अजनबी शहर की उस रात में जब दो शरीर एक हो गए कोई नाम नहीं कोई कल नहीं सिर्फ आज की आग और होटल रूम की खामोशी
बारिश की आवाज होटल की खिड़की से साफ आ रही थी। कमरे में सिर्फ एक टेबल लैंप जल रहा था।
मिशा ने अपने गीले बाल पीछे किए। काली ड्रेस शरीर से चिपक रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
वह जानती थी कौन है। लॉबी में जिस अजनबी से नजरें मिली थीं, उसी ने पूछा था—“ऊपर चलोगी?” मिशा ने सिर्फ कमरा नंबर बताया था।
दरवाजा खोला। आदमी अंदर आया। लंबा, शर्ट के ऊपर के बटन खुले हुए, आँखों में साफ भूख। उसने दरवाजा बंद किया और ताला लगा दिया।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। कोई नाम नहीं पूछा। कोई बात नहीं की। आदमी ने एक कदम बढ़ाया और मिशा का गला पकड़ लिया। चुंबन तुरंत गहरा और भूखा हो गया। मिशा की ड्रेस का जिपर पीछे से खुल गया। आदमी ने उसे कंधों से नीचे सरका दिया।
मिशा अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। आदमी ने ब्रा के हुक खोले और दोनों स्तनों को जोर से अपने हाथों में ले लिया। निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसने लगा। मिशा की कमर आगे बढ़ गई।
“आह्ह…” उसकी सिसकी निकली।
आदमी ने उसे बिस्तर की ओर धकेला। मिशा बिस्तर पर गिरते ही आदमी उसके ऊपर आ गया। उसने उसकी पैंटी को एक झटके में नीचे खींच लिया और फेंक दिया। मिशा की जाँघें अपने आप फैल गईं।
आदमी ने बिना देर किए अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। मिशा की कमर उछल गई। आदमी की जीभ तेज और अनुभवी थी। वह क्लिट को चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिला रहा था। मिशा के नाखून चादर में गड़ गए।
“रुक मत… और अंदर…” मिशा की आवाज काँप रही थी।
आदमी ने तीसरी उँगली भी डाल दी। मिशा का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसकी आवाज कमरे में गूँज गई।
आदमी ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। मिशा की आँखें उसके मोटे, कड़े अंग पर टिक गईं। आदमी ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
मिशा चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत गहरा…”
आदमी नहीं रुका। उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। हर धक्का इतना तीव्र था कि मिशा की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। आदमी ने झुककर उसके निप्पल को दाँतों से काटा।
मिशा की आवाजें अब बेकाबू थीं। आदमी ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया। मिशा की आँखों में आँसू आ गए—मजे के।
थोड़ी देर बाद आदमी ने उसे पलटा। मिशा अब घुटनों के बल थी। आदमी ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने मिशा के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ मिशा की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
“बोल… कितना चाहिए?” आदमी ने कान में गुर्राया।
“पूरा… तोड़ दो मुझे…” मिशा की आवाज टूटी हुई थी।
आदमी ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। आवाज कमरे में गूँज रही थी। मिशा और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी। आदमी ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी शक्ति लगा दी।
दूसरा चरम मिशा के शरीर में बिजली की तरह दौड़ा। उसके पैर लड़खड़ा गए। आदमी ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा। दोनों कुछ पल के लिए अचल रहे।
साँसें थामने के बाद भी आदमी बाहर नहीं निकला। उसने मिशा को साइड में कर लिया और उसी पोजीशन में फिर से हिलना शुरू कर दिया। मिशा की आँखें बंद थीं, लेकिन होंठ खुले हुए थे।
“फिर से…” उसने फुसफुसाया।
आदमी ने उसकी एक टाँग ऊपर उठाई और और गहराई तक जाने लगा। इस बार गति पहले से भी तेज थी। मिशा के स्तन हर धक्के के साथ काँप रहे थे। आदमी ने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का सा दबाया। मिशा की आँखें खुल गईं—थ्रिल से।
तीसरा चरम और भी लंबा था। मिशा की आवाज निकलना बंद हो गई। सिर्फ शरीर काँप रहा था। आदमी ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
रात अभी बाकी थी।
दो घंटे बाद मिशा बाथरूम से निकली तो आदमी बिस्तर पर नंगा लेटा था। मिशा उसके पास गई और खुद उसके ऊपर बैठ गई। उसने उसका अंग फिर से कड़ा किया और धीरे-धीरे अपने अंदर ले लिया।
इस बार मिशा खुद ऊपर-नीचे हो रही थी। आदमी के हाथ उसके स्तनों पर थे। मिशा की गति तेज होती गई। आदमी ने उसके नितंबों को जोर से पकड़ लिया और नीचे से धक्के लगाने लगा।
“और तेज…” मिशा ने कहा।
आदमी ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और मिशनरी में पूरी ताकत लगा दी। मिशा की टाँगें उसके कंधों पर थीं। हर धक्का दीवार तक गूँज रहा था। मिशा ने उसके पीठ पर नाखून चला दिए।
आदमी और बेकाबू हो गया। उसने मिशा के दोनों हाथ सिर के ऊपर पकड़ लिए और और जोर से मारने लगा। अंतिम चरम दोनों का एक साथ आया। मिशा की आवाज इस बार दब नहीं पाई।
सुबह पाँच बजे आदमी कपड़े पहनने लगा। मिशा चादर ओढ़े उसे देख रही थी।
“नाम?” उसने पूछा।
आदमी ने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला। “कोई जरूरत नहीं। ये सिर्फ एक रात थी।”
दरवाजा बंद होते ही मिशा ने आँखें बंद कर लीं। शरीर में दर्द था, जाँघों के अंदर उसका अंश अभी भी बह रहा था, और पूरे शरीर पर नाखूनों व दाँतों के निशान थे।
उसने मुस्कुरा दिया।
अजनबी शहर की उस रात में दो शरीर एक हो गए थे। और मिशा जानती थी—ये भूख अब और रातों की माँग करेगी।
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