हिंदी चुदाई कहानी: आधी रात का मेहमान
"भाभी जी, ये गेट तो बिल्कुल गल चुका है। एक ज़ोर का धक्का और ये सीधा ज़मीन पर आ गिरेगा," देवू ने टॉर्च की रोशनी में टूटे हुए कब्ज़े को हिलाकर कहा। उस पल मीरा को लगा जैसे यह कोई आम रात नहीं है, बल्कि उसकी ज़िंदगी की सबसे गरम हिंदी चुदाई कहानी की शुरुआत है।
मीरा छब्बीस साल की थी, मेरठ के पास एक गाँव में ब्याही हुई। उसका पति सुरेश चीनी मिल में नाइट शिफ्ट करता था, और हफ्ते में पाँच रातें घर सूना रहता था। सुबह उसने गाँव के वेल्डर को फोन किया था कि घर का लोहे का गेट टूट गया है, और देवू ने कहा था कि दिन में फुर्सत नहीं मिलेगी, रात को दस बजे आकर ठीक कर देगा।
देवू चौंतीस का हट्टा कट्टा मर्द था। पसीने से चिपकी हुई सफेद बनियान उसके चौड़े कंधों और उभरी हुई छाती से चिपक गई थी। हाथों में औज़ार पकड़ने की खुरदरी पकड़ थी, और टॉर्च की पीली रोशनी में उसकी बाँहों की नसें उभर आई थीं। मीरा दरवाज़े की ओट से उसे देख रही थी, और उसके गले में कुछ अटक सा गया था।
गेट का एक कब्ज़ा तो टूटकर लटक रहा था, दूसरा जंग खाकर आधा गल चुका था। देवू ने अपना वेल्डिंग का सामान नीचे रखा, चिंगारी वाली मशीन चालू की, और नीली सफेद चिंगारियाँ रात के अंधेरे में फूटने लगीं। हर चिंगारी के साथ मीरा की छाती में भी कोई चिंगारी सी उठ रही थी।
"पानी लाऊँ?" मीरा ने पूछा, और बिना जवाब सुने अंदर जाकर स्टील का गिलास भर लाई। लौटते वक्त उसने जानबूझकर साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला छोड़ दिया था। देवू ने गिलास लेते वक्त उसकी छाती पर नज़र डाली, और मीरा ने देखा कि उसकी नज़र वहाँ एक पल ज़्यादा टिकी रही। उसने पल्लू ठीक नहीं किया।
"टॉर्च पकड़ लूँ? अंधेरे में दिखेगा नहीं ठीक से," मीरा ने कहा और उसके बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई। टॉर्च की रोशनी कब्ज़े पर टिकाते वक्त उसकी नरम छाती देवू की सख्त बाँह से छू गई। दोनों ने महसूस किया, दोनों ने कुछ नहीं कहा, पर हवा में कुछ बदल गया था।
"इतनी रात को अकेली डर नहीं लगता, भाभी?" देवू ने बिना देखे पूछा, उसकी नज़र काम पर थी पर आवाज़ में शरारत थी। मीरा ने धीरे से कहा, "डर तो तब लगे जब कोई अपना पास न हो।" देवू का हाथ एक पल को रुका, फिर उसने सिर उठाकर उसे देखा, और उस देखने में अब वेल्डर नहीं था।
आधे घंटे में गेट नया जैसा खड़ा था। मीरा ने उसे मज़दूरी से ज़्यादा पैसे दिए, और जब उसने मना किया तो उसकी हथेली पर ज़बरदस्ती नोट रख दिए। "इतनी मेहनत की है, चाय पिए बिना मत जाना," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वह नरमी थी जो सिर्फ निमंत्रण में होती है।
बरामदे में चारपाई पर देवू बैठ गया। मीरा चाय बनाकर लाई और उसके इतने पास बैठी कि उनकी जाँघें छू गईं। "इतनी गर्मी में बनियान में भी पसीना आ रहा होगा, उतार दो न," उसने कहा। देवू ने एक पल उसे देखा, फिर बनियान उतारकर चारपाई पर रख दी। नंगे बदन पर पसीने की बूँदें टॉर्च की रोशनी में चमक रही थीं।
चाय का कप रखते वक्त देवू का खुरदरा हाथ मीरा की नंगी जाँघ पर आ टिका। "मच्छर था," उसने कहा, पर हाथ हटाया नहीं। मीरा ने भी हाथ हटाने को नहीं कहा। उसने बस उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोली, "मच्छर तो उड़ गया। हाथ क्यों नहीं उड़ा?"
