मुरादाबाद की पुरानी पीतल कारखाने की ऊपरी हिसाब कैबिन से विवाहित पॉलिशवाली ने पति की सहमति और उसकी आँखों के सामने अलीगढ़ के थोक खरीदार को वह रात दी जो किसी तौल पर्ची या रजिस्टर में कभी नहीं चढ़ी
मुरादाबाद की पुरानी पीतल की गली रात में भी नहीं सोती। भट्टियाँ दिन में जलती हैं, लेकिन पॉलिश और पैकिंग की पाली आधी रात तक चलती है। गली के आखिरी मोड़ पर शफीक एंड संस की तीन मंजिला कच्ची इमारत है। नीचे भट्टी की गर्मी की गंध, बीच में पॉलिश की मेजें, ऊपर हिसाब की लकड़ी की कैबिन। उसी कैबिन में दीनेश रजिस्टर बंद करता था और नीचे अपनी बीवी मीनाक्षी को देखता था।
मीनाक्षी की उम्र अट्ठाईस थी। शादी को पाँच साल हो चुके थे। बेटा गाँव नानी के पास था। दोनों पति-पत्नी शहर में किराए के एक कमरे में रहते थे और रात की पाली इसलिए लेते थे कि दिन की भीड़ और पड़ोसियों की नजर से बचे रहें। दीनेश पतला था, चश्मा लगाता था, आवाज धीमी थी। मीनाक्षी गठीली थी। पॉलिश के तेल से उसके हाथ हमेशा चिकने रहते थे। ब्लाउज के बटन काम की गर्मी में अक्सर ढीले पड़ जाते थे। दीनेश यह बात जानता था। वह जानबूझकर ऊपर बैठता था।
उस रात आखिरी लॉट अलीगढ़ के थोक खरीदार इरफान का था। इरफान चालीस के करीब था। मोटा नहीं, लेकिन कंधे चौड़े थे। दाढ़ी साफ थी। आवाज में हुक्म था। वह हर महीने आता था, तौलता था, खरोंच देखता था, और कभी-कभी रेट पर झगड़ा करता था। उस रात झगड़ा नहीं हुआ। उसने दीनेश से ऊपर कैबिन में कहा, माल ठीक है। लेकिन पैकिंग वाली को नीचे बुला। मैं खुद चेक करूँगा कि लच्छे सही बँधे हैं या नहीं।
दीनेश ने नीचे देखा। मीनाक्षी मेज पर पीतल के कटोरे पॉलिश कर रही थी। पसीना गले से छाती की हड्डी तक बह रहा था। उसने धीरे से कहा, जा। जो कहे वो कर। रेट हमें चाहिए। और मैं यहीं रहूँगा।
मीनाक्षी ने सिर उठाया। पति की आँखों में वह भूख थी जो पिछले साल से बढ़ रही थी। पहली बार जब इरफान ने उसकी कमर छुई थी, दीनेश चुप रहा था। दूसरी बार जब इरफान ने गोदाम के कोने में उसे चूमा था, दीनेश ने रजिस्टर में कुछ काटा था। तीसरी बार दीनेश ने खुद कहा था, अगर तू मना करेगी तो ऑर्डर चला जाएगा। और मुझे देखना है।
वह नीचे उतरी। इरफान पैकिंग रूम के पीछे वाले अंधेरे कोने में खड़ा था जहाँ तैयार माल की गठरियाँ रखी थीं। बल्ब एक ही जल रहा था। पीतल की गंध और पॉलिश के तेल की गंध मिली हुई थी। इरफान ने दरवाजे का कब्जा अंदर से चटक दिया। ऊपर कैबिन की खिड़की आधी खुली थी। दीनेश की चश्मे वाली आँखें वहीं टिकी थीं।
