ससुर बहू की कहानी: गाँव की शाम में भड़की आग

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"इतनी सजी-धजी कहाँ जा रही हो, बहू?" रघुनाथ ने चाय का कुल्हड़ होंठों से लगाते हुए पूछा, और कविता की धड़कन एक पल के लिए थम गई। उस शाम से पहले उसने कभी नहीं सोचा था कि ससुर बहू की चुदाई जैसी कहानियाँ उसके अपने घर में सच हो सकती हैं।

कविता ने अपनी लाल साड़ी का पल्लू ठीक किया और हँसने की कोशिश की। "कहीं नहीं जा रही, ससुर जी। घर में ही तो हूँ।" उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कँपकँपाहट थी जिसे वह खुद भी रोक नहीं पाई।

रघुनाथ की आँखें उस पर टिकी रहीं। चौवन साल का वह किसान, धूप में तपी हुई साँवली चमड़ी, मज़बूत कंधे, और उन आँखों में कुछ ऐसा जो कविता पिछले कुछ हफ़्तों से देख रही थी। पहले वह इसे अपना वहम समझती थी। अब वहम नहीं रहा था।

"घर में रहने के लिए इतना सिंदूर, इतना काजल?" रघुनाथ ने कुल्हड़ नीचे रखा और मुस्कुराया। वह मुस्कान अब उसे पहले जैसी नहीं लगती थी। उसमें एक भूख थी, दबी हुई, लेकिन साफ़ दिखती हुई।

कविता का पति राकेश लुधियाना की एक फैक्ट्री में काम करता था। महीने में एक बार आता था, दो दिन रुकता था, और उन दो दिनों में भी थकान से चूर रहता था। पिछली बार आया था तो रात को बिस्तर पर लेटते ही खर्राटे लेने लगा था। कविता ने उस रात करवटें बदलते हुए सुबह कर दी थी।

"आपकी चाय ठंडी हो रही है," कविता ने बात पलटने की कोशिश की। वह उठकर अंदर जाने लगी, लेकिन रघुनाथ की आवाज़ ने उसे रोक दिया।

"बैठो ना, बहू। अकेले चाय पीने में मज़ा नहीं आता।" उसने सामने वाली चारपाई की ओर इशारा किया। कविता एक पल झिझकी, फिर बैठ गई। उसके बैठते ही रघुनाथ की नज़र उसके ब्लाउज़ की गर्दन पर ठहर गई, जहाँ से पसीने की एक बूँद धीरे-धीरे नीचे सरक रही थी।

कविता ने वह नज़र देखी। और सबसे खतरनाक बात यह थी कि उसने अपनी नज़र हटाई नहीं। उसके सीने में कुछ सुलगने लगा, कुछ ऐसा जो शादी के शुरू के दिनों के बाद उसने महसूस ही नहीं किया था।

उस दोपहर की घटना उसकी आँखों के सामने फिर घूम गई। गेहूँ की बोरी कोठे में रखनी थी। रघुनाथ बोरी उठाने आया था। तंग कोठे में दोनों के कंधे टकराए, फिर सीना, फिर पूरा बदन। रघुनाथ का हाथ बोरी सँभालते हुए उसकी कमर पर आ टिका था।

वह हाथ वहाँ एक पल से ज़्यादा रुका था। कविता जड़ हो गई थी। गरम साँस उसकी गर्दन पर पड़ रही थी। फिर रघुनाथ पीछे हटा था और बोला था, "माफ़ करना, बहू। जगह तंग थी।" लेकिन उसकी आवाज़ में माफ़ी से ज़्यादा कुछ और था।

"कोई बात नहीं, ससुर जी," कविता ने कहा था, लेकिन उसकी अपनी आवाज़ काँप रही थी। वह जल्दी से कोठे से बाहर निकल आई थी और आँगन में खड़े होकर लंबी साँसें ली थीं। उसकी कमर पर अब भी उस हाथ की गर्मी महसूस हो रही थी।

शाम को खाना बनाते समय कविता के हाथ काँप रहे थे। रोटी बेलते हुए वह बार-बार दरवाज़े की ओर देखती। रघुनाथ बाहर नल पर हाथ-मुँह धो रहा था। पानी की छींटों से उसकी कुर्ता भीग गया था और बदन से चिपक गया था। कविता ने जल्दी से नज़र फेर ली, लेकिन देर हो चुकी थी।

उसने रघुनाथ की छाती देख ली थी। चौड़ी, मज़बूत, उम्र के बावजूद कसी हुई। राकेश की छाती उसके सामने कुछ भी नहीं थी। यह ख्याल आते ही कविता ने खुद को डाँटा, लेकिन डाँट का कोई असर नहीं हुआ। उसकी जाँघों के बीच एक अजीब सी सनसनाहट शुरू हो चुकी थी।

