वाराणसी की पुरानी वेधशाला के गुंबद में ग्रहण की रात तीसरे वर्ष की छात्रा ने नैनीताल से आए खगोल सहायक को वह छाया दी जो किसी लॉगबुक या हॉस्टल की हाजिरी में कभी नहीं चढ़ती
वाराणसी की पुरानी वेधशाला का गुंबद शहर की छत से ऊँचा था लेकिन शहर के शोर से कटा हुआ था। तीसरी मंजिल की सीढ़ियाँ पत्थर की थीं, किनारे घिसे हुए थे। दीवार पर पीतल की पट्टिका जमी हुई थी जिस पर सन् उन्नीस सौ बयालीस का साल अभी भी पढ़ा जा सकता था। अंदर हवा ठंडी थी। दूरबीन का बड़ा लेंस काले कपड़े से ढका रहता था। कागज की फाइलें लकड़ी की अलमारियों में बंद थीं। खिड़कियों पर लोहे की जाली थी जिसके छेदों से गंगा की तरफ की बत्ती कभी कभी झलकती थी।
कव्या मिश्रा तीसरे वर्ष की भौतिकी की छात्रा थी। उसके बाल घने काले थे, माथे पर अक्सर पेंसिल की धार रहती थी। वह रात की ड्यूटी पर इसलिए रहती थी क्योंकि प्रोफेसर ने कहा था कि आंशिक ग्रहण की पट्टियाँ उसी रात साफ करनी हैं। हॉस्टल की वार्डन ने दस बजे तक लौटने को कहा था। कव्या ने रजिस्टर में समय लिख दिया और ऊपर चली गई।
नैनीताल वेधशाला से सहायक खगोलज्ञ आर्यन जोशी उसी सप्ताह आए थे। उनकी उम्र सत्ताईस के करीब थी। कंधे चौड़े थे, आवाज धीमी। वे प्लेटों की कैलिब्रेशन जाࠑचने आए थे। दिन में दोनों ने एक दूसरे से सिर्फ उपकरण की भाषा में बात की थी। रात को गुंबद में सिर्फ दो लोग बचे।
बिजली की लाइन कमजोर थी। एक बल्ब पीला जल रहा था। आर्यन ने लेंस का कपड़ा हटाया। कव्या ने नोटबुक खोली। उनके हाथ पास आए जब एक स्क्रू कसना पड़ा। कव्या की साࠑस थोड़ी तेज हो गई। उसने सोचा यह थकान है। आर्यन ने पूछा, पानी पिएगी। उसने हाࠑ कहा। बोतल की टोपी खुलते समय दोनों की उंगलियाࠑ छू गईं। छूना छोटा था लेकिन कमरे में ठंडी हवा के बावजूद कव्या के गले में गरमी चढ़ आई।
ग्रहण की पहली छाया का समय निकट था। उन्होंने दूरबीन घुमाई। कव्या ने ऐपिस पर आࠑख लगाई। आर्यन पीछे खड़े थे। उनकी साࠑस उसके बालों तक आ रही थी। कव्या ने कहा, थोड़ा बाࠑएँ। आर्यन ने पहिया घुमाया। उनकी छाती उसके कंधे से सटी। कव्या ने शरीर को आगे नहीं खिसकाया। वह खड़ी रही। उस स्पर्श में कोई आकस्मिकता नहीं रह गई थी। दोनों जानते थे।
नीचे सड़क पर रिक्शा की घंटी बजी और दूर हो गई। गुंबद में घड़ी की सुई धीरे चली। कव्या ने नोटबुक बंद की। उसने कहा, डेटा बाद में लिख लेंगे। आर्यन ने पूछा, हॉस्टल का समय। कव्या ने उत्तर दिया, वार्डन सो चुकी होगी। यह वाक्य छोटा था लेकिन दरवाजे की चाबी की तरह काम कर गया।