इरफान ने कहा, साड़ी ऊपर कर। मैं देखूँ कि तू काम के लायक है या सिर्फ हिसाब वाली की बीवी है।
मीनाक्षी का गला सूख गया। शर्म थी, लेकिन नीचे गर्माहट पहले से फैल चुकी थी। उसने साड़ी की पल्लू सरकाई। ब्लाउज के दो बटन पहले से खुले थे। इरफान ने बाकी बटन नोच दिए। स्तन बाहर आए। निप्पल तेल और पसीने से चिपके हुए थे। इरफान ने एक को मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दाँत लगाए। मीनाक्षी की कमर झुकी। आवाज निकली, आह... धीरे... ऊपर वाला सुन लेगा।
इरफान हँसा। सुनने के लिए ही तो बैठा है तेरा लुच्चा पति। बोल, लंड चाहती है या नहीं।
मीनाक्षी ने आँखें ऊपर उठाईं। दीनेश खिड़की पर था। उसने सिर हिलाया। मीनाक्षी ने फुसफुसाया, चाहती हूँ। गाँड और चूत दोनों खोल दे। पति देख रहा है।
इरफान ने उसकी साड़ी कमर तक उठाई। पेटीकोट नीचे खींच दिया। पैंटी पॉलिश के दाग वाली थी। उसने पैंटी फाड़ दी। उँगली चूत में घुसाई। गीली थी। दो उँगली कीं। फिर तीन। मीनाक्षी की टाँगें काँपीं। इरफान ने उसे गठरी पर लिटाया। पीतल की ठंडी सतह कमर से लगी। उसने पैजामा खोला। मोटा लंड बाहर आया। सिर लाल था, नसें फूली हुई थीं। उसने चूत के मुँह पर रगड़ा। फिर एक झटके में अंदर घुसा दिया।
मीनाक्षी चिल्लाई। हरामी... पूरा घुसा... मेरी चूत फट रही है... पति देख ले... तेरी बीवी की चूत दूसरे के लंड से भरी है...
इरफान ने बाल पकड़े और धक्के तेज किए। हर धक्के पर गठरियाँ खड़खड़ाईं। ऊपर दीनेश का हाथ अपनी पैंट के ऊपर था। वह धीरे-धीरे रगड़ रहा था। मीनाक्षी यह देखकर और खुल गई। उसने खुद टाँगें फैलाईं। और अंदर... तिलक तक... मेरी गाँड भी छू... दोनों छेद खोल...
इरफान ने थूक लगाया और दूसरी उँगली गाँड में घुसाई। चूत में लंड, गाँड में उँगली। मीनाक्षी की आवाज बदल गई। गालियाँ निकलने लगीं। साला... चोद... बीवी की तरह मत चोद... रंडी की तरह चोद... पति के सामने मेरी इज्जत उतार...
पसीना दोनों के शरीर पर बह रहा था। पीतल की गंध और सेक्स की गंध एक हो गई। इरफान ने उसे पलट दिया। घुटनों के बल। पीछे से और गहराई तक घुसा। थप्पड़ मारे गाँड पर। लाल निशान पड़ गए। मीनाक्षी ने मुँह गठरी में दबाया फिर उठाया और ऊपर की ओर चिल्लाई, दीनेश... देख ले... तेरी मीना की चूत कितनी चूस रही है इस लंड को... तू सिर्फ देख... हाथ मत लगा मुझ पर आज...
