जब पति के शहर जाने के बाद मेरे शरीर ने किसी और को अपना घर बना लिया
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे जब यश ने दरवाजा खटखटाया।
मेहर आईने के सामने खड़ी थी। साड़ी का पल्लू कंधे से उतर चुका था। ब्लाउज के ऊपर वाले हुक उसने जानबूझकर खुले छोड़ रखे थे। पति तीन दिन के दौरे पर था। घर पूरी तरह खाली। और यश—पति का सबसे पुराना दोस्त—आज चौथी बार आ रहा था।
मेहर ने दरवाजा खोला। यश अंदर आया। दोनों की नजरें मिलीं। कोई मुस्कान नहीं, कोई नमस्ते नहीं। यश ने पीछे मुड़कर ताला लगाया और सिटकिनी भी चढ़ा दी। फिर धीरे-धीरे मेहर की ओर बढ़ा।
मेहर दीवार से सट गई। यश ने उसका गला पकड़ा। उंगलियाँ उसके जबड़े पर फिसलीं। फिर होंठ आए। चुंबन धीमा नहीं था। इसमें भूख थी, कब्जा था। मेहर की साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया। यश ने उसके ब्लाउज के बाकी हुक एक-एक करके खोले। ब्रा के ऊपर से ही स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल्स तनकर खड़े हो गए थे।
यश ने ब्रा को नीचे खींचा और बाएँ निप्पल को मुँह में ले लिया। दाँतों से हल्का काटा, फिर जोर से चूसा। मेहर की कमर अपने आप आगे बढ़ गई। उसकी उंगलियाँ यश के बालों में खो गईं।
“आज रात धीरे नहीं करना,” मेहर ने हांफते हुए कहा।
यश ने सिर उठाया। आँखों में एक खतरनाक सी चमक थी। “तू खुद माँग रही है?”
मेहर ने सिर हिलाया। “माँग रही हूँ। आज रात मेरा शरीर तेरा है। जैसा चाहे वैसा ले।”
यश ने उसे उठाया और सीधे बेडरूम में ले गया। बिस्तर पर पटकते ही साड़ी और पेटीकोट एक साथ उतर गए। पैंटी को यश ने दोनों हाथों से पकड़कर फाड़ दिया। मेहर अब पूरी तरह नंगी थी। यश ने उसकी जाँघें फैलाईं और बिना किसी प्रस्तावना के अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी।
मेहर की कमर जोर से उछली। यश की जीभ तेज, मोटी और बेकाबू थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, कभी अंदर तक जीभ डाल रहा था, कभी सिर्फ ऊपर के हिस्से को दाँतों से हल्का काट रहा था। मेहर के नाखून चादर को चीर रहे थे। उसकी आवाजें अब घर में गूँजने लगी थीं।
यश ने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। फिर तीसरी। तेजी से आगे-पीछे करने लगा। मेहर का शरीर काँप रहा था। चरम इतनी तेजी से आया कि उसने तकिया मुँह में दबा लिया। फिर भी आवाज दब नहीं पाई।
यश ऊपर आया। उसने अपनी पैंट और अंडरवियर एक साथ उतारे। मेहर की आँखें उसके मोटे, पूरी तरह कड़े अंग पर टिक गईं। यश ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
मेहर चीख पड़ी। आँखें फटी रह गईं। यश रुका नहीं। उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने शुरू कर दिए। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। हर धक्का इतना गहरा था कि मेहर को लग रहा था जैसे वह अंदर तक फट जाएगी। यश ने झुककर उसके दोनों निप्पल्स को बारी-बारी से दाँतों से काटना शुरू कर दिया।
“और जोर से… यश… तोड़ दे मुझे…” मेहर चिल्ला रही थी।
यश ने उसकी बात मान ली। धक्के और तेज हो गए। मेहर की छाती हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी। पसीने से दोनों के शरीर चमक रहे थे। यश ने अचानक उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और गहराई तक मारने लगा।
मेहर का दूसरा चरम पहले से कहीं तेज था। उसका पूरा शरीर अकड़ गया। पैर काँपने लगे। यश ने उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म, गाढ़ा और बहुत ज्यादा। मेहर महसूस कर सकती थी कि वह उसके अंदर भर रहा है।
दोनों हांफते हुए बिस्तर पर गिरे रहे। यश अभी भी उसके अंदर था। बाहर नहीं निकला। कुछ देर बाद उसने धीरे-धीरे फिर से हिलना शुरू कर दिया। मेहर की आँखें चौड़ी हो गईं।
“फिर से?” उसने हैरानी से पूछा।
यश ने उसके कान में कहा, “तूने कहा था—जैसा चाहे वैसा लूँ। आज रात मैं थकने वाला नहीं।”
उसने मेहर को पलटा। अब वह घुटनों के बल थी। यश ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया। इस बार और भी गहरा। उसने मेहर के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ मेहर की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी। यश ने उसके नितंबों पर लगातार जोरदार थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। मेहर और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी।
“पूरा… पूरा ले लो यश…”
यश ने उसकी कमर और नीचे झुका दी। एक हाथ से बाल खींच रहा था, दूसरे से उसके निप्पल को मरोड़ रहा था। धक्के इतने तेज थे कि मेहर की आवाज अब सिसकी में बदल गई थी। तीसरा चरम आया तो मेहर की आँखों से आँसू निकल आए। यश ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
दो घंटे बाद दोनों बाथरूम से निकले। मेहर के शरीर पर जगह-जगह दाँतों और नाखूनों के निशान थे। जाँघों के अंदर यश का अंश अभी भी धीरे-धीरे बह रहा था। यश ने उसे फिर से बिस्तर पर लिटाया। इस बार उसने मेहर के मुँह में अपना अंग डाल दिया। मेहर ने गला खोला रखा। यश ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गला तक। मेहर की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन उसने रोका नहीं।
जब यश ने उसके मुँह में छोड़ा, मेहर ने सब कुछ निगल लिया। फिर यश ने उसे फिर से लिटाया और चौथी बार अंदर घुस गया। इस बार मेहर की टाँगें उसके कंधों पर थीं। यश ने पूरी ताकत लगा दी। मेहर अब खुद अपनी टाँगें और फैला रही थी।
“यश… और अंदर… मुझे भर दे…”
यश ने उसकी बात पूरी की। अंतिम चरम दोनों का एक साथ आया। मेहर की चीख इस बार घर की दीवारों से टकराई। यश ने उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया और कुछ देर तक उसी पोजीशन में रहा।
सुबह पाँच बजे यश कपड़े पहनने लगा। मेहर चादर ओढ़े उसे देख रही थी। शरीर में गहरी थकान थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सी शांति थी।
यश ने उसके गाल पर उँगली फेरी। “पति तीन दिन बाद आएगा। तब तक हर रात आऊँगा।”
मेहर ने धीरे से कहा, “आ जाना। दरवाजा हर रात खुला रहेगा।”
यश मुस्कुराया। “तेरा शरीर अब मेरा घर बन चुका है। याद रखना।”
दरवाजा बंद होते ही मेहर ने आँखें बंद कर लीं। जाँघों के अंदर अभी भी यश का अंश था। स्तनों पर दाँतों के निशान थे। नितंबों पर थप्पड़ों के लाल निशान थे।
उसने मुस्कुरा दिया।
पति के शहर जाने के बाद उसके शरीर ने सच में किसी और को अपना घर बना लिया था। और मेहर जानती थी—ये घर अब खाली होने वाला नहीं।
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