कॉलेज फेस्ट की उस पागल रात में जब हमने खाली ऑडिटोरियम में सब कुछ कर डाला
रात के लगभग दो बज रहे थे। कॉलेज फेस्ट की आखिरी पार्टी खत्म हो चुकी थी। ज्यादातर छात्र होस्टल लौट चुके थे। ऑडिटोरियम का बैकस्टेज अभी भी हल्की रोशनी में डूबा था।
कीर्ति अभी भी अपनी परफॉर्मेंस वाली ड्रेस में थी। पसीने से बाल चेहरे पर चिपक गए थे। तभी पीछे से आवाज आई—
“अकेली यहाँ, रांड?”
रुद्र था। थर्ड ईयर का, लंबा, मोटा जिस्म वाला, और फेस्ट का ऑर्गनाइजर। दोनों पिछले दो दिनों से एक-दूसरे को घूर रहे थे लेकिन बात नहीं हुई थी।
कीर्ति ने मुड़कर देखा। “तू भी नहीं गया?”
रुद्र पास आया। “जाऊँ कहाँ? तेरी चूत यहाँ खड़ी है।”
दोनों के बीच सिर्फ दो कदम की दूरी थी। संगीत की आखिरी गूँज अभी भी कानों में बची हुई थी। रुद्र ने एक कदम और बढ़ाया। कीर्ति पीछे नहीं हटी। अगले ही पल रुद्र ने उसका चेहरा पकड़कर जोर से चूमा। जीभ अंदर घुसा दी, मुँह चूसने लगा।
चुंबन में थकान थी, उत्साह था और बहुत सारी दबी हुई हवस। कीर्ति की उंगलियाँ रुद्र की टी-शर्ट में घुस गईं। रुद्र ने उसकी ड्रेस का जिपर पीछे से खोला। ड्रेस कंधों से नीचे सरक गई। रुद्र ने ब्रा के हुक खोले और उसके मोटे-मोटे स्तनों को दोनों हाथों से पकड़ लिया, मसलने लगा।
“यहाँ… ऑडिटोरियम में?” कीर्ति ने हांफते हुए पूछा।
“ताला लगा है बाहर, रंडी। तेरी चूत यहीं फाड़ूँगा,” रुद्र ने कहा और निप्पल को मुँह में ले लिया। जोर से चूसा, काटा। कीर्ति की कमर तन गई। रुद्र ने उसकी ड्रेस पूरी तरह नीचे गिरा दी। पैंटी के ऊपर से हाथ फेरने लगा। कीर्ति पहले से गीली थी।
रुद्र ने उसे बैकस्टेज के पुराने सोफे पर धकेला। पैंटी को एक झटके में नीचे खींच लिया। फिर अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। कीर्ति की टाँगें काँपने लगीं। रुद्र की जीभ तेज थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, फिर तीन उंगलियाँ अंदर डालकर घुमा रहा था, पेल रहा था।
कीर्ति ने अपना मुँह हाथ से बंद कर लिया। लेकिन सिसकियाँ दब नहीं पा रही थीं। “आह्ह… जीभ और अंदर… मेरी चूत चाट… जोर से…”
थोड़ी देर में उसका शरीर अकड़ गया। पहला चरम ऑडिटोरियम की खामोशी में गूँज गया। चूत से रस निकल रहा था।
रुद्र ऊपर आया। उसने अपनी जींस खोली। कीर्ति की आँखें उसके कड़े, मोटे लंड पर टिक गईं। रुद्र ने उसकी टाँगें फैलाईं और एक ही धक्के में पूरा लंड अंदर तक घुस गया।
कीर्ति चीख पड़ी। “आह्ह… रुद्र… बहुत मोटा है… मेरी चूत फट जाएगी…”
रुद्र रुका नहीं। उसने कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। सोफा चरमरा रहा था। कीर्ति की छाती हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी। रुद्र ने झुककर उसके स्तनों को फिर मुँह में लिया और दाँतों से काटने लगा।
कीर्ति की आवाजें अब साफ सुनाई दे रही थीं। “और जोर से पेल… मेरी चूत फाड़… लंड पूरा अंदर…”
रुद्र ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया। “चुप रह रंडी… सिर्फ चूत हिला…”
थोड़ी देर बाद रुद्र ने उसे पलटा। कीर्ति अब घुटनों के बल थी। रुद्र ने पीछे से फिर से पूरा लंड अंदर घुस दिया। उसने कीर्ति के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ कीर्ति की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
“और जोर से… रुद्र… तोड़ दे… मेरी चूत फाड़ डाल… इस मोटे लंड से…” कीर्ति चिल्ला रही थी।
रुद्र ने उसके नितंबों पर थप्पड़ मारे। आवाज बैकस्टेज में गूँज रही थी। “ले… रांड… पीछे से चोद रहा हूँ… और जोर से धकेल…”
कीर्ति और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी। दूसरा चरम इतना तेज था कि कीर्ति के पैर लड़खड़ा गए। रुद्र ने भी उसी समय उसके अंदर ही पूरा गरम वीर्य छोड़ दिया। चूत से वीर्य बाहर निकलने लगा।
दोनों हांफते हुए सोफे पर गिरे रहे। ऑडिटोरियम की बड़ी सी खामोशी में सिर्फ उनकी साँसें गूँज रही थीं।
कुछ देर बाद कीर्ति ने धीरे से कहा, “एक बार और। सुबह होने से पहले। मेरी चूत अभी और लंड ले सकती है।”
रुद्र मुस्कुराया। उसने कीर्ति को उठाया और दीवार से सटा दिया। एक टाँग ऊपर उठाई और खड़े-खड़े पूरा लंड अंदर घुस गया। कीर्ति की पीठ दीवार से रगड़ रही थी। रुद्र के धक्के तेज और गहरे थे। कीर्ति की आवाजें अब दबाने की कोशिश भी नहीं हो रही थीं।
“आह्ह… जोर से पेल… दीवार से सटा के चोद… मेरी चूत तोड़ दे…”
तीसरा चरम दोनों का लगभग एक साथ आया। रुद्र ने फिर से उसके अंदर ही गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया। कीर्ति की टाँगें काँप रही थीं। चूत से वीर्य टपक रहा था।
रात के तीन बज गए थे जब दोनों ने कपड़े सही किए। कीर्ति की ड्रेस अभी भी आधी खुली थी। रुद्र ने उसके बाल पीछे किए।
“कल होस्टल में?” रुद्र ने पूछा।
कीर्ति ने सिर हिलाया। “कल… और उसके बाद भी। लेकिन अगली बार किसी कमरे में। यहाँ दिल नहीं लगा। अगली बार और जोर से चोदना… मेरी चूत और फाड़ना।”
रुद्र हँसा। “ठीक है। अगली बार तेरे कमरे में। पूरा रात तेरी चूत पे लंड चलाऊँगा।”
दोनों ऑडिटोरियम से निकले। बाहर हल्की ठंड थी। फेस्ट की पागल रात खत्म हो चुकी थी, लेकिन दोनों के शरीर पर जो निशान थे, वे अभी भी गर्म थे। कीर्ति की जाँघों पर वीर्य के निशान अभी भी थे।
कीर्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज रात हमने वाकई पागलपन कर दिया। मेरी चूत अभी भी फड़क रही है।”
रुद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया। “और ये पागलपन अब सिर्फ एक रात का नहीं रहने वाला। अब रोज तेरी चूत फाड़ूँगा।”
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