हुक्म और समर्पण की वो रात जब उसने मुझे पूरी तरह अपने काबू में ले लिया और दर्द को भी मजे में बदल दिया
कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। खिड़कियाँ बंद थीं। दरवाजे पर ताला लग चुका था।
आयुष कुर्सी पर बैठा था। काली शर्ट, आस्तीन ऊपर चढ़ी हुई। सामने घुटनों के बल कीर्ति बैठी थी। आँखों पर काली पट्टी बंधी हुई, हाथ पीछे बंधे हुए।
“सिर उठा,” आयुष ने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा।
कीर्ति ने सिर उठाया। आयुष ने कुर्सी से उठकर उसके पास आकर उसके ठोड़ी को उँगली से ऊपर किया। “आज तू पूरी तरह मेरी है। समझी?”
“जी…” कीर्ति की आवाज काँप रही थी।
आयुष ने उसके गाल पर हल्के से थप्पड़ मारा। “जोर से बोल।”
“जी, मैं पूरी तरह आपकी हूँ।”
आयुष मुस्कुराया। उसने कीर्ति की साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। ब्रा को भी काट कर फेंक दिया। कीर्ति के स्तन खुले हो गए। आयुष ने दोनों निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा। कीर्ति की साँस तेज हो गई।
“आवाज निकालना मना है जब तक मैं इजाजत न दूँ,” आयुष ने कहा और उसके एक निप्पल को जोर से दाँतों से काट लिया। कीर्ति की बदन में सिहरन दौड़ गई लेकिन उसने आवाज दबा ली।
आयुष ने उसे उठाया और बिस्तर पर पेट के बल लिटा दिया। हाथ अभी भी पीछे बंधे थे। उसने उसकी साड़ी और पेटीकोट पूरी तरह हटा दिए। पैंटी को एक झटके में फाड़ दिया। कीर्ति की जाँघें हल्की काँप रही थीं।
आयुष ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान उभर आया। फिर एक और। फिर एक और। कीर्ति के मुँह से हल्की सिसकी निकली।
“मैंने आवाज निकालने को कहा था?” आयुष ने फिर थप्पड़ मारा—इस बार और जोर से।
“माफ कीजिए…” कीर्ति ने फुसफुसाया।
आयुष ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “आज तुझे सिखाना है कि समर्पण किसे कहते हैं।”
उसने कीर्ति की जाँघें फैलाईं और दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। कीर्ति की कमर उछल गई। आयुष की उंगलियाँ तेजी से आगे-पीछे हो रही थीं। कभी अंदर तक, कभी सिर्फ किनारे पर। कीर्ति की साँसें तेज चल रही थीं लेकिन वह आवाज नहीं निकाल रही थी।
आयुष ने अचानक उंगलियाँ निकाल लीं। कीर्ति की निराशा साफ थी। फिर उसने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। कीर्ति का शरीर तन गया। आयुष की जीभ तेज और नियंत्रित थी। वह क्लिट को चूस रहा था, फिर अंदर तक जीभ डाल रहा था। कीर्ति के नाखून मुट्ठी में गड़ गए।
“अब आवाज निकाल,” आयुष ने आदेश दिया।
कीर्ति की दबी हुई सिसकियाँ अब बाहर आने लगीं। आयुष ने और जोर से चूसा। कीर्ति का शरीर काँपने लगा। चरम करीब था तभी आयुष ने अचानक रुक गया।
कीर्ति ने हांफते हुए कहा, “प्लीज… पूरा होने दीजिए…”
आयुष ने उसके नितंब पर फिर थप्पड़ मारा। “तू माँग नहीं सकती। तू सिर्फ ले सकती है जो मैं दूँ।”
उसने कीर्ति को पलटा। आँखों की पट्टी अभी भी बंधी थी। आयुष ने अपनी पैंट खोली और उसका कड़ा अंग कीर्ति के होंठों पर रखा। “मुँह खोल।”
कीर्ति ने मुँह खोला। आयुष ने धीरे-धीरे अंदर डाला। फिर गहरा। कीर्ति की आँखों से आँसू बहने लगे लेकिन उसने गला खोला रखा। आयुष ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गला तक।
थोड़ी देर बाद आयुष बाहर निकला। उसने कीर्ति की टाँगें फैलाईं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया। कीर्ति की चीख निकल गई।
आयुष रुक नहीं रहा था। उसने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। बिस्तर चरमरा रहा था। हर धक्का इतना गहरा था कि कीर्ति की साँसें अटक जा रही थीं। आयुष ने उसके दोनों निप्पल्स को फिर मरोड़ना शुरू कर दिया।
“कौन सी हो तू?” आयुष ने गुर्राते हुए पूछा।
“आपकी… सिर्फ आपकी…” कीर्ति की आवाज टूट रही थी।
आयुष ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक मारने लगा। कीर्ति का पहला चरम बिना इजाजत के आ गया। उसका शरीर अकड़ गया। आयुष ने तुरंत बाहर निकाल लिया।
“बिना इजाजत के?” उसने उसके गाल पर थप्पड़ मारा। “सजा मिलेगी।”
उसने कीर्ति को फिर पेट के बल किया। हाथ अभी भी बंधे थे। आयुष ने पीछे से फिर अंदर घुस गया और इस बार और तेज। साथ में उसके नितंबों पर लगातार थप्पड़ पड़ रहे थे। कीर्ति की आवाजें अब दब नहीं पा रही थीं।
“प्लीज… और… पूरा…”
आयुष ने उसके बाल जोर से खींचे और कान में कहा, “अब चरम पर पहुँच। मेरी इजाजत है।”
कीर्ति का शरीर काँप उठा। दूसरा चरम पहले से कहीं तेज था। आँसू और सिसकियाँ एक साथ निकल रही थीं। आयुष ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा।
दोनों कुछ देर तक उसी हालत में रहे। आयुष ने धीरे-धीरे उसके हाथ खोल दिए और आँखों की पट्टी हटाई। कीर्ति की आँखें लाल थीं।
आयुष ने उसके माथे पर चुंबन लिया। “बोल, कैसा लगा?”
