मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 1
उस रात तक "मौसी की चुदाई" जैसी बातें मेरे लिए सिर्फ हॉस्टल के दोस्तों के मुंह से सुनी हुई कहानियां थीं। कॉलेज की रातों में कोई ना कोई दोस्त अपनी मौसी या चाची की कहानी सुनाता और हम सब हंसते हुए उसे बढ़ा चढ़ा कर सुनते। मुझे कभी नहीं लगा था कि एक दिन मैं खुद ऐसी ही कहानी का हिस्सा बन जाऊंगा। लेकिन नैना मौसी के घर के उस मेहमान कमरे में बैठे बैठे आज जब मैं ये सोचता हूं तो हंसी भी आती है और एक अजीब सी बेचैनी भी होती है।
"विक्रम बेटा, दरवाज़ा खोल कर मत सोना, बरसात का मौसम है, मच्छर घुस जाएंगे।" नैना मौसी की आवाज़ नीचे से आई थी। मैंने हल्का सा "हां मौसी" कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। लेकिन अंदर से कुंडी नहीं लगाई। क्यों नहीं लगाई, ये मुझे खुद नहीं पता। शायद इसलिए कि कहीं ना कहीं दिल चाहता था कि दरवाज़ा खुला ही रहे।
जयपुर आए मुझे चार दिन हो गए थे। बैंकिंग की कोचिंग के लिए पापा ने कहा था कि दस पंद्रह दिन नैना मौसी के घर रह कर पढ़ाई कर लो, खर्चा भी बचेगा और पढ़ाई भी होगी। मामा सूरज दुबई में नौकरी करते हैं और अभी उनकी वापसी में दस दिन बाकी थे। घर में सिर्फ मौसी और काम वाली बाई थी, जो शाम को चली जाती थी।
पहले दिन जब मैं सामान लेकर पहुंचा था, तो मौसी ने दरवाज़ा खोला था और मैं एक पल को ठिठक गया था। अड़तीस साल की नैना मौसी को मैंने बचपन में देखा था, लेकिन अब वो बिल्कुल बदल चुकी थीं। हल्की गुलाबी साड़ी में, बालों का जूड़ा आधा खुला हुआ, चेहरे पर वो मुस्कान जो औरतों के चेहरे पर तब आती है जब उन्हें पता होता है कि सामने वाला उन्हें देख रहा है।
"अरे विक्रम, इतना बड़ा हो गया तू? आ अंदर आ।" उन्होंने मेरा बैग पकड़ लिया था और अंदर खींच लिया था। उनके हाथ की नरम पकड़ मेरी कलाई पर थी और मैं अनजाने में उनकी तरफ खिंचता चला गया था।
रात को खाने की मेज़ पर मौसी ने दाल बाटी बनाई थी। मैं खा रहा था और वो सामने बैठी मुझे देख रही थीं। "पढ़ाई कैसी चल रही है?" उन्होंने पूछा। "ठीक चल रही है मौसी, कोचिंग सुबह नौ बजे से है।" मैंने कहा। वो हंसीं, "सुबह नौ बजे? तो रात को जल्दी सोना पड़ेगा। यहां तो मैं अकेली टीवी देखती रहती हूं रात को।" उनकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी थी, या शायद तन्हाई।
खाना खाते खाते उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था। मैंने नज़रें झुका लीं, लेकिन आंखें धोखा दे गईं। ब्लाउज़ के ऊपर उनकी गोरी गर्दन और कॉलरबोन पर पसीने की हल्की बूंदें चमक रही थीं। गर्मी का मौसम था और पंखा धीमा चल रहा था। मौसी ने पल्लू ठीक किया, लेकिन उनकी आंखों में मैंने कुछ देखा था। वो जानती थीं कि मैं देख रहा था।
"और बता, कोई गर्लफ्रेंड है कि नहीं?" उन्होंने अचानक पूछा और मैं खांसने लगा। "नहीं मौसी, पढ़ाई में टाइम कहां मिलता है।" वो हंस पड़ीं, खुल कर हंसीं। "झूठ मत बोल। तेरी उम्र में सबके होते हैं।" उनकी हंसी में कुछ ऐसा था कि मेरे कान गर्म हो गए।
