मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 2
"मौसी की चुदाई" जैसी कहानियां सुनने में मज़ा आता है, लेकिन जब खुद ऐसी कहानी के बीच में फंसे हो और आधी रात को दरवाज़े पर मामा खड़े हों, तो मज़ा नहीं, दिल की धड़कन रुकने लगती है। मैं सीढ़ियों पर खड़ा था और नीचे मुख्य दरवाज़े की आंख से मौसी ने बाहर देखा था। उनकी सांस अटक गई थी और उन्होंने पलट कर कहा था, "विक्रम, बाहर तेरे मामा खड़े हैं।"
मौसी ने जल्दी से अपनी नाइटी ठीक की और दरवाज़ा खोला। बाहर मामा सूरज खड़े थे, कंधे पर बैग, चेहरे पर थकान और हैरानी। "सूरज! तुम?" मौसी की आवाज़ में खुशी थी या घबराहट, ये समझना मुश्किल था। "फ्लाइट दस दिन बाद थी ना?" मामा अंदर आए और मुझे देख कर मुस्कुराए, "अरे विक्रम! तू भी यहीं है?"
मामा ने बैग नीचे रखा और मुझे गले लगाया। उनकी शर्ट में पसीने और हवाई जहाज़ की अजीब सी मिली जुली गंध थी। "कंपनी ने प्रोजेक्ट जल्दी खत्म कर दिया, तो सोचा सरप्राइज़ दे दूं।" उन्होंने कहा। मैं हंसा, लेकिन मेरी हंसी खोखली थी। दस मिनट पहले मौसी मेरे कमरे में थीं, मेरे कंधे पर सिर रख कर रो रही थीं, और अब उनके पति घर के अंदर खड़े थे।
"तुमने बताया क्यों नहीं?" मौसी ने कहा और मामा का बैग अंदर ले जाने लगीं। "बताता तो सरप्राइज़ कैसा?" मामा हंसे। वो हॉल में सोफे पर बैठ गए। "विक्रम, पढ़ाई कैसी चल रही है?" "ठीक चल रही है मामा।" मेरी आवाज़ कांप रही थी। मौसी ने मेरी तरफ देखा, उनकी आंखों में एक चेतावनी थी। चुप रह। कुछ मत बोल।
मामा ने पानी मांगा और मौसी रसोई में चली गईं। मैं भी ऊपर अपने कमरे में जाने लगा। "विक्रम, रुक।" मामा ने कहा। मेरा दिल धक से हुआ। "मामा?" "तेरी मौसी ठीक है ना? वो थोड़ी घबराई हुई लग रही है।" "वो... वो अचानक आपको देख कर हैरान हो गईं।" मैंने कहा। मामा हंसे, "हां, सरप्राइज़ तो ज़ोरदार था।"
ऊपर कमरे में मैं बिस्तर पर बैठ गया। दरवाज़ा खुला था और नीचे से मामा मौसी की बातचीत की आवाज़ आ रही थी। मौसी हंस रही थीं, वो हंसी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी, बनावटी हंसी। मेरे दिमाग में वही तस्वीर घूम रही थी, मौसी मेरे कंधे पर सिर रखे, उनकी नाइटी मेरे बाजू से दबती हुई, और उनकी वो बात, "आज रात मेरे साथ रुक।"
वो रात अब कभी नहीं आने वाली थी। या शायद आने वाली थी, लेकिन अब मामा घर में थे। मैं बिस्तर पर लेट गया और छत को देखने लगा। नीचे मौसी के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। मामा और मौसी अपने कमरे में थे, पति पत्नी, और मैं ऊपर अकेला। मेरे लंड में फिर तनाव आने लगा, लेकिन इस बार उसके साथ एक अजीब सा गुस्सा भी था।
सुबह मेरी आंख देर से खुली। नीचे से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी। मैं नीचे आया तो मामा हॉल में अखबार पढ़ रहे थे और मौसी रसोई में नाश्ता बना रही थीं। सब कुछ इतना सामान्य था कि मुझे लगा रात को जो हुआ वो सपना था। "उठ गया?" मामा ने कहा। "हां मामा।" मैं मेज़ पर बैठ गया।
मौसी पराठे लेकर आईं। उन्होंने आज गुलाबी सूट पहना था, बाल बंधे हुए। बिल्कुल एक आदर्श पत्नी की तरह। लेकिन जब उन्होंने मेरी थाली में पराठा रखा, तो मेज़ के नीचे उनका पैर मेरे पैर से छू गया। मैंने चौंक कर उनकी तरफ देखा। वो मामा से बात कर रही थीं, "आज बाज़ार चलोगे?" लेकिन मेज़ के नीचे उनका पैर मेरे टखने पर रगड़ रहा था।
मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। मामा अखबार में डूबे थे। मौसी का पैर धीरे धीरे मेरे पैर के ऊपर आया और दबाव बढ़ाने लगा। मैं समझ गया, रात को जो बात अधूरी रह गई थी, वो खत्म नहीं हुई थी। मामा के घर आने से कुछ भी खत्म नहीं हुआ था। बल्कि अब तो खेल और खतरनाक हो गया था।
"विक्रम, मैं आज शाम तक बाहर रहूंगा।" मामा ने अखबार नीचे रखा। "बैंक का काम है और फिर पुराने दोस्त से मिलना है।" मेरे कान खड़े हो गए। "शाम तक?" "हां, छह सात बज जाएंगे।" मामा ने कहा। मौसी ने मेरी तरफ देखा और उनकी आंखों में एक चमक थी। मैंने जल्दी से नज़रें झुका लीं, लेकिन दिल में एक तूफान उठ रहा था।
मामा के जाने के बाद घर में सन्नाटा छा गया। बाई सुबह का काम करके जा चुकी थी। मौसी हॉल में बैठी टीवी देख रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें टीवी पर नहीं थीं। मैं ऊपर अपने कमरे में किताब खोल कर बैठा था, लेकिन एक शब्द पढ़ नहीं पा रहा था। बार बार वही ख्याल, क्या मौसी ऊपर आएंगी?
दोपहर के दो बजे मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। हल्की सी, बिल्कुल रात वाली तरह। "विक्रम?" मौसी की आवाज़। मैंने दरवाज़ा खोला। मौसी सामने खड़ी थीं, वही गुलाबी सूट, लेकिन दुपट्टा कंधे से सरका हुआ। "मौसी?" "अंदर आ सकती हूं?" उन्होंने पूछा और बिना जवाब का इंतज़ार किए अंदर आ गईं। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।
"मौसी, ये..." मेरे मुंह से बस इतना निकला। उन्होंने मेरी तरफ देखा, बहुत करीब से। "रात को जो बात अधूरी रह गई थी, विक्रम।" उनकी आवाज़ धीमी थी। "लेकिन मामा..." "मामा शाम को आएंगे।" उन्होंने कहा और मेरा हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ गर्म था, बिल्कुल रात की तरह कांप रहा था।
"मौसी, ये गलत है।" मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज़ में कोई दम नहीं था। "गलत?" वो हंसीं, लेकिन उनकी हंसी में आंसू थे। "इतने सालों से जो मेरे साथ हो रहा है वो गलत नहीं? तेरा मामा दुबई में है, मैं यहां अकेली। औरत हूं मैं विक्रम, सिर्फ मौसी नहीं।" उन्होंने मेरा हाथ अपनी छाती पर रख दिया। सूट के अंदर उनके दूध की गर्मी मेरे हाथ में उतर गई।
मेरा लंड पैंट में तनने लगा। मैंने हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन मौसी ने मेरा हाथ पकड़े रखा। "डर लग रहा है?" उन्होंने पूछा। "हां।" "मुझे भी लग रहा था। लेकिन अब नहीं लगता।" उन्होंने धीरे से मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो पहला चुम्बन था जिसने सब कुछ बदल दिया। उनके होंठ नरम थे और उनमें एक भूख थी जो सालों से दबी हुई थी। मैंने पहले झिझक महसूस की, लेकिन फिर मेरे हाथ खुद ब खुद उनकी कमर पर चले गए। सूट के ऊपर से उनकी कमर की गर्मी महसूस हो रही थी। उन्होंने मेरे निचले होंठ को दांतों से काटा और मैं कराह उठा।
"मौसी..." "शशश।" उन्होंने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू किए। उनकी उंगलियां कांप रही थीं, लेकिन रुक नहीं रही थीं। शर्ट खुलते ही उन्होंने मेरी नंगी छाती पर हाथ फेरा। "इतना गर्म..." वो बुदबुदाईं। फिर उन्होंने झुक कर मेरी छाती पर चूमा। उनकी जीभ मेरे निप्पल पर घूमी और मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।
