कर्फ्यू वाली रात जब गेस्ट हाउस में सिर्फ हम दो बचे थे
रात के लगभग नौ बज रहे थे। अचानक कर्फ्यू लग गया था। शहर के सारे रास्ते बंद। गेस्ट हाउस का मालिक भी घर चला गया था। इमारत में सिर्फ दो कमरे में रोशनी थी।
अनन्या अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ी थी। सामने वाले कमरे से वीर निकला। दोनों एक-दूसरे को सुबह से जानते थे—बस नाम और शहर। अब पूरी बिल्डिंग में सिर्फ वे दो बचे थे।
“खाना आदि कुछ नहीं मिला,” वीर ने कहा।
अनन्या ने सिर हिलाया। “मेरे पास थोड़ी वाइन और चिप्स हैं। आ जाओ।”
वीर उसके कमरे में आ गया। अनन्या ने दरवाजा बंद किया। दोनों बिस्तर के किनारे बैठ गए। वाइन के दो गिलास खत्म होने तक बातें हल्की थीं। तीसरे गिलास के बाद खामोशी भारी हो गई।
वीर ने अनन्या का गिलास नीचे रखा और उसका चेहरा अपनी ओर किया। “हम पागल हैं।”
“हाँ,” अनन्या ने कहा और खुद आगे बढ़कर उसे चूमा।
चुंबन में वाइन और तन्हाई दोनों थी। वीर ने अनन्या की कुर्ती के बटन खोले। ब्रा के ऊपर से स्तनों को मसलने लगा। फिर ब्रा को नीचे सरकाया और निप्पल को मुँह में ले लिया। अनन्या की कमर तन गई।
वीर ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। सालवार और पैंटी एक साथ उतार दी। अनन्या की जाँघें फैल गईं। वीर ने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। अनन्या ने तकिया दबा लिया। वीर की जीभ तेज थी। वह क्लिट को चूस रहा था, उंगलियाँ अंदर डाल रहा था। अनन्या का पहला चरम जल्दी आ गया।
वीर ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। अनन्या ने खुद उसका अंग पकड़कर अपने अंदर की ओर गाइड किया। वीर ने धीरे-धीरे पूरा अंदर ले लिया। दोनों की साँसें एक हो गईं।
वीर ने हिलना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज। अनन्या की टाँगें उसकी कमर पर लिपट गईं। वीर ने झुककर उसके स्तनों को फिर मुँह में लिया। अनन्या की आवाजें अब कमरे में गूँज रही थीं। बाहर कर्फ्यू की खामोशी थी।
“और जोर से वीर…” अनन्या ने कहा।
वीर ने उसकी कमर पकड़ ली और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। बिस्तर चरमरा रहा था। अनन्या का दूसरा चरम और भी तेज था। उसने वीर को जोर से जकड़ लिया। वीर ने भी उसी समय उसके अंदर ही छोड़ दिया।
दोनों हांफते हुए बिस्तर पर लेटे रहे। कुछ देर बाद अनन्या ने धीरे से कहा, “कर्फ्यू सुबह तक है… रात अभी बाकी है।”
वीर मुस्कुराया। उसने अनन्या को घुटनों के बल किया। पीछे से फिर से अंदर आया। इस बार शुरू से ही तेज। अनन्या ने तकिया दबा लिया। वीर एक हाथ से उसके बाल पकड़े हुए था, दूसरे से उसके नितंबों पर थप्पड़ मार रहा था।
अनन्या पीछे की ओर जोर से धकेल रही थी। “और… पूरा…”
वीर ने उसकी कमर और नीचे झुका दी। तीसरा चरम दोनों का लगभग एक साथ आया। वीर ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
रात के बारह बज गए थे। दोनों फिर से एक-दूसरे के करीब आए। इस बार अनन्या ने वीर के ऊपर बैठकर खुद गति तय की। वीर के हाथ उसके स्तनों पर थे। अनन्या जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रही थी। चौथा चरम और भी भारी था।
सुबह जब कर्फ्यू हटा, दोनों ने कपड़े पहन लिए। अनन्या ने अपना बैग संभाला। वीर दरवाजे पर खड़ा था।
“नंबर?” वीर ने पूछा।
अनन्या मुस्कुराई। “नहीं। ये रात बस कर्फ्यू की थी।”
वीर ने सिर हिलाया। दोनों गेस्ट हाउस से निकले। बाहर की रोशनी में वे फिर से अजनबी लग रहे थे। लेकिन जो कुछ उस खाली गेस्ट हाउस में हुआ था, वह दोनों की त्वचा पर कर्फ्यू की तरह छाया हुआ था।
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