दूसरे दिन सुबह कोचिंग से लौटा तो घर में सन्नाटा था। बाई जा चुकी थी। मौसी अपने कमरे में थीं। मैं अपने कमरे में किताबें खोल कर बैठ गया, लेकिन ध्यान नहीं लग रहा था। नीचे से मौसी के हंसने की आवाज़ आ रही थी, शायद किसी सहेली से फोन पर बात कर रही थीं।
शाम को मैं नीचे पानी लेने गया। रसोई में मौसी आटा गूंथ रही थीं। उन्होंने स्लीवलेस ब्लाउज़ पहना था और साड़ी कमर में खोंस रखी थी। आटा गूंथते हुए उनकी बाहें ऊपर नीचे हो रही थीं और बगल से उनके ब्लाउज़ का किनारा दिख रहा था। मैंने जल्दी से बोतल भरी और ऊपर जाने लगा।
"विक्रम, सुन।" उन्होंने मुझे रोका। "हां मौसी?" "कल से तेरे मामा का फोन आएगा, वीडियो कॉल पर बात कर लेना। वो पूछ रहे थे तेरे बारे में।" "ठीक है।" मैं बोतल लेकर ऊपर चला गया, लेकिन सीढ़ियों पर रुक कर एक बार पीछे देखा। मौसी आटा गूंथ रही थीं और मुस्कुरा रही थीं। मुझे लगा जैसे वो जानबूझ कर धीरे धीरे काम कर रही हों।
तीसरे दिन वो हादसा हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया। रात के नौ बजे थे। मैं नीचे आया क्योंकि मेरे फोन का चार्जर कमरे में नहीं मिल रहा था। मौसी का कमरा नीचे हॉल के पास था और दरवाज़ा आधा खुला था। मैंने सोचा मौसी से पूछ लूं कि चार्जर कहीं नीचे तो नहीं छूटा।
मैंने दरवाज़ा खटखटाए बिना हल्का सा धक्का दिया। और जो देखा, उससे मेरी सांस रुक गई। नैना मौसी बिस्तर पर बैठी थीं, सिर्फ एक सफेद तौलिए में लिपटी हुई। उनके बाल गीले थे और तौलिए से पानी की बूंदें टपक रही थीं। तौलिया उनकी छाती से लेकर जांघों तक था, और वो अपने पैरों पर लोशन लगा रही थीं।
"मौसी, वो चार्जर..." मेरे मुंह से बस इतना ही निकला। उन्होंने ऊपर देखा। एक पल के लिए हम दोनों जम गए। फिर उन्होंने धीरे से मुस्कुराया। घबराई नहीं, चिल्लाई नहीं, बस मुस्कुराई। "चार्जर? मेरे कमरे में कहां से आएगा पगले। जा, अपने बैग में देख।" उनकी आवाज़ बिल्कुल सामान्य थी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
लेकिन जब मैं पीछे हटा, तो मैंने देखा कि तौलिया उनकी जांघ पर थोड़ा सरक गया था। गोरी चिकनी जांघ का वो हिस्सा देख कर मेरे पूरे बदन में एक करंट दौड़ गया। मेरा लंड पैंट में तनने लगा और मुझे शर्म आई, लेकिन आंखें हटाने का मन नहीं कर रहा था। मौसी ने ये भी देखा। मुझे यकीन है कि उन्होंने देखा, क्योंकि उनकी मुस्कान और गहरी हो गई।
"दरवाज़ा बंद कर के जा।" उन्होंने कहा और मैं जल्दी से दरवाज़ा बंद करके ऊपर भाग गया। कमरे में पहुंच कर मैंने दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर गिर पड़ा। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि कानों में आवाज़ आ रही थी। आंखें बंद करता तो वही तस्वीर सामने आती, गीले बाल, सफेद तौलिया, सरकती हुई जांघ।