देवू ने जवाब में उसका हाथ पकड़कर सीधा अपनी छाती पर रख दिया, अपने धड़कते दिल पर। फिर मीरा ने खुद उसका हाथ उठाया और अपने ब्लाउज़ पर रख दिया। "यहाँ भी देखो, यहाँ भी कुछ काट रहा है," उसने फुसफुसाकर कहा। देवू की उँगलियाँ ब्लाउज़ के ऊपर ही उसकी छाती को ज़ोर से दबोचने लगीं।
अगले ही पल देवू ने उसके बालों की मुट्ठी भरकर उसका चेहरा अपनी तरफ खींचा और उसके होंठों पर टूट पड़ा। यह कोई नर्म चुम्बन नहीं था। उसकी जीभ मीरा के मुँह में घुस गई, दाँत उसके निचले होंठ को काट रहे थे। मीरा कराह उठी, और उसकी कराह सुनकर देवू और भी जानवर बन गया।
मीरा ने खुद अपने ब्लाउज़ के हुक खोले, एक एक करके, उसकी आँखों में देखते हुए। जैसे ही उसकी भारी छातियाँ बाहर आईं, देवू ने उन पर मुँह मार दिया। वह निप्पल को चूस रहा था, काट रहा था, और मीरा की कमर धनुष की तरह तन गई। "और ज़ोर से," वह बड़बड़ाई, "काटो मुझे।"
मीरा के हाथ नीचे गए और उसने देवू की पैंट का बटन खोला। ज़िप नीचे खिसकते ही उसका मोटा लंबा लंड बाहर उछल पड़ा, नसों से भरा हुआ, ऊपर से गीला। मीरा ने उसे मुट्ठी में भरा और ऊपर नीचे करने लगी। देवू की साँसें भारी हो गईं, और उसके मुँह से एक दबी हुई गुर्राहट निकली।
फिर मीरा चारपाई से उतरकर उसके सामने घुटनों पर बैठ गई। उसने लंड को मुँह में लिया, पहले सिर्फ टोपा, फिर धीरे धीरे पूरा अंदर तक। देवू ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और खुद धक्के मारने लगा, उसका लंड उसके गले तक जा रहा था। मीरा की आँखों में पानी आ गया, पर उसने मुँह नहीं हटाया।
अचानक देवू ने उसे बाँहों से उठाया और आँगन की दीवार से सटा दिया। उसने उसकी साड़ी कमर तक उठा दी और पैंटी को एक झटके में जाँघों तक सरका दिया। उसकी मोटी उँगलियाँ मीरा की चूत में घुसीं, जो पहले से ही पानी पानी हो रही थी। "इतनी गीली?" उसने हँसते हुए कहा।
"तुम्हारे लिए ही तो," मीरा ने उसके कान में काटते हुए कहा, "सुबह से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।" देवू ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर टिकाया और एक ही ज़ोर के धक्के में पूरा अंदर पेल दिया। मीरा की चीख उसके कंधे में दब गई, जहाँ उसने अपने दाँत गड़ा दिए थे।
दीवार से सटाकर देवू उसे पेल रहा था, हर धक्का पहले से ज़्यादा गहरा और ज़्यादा ज़ोर का। मीरा की टाँगें उसकी कमर से लिपटी थीं, उसके नाखून उसकी नंगी पीठ पर लकीरें खींच रहे थे। "और अंदर, और ज़ोर से," वह चिल्ला रही थी। फिर उसका बदन अकड़ गया, चूत ने लंड को ज़ोर से जकड़ लिया, और वह झड़ गई। उसका पानी उसकी जाँघों पर बह निकला।