मैंने उनका दुपट्टा खींच कर नीचे गिरा दिया। सूट के गले से उनकी छाती का उभार दिख रहा था। मैंने धीरे से उनका कुर्ता ऊपर किया। उन्होंने हाथ ऊपर कर दिए और मैंने कुर्ता उनके सिर के ऊपर से निकाल दिया। अंदर काले रंग की ब्रा में उनके बड़े बड़े दूध कसे हुए थे। मैंने ब्रा का हुक खोला और दूध बाहर निकल आए, गोरे, भारी, निप्पल कड़े।
"विक्रम..." मौसी की सांसें तेज़ हो गईं। मैंने एक दूध मुंह में लिया और चूसने लगा। दूसरा हाथ से मसलने लगा। मौसी ने मेरे बालों में उंगलियां धंसा दीं और मेरा सिर अपनी छाती पर दबाने लगीं। "हां, ऐसे ही... और ज़ोर से..." उनकी आवाज़ में वो तड़प थी जो मैंने कभी किसी औरत में नहीं सुनी थी।
मैंने उनके सलवार का नाड़ा खोला और सलवार नीचे सरक गई। अंदर लाल रंग की पैंटी थी, जो उनकी चूत पर चिपकी हुई थी और बीच में गीली हो चुकी थी। मैंने पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत पर हाथ रखा। गीलापन मेरी उंगलियों में उतर आया। मौसी ने अपनी टांगें फैला दीं और मेरा हाथ अंदर धकेलने लगीं।
मैंने पैंटी एक तरफ सरकाई और उंगली उनकी चूत में डाली। अंदर बहुत गर्म और गीला था। मौसी की कमर उछल पड़ी। "आह... विक्रम..." मैंने उंगली अंदर बाहर करने लगा और अंगूठे से उनके दाने को रगड़ने लगा। दो मिनट में ही उनका बदन अकड़ने लगा और वो झड़ गईं। उनकी चूत से पानी निकला और मेरी उंगलियां भीग गईं।
"अब मेरी बारी।" मौसी ने कहा और मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। उन्होंने मेरी पैंट खोली और अंडरवियर के ऊपर से मेरे लंड को पकड़ लिया। "इतना बड़ा..." वो बुदबुदाईं और अंडरवियर नीचे खींच दिया। मेरा लंड उछल कर बाहर आया, पूरा तना हुआ। मौसी ने उसे देखा और उनकी आंखों में भूख और बढ़ गई।
उन्होंने मेरे लंड को हाथ में लिया और धीरे धीरे हिलाने लगीं। फिर झुक कर उन्होंने टोपे पर जीभ फेरी। मेरे मुंह से सिसकारी निकली। उन्होंने पूरा लंड मुंह में ले लिया और चूसने लगीं। उनकी जीभ टोपे के चारों तरफ घूम रही थी और गला लंड को अंदर तक ले रहा था। मैंने उनके बाल पकड़ लिए और धीरे धीरे धक्के देने लगा।
पांच मिनट की चुसाई के बाद मेरा लंड लोहे जैसा सख्त हो गया था और मैं झड़ने वाला था। "मौसी, मैं..." "नहीं, अभी नहीं।" उन्होंने लंड मुंह से निकाला और मेरे ऊपर चढ़ गईं। उन्होंने अपनी चूत मेरे लंड पर रखी और धीरे धीरे बैठने लगीं। मेरा लंड उनकी गीली चूत में धंसता चला गया। हम दोनों के मुंह से एक साथ सिसकारी निकली।
मौसी मेरे ऊपर बैठ कर धीरे धीरे हिलने लगीं। उनकी चूत मेरे लंड को अंदर तक निगल रही थी। हर धक्के पर उनके दूध उछल रहे थे। मैंने उनके दूध पकड़ लिए और नीचे से धक्के देने लगा। "हां विक्रम... और अंदर... पूरा डाल..." मौसी की आंखें बंद थीं और चेहरा लाल हो रहा था।
दस मिनट की सवारी के बाद मौसी फिर झड़ने वाली थीं। "मैं आ रही हूं..." उन्होंने कहा और तेज़ी से हिलने लगीं। उनकी चूत ने मेरे लंड को कस कर जकड़ लिया और वो झड़ गईं। उनके झड़ते ही मैंने उन्हें पलटा और मिशनरी में आ गया। उनकी टांगें मेरे कंधों पर रखीं और मैंने ज़ोर ज़ोर से धक्के देने शुरू किए।
बिस्तर हिलने लगा। मौसी की सिसकारियां कमरे में गूंज रही थीं। "और ज़ोर से... फाड़ दे मेरी चूत..." मैंने उनकी बात सुनी और धक्के और तेज़ कर दिए। मेरा लंड उनकी चूत की गहराई में उतर रहा था। दो मिनट में मैं भी झड़ने वाला था। "मौसी, मैं झड़ने वाला हूं..." "अंदर ही झड़... आज कोई डर नहीं..."