दीनेश ने खिड़की और खोल दी। उसकी साँस तेज थी। उसने कहा, आवाज काँपती हुई, मुँह में ले ले अब। मैं देखना चाहता हूँ कि तू कैसे चाटती है।
इरफान निकल आया। लंड चमक रहा था, चूत के रस से लथपत। मीनाक्षी घुटनों पर बैठी। मुँह खोला। पूरा लिया। गला भर गया। आँखों में पानी आ गया। इरफान ने सिर पकड़कर मुँह चोदा। थूक गिरा। आवाजें घिनौनी और गीली थीं। मीनाक्षी की छाती हिल रही थी। स्तन तेल से चमक रहे थे।
फिर इरफान ने उसे उठाया और दीवार से सटाया। एक टाँग उठाई। खड़े-खड़े चूत फाड़ता रहा। मीनाक्षी की पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। उसने पति से कहा, अपना लंड निकाल। मैं देखूँगी तू कैसे हिलाता है अपनी बीवी को देखते हुए।
दीनेश ने पैंट खोली। छोटा लेकिन सख्त लंड हाथ में था। वह ऊपर से हिला रहा था। शर्म और मजे का मिश्रण उसके चेहरे पर था। इरफान और तेज हुआ। तेरी बीवी की चूत मेरे लंड की गुलाम है। बोल साली।
मीनाक्षी बोली, साँस टूटती हुई, हाँ... गुलाम... आज की रात तेरी रंडी हूँ... पति सिर्फ तमाशा देखे... वीर्य मेरे अंदर डाल... बाहर मत निकाल...
इरफान ने कमर अकड़ाई। गरम वीर्य की धार चूत के अंदर छूटी। मीनाक्षी काँपी। उसकी अपनी लहर भी आई। जाँघें काँपती रहीं। रस और वीर्य टाँगों से बहकर जमीन पर गिरा। इरफान कुछ देर अंदर रहा। फिर निकला। सफेद गाढ़ा पदार्थ चूत के होंठों पर लटका।
दीनेश नीचे आ गया। दरवाजा अभी भी बंद था। उसने पत्नी का मुँह पकड़ा और चूमा। इरफान के लंड का स्वाद उसकी जीभ पर था। उसने फुसफुसाया, और ले। गाँड भी खुलवा। मैं बैठा रहूँगा।
मीनाक्षी थकी थी लेकिन इनकार नहीं किया। इरफान ने फिर से सख्त किया। तेल और थूक लगाकर गाँड के छेद पर लंड रखा। धीरे धक्का दिया। मीनाक्षी चीखी। आह साला... गाँड फट गई... फिर भी घुसा... पूरा... पति देख रहा है कि उसकी बीवी की गांड कैसे खुल रही है...
इरफान ने आधा घुसाया, फिर पूरा। मीनाक्षी की आँखें बंद हुईं। दर्द और मजा एक साथ थे। हर धक्के पर उसका शरीर आगे झटका। स्तन हिल रहे थे। दीनेश पास बैठकर अपनी बीवी का हाथ पकड़े हुए था और दूसरी ओर खुद को हिला रहा था। उसने कहा, बोल उसको गंदी बातें। मुझे सुननी हैं।
मीनाक्षी बोली, आवाज टूटी हुई, मेरी गांड चोद... चूत भी भर... दोनों छेद तेरे हैं आज... दीनेश मेरा मालिक नहीं आज रात... तू मालिक है... थप्पड़ मार... बाल खींच... रंडी बना...
इरफान ने बाल पकड़े। थप्पड़ चेहरे पर मारा। फिर गाँड पर। धक्के जानवरों जैसे हो गए। कमरा पीतल की खनक और मांस की आवाज से भर गया। मीनाक्षी का दूसरा पानी भी छूटा। शरीर ढीला पड़ा। इरफान ने गाँड के अंदर दूसरी बार झोड़ा। गरम भर गया। निकलते समय छेद खुला रह गया, वीर्य धीरे-धीरे रिस रहा था।
तीनों कुछ देर चुप रहे। पसीना ठंडा होने लगा। इरफान ने पैजामा बाँधा। बोला, लॉट कल सुबह गाड़ी में चढ़ेगा। रेट वही रहेगा जो मैंने कहा। और अगले महीने भी मैं रात को ही आऊँगा।
दीनेश ने सिर हिलाया। मीनाक्षी ने पैंटी के फटे टुकड़े समेटे। साड़ी ठीक की। ब्लाउज के बटन नहीं बचे थे इसलिए दुपट्टा छाती पर लपेट लिया। ऊपर जाकर दीनेश ने रजिस्टर में साफ अक्षरों में लिखा: अंतिम निरीक्षण पूर्ण, खरीदार संतुष्ट।
नीचे मीनाक्षी ने फर्श पोछा। पीतल की गठरियों पर उसके हाथ के निशान और शरीर के दाग रह गए। वह जानती थी कि अगली रात फिर यही होगा। पति चाहता था। वह भी चाहती थी। शर्म सुबह लौटती। रात में सिर्फ चूत, गाँड, लंड और ऊपर बैठी हुई वह आँखें रहतीं जो सब देखती थीं और कुछ नहीं लिखती थीं।
घर लौटते समय रिक्शे में दीनेश ने उसका हाथ पकड़ा। दर्द है?