खाना परोसते समय रघुनाथ ने उसकी बनाई दाल की तारीफ़ की। "तुम्हारे हाथ में जादू है, बहू। तुम्हारी सास भी इतनी अच्छी दाल नहीं बनाती थी।" उसकी आवाज़ में एक उदासी उतर आई।

"सासू माँ को गए छह साल हो गए, है ना?" कविता ने धीरे से पूछा।

"छह साल, दो महीने।" रघुनाथ ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा। "छह साल से इस घर में औरत की हँसी नहीं गूँजी थी। तुम आई हो तो घर घर लगने लगा है।"

कविता ने उसे एक और रोटी दी। रोटी देते समय रघुनाथ का हाथ उसके हाथ पर आ टिका। इस बार कोई बोरी नहीं थी, कोई तंग जगह नहीं थी। सिर्फ़ उसका हाथ, उसके हाथ पर, और दोनों की आँखें एक-दूसरे में।

कविता ने हाथ नहीं हटाया। रघुनाथ ने भी नहीं। एक लंबा पल बीता, जिसमें सिर्फ़ चूल्हे की आँच की सरसराहट सुनाई दी। फिर कविता ने धीरे से हाथ खींचा और उठकर बर्तन समेटने लगी। उसकी पीठ रघुनाथ की ओर थी, लेकिन वह जानती थी कि वह उसे देख रहा है।

रात को अपने कमरे में कविता बिस्तर पर लेटी छत को देखती रही। नींद कोसों दूर थी। उसकी साड़ी का पल्लू एक ओर सरक गया था और ब्लाउज़ के ऊपर से उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। उसने करवट ली, फिर सीधी हुई। बदन में एक बेचैनी थी जो बढ़ती ही जा रही थी।

उसका हाथ अनजाने में ही अपने पेट पर गया, फिर नीचे। साड़ी के ऊपर से ही उसने अपनी जाँघों के बीच दबाव महसूस किया। "यह गलत है," उसके मन ने कहा। लेकिन उसके हाथ ने मन की नहीं सुनी।

कविता ने साड़ी ऊपर सरकाई और अपनी उँगलियाँ अपनी चूत पर रख दीं। वह गीली थी, बहुत गीली। उसने धीरे-धीरे उँगली अंदर-बाहर करनी शुरू की और होंठ भींच लिए ताकि आवाज़ न निकले। उसकी आँखों के सामने रघुनाथ का चेहरा था, उसकी वह नज़र, उसका वह हाथ।

"ससुर जी," उसके मुँह से बेसाख़्ता निकला, और उसी पल उसका बदन अकड़ गया। एक तेज़ लहर उसके पूरे बदन में दौड़ गई और वह बिस्तर पर पसर गई, हाँफती हुई। लेकिन वह अधूरा सुकून था। उँगलियों से जो मिलता है, वह असली की बराबरी नहीं कर सकता। यह बात उसका बदन अच्छी तरह जानता था।

प्यास लगी तो कविता उठी। घड़े से पानी लेने वह बाहर दालान में आई। चाँदनी आँगन में बिखरी थी। और दालान की चारपाई पर रघुनाथ बैठा था, जाग रहा था।

"तुम भी नहीं सोईं?" रघुनाथ ने पूछा। उसकी आवाज़ रात के सन्नाटे में बहुत क़रीब लगी।

कविता घड़े के पास ठिठक गई। "नींद नहीं आ रही थी। पानी पीने आई थी।" उसने लोटा भरा और एक घूँट पिया। पानी उसकी ठोड़ी से बहकर गर्दन पर उतर गया। उसने देखा कि रघुनाथ की नज़र उस बूँद का पीछा कर रही है।

"इधर बैठो," रघुनाथ ने चारपाई पर हाथ मारकर जगह बनाई। कविता के पैर खुद-ब-खुद उधर बढ़ गए। वह चारपाई के किनारे बैठी, दोनों के बीच एक हाथ का फ़ासला।

"राकेश कब आ रहा है?" रघुनाथ ने पूछा।

"कह रहा था इस महीने मुश्किल है। काम ज़्यादा है। अगले महीने देखेगा।" कविता की आवाज़ में एक थकान थी।

रघुनाथ चुप रहा। फिर उसने वह सवाल पूछा जो कविता के सीने में हथौड़े की तरह लगा। "महीने में एक बार आता है। तुम कैसे सह लेती हो, बहू? जवान हो, खूबसूरत हो।"

कविता का गला सूख गया। "सहना पड़ता है, ससुर जी। औरत का यही नसीब है।"

"नसीब?" रघुनाथ उसकी ओर घूमा। चाँदनी में उसका चेहरा बहुत क़रीब था। "और अगर नसीब बदलने का मौक़ा मिले तो?"