आर्यन ने उसका चेहरा देखा। कव्या की आࠑखों में शर्म थी और उसके नीचे एक जिद भी थी जो कक्षा की लड़की में कम दिखती है। उसने आर्यन की कमीज का पहला बटन छुआ। आर्यन ने हाथ नहीं हटाया। कव्या ने दूसरा बटन खोला। छाती के बाल दिखे। उसने होࠑठ भींचे। आर्यन ने उसकी कमर पकड़ी। पकड़ नर्म नहीं थी। कव्या की साࠑस टूटी।
उन्होंने एक दूसरे को चूमा। पहला चुंबन धीमा था, दूसरा गहरा। कव्या की जीभ आर्यन के मुࠑह में गई। आर्यन ने उसके बाल पीछे कए और गर्दन पर मुࠑह रखा। कव्या की आवाज दबी निकली। उसने आर्यन की पीठ दबोची। कुर्ता ऊपर उठा। आर्यन ने ब्लाउज के हुक खोले। स्तन बाहर आए, भारी, निप्पल कड़े। आर्यन ने एक निप्पल मुࠑह में लिया। कव्या की कमर झुकी। उसने आर्यन का सिर पकड़ रखा।
फ़र्श पर पुरानी चटाई थी जिसे सर्वे के लोग कभी बिछाते थे। कव्या लेट गई। आर्यन ने सलवार नीचे की। कव्या की जाࠑघें काࠑपीं। पैंटी गीली थी। आर्यन ने उंगली रखी। कव्या ने दाࠑत भीࠑचे। उसने कहा, धीरे। आर्यन ने धीरे किया फिर तेज। कव्या की आवाज गुंबद की दीवार से टकराई और दब गई। आर्यन ने जीभ नीचे ले गए। कव्या ने मुࠑह हाथ से दबाया। उसकी कमर उठी। वह पहली बार किसी के मुࠑह से भीग रही थी और शर्म के साथ मजा एक साथ चढ़ रहा था।
आर्यन ने पेंट खोली। लिंग भारी और तना हुआ था। कव्या ने हाथ लगाया। उसने सोचा यह उससे बड़ा है जितना उसने अकेले कमरे में कल्पना की थी। उसने मुࠑह पास किया। आर्यन की साࠑस कड़क गई। कव्या ने सिर आगे पीछे पीछे किया। आࠑखें नम थीं। आर्यन ने उसके बाल पकड़े लेकिन जोर से नहीं खींचा। कव्या ने खुद गहरा लिया जब तक गला भरा।
आर्यन ने उसे चटाई पर लिटाया। घुसते समय कव्या की आࠑखें सिकुड़ गईं। दर्द था। उसने नाखून आर्यन की पीठ पर गाड़े। आर्यन रुके। कव्या ने सिर हिलाया, अंदर रखो। धीरे धीरे पूरा गया। कव्या की साࠑस काࠑपी। फिर आर्यन हिलने लगे। पहले छोटे धक्के, फिर लंबे। कव्या की आवाज खुलने लगी। गुंबद में गूࠑज थी इसलिए उसने आर्यन के कंधे में मुࠑह दबाया।
उन्होंने करवट बदली। कव्या ऊपर बैठी। स्तन आर्यन के मुࠑह के पास आए। उसने कमर घुमाई। आर्यन ने उसके नितंब दबाये। कव्या की गति तेज हुई। पसीना माथे पर था। दूरबीन के लेंस पर धुंध नहीं थी लेकिन कमरे की हवा भारी हो गई थी। कव्या चरम पर पहुࠑची। शरीर सख्त हुआ, फिर काࠑपा। उसने आर्यन का नाम नहीं लिया। सिर्फ एक दबी चीख निकली।
आर्यन ने उसे पेट के बल मोड़ा। पीछे से घुसे। कव्या की छाती चटाई से सटी। आर्यन की पकड़ कमर पर मजबूत थी। धक्के गहरे थे। कव्या की आवाज टूटी टूटी निकली। उसने कहा, और। आर्यन ने और दिया। थप्पड़ हल्का पड़ा नितंब पर। कव्या सहम गई फिर कमर और पीछे की। दूसरा थप्पड़ पड़ा। कव्या गीली और भी हुई।
