मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 3
दरवाज़े का हैंडल घुमा और सूरज मामा की आधी नींद में डूबी शक्ल दरवाज़े की झिरी से अंदर झाँकी। मौसी की चुदाई की इस कहानी का सबसे खतरनाक पल मेरी आँखों के सामने खड़ा था और मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा मामा उसकी आवाज़ सुन लेंगे। मौसी ने पलक झपकते ही नाइटी नीचे खींची और चेहरे पर ऐसी शांति ओढ़ ली जैसे यहाँ कुछ हुआ ही न हो।
"नैना, तुम ऊपर क्या कर रही हो?" मामा की आवाज़ में नींद घुली हुई थी, पर सवाल में धार थी। मौसी ने बिना एक पल गँवाए कहा, "नीचे कूलर बंद हो गया है, घुटन हो रही थी। सोचा ऊपर आकर देख लूँ, विक्रम को मच्छर काट रहे थे, पंखा तेज़ कर दूँ।" मैं चादर ताने सोने का नाटक कर रहा था, साँस रोककर, और मौसी की उँगलियाँ मेरी बाँह पर हल्के से दबी थीं, जैसे कह रही हों, हिलो मत।
मामा ने कमरे में नज़र दौड़ाई। पंखा सच में चल रहा था, खिड़की आधी खुली थी, और मैं चादर में लिपटा बेखबर सोया हुआ था। उन्होंने लंबी साँस ली, कुछ बुदबुदाए जो समझ नहीं आया, और दरवाज़ा भिड़ाकर सीढ़ियाँ उतर गए। उनके कदमों की आवाज़ नीचे जाकर थमी, फिर बेडरूम का दरवाज़ा बंद होने की धीमी आवाज़ आई।
मौसी बिस्तर के किनारे धम्म से बैठ गईं। उनके हाथ काँप रहे थे। "बच गए," उन्होंने फुसफुसाकर कहा, और उनकी आँखों में डर के साथ कुछ और भी था, एक अजीब सी चमक। "विक्रम, अगर आज पकड़े जाते तो?" मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। वह पसीने से तर था।
उन्होंने मेरा हाथ धीरे से छुड़ाया और खड़ी हो गईं। "सुनो," उनकी आवाज़ अब सख्त थी, "जब तक तुम्हारे मामा घर पर हैं, हम दोनों के बीच कुछ नहीं होगा। कोई नज़र, कोई इशारा, कोई रात की मुलाकात, कुछ नहीं। समझे?" मैंने सिर हिलाया, पर मेरे अंदर कुछ टूट सा रहा था। वह दरवाज़े तक गईं, पलटीं, और धीरे से बोलीं, "और हाँ, दरवाज़ा अंदर से बंद करके सोना।" फिर वह चली गईं।
उस रात मुझे नींद नहीं आई। पंखा घूमता रहा, मच्छर भिनभिनाते रहे, और मेरे दिमाग़ में बार बार वही पल घूमता रहा, मामा की शक्ल, मौसी की फुर्ती, और वह अधूरी रात जो शुरू होकर खत्म हो गई थी। सुबह जब मैं नीचे उतरा तो नाश्ते की मेज़ पर अजीब सी खामोशी थी। मामा अखबार पढ़ रहे थे, मौसी पराठे सेक रही थीं, और कोई किसी की आँखों में नहीं देख रहा था।
तभी मामा का फ़ोन बजा। दुबई से था। उन्होंने स्पीकर पर बात की और कमरा एकदम सुनसान हो गया। कंपनी का प्रोजेक्ट शारजाह में फिर से शुरू हो रहा था, और उन्हें तीन दिन में वापस लौटना था। फ़ोन रखते ही मामा ने कहा, "तीन दिन। फिर फ्लाइट।" मौसी के हाथ से कलछी छूटते छूटते बची।
मैंने मौसी की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वही चमक लौट आई थी जो रात को दरवाज़े वाले पल में दिखी थी। उन्होंने जल्दी से नज़रें झुका लीं, पर उनके होंठों के कोने में हल्की सी मुस्कान थी। मेरे सीने में धड़कन तेज़ हो गई। तीन दिन। बस तीन दिन का इंतज़ार था।
