कानपुर कृषि महाविद्यालय की पुरानी बीज परीक्षण प्रयोगशाला में अंतिम जर्मिनेशन ट्रे के बाद तीसरे वर्ष की छात्रा ईशा ने उन्नाव के लैब अटेंडेंट को वह प्रतिशत दिया जो किसी रजिस्टर या हॉस्टल हाजिरी में कभी नहीं चढ़ता

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कानपुर कृषि महाविद्यालय की पुरानी बीज परीक्षण प्रयोगशाला गर्मियों की छुट्टी से एक रात पहले भी वैसी ही गंध देती थी जैसी पचास साल से दे रही थी। गीली रूई, फटी हुई जर्मिनेशन ट्रे, फॉर्मेलिन का हल्का तीखापन और पुरानी छत से टपकती पसीने की बूँदें। तीसरे वर्ष की छात्रा ईशा वर्मा अंतिम लॉट की मक्का की ट्रे गिन रही थी। रजिस्टर में सिर्फ तीन कॉलम थे: किस्म, प्रतिशत, तारीख। जो उस रात होने वाला था, उसके लिए कोई कॉलम नहीं था।

लैब अटेंडेंट राजू उन्नाव से आया था। बाईस साल का, मोटा कंधा, उंगलियों पर बीज का काला दाग जो साबुन से नहीं उतरता था। वह शाम को ट्रे धोता था और रात को ताला लगाता था। ईशा को पता था कि वॉचमैन नौ बजे गेट पर सो जाता है। वह जानबूझकर अंतिम ट्रे छोड़ती थी।

रात साढ़े नौ बजे पंखा बंद हो गया। ईशा ने सफेद लैब कोट के बटन खोले। अंदर सफेद कॉटन की कमीज थी, पसीने से चिपक रही थी। राजू दरवाजे के पास खड़ा था। ईशा ने बिना मुड़े कहा, राजू, रोशनी मत जलाओ। सिर्फ पीछे वाली खिड़की खुली रहने दो।

राजू करीब आया। उसकी साँस में बीडी और मिट्टी का स्वाद था। ईशा ने उसका हाथ अपनी कमर पर रखा। राजू की हथेली मोटी थी, नाखून कटे हुए। उसने ईशा की कमीज के नीचे हाथ घुसाया। ईशा की छाती छोटी लेकिन भारी थी, निप्पल पहले से कड़े। राजू ने अंगूठे से निप्पल दबाया। ईशा की कमर लचक गई।

कमीज ऊपर उठी। राजू ने मुँह लगा दिया। जीभ गोल गोल घूम रही थी, दाँत हल्के काट रहे थे। ईशा ने उसके बाल पकड़ लिए। और जोर से चूस साले, आज कोई हाजिरी नहीं है। राजू ने दाँत और जोर से दबाए। ईशा की आवाज प्रयोगशाला की काँच की अलमारियों में गूँजी।

ईशा ने राजू की पैंट का बटन खोला। लंड पहले से तना हुआ था, मोटा, नसों वाली, सिर लाल। ईशा झुकी और मुँह में ले लिया। स्वाद नमक और पसीने का था। उसने गला खोला और पूरा अंदर तक ले गई। राजू की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। उसने सिर दबाया। ईशा की आँखों से पानी निकला लेकिन उसने मुँह नहीं छोड़ा। गला खड़खड़ा रहा था, लार टपक रही थी।

राजू ने उसे उठाया और जर्मिनेशन टेबल पर लिटा दिया। टेबल पर गीली रूई और बीज बिखरे थे। ईशा की सलवार नीचे खिसकी। पैंटी पहले से गीली थी। राजू ने पैंटी एक तरफ सरकाई और दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। ईशा की चूत तंग थी, गरम, फिसलन भरी। राजू की उंगलियाँ अंदर बाहर हो रही थीं, अंगूठा चूत के ऊपर के दाने पर रगड़ रहा था। ईशा की जाँघें काँप रही थीं।

राजू झुका और जीभ लगा दी। उसने चूत चाटी जैसे कोई आदमी प्यासा कुआँ चाटे। ईशा की कमर टेबल से उठी। जीभ अंदर घुसी, नाक चूत के ऊपर दब गई। ईशा ने उसकी गर्दन पकड़कर और जोर से दबाया। चाट साले चाट, आज पूरा रस निकाल। राजू ने दोनों हाथों से जाँघें फैला दीं और जीभ और गहरी कर दी।

ईशा आई। शरीर ऐंठा, चूत राजू के मुँह पर दब गई, रस बह निकला। राजू ने सब चाट लिया। फिर वह खड़ा हुआ। लंड चमक रहा था। उसने ईशा की टाँगें कंधे पर चढ़ाईं और एक झटके में लंड अंदर घुसा दिया। ईशा चीखी। दर्द और मजे का मिश्रण था। राजू रुका नहीं। उसने धक्के लगाने शुरू किए। टेबल खड़खड़ा रही थी, ट्रे गिर रही थीं।