पर देवू रुका नहीं। उसने लंड बाहर निकाला, मीरा को घुमाया और चारपाई के किनारे पर झुका दिया। पीछे से उसने फिर से एक ही धक्के में पूरा लंड उसकी गीली चूत में उतार दिया। एक हाथ से उसने उसके बालों की मुट्ठी पकड़ रखी थी, दूसरे से उसके चूतड़ों पर थप्पड़ मार रहा था। हर थप्पड़ पर मीरा और ज़ोर से कराहती।
"तुम्हारी चूत कितनी टाइट है भाभी," देवू हाँफते हुए बड़बड़ाया, "पति तो रात को घर आता नहीं, ये किसके लिए बचा रखी थी?" मीरा ने पीछे मुड़कर उसे देखा, आँखों में नशा था। "तुम्हारे लिए ही बचा रखी थी, हरामी। अब फाड़ दो इसे।" यह सुनकर देवू पागल हो गया, और कुछ ही धक्कों में वह दहाड़ते हुए उसके अंदर झड़ गया। उसका गर्म पानी उसकी चूत में भर गया।
दोनों हाँफ रहे थे, पसीने से तर। तभी गली में किसी के खाँसने की आवाज़ आई, और मीरा झटके से सीधी हुई। "यहाँ कोई देख लेगा," उसने जल्दी से साड़ी ठीक करते हुए कहा, पर उसकी आँखों में अभी भी आग थी। "पीछे खेत हैं न? वहाँ चलो। वहाँ इस वक्त कोई नहीं आता।"
चाँदनी रात में दोनों खेत की मेड़ पर पहुँचे। चारों तरफ गन्ने के खेत लहलहा रहे थे, हवा में मिट्टी और फसल की खुशबू थी। दूर कहीं सियार हुआँ हुआँ कर रहे थे। मीरा ने देवू को धक्का देकर मेड़ पर गिरा दिया और उसकी छाती पर चढ़ बैठी। उसकी साड़ी अब कमर में खोंसी हुई थी।
मीरा ने खुद उसका लंड पकड़कर अपनी चूत में डाला और ऊपर नीचे उछलने लगी। चाँदनी में उसकी नंगी छातियाँ उछल रही थीं, और देवू ने उन्हें दोनों हाथों से दबोच लिया, निप्पलों को मरोड़ते हुए। "इतनी बड़ी छातियाँ लेकर गाँव में घूमती हो, किसी दिन कोई उठा ले जाएगा," उसने कहा। "उठाने वाला आ गया न," मीरा हँसी, और और तेज़ उछलने लगी।
फिर देवू ने उसे पलट दिया और मेड़ पर लिटा दिया। उसने मीरा की दोनों टाँगें उठाकर अपने कंधों पर रख लीं और लंड को जड़ तक उसकी चूत में धँसा दिया। इस पोज़ में हर धक्का उसकी बच्चेदानी तक पहुँच रहा था। मीरा चीख रही थी, उसके नाखून देवू की पीठ में धँस गए थे। "मर गई, मर गई," वह बड़बड़ा रही थी, पर उसकी चूत और ज़्यादा पानी छोड़ रही थी।
दूसरी बार झड़ते वक्त मीरा की चीख इतनी ज़ोर की थी कि खेत के कीड़े भी एक पल को चुप हो गए। उसका बदन थरथरा रहा था, चूत से पानी बहकर मिट्टी में मिल रहा था। देवू ने उसे उठाया, घुटनों पर किया, और पीछे से उसकी चूत में फिर घुस गया। खेत की गीली मिट्टी में, चाँदनी के नीचे, वह उसे कुत्ते की तरह पेल रहा था।