उस रात मैंने पहली बार मौसी के बारे में सोच कर मुठ मारी। हाथ नीचे गया और आंखें बंद। तौलिए वाली तस्वीर, उनकी मुस्कान, वो गीली जांघ। मेरा लंड लोहे जैसा सख्त हो गया था। मैंने धीरे धीरे हाथ चलाया, कल्पना में तौलिया हटता जा रहा था। जब झड़ा तो इतना ज़ोर से कि बिस्तर की चादर गीली हो गई। उसके बाद शर्म आई, बहुत शर्म आई, लेकिन नींद नहीं आई।
चौथे दिन सुबह नाश्ते पर मौसी बिल्कुल सामान्य थीं। "रात को ठीक से सोया?" उन्होंने पूछा। "हां मौसी।" मैंने नज़रें झुकाए कहा। "झूठा। आंखों में नींद भरी है।" वो हंसीं और पराठा मेरी थाली में रखा। उनके हाथ की उंगलियां मेरी थाली के किनारे को छू गईं और मैं कांप गया।
कोचिंग में उस दिन एक शब्द समझ नहीं आया। बार बार वही तस्वीर आंखों के सामने। शाम को घर लौटा तो मौसी हॉल में टीवी देख रही थीं। उन्होंने नाइटी पहनी थी, हल्के नीले रंग की, घुटनों तक। मैं सोफे के दूसरे छोर पर बैठ गया।
टीवी पर कोई सीरियल चल रहा था जिसमें हीरो हीरोइन को दीवार से लगा कर चूम रहा था। मौसी ने रिमोट उठाया, लेकिन चैनल नहीं बदला। "आजकल के सीरियलों में यही सब रह गया है।" उन्होंने कहा। "हां मौसी।" मेरी आवाज़ फंस रही थी। "तुझे कैसा लगता है ये सब देख कर?" उन्होंने अचानक पूछा और मेरी तरफ देखा।
"मतलब?" मैंने पूछा। "मतलब, तेरी उम्र के लड़के ये सब देखते हैं तो क्या सोचते हैं?" उनकी आंखों में शरारत थी। "पता नहीं मौसी।" "पता है तुझे, झूठ मत बोल।" वो हंस पड़ीं और मेरे कंधे पर हल्का सा हाथ मारा। उनका हाथ मेरे कंधे पर एक पल ज़्यादा रुका।
रात को खाने के बाद मैं ऊपर जाने लगा तो मौसी ने कहा, "विक्रम, ऊपर वाली टंकी का नल ढीला है, पानी टपकता रहता है। कल प्लंबर को बुलाना पड़ेगा।" "मैं देख लूं मौसी?" "रहने दे, रात को छत पर मत जा। कल दिन में देख लेना।" उन्होंने कहा और मेरे गाल पर हल्का सा हाथ फेरा, जैसे बच्चे को थपथपाते हैं। लेकिन मैं बच्चा नहीं था और वो जानती थीं।
ऊपर कमरे में मैं पढ़ने बैठा, लेकिन किताब के पन्ने खाली नज़र आ रहे थे। नीचे से मौसी के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। फिर सन्नाटा। मैं बिस्तर पर लेट गया और छत को देखने लगा। घड़ी में साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
तभी मुझे प्यास लगी। मैं नीचे पानी लेने गया। हॉल में अंधेरा था, सिर्फ मौसी के कमरे से हल्की रोशनी आ रही थी। दरवाज़ा पूरा बंद नहीं था, हल्का सा खुला था। मैं रसोई की तरफ जा ही रहा था कि अंदर से आवाज़ आई। मौसी किसी से फोन पर बात कर रही थीं, धीमी आवाज़ में।
"अरे नहीं रीमा, वो तो बच्चा है अभी।" मौसी हंस रही थीं। "हां हां, देखा मैंने, शर्मा जाता है बेचारा।" मेरा दिल धड़कने लगा। क्या वो मेरे बारे में बात कर रही थीं? "अरे तू भी ना, कुछ भी बोलती है।" फिर हंसी। "चल रखती हूं, कल बात करती हूं।" फोन कटने की आवाज़ आई।
मैं जल्दी से रसोई में घुस गया और बोतल भरने लगा। हाथ कांप रहे थे। वो मेरी ही बात कर रही थीं, मुझे यकीन था। "बच्चा है अभी।" इस शब्द पर मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी। बच्चा नहीं हूं मैं, मौसी। ये साबित करने का मन कर रहा था, लेकिन कैसे?