कविता की साँस थम गई। उसने रघुनाथ की आँखों में देखा और वहाँ कोई छल नहीं था, कोई ज़बरदस्ती नहीं थी। सिर्फ़ एक सीधी, नंगी चाहत थी, वैसी ही जैसी उसके अपने सीने में धधक रही थी।

रघुनाथ ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और कविता के गाल को छुआ। उसका हाथ खुरदुरा था, मेहनतकश हाथ, लेकिन वह छुअन इतनी नर्म थी कि कविता की आँखें बंद हो गईं।

"ससुर जी," वह फुसफुसाई, लेकिन यह मना नहीं था। यह एक गुहार थी।

और फिर उसके होंठ उस पर थे। पहले धीरे, पूछते हुए, फिर भूखे। रघुनाथ ने उसे अपनी ओर खींचा और कविता उसके सीने से जा लगी। उसके मुँह से एक सिसकी निकली जो उसने रोकने की कोशिश भी नहीं की।

चुंबन लंबा चला। रघुनाथ की जीभ उसके मुँह में थी और कविता उसे चूस रही थी जैसे बरसों की प्यासी हो। उसका हाथ रघुनाथ के बालों में था, दूसरा उसकी पीठ पर, उसे और क़रीब खींचता हुआ।

रघुनाथ का हाथ उसकी साड़ी के पल्लू पर गया और उसे कंधे से सरका दिया। कविता ने उसे रोका नहीं। उसका ब्लाउज़ चाँदनी में चमक रहा था, और उसकी भारी साँसों से उसकी छातियाँ ऊपर-नीचे हो रही थीं।

"अंदर चलो," रघुनाथ ने उसके कान में फुसफुसाया। "बैठक में। वहाँ कोई नहीं आएगा।"

कविता उठी। उसके पैर काँप रहे थे, लेकिन वह रुकी नहीं। बैठक का दरवाज़ा बंद हुआ और अँधेरे में रघुनाथ ने उसे दीवार से लगा लिया। उसके होंठ फिर उस पर थे, इस बार और बेसब्र।

रघुनाथ के हाथों ने उसके ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू किए। एक, दो, तीन। ब्लाउज़ खुला और कविता की गोरी छातियाँ उसके सामने थीं। रघुनाथ ने एक पल उन्हें देखा, फिर अपना मुँह एक निप्पल पर रख दिया।

कविता के मुँह से एक ज़ोर की सिसकी निकली। "आह, ससुर जी।" रघुनाथ उसकी चूची को चूस रहा था, काट रहा था हल्के से, और उसका दूसरा हाथ दूसरी चूची को मसल रहा था। कविता की उँगलियाँ उसके बालों में गड़ गईं।

उसने रघुनाथ का कुर्ता ऊपर खींचा और उतार फेंका। फिर उसकी धोती की गाँठ खोली। जो सामने आया, उसे देखकर कविता की आँखें फैल गईं। रघुनाथ का लंड लंबा और मोटा था, तना हुआ, नसें उभरी हुईं।

कविता ने उसे हाथ में लिया। गरम, भारी, धड़कता हुआ। उसने धीरे-धीरे हाथ ऊपर-नीचे करना शुरू किया और रघुनाथ के मुँह से एक गहरी साँस निकली। "बहू," वह कराहा।

फिर कविता ने वह किया जो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। वह घुटनों के बल बैठी और रघुनाथ के लंड को अपने मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ़ टोपा, फिर धीरे-धीरे और अंदर। उसकी जीभ उस पर घूम रही थी।

रघुनाथ का हाथ उसके सिर पर था। "हाँ, ऐसे ही," वह फुसफुसाया। कविता उसे चूस रही थी, उसके अंडकोषों को हाथ से सहलाते हुए। रघुनाथ की साँसें तेज़ हो गईं और उसके घुटने काँपने लगे।

फिर रघुनाथ ने उसे उठाया और चारपाई पर लिटा दिया। उसने उसकी साड़ी ऊपर सरकाई, पेटीकोट का नाड़ा खोला और एक झटके में सब नीचे कर दिया। कविता उसके सामने नंगी थी, चाँदनी खिड़की से आकर उसके बदन पर पड़ रही थी।