राजू गंदी बातें बोल रहा था। तेरी यह पढ़ी लिखी चूत आज उन्नाव वाले के लंड की गुलाम है। ईशा जवाब दे रही थी। हां गुलाम है, और जोर से झोंक, आज कोई प्रोफेसर नहीं है। राजू ने ईशा के गाल पर थप्पड़ मारा। ईशा की आँखें चमक उठीं। और मार। राजू ने दूसरा थप्पड़ मारा और कमर और जोर से पटकी।

उन्होंने पोजीशन बदली। ईशा पेट के बल लेटी, हाथ टेबल के किनारे पकड़े। राजू पीछे से घुसा। यह और गहरा था। उसने ईशा के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। ईशा की गर्दन तन गई। राजू का लंड पूरा अंदर जा रहा था, अंडे उसकी गांड से टकरा रहे थे। हर धक्के के साथ ईशा की छाती टेबल से रगड़ खा रही थी, निप्पल गीली रूई में दब रहे थे।

राजू ने ईशा की गांड पर थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गया। फिर उसने अंगूठा गीला करके गांड के छेद पर दबाया। ईशा सहम गई लेकिन पीछे नहीं हटी। राजू का अंगूठा धीरे से अंदर गया। दो छेद एक साथ भरे हुए। ईशा पागल हो रही थी। आवाजें अब काबू में नहीं थीं।

वे फर्श पर गिरे। पुरानी टाइल्स ठंडी थीं। ईशा ऊपर बैठ गई। उसने लंड पर बैठकर खुद हिलना शुरू किया। स्तन राजू के चेहरे पर झूल रहे थे। राजू मुँह से निप्पल पकड़ता और काटता। ईशा की कमर गोल घूम रही थी। उसने राजू का हाथ अपनी गर्दन पर रखा। दबा। राजू ने दबाया। ईशा की साँस रुक गई, आँखें पलकें चढ़ीं, फिर वह फिर से आई। चूत राजू के लंड को निचोड़ रही थी।

राजू पलट गया। उसने ईशा को चारों तरफ से मोड़ा। घुटने छाती से लगे, गांड ऊपर। राजू ने फिर से घुसाया, इस बार और तेज। ईशा की आवाज दबी हुई थी क्योंकि मुँह टाइल्स से लगा था। राजू ने कमर पकड़कर झटके लगाए जैसे कोई आदमी अनाज की बोरी पटकता है। पसीना दोनों के शरीर से टपक रहा था, फर्श पर छोटे तालाब बन रहे थे।

ईशा ने कहा, मुँह में दे। राजू निकला और ईशा के सामने खड़ा हो गया। ईशा घुटनों के बल बैठी और मुँह खोल दिया। राजू ने लंड अंदर ठूंस दिया। गला भरा, आँखों से आँसू। राजू ने सिर पकड़कर हिलाया। फिर वह निकला और ईशा के चेहरे, छाती और खुली चूत पर गिरने लगा। गाढ़ा, गर्म, बहुत। ईशा ने जीभ से अपने होंठ चाटे और बाकी उंगलियों से चूत पर मल लिया।

वे कुछ देर लेटे रहे। पंखा अभी भी बंद था। खिड़की से दूर की रेलवे लाइन की सीटी आ रही थी। ईशा ने कमीज पहनी लेकिन बटन नहीं लगाया। राजू पैंट पहन रहा था। ईशा ने कहा, रजिस्टर में लिख देना Germination ninety two percent. बाकी कुछ मत लिखना।

राजू हंसा। वह ताला लेकर बाहर गया। ईशा अकेली रह गई। टेबल पर एक ट्रे अभी भी गीली थी। उसने उस ट्रे को भी रजिस्टर में पूरा लिखा। शरीर में दर्द था, चूत सूजी हुई थी, गांड में अंगूठे का अहसास बाकी था, मुँह में स्वाद बाकी था।

अगली सुबह लैब साफ थी। प्रोफेसर ने रजिस्टर देखा और सिर हिलाया। अच्छा काम है ईशा। ईशा ने सफेद कोट के नीचे वही कमीज पहनी हुई थी। कमीज के अंदर निप्पल अभी भी संवेदनशील थे। राजू गलियारे में ट्रे ढो रहा था। दोनों की नजर मिली। कोई मुस्कान नहीं, कोई बात नहीं। सिर्फ वह रात जो किसी उपस्थिति पंजी या बीज प्रमाण पत्र पर कभी नहीं चढ़ती।

छुट्टियों के पहले दिन ईशा घर नहीं गई। उसने लैब की चाबी अपने पास रख ली। राजू शाम को फिर आया। इस बार उन्होंने स्टोर रूम में किया, जहाँ पुराने बीज के बोरे रखे थे। बोरे खड़खड़ाए, धूल उड़ी, ईशा की पीठ बोरे से रगड़ खाई। राजू ने इस बार बिना पूछे गांड में भी डाला। धीरे धीरे, फिर पूरा। ईशा ने मुँह बोरे में दबाया और सह लिया, फिर मजा लेने लगी। राजू अंदर गिर गया। गर्म, गहरा। ईशा की आँखें बंद थीं।