पानी लेकर ऊपर जाते हुए मैंने फिर उनके दरवाज़े की तरफ देखा। अब दरवाज़ा बंद था। मैं अपने कमरे में आया और बिस्तर पर बैठ गया। तभी फोन पर मैसेज आया, दोस्त का था। "और भाई, मौसी के घर मज़े आ रहे हैं?" मैंने लिखा, "चुप कर।" लेकिन उंगलियां रुक गईं। मज़ा तो आ रहा था, ऐसे मज़ा जैसा पहले कभी नहीं आया था।
आधी रात को मेरी आंख खुली। पंखे की आवाज़ के बीच मुझे नीचे से कुछ सुनाई दिया। जैसे कोई धीरे धीरे चल रहा हो। मैंने कान लगाए। सीढ़ियों पर हल्की आहट। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। क्या मौसी ऊपर आ रही थीं? क्यों?
आहट मेरे दरवाज़े के पास आकर रुक गई। मैंने सांस रोक ली। एक पल, दो पल। फिर आहट वापस सीढ़ियों की तरफ चली गई। मैं उठा और दरवाज़ा खोला। सीढ़ियों पर कोई नहीं था। नीचे मौसी के कमरे का दरवाज़ा बंद था। शायद मेरा वहम था। शायद बाई का बचा हुआ काम था। लेकिन दिल नहीं मान रहा था।
मैं वापस बिस्तर पर लेटा, लेकिन नींद कोसों दूर थी। कल्पना दौड़ रही थी। अगर मौसी सच में ऊपर आई थीं तो क्यों? क्या वो देखना चाहती थीं कि मैं सोया हूं या जाग रहा हूं? क्या वो भी वही सोच रही थीं जो मैं सोच रहा था? मेरे लंड में फिर तनाव आने लगा। मैंने हाथ नीचे ले जाया और धीरे धीरे हिलाने लगा।
आंखें बंद थीं और कल्पना में मौसी थीं। वही सफेद तौलिया, वही गीली जांघ, वही मुस्कान। कल्पना में तौलिया गिरता है और वो पूरी नंगी मेरे सामने खड़ी हैं। उनके बड़े बड़े दूध, गोरी कमर, जांघों के बीच काली झांटों की हल्की रेखा। मैं कल्पना में उनके पास जाता हूं, उन्हें बिस्तर पर लिटाता हूं, उनकी टांगें फैलाता हूं और अपना लंड उनकी चूत में उतार देता हूं।
कल्पना इतनी ज़बरदस्त थी कि मैं जल्दी झड़ गया। हाथ में चिपचिपा पानी और दिल में अजीब सी बेचैनी। मैंने टिश्यू से साफ किया और करवट बदल ली। घड़ी में एक बज रहा था। तभी, बिल्कुल तभी, मेरे दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। खट। खट।
मेरी सांस रुक गई। इतनी रात को कौन? मैंने धीरे से पूछा, "कौन?" बाहर से मौसी की आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत नरम। "विक्रम, मैं हूं। नींद नहीं आ रही। दरवाज़ा खोलो।"
मैं बिस्तर से उठा। पैर कांप रहे थे। दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए मेरे दिमाग में हज़ार सवाल थे। इतनी रात को मौसी मेरे कमरे में क्यों आना चाहती हैं? नींद नहीं आ रही तो मेरे पास क्यों? मैंने कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
सामने नैना मौसी खड़ी थीं। नाइटी में, बाल खुले हुए, पैर नंगे। उनकी आंखों में नींद नहीं थी, कुछ और था। वो कुछ ऐसा था जिसे मैं समझ रहा था, लेकिन समझना नहीं चाहता था। या शायद समझना चाहता था। "मौसी, सब ठीक है?" मैंने पूछा। वो अंदर आईं और दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।
