रिश्ते की पहली मुलाकात में ही जब हमने एक-दूसरे को पूरी तरह उतार दिया
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। होटल के रूफटॉप कैफे में सिर्फ हम दो ही बचे थे।
अनन्या ने वाइन का आखिरी घूँट लिया। सामने वीर बैठा था। परिवारों ने रिश्ता तय करने से पहले “एक बार मिल लो” कहा था। दोनों ने सोचा था सिर्फ औपचारिक बातचीत होगी। लेकिन तीन घंटे, दो बोतल वाइन और बहुत सारी बातों ने हवा बदल दी थी।
वीर ने बिल चुकाया और उठा। “ छोड़ दूँ?”
अनन्या ने खड़े होते हुए कहा, “मेरा ड्राइवर कैंसिल हो गया। तू कहाँ रुक रहा है?”
“यहीं। चौथी मंजिल।”
अनन्या कुछ सेकंड चुप रही। फिर बोली, “मुझे भी थकान हो रही है। लिफ्ट तक तो साथ चल ही सकता है।”
लिफ्ट में दोनों चुप थे। चौथी मंजिल पर वीर रुका। अनन्या भी निकल आई। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। कोई हँसी नहीं, कोई मजाक नहीं। सिर्फ एक भारी सा मौन।
वीर ने कमरे का कार्ड स्वाइप किया। दरवाजा खुला। अनन्या अंदर चली गई। वीर ने दरवाजा बंद किया। ताला भी लगा दिया।
अनन्या ने मुड़कर देखा। “हम पागल हो रहे हैं।”
“हाँ,” वीर ने कहा और एक कदम बढ़ाया।
अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से चिपक गए। चुंबन में वाइन और भूख दोनों थी। अनन्या की ड्रेस का जिपर वीर ने पीछे से खोला। ड्रेस फर्श पर गिर गई। अनन्या ने वीर की शर्ट के बटन खोले और सीने पर हाथ फेरने लगी।
वीर ने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। ब्रा खोली। अनन्या के स्तनों को दोनों हाथों से पकड़कर जोर से मसला। फिर निप्पल को मुँह में ले लिया। अनन्या की कमर तन गई।
“धीरे मत करना,” अनन्या ने हांफते हुए कहा। “आज रात हमें एक-दूसरे को सही से जानना है।”
वीर ने उसकी पैंटी नीचे खींची। अनन्या की जाँघें अपने आप फैल गईं। वीर ने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। अनन्या की उंगलियाँ उसके बालों में घुस गईं। वीर की जीभ तेज और भूखी थी। वह क्लिट को चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर घुमा रहा था।
अनन्या की साँसें तेज हो गईं। “वीर… वहाँ… बस वहीं रख…”
वीर ने और गहराई तक उंगलियाँ दबाईं। अनन्या का शरीर अकड़ गया। पहला चरम आँसू और सिसकी के साथ आया। उसने वीर के बाल जोर से पकड़ रखे थे।
वीर ऊपर आया। अनन्या ने खुद उसकी पैंट के बटन खोले और नीचे की। जब वीर का अंग उसके हाथ में आया तो अनन्या ने उसे अपने होंठों तक ले गई। मुँह में लिया। धीरे-धीरे गहरा। वीर की साँस अटक गई।
थोड़ी देर बाद अनन्या ने उसे छोड़ा और जाँघें फैला दीं। “अब अंदर आ।”
वीर ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और धीरे-धीरे अंदर घुसना शुरू किया। अनन्या की भौंहें सिकुड़ गईं लेकिन उसने रोका नहीं। जब पूरा अंदर गया तो दोनों की आँखें मिलीं।
“हिल,” अनन्या ने कहा।
वीर ने हिलना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज। अनन्या की टाँगें उसकी कमर पर लिपट गईं। वीर ने झुककर उसके स्तनों को फिर मुँह में लिया। अनन्या की आवाजें अब कमरे में गूँज रही थीं।
“और जोर से वीर… आज सब कुछ देना है।”
वीर ने उसकी बात मान ली। धक्के गहरे और तेज हो गए। बिस्तर चरमरा रहा था। अनन्या की नाखून उसकी पीठ पर चल रहे थे। दूसरा चरम अनन्या का और भी लंबा था। उसने वीर को जोर से जकड़ लिया। वीर ने भी उसी समय उसके अंदर ही छोड़ दिया।
दोनों हांफते हुए एक-दूसरे से चिपके रहे। कुछ देर बाद अनन्या ने धीरे से कहा, “एक बार और। सुबह होने से पहले हमें खत्म हो जाना है।”
वीर मुस्कुराया। उसने अनन्या को घुटनों के बल किया और पीछे से अंदर आया। इस बार गति शुरू से ही तेज थी। अनन्या ने तकिया दबा लिया। वीर एक हाथ से उसके बाल पकड़े हुए था, दूसरे से उसके स्तन को मसल रहा था।
अनन्या पीछे की ओर जोर से धकेल रही थी। “और… और गहरा…”
वीर ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी ताकत लगा दी। तीसरा चरम दोनों का लगभग एक साथ आया। वीर ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
सुबह चार बजे दोनों थककर बिस्तर पर लेटे थे। अनन्या ने वीर की छाती पर सिर रखा।
“रिश्ता तो अब नहीं होगा,” उसने धीरे से कहा।
वीर ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “रिश्ता नहीं। लेकिन ये रात… ये तो हो गई।”
अनन्या मुस्कुराई। “हाँ। और ये रात काफी थी।”
वीर ने उसका चेहरा उठाया और फिर से चूमा। दोनों जानते थे कि सुबह वे अलग-अलग निकलेंगे। परिवारों को ना कह देंगे। लेकिन जो कुछ आज रात हुआ था, वह दोनों की त्वचा पर हमेशा के लिए छप चुका था।
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