रघुनाथ उसकी जाँघों के बीच बैठा और अपना मुँह उसकी चूत पर रख दिया। कविता की कमर उछल पड़ी। "नहीं, ससुर जी, वहाँ," वह बोली, लेकिन उसका बदन कुछ और कह रहा था।

रघुनाथ ने उसकी चूत को चाटना शुरू किया। उसकी जीभ उसके दाने पर थी, फिर अंदर। कविता की उँगलियाँ चादर को मुट्ठियों में भींच रही थीं। उसका बदन ऐंठ रहा था। "आह, और, और," वह बड़बड़ा रही थी।

एक तेज़ लहर आई और कविता का बदन अकड़ गया। उसकी चूत से पानी बह निकला और रघुनाथ ने उसे चाट लिया। कविता हाँफ रही थी, उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। लेकिन रघुनाथ रुका नहीं।

वह ऊपर आया और अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा। कविता ने उसकी आँखों में देखा। "अंदर डालो," वह फुसफुसाई। "पूरा।"

रघुनाथ ने एक धक्का दिया और उसका लंड उसकी गीली चूत में समा गया। कविता के मुँह से एक लंबी आह निकली। इतना भरा हुआ उसने बरसों से महसूस नहीं किया था। राकेश का तो इसके सामने कुछ था ही नहीं।

रघुनाथ ने धक्के लगाने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज़। चारपाई चरमराने लगी। कविता की टाँगें उसकी कमर से लिपट गईं और वह हर धक्के पर उससे टकरा रही थी। "हाँ, ससुर जी, और ज़ोर से," वह चिल्ला पड़ी, फिर होंठ भींच लिए।

रघुनाथ ने उसे पलटा और घोड़ी बना दिया। पीछे से उसने एक झटके में लंड अंदर डाला। इस पोज़ में वह और गहरा जा रहा था। कविता के मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं। उसका एक हाथ रघुनाथ ने पकड़ा और उसकी चूचियों को पीछे से मसलने लगा।

"तुम्हारी चूत बहुत टाइट है, बहू," रघुनाथ हाँफते हुए बोला। "राकेश तो नसीब वाला है, पर वह इसकी क़द्र नहीं जानता।"

"अब यह आपकी है," कविता ने पीछे मुड़कर कहा, उसकी आँखों में एक शरारत थी। "जब चाहो, जैसे चाहो।"

यह सुनकर रघुनाथ के धक्के और तेज़ हो गए। कविता का बदन फिर अकड़ने लगा। दूसरी बार का चरम पहले से भी तेज़ था। वह ज़ोर से चिल्लाई और उसकी चूत ने रघुनाथ के लंड को भींच लिया।

उसी पल रघुनाथ भी झड़ गया। उसका गरम पानी उसकी चूत के अंदर बहा और कविता ने उसे अपने अंदर महसूस किया। दोनों पसीने में भीगे चारपाई पर गिर पड़े, एक-दूसरे से लिपटे हुए।

कुछ देर सिर्फ़ उनकी साँसों की आवाज़ थी। फिर रघुनाथ ने उसके माथे को चूमा। "डर लग रहा है?" उसने पूछा।

कविता ने सिर हिलाया। "नहीं। पहली बार इतने सालों में मुझे लग रहा है कि मैं ज़िंदा हूँ।"

रघुनाथ मुस्कुराया और उसे और कसकर अपनी बाँहों में ले लिया। "राकेश को कभी पता नहीं चलेगा। यह बात हम दोनों के बीच रहेगी।"

"रहेगी," कविता ने कहा। फिर वह उठी, अपनी साड़ी ठीक की और दरवाज़े की ओर बढ़ी। दरवाज़े पर रुककर उसने पीछे मुड़कर देखा। "ससुर जी, एक बात कहूँ?"

"कहो, बहू।"

कविता की आँखों में वही शरारत चमकी। "अब शाम की चाय मेरे कमरे में पिया करो। वहाँ चारपाई ज़्यादा मज़बूत है।"

रघुनाथ की हँसी बैठक में गूँज गई, धीमी और गहरी। "बहू," उसने कहा, "यह तो बस शुरुआत है।"

कविता अपने कमरे में लौटी। बिस्तर पर लेटते ही उसे एहसास हुआ कि उसकी चूत से अब भी रघुनाथ का पानी बह रहा है। उसने साड़ी ठीक की, आँखें बंद कीं, और पहली बार महीनों में एक गहरी, संतोष भरी नींद में डूब गई। सुबह का इंतज़ार अब उसे बेसब्री से था।