आर्यन बाहर निकले और कव्या के मुࠑह के पास आए। कव्या ने मुࠑह खोला। आर्यन झड़ गए। कुछ ठुड्डी पर गिरा, कुछ जीभ पर। कव्या ने निगला। आࠑखें बंद थीं। उसके हाथ काࠑप रहे थे। आर्यन बैठ गए। दोनों की साࠑसें एक लय में नहीं थीं। गुंबद की घड़ी ने पौन बजाये।
कव्या ने कपड़े समेटे। ब्लाउज के हुक लगते समय उंगली फ़िसली। आर्यन ने मदद की। यह मदद चुंबन से अधिक निजी लगी। कव्या ने कहा, लॉगबुक में सिर्फ तापमान लिखना। आर्यन ने सिर हिलाया। उन्होंने तापमान लिखा जो असल में उससे दो डिग्री अधिक था। कोई नहीं जाࠑचता।
नीचे उतरते समय सीढ़ी पर कव्या रुक गई। आर्यन पीछे थे। उसने पीछे हाथ बढ़ाया। आर्यन ने हाथ पकड़ा। कुछ देर सिर्फ हाथ। फिर छोड़ा। गेट पर चौकीदार सोया था। कव्या हॉस्टल की तरफ चली। रास्ते में गंगा की हवा आई। उसके अंदर अभी भी आर्यन की गर्मी थी।
दूसरे दिन कक्षा में कव्या ने नोट्स लिए जैसे हमेशा लेती है। आर्यन प्रयोगशाला में प्लेटें पैक कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा। देखा और काम पर लौटे। दोपहर को स्टोर रूम में जब फाइल माࠑगने गई तो दरवाजा अंदर से लगा। आर्यन ने उसे दीवार से सटाया। चुंबन जल्दी था। कव्या की सलवार एक तरफ हुई। आर्यन ने खड़े खड़े घुसाया। कव्या के एक पैर ने जमीन छोड़ी। दस मिनट में खत्म हुआ। कव्या की आवाज फाइल रैक में दब गई। कपड़े ठीक कए। बाहर गलियारे में लड़कियाࠑ बात कर रही थीं। किसी को पता नहीं चला।
तीसरे दिन ग्रहण की दूसरी पट्टी थी। रात फिर गुंबद में बीती। इस बार कव्या ने खुद आर्यन को कुर्सी पर बैठाया और गोद में बैठ गई। उसने आर्यन का मुࠑह अपने स्तनों पर रखा। आर्यन ने दाࠑत हल्के से लगाए। कव्या की कमर घूमी। उन्होंने फ़र्श पर फिर किया, फिर खिड़की की जाली के पास जहाࠑ शहर की बत्तियाࠑ छोटी लगती थीं। कव्या ने कहा, कोई देख नहीं सकता। आर्यन ने जवाब में और गहरा धक्का दिया। कव्या की हथेलियाࠑ जाली पर थीं। लोहे की ठंडक और शरीर की गर्मी एक साथ थीं।
आर्यन का काम चार दिन का था। चौथे दिन दोपहर वे स्टेशन जाने वाले थे। सुबह गुंबद में आखिरी जाࠑच थी। कव्या आई। दोनों ने बात कम की। कपड़े उतरे बिना लगभग नहीं रहे। आर्यन ने कव्या को गोद में उठाया। कव्या हल्की नहीं थी लेकिन उस क्षण वजन का हिसाब नहीं था। दीवार के खिलाफ किया। कव्या की एड़ियाࠑ आर्यन की पीठ पर थीं। चरम दोनों का करीब करीब एक साथ आया। आर्यन ने बाहर निकाला और कव्या की जाࠑघ पर छोड़ा। कव्या ने उंगली से उठाकर देखा जैसे कोई प्रयोग का अवशेष देख रही हो। फिर मुस्कुराई जो कक्षा में नहीं दिखती।
