जब मैंने खुद को पूरी तरह उसके हुक्म के हवाले कर दिया आँखों पर पट्टी हाथ बंधे और दर्द इजाजत बन गया
कमरे में सिर्फ एक लाल बत्ती जल रही थी। खिड़कियाँ काली पर्दों से ढकी थीं। दरवाजे पर ताला लग चुका था।
ईशा घुटनों के बल फर्श पर बैठी थी। आँखों पर काली रेशमी पट्टी बंधी हुई। दोनों हाथ पीछे की ओर रस्सी से कसे हुए। सामने कुर्सी पर आदित्य बैठा था।
“सिर उठा,” आदित्य ने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा।
ईशा ने सिर उठाया। आदित्य ने कुर्सी से उठकर उसके पास आकर उसके ठोड़ी को उँगली से ऊपर किया। “आज तू सिर्फ मेरी चीज है। कोई राय नहीं, कोई ना नहीं। समझी?”
“जी…” ईशा की आवाज काँप रही थी।
आदित्य ने उसके गाल पर हल्के से थप्पड़ मारा। “जोर से।”
“जी, मैं सिर्फ आपकी हूँ।”
आदित्य मुस्कुराया। उसने ईशा की साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। ब्रा को कैंची से काट कर फेंक दिया। ईशा के स्तन खुले हो गए। आदित्य ने दोनों निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा। ईशा की साँस तेज हो गई।
“आवाज निकालना मना है जब तक मैं इजाजत न दूँ,” आदित्य ने कहा और उसके एक निप्पल को जोर से दाँतों से काट लिया। ईशा की बदन में सिहरन दौड़ गई लेकिन उसने आवाज दबा ली।
आदित्य ने उसे उठाया और बिस्तर पर पेट के बल लिटा दिया। हाथ अभी भी पीछे बंधे थे। उसने उसकी साड़ी और पेटीकोट पूरी तरह हटा दिए। पैंटी को एक झटके में फाड़ दिया। ईशा की जाँघें हल्की काँप रही थीं।
आदित्य ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान उभर आया। फिर एक और। फिर एक और। ईशा के मुँह से हल्की सिसकी निकली।
“मैंने आवाज निकालने को कहा था?” आदित्य ने फिर थप्पड़ मारा—इस बार और जोर से।
“माफ कीजिए…” ईशा ने फुसफुसाया।
आदित्य ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “आज तुझे सिखाना है कि असली समर्पण किसे कहते हैं।”
उसने ईशा की जाँघें फैलाईं और दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। ईशा की कमर उछल गई। आदित्य की उंगलियाँ तेजी से आगे-पीछे हो रही थीं। कभी अंदर तक, कभी सिर्फ किनारे पर। ईशा की साँसें तेज चल रही थीं लेकिन वह आवाज नहीं निकाल रही थी।
आदित्य ने अचानक उंगलियाँ निकाल लीं। ईशा की निराशा साफ थी। फिर उसने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। ईशा का शरीर तन गया। आदित्य की जीभ तेज और नियंत्रित थी। वह क्लिट को चूस रहा था, फिर अंदर तक जीभ डाल रहा था। ईशा के नाखून मुट्ठी में गड़ गए।
“अब आवाज निकाल,” आदित्य ने आदेश दिया।
ईशा की दबी हुई सिसकियाँ अब बाहर आने लगीं। आदित्य ने और जोर से चूसा। ईशा का शरीर काँपने लगा। चरम करीब था तभी आदित्य ने अचानक रुक गया।
ईशा ने हांफते हुए कहा, “प्लीज… पूरा होने दीजिए…”
आदित्य ने उसके नितंब पर फिर थप्पड़ मारा। “तू माँग नहीं सकती। तू सिर्फ ले सकती है जो मैं दूँ।”
उसने ईशा को पलटा। आँखों की पट्टी अभी भी बंधी थी। आदित्य ने अपनी पैंट खोली और उसका कड़ा अंग ईशा के होंठों पर रखा। “मुँह खोल।”
ईशा ने मुँह खोला। आदित्य ने धीरे-धीरे अंदर डाला। फिर गहरा। ईशा की आँखों से आँसू बहने लगे लेकिन उसने गला खोला रखा। आदित्य ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गला तक।
थोड़ी देर बाद आदित्य बाहर निकला। उसने ईशा की टाँगें फैलाईं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया। ईशा की चीख निकल गई।
आदित्य रुक नहीं रहा था। उसने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। बिस्तर चरमरा रहा था। हर धक्का इतना गहरा था कि ईशा की साँसें अटक जा रही थीं। आदित्य ने उसके दोनों निप्पल्स को फिर मरोड़ना शुरू कर दिया।
“कौन सी हो तू?” आदित्य ने गुर्राते हुए पूछा।
“आपकी… सिर्फ आपकी…” ईशा की आवाज टूट रही थी।
आदित्य ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक मारने लगा। ईशा का पहला चरम बिना इजाजत के आ गया। उसका शरीर अकड़ गया। आदित्य ने तुरंत बाहर निकाल लिया।
“बिना इजाजत के?” उसने उसके गाल पर थप्पड़ मारा। “सजा मिलेगी।”
उसने ईशा को फिर पेट के बल किया। हाथ अभी भी बंधे थे। आदित्य ने पीछे से फिर अंदर घुस गया और इस बार और तेज। साथ में उसके नितंबों पर लगातार थप्पड़ पड़ रहे थे। ईशा की आवाजें अब दब नहीं पा रही थीं।
“प्लीज… और… पूरा…”
आदित्य ने उसके बाल जोर से खींचे और कान में कहा, “अब चरम पर पहुँच। मेरी इजाजत है।”
ईशा का शरीर काँप उठा। दूसरा चरम पहले से कहीं तेज था। आँसू और सिसकियाँ एक साथ निकल रही थीं। आदित्य ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा।
दोनों कुछ देर तक उसी हालत में रहे। आदित्य ने धीरे-धीरे उसके हाथ खोल दिए और आँखों की पट्टी हटाई। ईशा की आँखें लाल थीं।
आदित्य ने उसके माथे पर चुंबन लिया। “बोल, कैसा लगा?”
ईशा ने हांफते हुए जवाब दिया, “और चाहिए… फिर से…”
आदित्य मुस्कुराया। उसने ईशा को अपनी ओर खींचा और उसके कान में कहा, “रात अभी बाकी है। और आज तू बिना इजाजत के कुछ नहीं करेगी।”
ईशा ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में वही समर्पण था जो आदित्य चाहता था।
अगले दो घंटे में आदित्य ने उसे और तीन बार लिया। कभी दीवार से सटाकर, कभी कुर्सी पर बैठाकर, कभी बाल पकड़कर घुटनों के बल। हर बार इजाजत लेकर। हर बार और गहरा। हर बार ईशा की आवाज और भी दबी हुई और भूखी होती गई।
रात के तीन बजे जब आदित्य ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, ईशा का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। नाखूनों और थप्पड़ों के निशान पूरे शरीर पर थे। जाँघों के अंदर उसका अंश बह रहा था।
आदित्य ने उसे अपनी छाती से लगाया। ईशा ने आँखें बंद कर लीं।
“कल फिर?” उसने धीरे से पूछा।
आदित्य ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “जब तक तू मेरी इजाजत से साँस लेगी… तब तक।”
ईशा मुस्कुराई। हुक्म और समर्पण की ये रात अब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी।
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