अगली सुबह कविता रसोई में गुनगुना रही थी। रघुनाथ खेत जाने से पहले रोटी लेने आया। उसने रोटी का डिब्बा उठाया और जाते-जाते कविता की कमर को हल्के से दबा दिया। कविता ने उसे देखकर आँख मारी।

"शाम को चाय," वह फुसफुसाई।

"शाम को चाय," रघुनाथ ने दोहराया, और उसकी आँखों में वही भूख थी, अब बिना किसी पर्दे के। दरवाज़े से निकलते हुए वह एक बार पलटा और कविता ने अपने होंठों पर उँगली रखकर उसे चूमा, दूर से।

उस दिन दोपहर को कविता कोठे में गेहूँ निकालने गई। उसे पता था कि रघुनाथ खेत में है, लेकिन फिर भी उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। हर आहट पर वह चौंक जाती। यह डर नहीं था। यह इंतज़ार था।

शाम ढली और कविता ने दो कुल्हड़ चाय बनाई। एक अपने लिए, एक ससुर जी के लिए। वह चाय लेकर अपने कमरे में गई और दरवाज़ा अधखुला छोड़ दिया। बाहर आँगन में रघुनाथ की चारपाई खाली थी।

कदमों की आहट हुई। रघुनाथ दरवाज़े पर खड़ा था। कविता ने चाय का कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ाया और मुस्कुराई। "आइए, ससुर जी। चाय ठंडी हो रही है।"

रघुनाथ अंदर आया। कविता ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया। इस बार कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। इस बार पूरी रात पड़ी थी। रघुनाथ ने कुल्हड़ एक ओर रखा और कविता को अपनी बाँहों में भर लिया।

उस रात कविता ने पहली बार खुद पहल की। उसने रघुनाथ को बिस्तर पर धकेला और उसके ऊपर चढ़ गई। उसकी साड़ी उसने खुद उतारी, एक-एक परत, धीरे-धीरे, रघुनाथ की आँखों में देखते हुए।

रघुनाथ की छाती पर झुककर उसने उसके निप्पलों को चूसा और नीचे सरकती गई। उसका लंड फिर तना हुआ था। कविता ने उसे मुँह में लिया और इस बार और गहरा, और देर तक। रघुनाथ की उँगलियाँ उसके बालों में थीं और वह कराह रहा था।

फिर वह उसके ऊपर बैठी। उसने लंड को अपनी चूत पर रखा और धीरे-धीरे नीचे धँसती चली गई। पूरा अंदर जाने पर दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। कविता ने हिलना शुरू किया, पहले धीरे, फिर तेज़।

रघुनाथ के हाथ उसकी कमर पर थे, उसे ऊपर-नीचे करने में मदद करते हुए। उसकी चूचियाँ उसके चेहरे के सामने उछल रही थीं और रघुनाथ बारी-बारी से उन्हें चूस रहा था। कविता की साँसें उखड़ रही थीं।

"देखो, बहू," रघुनाथ ने हाँफते हुए कहा, "तुम तो मुझसे भी आगे निकल गईं।"

"सिखाने वाला अच्छा मिला है," कविता ने हँसकर कहा और और तेज़ हिलने लगी। उसका बदन पसीने से चमक रहा था।

चरम आया तो कविता रघुनाथ की छाती पर गिर पड़ी, काँपती हुई। रघुनाथ ने उसे पलटा, खुद ऊपर आया और कुछ ही धक्कों में वह भी झड़ गया, उसका पानी फिर उसकी चूत में बहा।

वे दोनों बिस्तर पर लेटे रहे। बाहर मुर्गे ने बाँग दी। सुबह होने को थी। कविता उठी और अपनी साड़ी बाँधने लगी। रघुनाथ उसे देखता रहा।

"राकेश अगले महीने आएगा," कविता ने साड़ी का पल्लू कंधे पर डालते हुए कहा। "उसके जाने के बाद फिर यही होगा। हर हफ़्ते।"

"हर हफ़्ते?" रघुनाथ ने भौंह उठाई।

कविता दरवाज़े पर रुकी और पलटी। उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास था जो पहले कभी नहीं था। "ससुर जी, अब मैं आपकी बहू कम, आपकी औरत ज़्यादा हूँ। और अपनी औरत को कोई हफ़्तों तक तरसाता नहीं।"

रघुनाथ बिस्तर से उठा, उसके पास आया और उसके गाल को चूमा। "जैसा हुक्म, मेरी जान।"

कविता रसोई की ओर चली गई, होंठों पर एक मुस्कान लिए। चूल्हा जलाया, चाय चढ़ाई। आज की चाय में एक ख़ास मिठास थी, वह मिठास जो सिर्फ़ वही जानती थी।

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