पहला दिन सबसे मुश्किल था। मौसी ने अपनी कसम निभाई, दिन भर उन्होंने मुझसे दूरी बनाए रखी। पर दोपहर को जब मामा बैंक के काम से बाहर गए, मौसी रसोई में अकेली थीं। मैं पानी लेने गया और वह सिंक के पास खड़ी थीं। उन्होंने बिना पलटे कहा, "मामा को कुछ शक नहीं हुआ, पर वह चौकन्ने हैं।" तभी उनके हाथ से छूटकर चम्मच गिरा, हम दोनों एक साथ झुके, और हमारे कंधे टकरा गए।
वह छुअन एक पल से ज़्यादा नहीं रही, पर मेरे पूरे बदन में करंट दौड़ गया। मौसी सीधी खड़ी हुईं, उनकी साँसें तेज़ थीं। "विक्रम," उन्होंने धीरे से कहा, "रात को दरवाज़ा बंद रखना, पर खिड़की खुली रखना।" इतना कहकर वह पल्लू सँभालती हुई बाहर चली गईं। मैं समझ गया था, यह इंतज़ार की घड़ी थी, और वह भी गिन रही थीं।
शाम को मामा लौटे तो थके हुए थे। खाने के बाद वह टीवी के सामने सोफ़े पर लेट गए। मौसी बर्तन धो रही थीं और मैं उनकी मदद करने गया। मामा की नाक बजने लगी थी, वह गहरी नींद में थे। मौसी ने मेरी तरफ़ देखा, और एक पल के लिए उनका हाथ मेरे हाथ पर आ टिका। गर्म, नरम, काँपता हुआ। फिर दूर से मामा खाँसे और वह हाथ झटके से हट गया।
दूसरे दिन की रात बालकनी में बीती। मामा अपने दोस्त के यहाँ ताश खेलने गए थे। मौसी और मैं बालकनी में आमने सामने बैठे थे, बीच में चाय के दो कप। बारिश की बूंदें छज्जे से टपक रही थीं। "तुम्हें डर नहीं लगता?" मैंने पूछा। वह हँसीं, "लगता है। इसीलिए तो मज़ा है।" उनकी आवाज़ में वह शरारत थी जो मैंने पहले दिन देखी थी।
"मामा के जाने के बाद," उन्होंने चाय का कप नीचे रखा, "आखिरी रात होगी तुम्हारी यहाँ। उसके बाद तुम्हारी कोचिंग खत्म, तुम अपने शहर।" मैंने कहा, "तो?" वह मेरी आँखों में देखती रहीं, फिर बोलीं, "तो उस रात कोई जल्दबाज़ी नहीं होगी। कोई डर नहीं होगा। सिर्फ़ हम दोनों।" मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया।
तीसरे दिन घर में अजीब सी भागदौड़ थी। मामा की पैकिंग, कागज़ात, फ़ोन पर आखिरी बातें। शाम तक वह इतने थके थे कि खाना खाते ही बिस्तर पर लेट गए। मौसी ने मुझे रसोई में अकेला पाकर धीरे से कहा, "उनकी फ्लाइट सुबह चार बजे है। वह गहरी नींद में होंगे।" फिर वह रुकीं, मेरे गाल को एक पल के लिए छुआ, और बोलीं, "ग्यारह बजे के बाद आना मत सोना। दरवाज़ा खुला रखना।"
रात के दस बजे घर में सन्नाटा छा गया। मामा के कमरे से उनकी नाक बजने की आवाज़ आ रही थी, भारी और बेखबर। मैं अपने कमरे में बैठा घड़ी देखता रहा। हर मिनट एक घंटे जैसा लग रहा था। ग्यारह बजकर पाँच मिनट पर सीढ़ियों पर हल्की सी आहट हुई। मेरा दिल गले में आ गया।
दरवाज़ा धीरे से खुला और मौसी अंदर आईं। उन्होंने वही नीली नाइटी पहनी थी, और उनके बाल खुले थे। उन्होंने दरवाज़ा अंदर से बंद किया, चटखनी लगाई, और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराईं। उस मुस्कान में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ भूख थी। "आज कोई जल्दी नहीं," उन्होंने कहा, "आज रात हमारी है।"