तीसरी रात उन्होंने छत पर किया। गर्म हवा, दूर शहर की बत्तियाँ। ईशा नंगी खड़ी थी, राजू पीछे से। हवा में उनकी आवाजें उड़ रही थीं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। राजू ने गर्दन काटी, कमर पकड़ी, लंड पूरा अंदर तक। ईशा की टाँगें काँप रही थीं लेकिन वह झुकी रही।

चौथी सुबह ईशा ट्रेन पकड़ने वाली थी। राजू स्टेशन नहीं आया। लैब के ताले पर एक छोटा सा कागज था। कोई नाम नहीं। सिर्फ एक पंक्ति: अगले सेमेस्टर पहली ट्रे मेरे नाम लिख देना। ईशा ने कागज जेब में रख लिया। ट्रेन में बैठकर उसने खिड़की से कानपुर के पुराने गोदाम देखे। शरीर अभी भी याद कर रहा था। चूत अभी भी हल्की सूजी थी। मुँह में रस का स्वाद नहीं था लेकिन याद थी।

घर पहुँचकर माँ ने पूछा, लैब का काम पूरा हो गया? ईशा ने हाँ कहा। रजिस्टर में सब पूरा है। जो रजिस्टर में नहीं था, वह उसके शरीर के अंदर पूरा था। वह रातें किसी अंकुरण प्रतिशत की तरह मापी नहीं जा सकती थीं। वे सिर्फ उस पुरानी प्रयोगशाला की गीली ट्रे, बंद पंखे और उन्नाव वाले मोटे हाथों की कहानी थीं।

ईशा ने छुट्टियों में कई बार वह रात दोहराई दिमाग में। राजू का लंड, थप्पड़, गांड में अंगूठा, मुँह में गिरा हुआ रस। हर बार शरीर गर्म हो जाता। वह जानती थी अगला सेमेस्टर आते ही लैब फिर उसी गंध से भर जाएगी। और राजू फिर ट्रे धोएगा। और वह फिर अंतिम ट्रे छोड़ देगी।

कॉलेज कैंपस की दीवारें बहुत कुछ देखती हैं लेकिन बीज परीक्षण प्रयोगशाला की वह चार रातें दीवारों ने भी दर्ज नहीं कीं। कोई सीसीटीवी नहीं था, कोई हाजिरी नहीं थी, कोई गवाह नहीं था सिवाय गीली रूई और गिरी हुई मक्का की ट्रे के। ईशा ने डिग्री के लिए पढ़ाई की। राजू ने ताला लगाया। दोनों ने वह लिया जो रजिस्टर के तीन कॉलम में फिट नहीं बैठता था।

बाद के सालों में ईशा ने कभी उस लैब का जिक्र नहीं किया। राजू ने भी नहीं। लेकिन जब भी मक्का का मौसम आता, ईशा की उंगलियाँ अपने आप बटन की तरफ जातीं। शरीर याद रखता है जो कागज नहीं रखते। कानपुर की वह पुरानी लैब अब नई मशीनों से भर गई है। पंखा बदला जा चुका है। लेकिन किसी गर्म रात अगर कोई अंतिम ट्रे छोड़ दे, तो वही गंध वापस आ जाती है। गीली रूई, पसीना, और वह आवाज जो उपस्थिति पंजी में कभी दर्ज नहीं होती।

ईशा अब स्नातक है। राजू अभी भी अटेंडेंट है। कभी कभी कैंपस में नजर मिलती है। दोनों मुस्कुराते नहीं। सिर्फ आँखें बताती हैं कि एक बार जर्मिनेशन टेबल पर दुनिया खत्म हो गई थी और फिर से शुरू हुई थी। वह शुरुआत किसी सिलेबस में नहीं थी। वह सिर्फ दो शरीर और एक बंद प्रयोगशाला की सच्ची, गंदी, पूरी कहानी थी।

और कहानी यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि शरीर भूलता नहीं। ईशा की नींद में कभी कभी टेबल खड़खड़ाती है, राजू के धक्के लौटते हैं, थप्पड़ की गर्मी गाल पर बैठ जाती है। वह जागती है, पानी पीती है, और फिर सो जाती है इस सोच के साथ कि कुछ प्रतिशत अंकुरण के बाहर भी जिंदगी उगती है। पूरी, गंदी, और रजिस्टर से आजाद।

कानपुर की गर्मी फिर आएगी। लैब फिर महकेगी। कोई नई छात्रा अंतिम ट्रे छोड़ेगी या नहीं, यह आने वाला सेमेस्टर तय करेगा। लेकिन ईशा और राजू की वह रात अब किसी और के रजिस्टर में नहीं चढ़ेगी। वह सिर्फ उनके शरीर के अंदर अंकुरित है, हमेशा के लिए।

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