पति के सामने जब मेरी साँसें किसी और के नाम हो गईं देखने वाला भी उतना ही भूखा था जितना करने वाला हॉटवाइफ की तीव्र रात
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बेडरूम में सिर्फ एक लैंप जल रहा था।
आरोही आईने के सामने खड़ी थी। लाल साड़ी, खुले बाल, और गले में वो मंगलसूत्र जो आज सिर्फ सजावट लग रहा था। पीछे बिस्तर पर उसका पति रोहन बैठा था। आँखों में एक अजीब सी चमक।
दरवाजे पर दस्तक हुई।
रोहन ने कहा, “खोल दे।”
आरोही ने दरवाजा खोला। बाहर वीर खड़ा था—रोहन का पुराना दोस्त। लंबा, मजबूत, और आँखों में साफ इरादा। वह अंदर आया। रोहन ने उसे देखकर सिर हिलाया। कोई बात नहीं हुई। बस एक समझौता जो तीनों ने पहले ही कर लिया था।
वीर ने दरवाजा बंद किया और ताला लगा दिया। फिर सीधे आरोही के पास गया। उसने उसका गला पकड़ा और जोर से चूमा। आरोही की साँस अटक गई। वीर की जीभ उसके मुँह में गहराई तक चली गई। रोहन बिस्तर पर बैठा दोनों को देख रहा था।
वीर ने आरोही की साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। ब्रा को नीचे सरकाया और दोनों स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लेकर चूसने लगा। आरोही की कमर आगे बढ़ गई।
रोहन की साँसें भी तेज हो रही थीं। वह अपनी पत्नी को किसी और के हाथों में देख रहा था—और उसे ये अच्छा लग रहा था।
वीर ने आरोही को बिस्तर की ओर धकेला। आरोही रोहन के ठीक बगल में गिर गई। वीर ने उसकी साड़ी पूरी तरह खोल दी। पेटीकोट और पैंटी एक साथ उतर गए। आरोही अब नंगी थी। वीर ने उसकी जाँघें फैलाईं और अपनी जीभ उसके बीच में रख दी।
आरोही की कमर उछल गई। वीर की जीभ तेज और भूखी थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिला रहा था। आरोही के नाखून चादर में गड़ गए। उसकी आवाजें अब निकल रही थीं।
रोहन ने अपना हाथ बढ़ाकर आरोही का हाथ पकड़ लिया। आरोही ने आँखें खोलकर अपने पति को देखा। रोहन मुस्कुरा रहा था।
“मजा आ रहा है ना?” रोहन ने धीरे से पूछा।
आरोही ने सिर्फ सिर हिलाया। वीर ने और जोर से चूसा। आरोही का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसकी चीख कमरे में गूँज गई।
वीर ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। आरोही की आँखें उसके मोटे अंग पर टिक गईं। वीर ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
आरोही चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत गहरा…”
वीर नहीं रुका। उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। हर धक्का इतना तीव्र था कि आरोही की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। रोहन पास में बैठा दोनों को देख रहा था। उसकी अपनी साँसें भी तेज थीं।
वीर ने आरोही के दोनों स्तनों को पकड़ रखा था और निप्पल्स को मरोड़ रहा था। आरोही की आवाजें बेकाबू हो चुकी थीं।
“देख रोहन… तेरी बीवी कितनी जोर से चीख रही है,” वीर ने गुर्राते हुए कहा।
रोहन ने कुछ नहीं कहा। बस आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
वीर ने आरोही को पलटा। अब वह घुटनों के बल थी। वीर ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने आरोही के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ आरोही की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
रोहन अब और करीब आ गया था। आरोही ने आँखें खोलकर अपने पति को देखा। रोहन का चेहरा उत्तेजना से लाल था।
“और जोर से ले उसे,” रोहन ने अचानक कहा।
वीर मुस्कुराया और और तेज हो गया। थप्पड़ की आवाजें कमरे में गूँजने लगीं। आरोही के नितंबों पर लाल निशान उभर आए। आरोही और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी।
“पूरा ले लो… तोड़ दो…” आरोही चिल्ला रही थी।
वीर ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी शक्ति लगा दी। आरोही का दूसरा चरम इतना तेज था कि उसके पैर लड़खड़ा गए। वीर ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा अंश उसके अंदर भर गया।
दोनों हांफ रहे थे। वीर अभी भी उसके अंदर था। रोहन ने आरोही के बाल सहलाते हुए कहा, “अभी खत्म नहीं हुआ।”
वीर बाहर निकला। रोहन ने अपनी पत्नी को अपनी ओर खींचा और खुद उसके अंदर घुस गया। आरोही की आँखें फट गईं। अभी-अभी किसी और का अंश उसके अंदर था और अब उसका पति। रोहन ने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।
वीर बिस्तर के किनारे बैठकर दोनों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने आरोही का मुँह अपने अंग की ओर किया। आरोही ने बिना हिचकिचाहट के मुँह खोल दिया। रोहन नीचे से मार रहा था और वीर उसके मुँह में।
आरोही का शरीर काँप रहा था। तीसरा चरम और भी लंबा था। उसकी आवाज दब गई क्योंकि मुँह भरा हुआ था। रोहन ने भी उसी समय उसके अंदर छोड़ दिया।
रात अभी बाकी थी।
अगले एक घंटे में वीर ने आरोही को फिर से लिया—इस बार रोहन के ठीक सामने, खड़े-खड़े, दीवार से सटाकर। आरोही की टाँगें वीर की कमर में लिपटी हुई थीं। रोहन पास में खड़ा दोनों को देख रहा था और कभी-कभी आरोही के स्तनों को मसल देता था।
जब वीर ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, आरोही का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। जाँघों के अंदर दोनों का अंश बह रहा था। गले और स्तनों पर दाँतों के निशान थे।
वीर कपड़े पहनने लगा। जाने से पहले उसने आरोही के गाल पर उँगली फेरी। “कल फिर आऊँ?”
आरोही ने थकी हुई आँखों से रोहन की ओर देखा। रोहन ने सिर हिलाया।
“आ जा,” आरोही ने धीरे से कहा।
दरवाजा बंद होते ही रोहन ने अपनी पत्नी को गले लगा लिया। आरोही ने उसकी छाती पर सिर रखा।
“तुम्हें अच्छा लगा?” उसने पूछा।
रोहन ने उसके बालों में उँगली फेरते हुए जवाब दिया, “बहुत। और तू?”
आरोही मुस्कुराई। “मेरी साँसें आज किसी और के नाम भी हो गईं… और मुझे पछतावा नहीं।”
रोहन ने उसके माथे पर चुंबन लिया। कमरे में अभी भी उस रात की गर्मी बाकी थी। और तीनों जानते थे—ये सिर्फ शुरुआत थी।
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