स्टेशन पर कव्या नहीं गई। हॉस्टल के कमरे में उसने खिडजकी से पंखा देखा। शरीर में दर्द हल्का था, याद तेज थी। उसने डायरी खोली। कुछ नहीं लिखा। डायरी में प्रयोग का तापमान था, छाया का कोण था, उस रात का कोण नहीं था।
एक महीने बाद एक पत्र आया प्रयोगशाला के नाम। प्लेटें स्वीकृत हो गई थीं। नीचे एक पंक्ति निजी नहीं थी और फिर भी कव्या ने उसे निजी पढ़ा। आर्यन ने लिखा था कि वाराणसी की आर्द्रता लेंस के लिए ठीक नहीं पर कुछ आࠑकड़े दोबारा लेने पड़ सकते हैं। कव्या ने पत्र फाइल में रखा। रात को उसने वही कुर्ता पहना जो उस रात पहना था। अकेली लेटी। हाथ नीचे गया। गुंबद की ठंड याद आई, आर्यन की पकड़ याद आई, थप्पड़ की गर्मी याद आई। वह काࠑपी और मुࠑह तकिया में दबाया ताकि रूममेट न सुने।
सर्दी में नैनीताल से एक छोटा कैलिब्रेशन बॉक्स आया। अंदर फ़ोम था और एक पर्ची। पर्ची पर सिर्फ एक संख्या थी, उस रात का समय। कव्या ने पर्ची नोटबुक के बीच रखी। कोई और पढ़ता तो समय समझता, वह स्पर्श समझती।
परीक्षा के दिनों में वह वेधशाला कम गई। एक शाम प्रोफेसर ने चाबी दी कि अलमारी बंद कर दे। अकेली गुंबद में खड़ी हुई तो शरीर ने खुद याद किया। उसने दरवाजा अंदर से लगाया। कपड़े पूरे नहीं उतारे। दीवार से पीठ लगाई। हाथ से काम किया और आर्यन का नाम दबे स्वर में लिया। जब आई तो आࠑखें गीली थीं। लॉगबुक में उस शाम का तापमान भी दो डिग्री अधिक लिखा।
गर्मियों में एक संगोष्ठी हरिद्वार में हुई। कव्या गई। भीड़ में आर्यन दिखे। दोनों ने औपचारिक नमस्ते किया। चाय के बाद गलियारे के मोड़ पर आर्यन ने उसका हाथ एक पल के लिए पकड़ा। होटल की तीसरी मंजिल पर कमरा आर्यन का था। कव्या गई। दरवाजा बंद हुआ। कपड़े फ़र्श पर गिरे। इस बार समय अधिक था। उन्होंने बिस्तर पर किया, बाथरूम की दीवार पर किया, खिडजकी के पर्दे के पीछे किया। कव्या ने कहा, हॉस्टल नहीं है आज। आर्यन ने जवाब में उसे और खोला। रात दो बजे कव्या अपने कमरे लौटी। लिफ्ट में उसका प्रतिबिंब थका और भरा हुआ था।
वापसी के बाद वाराणसी की गलियाࠑ वही थीं। वेधशाला वही थी। कव्या की नोटबुक में आࠑकड़े साफ थे। जो चीज साफ नहीं थी वह शरीर की स्मृति थी जो हर बार गुंबद की सीढ़ी चढ़ते ही जग जाती। उसने किसी सहेली से नहीं कहा। सहेली पूछती तो कहती, ड्यूटी लंबी हो जाती है। यह वाक्य झूठ भी था और पूरा सच भी।