उसने उसके बाल खींच रखे थे, उसकी कमर पकड़ रखी थी, और हर धक्के के साथ उसके चूतड़ उसकी जाँघों से टकराकर थप थप की आवाज़ कर रहे थे। "बोल, किसकी है ये चूत?" देवू दहाड़ा। "तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी," मीरा चिल्लाई। यह सुनकर देवू ने आखिरी ज़ोर के धक्के मारे और उसके अंदर ही झड़ गया। दोनों मिट्टी में लुढ़क गए, हाँफते हुए, एक दूसरे से लिपटे हुए।
वापस घर के दरवाज़े पर पहुँचकर देवू ने अपने औज़ार उठाए। पर मीरा ने उसका हाथ पकड़कर उसे अंदर खींच लिया। "एक बार और," उसने कहा, उसकी आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ भूख थी। "बिस्तर पर। इस बार आराम से नहीं, जानवरों की तरह।"
कमरे में पहुँचकर मीरा ने खुद अपनी साड़ी उतार फेंकी, ब्लाउज़ और पेटीकोट भी। वह पूरी नंगी देवू के सामने खड़ी थी, चाँदनी खिड़की से उसके बदन पर पड़ रही थी। देवू ने भी अपने बचे हुए कपड़े उतार दिए। मीरा ने उसे चारपाई पर धकेला और उसके लंड को फिर से मुँह में ले लिया, इस बार धीरे धीरे, चाटते हुए, चूसते हुए, उसे पागल करते हुए।
जब देवू का लंड लोहे जैसा सख्त हो गया, तो मीरा उसकी तरफ पीठ करके उस पर बैठ गई। रिवर्स पोज़ में वह खुद ऊपर नीचे हो रही थी, अपने हाथों से अपनी छातियाँ दबाते हुए। देवू नीचे से धक्के मार रहा था, और खिड़की से आती हवा में उनकी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
फिर देवू ने उसे सीधा लिटाया, उसके ऊपर चढ़ा, और उसके बालों की मुट्ठी भरकर उसका चेहरा अपनी तरफ किया। "आँखें खोलकर देख, कौन पेल रहा है तुझे," उसने कहा। मीरा ने आँखें खोलीं, और उसी पल देवू ने पूरी ताकत से धक्का मारा। मीरा की चीख कमरे में गूँज गई। वह उसे इतनी ज़ोर से पेल रहा था कि चारपाई चरमराने लगी।
आखिरी बार दोनों साथ झड़े। मीरा ने उसका नाम चिल्लाते हुए अपनी टाँगें उसकी कमर में जकड़ लीं, और देवू ने दहाड़ते हुए अपना सारा पानी उसके अंदर उड़ेल दिया। कुछ देर तक दोनों एक दूसरे से लिपटे हाँफते रहे, पसीने से तर बदन एक दूसरे से चिपके हुए।
"सुरेश को पता चला तो?" देवू ने धीरे से पूछा, उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए। मीरा ने उसके सीने पर सिर रखा और कहा, "सुरेश को सिर्फ मिल की मशीनों से फुर्सत मिले तब न। और वैसे भी, जो आज रात हुआ, वो मैं किसी को बताने वाली नहीं।" उसकी उँगली उसके सीने पर गोल घूम रही थी।
देवू ने कपड़े पहने, अपने औज़ार समेटे। दरवाज़े पर रुककर उसने पीछे मुड़कर देखा। मीरा दरवाज़े की चौखट से टिकी उसे देख रही थी, होठों पर एक शरारती मुस्कान। "कल गेट की जाँच करने आऊँगा," उसने कहा। मीरा मुस्कुराई, "गेट तो बिल्कुल ठीक है। तुम बस आ जाना।"
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