मैं उनकी चूत में झड़ गया। गर्म पानी की धार अंदर उतर गई और मौसी ने मुझे कस कर जकड़ लिया। हम दोनों हांफ रहे थे, पसीने से भीगे हुए। मौसी ने मेरे माथे पर चूमा। "इतने सालों बाद..." उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार खुशी के।
हम बिस्तर पर लेटे रहे। मौसी मेरे सीने पर सिर रखे थीं। "विक्रम, एक बात कहूं?" "कहो मौसी।" "आज रात... जब तेरे मामा सो जाएंगे... मैं ऊपर आऊंगी।" मेरे दिल की धड़कन रुक गई। "मौसी, मामा घर पर हैं। बहुत खतरा है।" "खतरा तो अब हर पल है।" उन्होंने कहा और मेरे होंठों पर हल्का सा चूमा। "रात को दरवाज़ा खुला रखना। कुंडी मत लगाना।"
शाम को छह बजे मामा घर आए। बिल्कुल सामान्य, हंसते हुए। "आज तो थक गया।" उन्होंने कहा। खाने की मेज़ पर सब कुछ सामान्य था। मामा दुबई की बातें बता रहे थे, मौसी सुन रही थीं, मैं चुपचाप खा रहा था। लेकिन मेज़ के नीचे मौसी का पैर फिर मेरे पैर से छू गया और इस बार उन्होंने धीरे से दबाया। मेरा लंड पैंट में फिर तनने लगा।
रात को सब अपने अपने कमरे में चले गए। मामा और मौसी नीचे, मैं ऊपर। घड़ी में बारह बज रहे थे। मैं बिस्तर पर लेटा छत को देख रहा था। क्या मौसी सच में आएंगी? मामा घर पर हैं, उनके बगल में सो रहे हैं। ये पागलपन है। लेकिन दिल चाहता था कि ये पागलपन हो।
एक बजे के करीब मेरे दरवाज़े पर हल्की सी आहट हुई। खट। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। "विक्रम?" मौसी की फुसफुसाहट। मैंने दरवाज़ा खोला। मौसी सामने खड़ी थीं, वही नीली नाइटी, बाल खुले, पैर नंगे। "मामा?" मैंने फुसफुसाया। "सो गए।" उन्होंने कहा और अंदर आ गईं। दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ, लेकिन इस बार कुंडी नहीं लगी।
"मौसी, अगर मामा उठ गए तो?" "नहीं उठेंगे। वो बहुत थके हैं।" उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ में भी डर था। फिर भी वो मेरे करीब आईं और मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। उनकी नाइटी मेरे बदन से सट गई। मैंने उनकी नाइटी ऊपर की और उनके दूध पकड़ लिए। वो मेरे ऊपर झुकीं और मेरे होंठ चूमने लगीं।
हम दोनों की सांसें तेज़ हो रही थीं। मौसी ने मेरी पैंट खोली और लंड बाहर निकाला। वो पहले से तना हुआ था। उन्होंने धीरे से उसे हिलाया और फिर अपनी नाइटी ऊपर करके मेरे ऊपर बैठने लगीं। तभी... तभी नीचे से आवाज़ आई। सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट।
हम दोनों जम गए। मौसी मेरे ऊपर बैठी थीं, मेरा लंड उनकी चूत के बिल्कुल पास, लेकिन अंदर नहीं। कदमों की आहट सीढ़ियां चढ़ रही थी। "नैना?" मामा की आवाज़ आई, नींद में डूबी हुई। "तुम ऊपर हो क्या?" मौसी का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने मेरी तरफ देखा, आंखों में घबराहट।
दरवाज़े का हैंडल हिला। मामा बाहर खड़े थे। "विक्रम? नैना? दरवाज़ा खोलो।" मौसी ने जल्दी से अपनी नाइटी ठीक की और मुझे इशारा किया, चुप रह। मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा मामा बाहर से सुन लेंगे। हैंडल फिर हिला, इस बार ज़ोर से।
अगला भाग जल्द आ रहा है...
मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 3
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