वह बिस्तर पर आईं और मेरे सामने बैठ गईं। मैंने उनके चेहरे को हाथों में लिया और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह चुम्बन पहले जैसा चोरी छिपे वाला नहीं था, यह दावा था। उनकी जीभ मेरे मुँह में आई, गर्म और बेसब्र। मेरे हाथ उनकी पीठ पर फिसलते हुए नाइटी के अंदर चले गए, उनकी नंगी कमर को सहलाते हुए।
मैंने उनकी नाइटी का स्ट्रैप कंधे से सरकाया, फिर दूसरा। नाइटी उनकी छातियों से फिसलकर कमर पर आ टिकी। उन्होंने ब्रा नहीं पहनी थी। उनकी बड़ी, भारी छातियाँ मेरे सामने थीं, निप्पल तने हुए। मैंने एक निप्पल को मुँह में लिया और चूसने लगा, दूसरा हाथ से मसलते हुए। मौसी के मुँह से सिसकी निकली, "विक्रम, और ज़ोर से।"
मेरे हाथ उनकी जाँघों पर चले गए। नाइटी ऊपर सरक चुकी थी और उनकी पैंटी गीली हो चुकी थी। मैंने पैंटी को एक तरफ़ सरकाया और उनकी चूत को उँगलियों से छुआ। वह पूरी तरह गीली थीं, फिसलन भरी। मेरी दो उँगलियाँ अंदर गईं और मौसी की कमर बिस्तर से उठ गई। "हाँ, ऐसे ही," वह फुसफुसाईं, "और अंदर।"
मैंने उनकी चूत को उँगलियों से चोदा, अंदर बाहर, तेज़ और गहरा। मेरा अँगूठा उनके दाने पर रगड़ खा रहा था। मौसी की साँसें उखड़ने लगीं, उनके नाखून मेरी पीठ में धँस गए। फिर उनका बदन अकड़ गया, एक लंबी सिसकी उनके गले से निकली, और उनकी चूत ने मेरी उँगलियों को भींच लिया। उनका पानी छूट गया, मेरी हथेली तर हो गई।
वह हाँफती हुई मेरी तरफ़ देख रही थीं, आँखों में धुंध। फिर वह नीचे सरकीं और मेरे पजामे का नाड़ा खोल दिया। मेरा लंड पहले से तना हुआ था, बाहर निकलते ही उन्होंने उसे हाथ में लिया। "इतना बड़ा," वह मुस्कुराईं, "और इतना बेसब्र।" उन्होंने मेरे लंड के टोपे को जीभ से चाटा, फिर पूरा मुँह में ले लिया।
मौसी का मुँह गर्म था, गीला था। वह मेरे लंड को अंदर बाहर ले रही थीं, जीभ टोपे पर घुमाते हुए। मेरे हाथ उनके बालों में थे। "मौसी," मैं कराहा, "मैं झड़ जाऊँगा।" उन्होंने मुँह हटाया, लंड को हाथ से हिलाते हुए बोलीं, "अभी नहीं। अभी तो शुरुआत है।" फिर वह उठीं और अपनी पैंटी उतार फेंकी।
वह मेरे ऊपर आ गईं, मेरे लंड को पकड़कर अपनी चूत पर रखा, और धीरे धीरे नीचे बैठती चली गईं। मेरा लंड उनकी गीली चूत में समाता चला गया, पूरा अंदर। हम दोनों के मुँह से एक साथ सिसकी निकली। वह मेरे ऊपर हिलने लगीं, ऊपर नीचे, उनकी छातियाँ मेरे चेहरे के सामने उछल रही थीं। मैंने उन्हें मुँह में लेकर चूसा।
"और तेज़, विक्रम," वह बोलीं, "मुझे पूरा लो।" उनकी रफ़्तार बढ़ गई। बिस्तर चरमराने लगा और हमने रफ़्तार धीमी की, पर गहराई बढ़ा दी। हर धक्के में मेरा लंड उनकी चूत की गहराई को छू रहा था। मौसी की आँखें बंद थीं, होंठ खुले थे, और उनके चेहरे पर वह नशा था जो मैंने उस दोपहर देखा था।