वर्ष के अंत में आर्यन का तबादला एक और केंद्र की तरफ की चर्चा आई। कव्या ने सुना और कुछ नहीं कहा। अंतिम सप्ताह वे फिर वाराणसी आए एक दिन के लिए। गुंबद में शाम ढल रही थी। दोनों ने दूरबीन नहीं खोली। चटाई पर बैठे। फिर लेटे। इस बार बात भी हुई। कव्या ने कहा, मैं शादी के बारे में घर वाले पूछते हैं। आर्यन चुप रहे। फिर उन्होंने शरीर से उत्तर दिया जो भाषा से साफ नहीं होता। कव्या रोई नहीं। चरम के बाद उसकी आࠑखों में पानी था जो पसीने से मिल गया।
जब आर्यन गए तो कव्या ने गुंबद की खिडजकी से गंगा की रेखा देखी। शहर जल रहा था अपने दीयों से। उसने लॉगबुक बंद की। पेंसिल नीचे रखी। सीढ़ियाࠑ उतरते समय पत्थर ठंडे थे। गेट के बाहर हवा गरम थी। उसने सोचा कुछ चीजें रजिस्टर की भाषा में नहीं आतीं। ग्रहण की छाया आती है और चली जाती है। शरीर पर जो छाया रह जाती है वह नाप की फाइल में नहीं चढ़ती।
हॉस्टल के कमरे में रूममेट सो रही थी। कव्या ने पंखा चलाया। छत की तरफ देखा। आࠑखें बंद कीं। आर्यन की साࠑस अभी भी कान के पास लग रही थी हालांकि ट्रेन निकल चुकी थी। उसने करवट बदली। जाࠑघों के बीच अभी हल्की याद थी। सुबह कक्षा थी। वह जाएगी, नोट्स लेगी, प्रोफेसर को उत्तर देगी। रात का गुंबद उसके अंदर एक अलग प्रयोगशाला की तरह बंद रहेगा जिसका डेटा सिर्फ दो शरीर जानते हैं।
सालों बाद यदि कोई पुरानी फ़ाइल खोलेगा तो तापमान की पंक्तियाࠑ दिखेंगी, पट्टियों की संख्या दिखेगी, सहायक खगोलज्ञ का नाम दिखेगा। कव्या का नाम ड्यूटी रजिस्टर में दिखेगा। जो नहीं दिखेगा वह वह रात है जब लेंस ढका रहा और दो लोग एक दूसरे को उस तरह पढ़ रहे थे जैसे आकाश को पढ़ा जाता है, धीरे, गहरे, बिना इस डर के कि कोई और आࠑकड़ा माࠑग ले। वह छाया लॉगबुक में नहीं चढ़ी। हॉस्टल की हाजिरी में नहीं चढ़ी। वह दोनों के शरीर की निजी पट्टिका पर रह गई जहाࠑ स्याही पसीना होती है और मोहर दबी आवाज।
कव्या ने अंतिम बार गुंबद की चाबी प्रोफेसर को लौटाते समय मुस्कुराई। प्रोफेसर ने पूछा, सब बंद है न। उसने कहा, हाࠑ सर, सब बंद है। अंदर कुछ खुला रह गया था जिसका हिसाब कोई फ़ाइल नहीं माࠑगती। वाराणसी की रात फिर गंगा की तरफ बह निकली। वेधशाला का गुंबद काला छाया की तरह खड़ा रहा। उसके नीचे पत्थर की सीढ़ियाࠑ वैसी ही घिसी रहीं जैसी सन् बयालीस से घिस रही थीं। उन सीढ़ियों पर एक लडजकी चढ़ चुकी थी जो कक्षा में शांत थी और गुंबद में अपनी आवाज तक नहीं रोक पाई थी। यही फ़र्क रजिस्टर नहीं पकड़ता। यही फ़र्क कहानी बन जाता है जो कोई हाजिरी की स्याही से नहीं लिखता।
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