"सब ठीक है बेटा।" उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ कांप रही थी। वो बिस्तर के किनारे बैठ गईं। "तेरे मामा का फोन आया था। दस दिन नहीं, अब वो..." वो रुकीं। "क्या हुआ मौसी? मामा ठीक हैं ना?" "वो ठीक हैं। लेकिन उनकी फ्लाइट..." मौसी ने मेरी तरफ देखा और उनकी आंखों में आंसू थे। या शायद आंसू का बहाना था।
"मौसी, बताओ ना क्या हुआ?" मैं उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ गर्म था और कांप रहा था। "विक्रम, तू अब बच्चा नहीं रहा। तुझसे एक बात कहूं?" "कहो मौसी।" "तेरे मामा... वो अब पहले जैसे नहीं रहे। दुबई जाने के बाद से..." उनकी आवाज़ टूट गई।
मैं समझ गया था कि वो क्या कहना चाहती हैं, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। बस उनका हाथ पकड़े रहा। उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में भींच लिया। "इतने सालों से मैं अकेली हूं विक्रम। रात को ये घर काटने को दौड़ता है।" उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और वो मेरे कंधे पर सिर रख कर रोने लगीं।
उनके बालों की खुशबू मेरे नाक में भर गई। उनका बदन मेरे बदन से सटा था। नाइटी के अंदर उनकी छाती मेरे बाजू से दब रही थी। मेरा लंड फिर तनने लगा और मुझे खुद पर गुस्सा आया। मौसी रो रही हैं और मैं ये सोच रहा हूं? लेकिन बदन तो बदन है, वो कहां सुनता है।
"मौसी, रो मत। मैं हूं ना।" मैंने कहा और उनके सिर पर हाथ फेरा। उन्होंने सिर उठाया और मेरी आंखों में देखा। बहुत करीब से। उनकी सांसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं। "सच में? तू है मेरे साथ?" "हां मौसी।" "तो फिर आज रात मेरे साथ रुक। मुझे अकेले डर लगता है।" उन्होंने कहा और मेरा हाथ पकड़ कर अपने कमरे की तरफ देखने लगीं। या शायद वो चाहती थीं कि मैं कुछ कहूं, कुछ करूं।
मैं कुछ बोल पाता, इससे पहले नीचे से आवाज़ आई। मुख्य दरवाज़े पर किसी ने कुंडी खटखटाई। खट खट खट। आधी रात को कौन? मौसी का चेहरा सफेद पड़ गया। "इतनी रात को कौन हो सकता है?" उन्होंने फुसफुसाया। फिर से खटखटाहट, इस बार ज़ोर से। मौसी ने मेरा हाथ छोड़ा और उठ खड़ी हुईं। "तू यहीं रुक, मैं देखती हूं।"
वो दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलीं और सीढ़ियों से नीचे जाने लगीं। मैं भी पीछे पीछे गया। नीचे पहुंच कर मौसी ने दरवाज़े की आंख से बाहर देखा और उनकी सांस अटक गई। उन्होंने पलट कर मेरी तरफ देखा, चेहरे पर घबराहट। "विक्रम," उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, "बाहर... बाहर तेरे मामा खड़े हैं।"
अगला भाग जल्द आ रहा है...
मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 2
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