शादीशुदा शरीर की भूख जब पति के दोस्त के साथ एक रात की गलती ने दोनों को हमेशा के लिए बाँध दिया
रात के साढ़े बारह बज रहे थे। घर में सिर्फ एक बेडरूम की लाइट जल रही थी।
मेघा आईने के सामने खड़ी थी। साड़ी का पल्लू कंधे से उतर चुका था। ब्लाउज के ऊपर वाले हुक खुले हुए थे। उसने खुद को देखा—शादीशुदा औरत, तीस साल की, पति विदेश में प्रोजेक्ट पर था, और घर में अकेली।
दरवाजे पर दस्तक हुई।
मेघा का दिल जोर से धड़का। वह जानती थी कौन है। करण। पति का सबसे करीबी दोस्त। पिछले तीन दिनों से वह हर रात आता था—पहले सिर्फ बात करने, फिर सिर्फ बैठने, और अब…
उसने दरवाजा खोला। करण अंदर आया और पीछे से ताला लगा दिया। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। कोई नमस्ते नहीं, कोई बात नहीं।
करण ने एक कदम बढ़ाया। मेघा पीछे नहीं हटी। उसने उसका गला पकड़ा और जोर से होंठों पर मुँह रख दिया। चुंबन हिंसक था। दाँत, जीभ, होंठ—सब कुछ। मेघा की साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया।
करण ने उसे दीवार से सटा दिया। एक हाथ से उसका ब्लाउज ऊपर किया और ब्रा के ऊपर से ही स्तनों को जोर-जोर से मसलने लगा। मेघा की सिसकी निकल गई। करण ने ब्रा को नीचे खींचा और निप्पल को मुँह में ले लिया। दाँतों से काटा, फिर जोर से चूसा।
“करण… धीरे…” मेघा की आवाज काँप रही थी।
“धीरे नहीं होगा आज,” करण ने कहा और उसकी साड़ी को एक झटके में खोल दिया। पेटीकोट भी नीचे गिर गया। मेघा अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। करण ने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया।
बिस्तर पर पटकते ही उसने उसकी पैंटी फाड़ दी। मेघा की आँखें फटी रह गईं। करण ने उसकी दोनों जाँघें फैलाईं और बिना किसी प्रस्तावना के अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी।
मेघा की कमर उछल गई। करण की जीभ तेज और भूखी थी। वह उसके क्लिट को चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर जोर-जोर से आगे-पीछे करने लगा। मेघा के नाखून चादर को फाड़ रहे थे।
“आह्ह… करण… रुक… मैं…”
लेकिन करण नहीं रुका। उसकी उंगलियाँ और तेज हो गईं। मेघा का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली।
करण ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। मेघा की आँखें उसके कड़े अंग पर टिक गईं। करण ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में अंदर तक घुस गया।
मेघा चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत गहरा…”
करण ने जवाब में और जोर से धक्का मारा। बिस्तर चरमरा रहा था। हर धक्का इतना तीव्र था कि मेघा की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। करण ने उसके दोनों स्तनों को पकड़ रखा था और निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ रहा था।
मेघा की आवाजें अब घर में गूँज रही थीं। करण ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया। मेघा की आँखों में आँसू आ गए—दर्द और मजे का मिश्रण।
करण अचानक रुक गया। उसने मेघा को पलटा और घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से अंदर घुस गया। इस बार और गहरा। उसने मेघा के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ मेघा की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
“बोल… कितना चाहिए?” करण ने कान में कहा।
“पूरा… पूरा ले लो…” मेघा की आवाज टूट रही थी।
करण ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी ताकत से मारने लगा। मेघा का दूसरा चरम इतना तेज था कि उसके पैर काँपने लगे। करण ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म तरल भर गया। दोनों कुछ देर तक उसी पोजीशन में रहे।
साँसें थामने के बाद करण उसके बगल में लेट गया। मेघा की पीठ अभी भी काँप रही थी।
“ये गलत है,” मेघा ने धीरे से कहा।
“पता है,” करण ने जवाब दिया और उसके स्तन को फिर से मसलने लगा। “लेकिन तू रुक नहीं पाएगी। और न ही मैं।”
मेघा चुप रही। क्योंकि वह जानती थी—सच है।
अगली रात फिर वही हुआ। और उसके बाद वाली रात भी। करण अब हर रात आता। कभी जल्दी, कभी देर से। कभी सिर्फ एक घंटे के लिए, कभी सुबह तक।
एक रात मेघा ने खुद दरवाजा खोला और करण को अंदर खींच लिया। इस बार उसने खुद उसके पैंट के बटन खोले और घुटनों के बल बैठ गई। करण का अंग उसके मुँह में था। मेघा ने उसे गले तक लिया। आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन वह रुक नहीं रही थी। करण ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया।
थोड़ी देर बाद करण ने उसे उठाया और दीवार से सटा दिया। एक टाँग ऊपर उठाई और खड़े-खड़े अंदर घुस गया। मेघा की पीठ दीवार से रगड़ रही थी। करण के धक्के इतने तेज थे कि तस्वीरें हिलने लगीं।
“और जोर से… तोड़ दो…” मेघा चिल्ला रही थी।
करण ने उसकी दोनों टाँगें अपने हाथों में ले लीं और हवा में ही पकड़कर मारने लगा। मेघा का शरीर पूरी तरह उसके हाथों में था। चरम इतना तीव्र था कि मेघा की आवाज निकलना बंद हो गई। सिर्फ मुँह खुला रह गया।
करण ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया। दोनों फर्श पर बैठ गए। पसीने से लथपथ।
मेघा ने करण के कंधे पर सिर रखा। “पति कल आ रहा है…”
करण चुप रहा। फिर बोला, “तो आज रात भर मिलना है।”
और उस रात उन्होंने सच में रात भर मिला। बेडरूम, सोफा, फर्श, यहाँ तक कि बालकनी के अंधेरे में भी। हर बार करण और गहरा जाता, और हर बार मेघा और जोर से माँगती।
सुबह चार बजे जब करण जा रहा था, मेघा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“फिर कब?”
करण ने उसके गाल पर उँगली फेरते हुए कहा, “जब भी तू बुलाएगी। तेरा शरीर अब मेरा हो चुका है।”
मेघा ने कुछ नहीं कहा। बस दरवाजा बंद किया और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसके शरीर पर करण के नाखूनों और दाँतों के निशान थे। जाँघों के अंदर अभी भी उसका अंश बह रहा था।
उसने मुस्कुरा दिया।
शादीशुदा शरीर की भूख अब जाग चुकी थी। और वह जानती थी—ये भूख अब कभी नहीं सोएगी।
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