फिर मैंने उन्हें पलटा और मिशनरी में लिया। उनकी टाँगें मेरे कंधों पर थीं, और मैं उन पर झुका हुआ था, हर धक्के में पूरा अंदर जाता हुआ। "चोदो मुझे," वह फुसफुसाईं, "आज रात मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ।" उनकी चूत मेरे लंड को निचोड़ रही थी, गीली और गर्म। मैंने रफ़्तार बढ़ा दी।
मैंने उन्हें घुटनों पर किया, पीछे से लिया। उनकी कमर पकड़कर मैंने धक्के मारे, तेज़ और गहरे। मौसी की सिसकियाँ अब रुक नहीं रही थीं, वह तकिए में मुँह दबाए कराह रही थीं। "मैं आने वाली हूँ," वह बोलीं, "अंदर ही, विक्रम, अंदर ही झड़ना।" मैंने उनकी बात मानी।
आखिरी धक्कों में मेरा पूरा बदन काँपने लगा। मौसी की चूत ने मेरे लंड को भींचा, उनका पानी छूटा, और उसी पल मैं उनकी चूत के अंदर झड़ गया, गाढ़ा और गर्म। हम दोनों एक दूसरे से लिपटे बिस्तर पर ढह गए, पसीने से तर, हाँफते हुए। खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी और दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था।
कुछ देर बाद मौसी उठीं, नाइटी पहनी, और मेरे माथे को चूमा। "सो जाओ," उन्होंने कहा, "सुबह चार बजे उनकी फ्लाइट है, मुझे नीचे होना चाहिए।" वह दरवाज़े तक गईं, पलटीं, और बोलीं, "और विक्रम, ये आखिरी बार नहीं था। बस इस घर में आखिरी बार था।" फिर वह चली गईं।
सुबह तीन बजे घर में हलचल हुई। मामा का अलार्म बजा, मौसी ने उन्हें चाय बनाकर दी, और टैक्सी आ गई। मैंने भी नीचे आकर उन्हें विदा किया। मामा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "पढ़ाई पर ध्यान देना," कहा, और चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही मौसी ने मेरी तरफ़ देखा। अब इस घर में कोई डर नहीं था।
मामा के जाने के बाद के चार दिन सपने जैसे बीते। कोई छिपना नहीं, कोई फुसफुसाहट नहीं। मौसी दिन में मेरे साथ रसोई में खड़ी होतीं, शाम को बालकनी में चाय पीतीं, और रात को वह मेरे कमरे में आ जातीं। हमने उन रातों को गिना नहीं, बस जिया। हर रात वही भूख, वही बेसब्री, और हर सुबह वही मुस्कान।
फिर मेरा आखिरी दिन आ गया। दो हफ़्ते पूरे हो रहे थे, कोचिंग का आखिरी टेस्ट था, और शाम की बस से मुझे अपने शहर लौटना था। दोपहर को मैंने बैग पैक किया। मौसी कमरे में आईं, बिस्तर पर बैठ गईं, और देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर उन्होंने कहा, "तुम्हारे जाने के बाद यह घर फिर वैसा ही हो जाएगा। खाली।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। "मौसी, मामा कब लौटेंगे?" वह हँसीं, "छह महीने बाद, शायद।" फिर वह उठीं, अलमारी से एक छोटा सा लिफ़ाफ़ा निकाला, और मेरी हथेली पर रख दिया। "बस में बैठकर खोलना," उन्होंने कहा। उनकी आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान थी।