मीनाक्षी ने कहा, है। अंदर अभी भी भरा हुआ लगता है। तू सोना चाहता है या सुनना चाहता है कि उसने कैसे भरा।
दीनेश ने रिक्शे वाले की ओर पीठ कर ली और फुसफुसाया, सुनना है। सब। गंदी भाषा में। जैसे तू उसके सामने बोल रही थी।
मीनाक्षी ने कान में कहा, उसने पहले चूत फाड़ी। फिर मुँह में डाला। फिर गांड में पूरा लंड बैठा दिया। तेरी बीवी की दोनों बंद जगहें उसने खोल दीं। तू देखता रहा और हिलाता रहा। मैंने उसे पति से बड़ा मालिक कहा। अगली बार तू और पास बैठना। मैं चाहती हूँ तू मेरा मुँह भी चूमे जब वो अंदर हो।
दीनेश की साँस रुक गई। उसने केवल सिर हिलाया। गली के मोड़ पर भट्टी की हल्की लाल रोशनी पीछे छूट गई। मुरादाबाद की वह रात किसी तौल पर्ची या हाजिरी रजिस्टर में नहीं चढ़ी। चढ़ी केवल तीन शरीरों की याद में, जो अगले महीने फिर उसी कोने में दोहराई जानी थी।
अगली सुबह कारखाना खुलते ही मजदूरों ने गठरियाँ उठाईं। किसी ने दाग नहीं पूछे। इरफान की गाड़ी आ गई। उसने मीनाक्षी की ओर केवल एक बार देखा। दीनेश ऊपर से देख रहा था। मीनाक्षी ने पॉलिश का कपड़ा हाथ में लिया और काम पर लग गई। ब्लाउज के नीचे छाती अभी भी संवेदनशील थी। चलते समय गाँड में हल्की जलन थी। वह दर्द उसे बार-बार याद दिलाता रहा कि रात सच थी।
दोपहर को दीनेश नीचे आया चाय लेकर। एक कोने में उसने धीरे से पूछा, रात को घर पर दोबारा बताना। और अगर तू तैयार हो तो अगली खेप पर मैं दरवाजा बंद करके उसी कमरे में बैठूँगा, खिड़की से नहीं।
मीनाक्षी ने चाय की प्याली होठों से लगाई। आँखें काम पर थीं, आवाज बहुत धीमी थी। बैठना। लेकिन छूना मत जब तक मैं न कहूँ। तू देखने वाला रह। करने वाला वही रहे। यही तेरी हवस है, यही मेरी भी।
पीतल की मेज पर धूप पड़ रही थी। गली में हथौड़ों की आवाज थी। कोई नहीं जानता था कि पिछली रात उसी मेज के पीछे एक विवाहित औरत ने पति की इच्छा पर अपना शरीर किसी और को दे दिया था। रजिस्टर साफ था। शरीर साफ नहीं था। और दोनों पति-पत्नी यही चाहते थे।
रात फिर आने वाली थी। आखिरी लॉट फिर आने वाला था। और मुरादाबाद की पुरानी पीतल गली में कुछ हिसाब ऐसे होते हैं जो तराजू पर नहीं, साँस और गालियों और खुले छेदों पर पूरे होते हैं।
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