ट्रेन की उस खाली कॉपी में जब दो अजनबियों ने पूरी रात एक-दूसरे को खोजा
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। ट्रेन तेज रफ्तार से भाग रही थी। 2AC की कॉपी नंबर 7 में सिर्फ दो ही यात्री थे।
मिशा निचली बर्थ पर बैठी खिड़की के बाहर अँधेरा देख रही थी। सामने ऊपरी बर्थ पर आरव लेटा था। दोनों का बर्थ एक ही कॉपी में संयोग से लग गया था। अटेंडेंट चाय देकर जा चुका था। गलियारे में सन्नाटा था।
मिशा ने अचानक कहा, “नींद नहीं आ रही।”
आरव ने करवट बदली। “मुझे भी।”
दोनों की निगाहें अँधेरे में मिलीं। ट्रेन की लयबद्ध आवाज के अलावा और कोई आवाज नहीं थी। आरव नीचे उतर आया। दोनों के बीच सिर्फ दो फीट का फासला था। मिशा ने कंबल हटाया। आरव ने एक कदम बढ़ाया।
अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से चिपक गए। चुंबन में ट्रेन की रफ्तार थी। मिशा की कुर्ती के बटन आरव ने एक-एक करके खोले। ब्रा के ऊपर से स्तनों को मसलने लगा। फिर ब्रा को ऊपर उठाया और निप्पल को मुँह में ले लिया। मिशा की सिसकी ट्रेन की आवाज में मिल गई।
आरव ने कॉपी का दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया। फिर मिशा को निचली बर्थ पर लिटा दिया। उसकी सालवार और पैंटी एक साथ नीचे खींच ली। मिशा की जाँघें फैल गईं। आरव ने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी।
मिशा ने मुँह में तकिया दबा लिया। आरव की जीभ तेज और गहरी थी। वह क्लिट को चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर घुमा रहा था। ट्रेन की हरकतों के साथ मिशा का शरीर भी हिल रहा था। थोड़ी देर में उसका पहला चरम आ गया। उसने आरव के बाल जोर से पकड़ रखे थे।
आरव ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। मिशा ने खुद उसका अंग पकड़कर अपने होंठों तक ले गई। मुँह में लिया। धीरे-धीरे गहरा। आरव की साँस अटक गई। ट्रेन की आवाज में मिशा की गट-गट की आवाज भी मिल रही थी।
थोड़ी देर बाद मिशा ने उसे छोड़ा और जाँघें फैला दीं। “अब अंदर आ। पूरी रात है।”
आरव ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में अंदर तक घुस गया। मिशा की आँखें फट गईं। आरव रुका नहीं। उसने कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। बर्थ चरमरा रही थी। मिशा की छाती हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी।
आरव ने झुककर उसके स्तनों को फिर मुँह में लिया। मिशा की आवाजें अब तकिए में भी पूरी तरह दब नहीं पा रही थीं। ट्रेन की रफ्तार के साथ आरव की गति भी बढ़ती जा रही थी।
मिशा का दूसरा चरम और भी तेज था। उसने आरव को जोर से जकड़ लिया। आरव ने भी उसी समय उसके अंदर ही छोड़ दिया। दोनों हांफते हुए बर्थ पर गिरे रहे। ट्रेन की आवाज के अलावा और कोई आवाज नहीं थी।
कुछ देर बाद मिशा ने धीरे से कहा, “एक बार और। सुबह होने में अभी चार घंटे हैं।”
आरव मुस्कुराया। उसने मिशा को घुटनों के बल किया। पीछे से फिर से अंदर आया। इस बार शुरू से ही तेज। मिशा ने तकिया दबा लिया। आरव एक हाथ से उसके बाल पकड़े हुए था, दूसरे से उसके नितंबों पर थप्पड़ मार रहा था। ट्रेन की हरकतों के साथ हर धक्का और गहरा लग रहा था।
मिशा पीछे की ओर जोर से धकेल रही थी। “और… और जोर से आरव…”
आरव ने उसकी कमर और नीचे झुका दी। धक्के इतने तेज थे कि बर्थ जोर-जोर से चरमरा रही थी। तीसरा चरम दोनों का लगभग एक साथ आया। आरव ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
रात अभी बाकी थी।
दो घंटे बाद दोनों फिर से जागे। इस बार मिशा ने आरव को अपने ऊपर खींच लिया। उसने खुद उसका अंग अपने अंदर लिया और जोर-जोर से ऊपर-नीचे होने लगी। आरव के हाथ उसके स्तनों पर थे। मिशा की आँखें बंद थीं। वह खुद अपनी गति बढ़ा रही थी। ट्रेन की लय के साथ उसका शरीर भी हिल रहा था।
आरव ने उसकी कमर पकड़ ली और नीचे से धक्के लगाने लगा। मिशा की सिसकियाँ तेज हो गईं। चौथा चरम और भी भारी था। मिशा आरव की छाती पर गिर गई। दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं।
सुबह जब ट्रेन स्टेशन के पास पहुँची, दोनों ने जल्दी से कपड़े पहन लिए। कॉपी का लॉक खोला। अटेंडेंट चाय लेकर आया तो दोनों सामान्य मुद्रा में बैठे थे।
मिशा ने खिड़की के बाहर देखा। आरव ने धीरे से कहा, “नंबर दे दूँ?”
मिशा मुस्कुराई। “नहीं। ये रात बस इसी ट्रेन की थी।”
आरव ने सिर हिलाया। दोनों जानते थे कि प्लेटफॉर्म पर उतरते ही वे अजनबी बन जाएँगे। लेकिन जो कुछ उस खाली कॉपी में हुआ था, वह दोनों की त्वचा पर ट्रेन की लय की तरह हमेशा के लिए बस गया था।
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