शाम को बस स्टैंड पर मौसी मुझे छोड़ने आईं। भीड़ थी, शोर था, और हम दोनों के बीच वह खामोशी थी जो सब कुछ कह रही थी। बस आई, मैं चढ़ा, खिड़की वाली सीट मिली। मौसी नीचे खड़ी हाथ हिला रही थीं। बस चल पड़ी, उनकी शक्ल धुंधली होती गई, फिर ओझल।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था, मौसी की लिखावट में सिर्फ़ दो लाइनें, "अगली बार जब तुम्हारे मामा दुबई जाएँगे, एक हफ़्ते पहले आ जाना। कमरा तुम्हारा ही रहेगा।" मैंने काग़ज़ को सीने से लगाया और खिड़की से बाहर देखा। जयपुर पीछे छूट रहा था, पर मौसी की चुदाई की यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। यह तो बस शुरुआत थी।
Readers who enjoyed “मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 3” also read
8 curated storiesशादीशुदा शरीर की भूख जब पति के दोस्त के साथ एक रात की गलती ने दोनों को हमेशा के लिए बाँध दिया
पति के दोस्त के साथ एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा खींच लिया कि अब पीछे मुड़ना नामुमकिन हो गया। शादीशुदा औरत की दबी हुई भूख की सबसे बेबाक कहानी।
शादीशुदा औरत की रात पति के दोस्त के साथ जब उसने दरवाज़ा खोला और साड़ी में लिपटी वो औरत पूरी तरह खुलने वाली थी
पति ऑफिस ट्रिप पर था। उसकी बीवी ने दरवाज़ा खोला तो मैं हैरान रह गया। साड़ी में लिपटी वो औरत आज पूरी तरह खुलने वाली थी।
ससुराल में अकेली देवर के साथ रात जब पति गाँव गया था और सिर्फ हम दो बचे थे रात भर जो हुआ वो किसी को पता नहीं चलना चाहिए
पति गाँव गया था। ससुराल में सिर्फ मैं और देवर बचे थे। रात भर जो हुआ वो किसी को पता नहीं चलना चाहिए।
पति के दोस्त ने जब मेरी हर सीमा को पार कर दिया एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा बाँध दिया कि पीछे मुड़ना नामुमकिन हो गया
एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा बांध दिया कि अब पति के घर में भी किसी और की साँसें गूँजने लगीं। शादीशुदा शरीर की बेकाबू भूख की कहानी।
ससुर बहू की कहानी: गाँव की शाम में भड़की आग
ससुर बहू की कहानी: गाँव की उस शाम कविता ने पहली बार अपने ससुर रघुनाथ को उस नज़र से देखा, और फिर कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
सolo ट्रिप की उस रात जब लोकल गाइड ने मेरी सारी अकेलापन मिटा दी
पति से दूर, पहाड़ों में अकेली। लोकल गाइड के साथ बिताई वो रात जिसने शादीशुदा शरीर की सारी प्यास जगा दी।
मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 2
बदली नज़र भाग 2: आधी रात को दरवाज़े पर मामा सूरज की वापसी के बाद विक्रम और नैना मौसी के बीच खतरा और बढ़ गया। दोपहर का वो कमरा और रात की वो आहट।
जब पति के शहर जाने के बाद मेरे शरीर ने किसी और को अपना घर बना लिया
पति के तीन दिन के दौरे ने दरवाजा खोल दिया एक ऐसी भूख का जो सालों से दबी हुई थी। एक शादीशुदा औरत और उसके पति के दोस्त के बीच वो गहरा, गंदा और बेकाबू रिश्ता जिसने दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।