कीर्ति ने हांफते हुए जवाब दिया, “और चाहिए… फिर से…”
आयुष मुस्कुराया। उसने कीर्ति को अपनी ओर खींचा और उसके कान में कहा, “रात अभी बाकी है। और आज तू बिना इजाजत के कुछ नहीं करेगी।”
कीर्ति ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में वही समर्पण था जो आयुष चाहता था।
अगले दो घंटे में आयुष ने उसे और तीन बार लिया। कभी दीवार से सटाकर, कभी कुर्सी पर बैठाकर, कभी बाल पकड़कर घुटनों के बल। हर बार इजाजत लेकर। हर बार और गहरा। हर बार कीर्ति की आवाज और भी दबी हुई और भूखी होती गई।
रात के तीन बजे जब आयुष ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, कीर्ति का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। नाखूनों और थप्पड़ों के निशान पूरे शरीर पर थे। जाँघों के अंदर उसका अंश बह रहा था।
आयुष ने उसे अपनी छाती से लगाया। कीर्ति ने आँखें बंद कर लीं।
“कल फिर?” उसने धीरे से पूछा।
आयुष ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “जब तक तू मेरी इजाजत से साँस लेगी… तब तक।”
कीर्ति मुस्कुराई। हुक्म और समर्पण की ये रात अब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी।
Readers who enjoyed “हुक्म और समर्पण की वो रात जब उसने मुझे पूरी तरह अपने काबू में ले लिया और दर्द को भी मजे में बदल दिया” also read
8 curated storiesज़बरदस्त रात जब उसने बाल खींचकर चोदा और साफ कहा कि आज नर्मियत नहीं चलेगी सिर्फ गंदी और ज़ोरदार सेक्स
उसने मेरा बाल पकड़कर खींचा और बोली – आज नर्मियत नहीं चलेगी। फिर जो हुआ वो सिर्फ गंदी और ज़ोरदार सेक्स था।
पड़ोसी भाभी सेक्स स्टोरी: आधी रात की घंटी
पड़ोसी भाभी सेक्स स्टोरी: आधी रात को बाथरूम की टंकी फटने पर सुनीता भाभी ने पड़ोसी दीपक को मदद के लिए बुलाया, लेकिन पानी रुकने के बाद जो शुरू हुआ, वो दोनों की जिंदगी की सबसे लंबी रात बन गया।
नौकरानी की चुदाई: दिवाली की सफ़ाई वाली दोपहर
राहुल और उसकी कामवाली गौरी की ये कहानी दिवाली की सफ़ाई वाली दोपहर में दीवान हिलाने की मदद मांगने से शुरू हुई, और बेकाबू होती चली गई।
जब पति ने खुद मुझे किसी और के हवाले कर दिया और दोनों की सीमाएँ मिटा दीं हॉटवाइफ की सबसे खुली और तीव्र रात
एक पति की इच्छा, एक पत्नी का समर्पण और एक तीसरा व्यक्ति जिसने दोनों की सीमाएँ मिटा दीं। हॉटवाइफ की सबसे खुली और तीव्र रात।
पत्नी को दूसरे के साथ देखना मेरी छुपी हुई हवस जब मैंने खुद कहा और दरवाज़े के पीछे से सब देखता रहा जो मज़ा आया वो काल्पनिक नहीं था
मैंने खुद अपनी पत्नी को दूसरे मर्द के साथ सोने के लिए कहा। दरवाज़े के पीछे से सब देखता रहा। जो मज़ा आया वो काल्पनिक नहीं था।
लेट नाइट ओवरटाइम जब मैनेजर ने केबिन में बुलाया दरवाज़ा बंद किया और जो ओवरटाइम हुआ वो काम से जुड़ा नहीं था
सभी कर्मचारी जा चुके थे। मैनेजर ने कैबिन में बुलाया और दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर जो ओवरटाइम हुआ वो काम से जुड़ा नहीं था।
हॉस्टल की रात रूमरेट की बहन के साथ जब उसने दरवाज़ा बंद करते ही कहा आज रात यहीं रुकोंगी फिर दीवारें भी नहीं सुन सकीं
रूममेट घर गया था। उसकी बहन मेरे कमरे में आई और दरवाज़ा बंद करते ही बोली – आज रात यहीं रुकोंगी। फिर जो हुआ वो हॉस्टल की दीवारें भी सुन नहीं सकतीं।
कानपुर के पुराने टेक्सटाइल गोदाम में रात की शिफ्ट खत्म होने के बाद शादीशुदा क्लर्क मीना ने अपने पति के सामने गोदाम के युवा लोडर की मोटी काली लंड से अपनी गीली चूत फड़वा दी और पूरा गाढ़ा वीर्य अंदर ले लिया
कानपुर के पुराने टेक्सटाइल गोदाम में रात की शिफ्ट खत्म होने के बाद शादीशुदा क्लर्क मीना ने अपने पति के सामने युवा लोडर की मोटी काली लंड से अपनी गीली चूत फड़वा दी और पूरा गाढ़ा वीर्य अंदर ले लिया।