होटल रूम का दरवाज़ा खुलते ही उसने बिना एक शब्द बोले सारी कपड़े उतार दिए और पूरी रात सिर्फ शरीर की भाषा चली
होटल के कमरे का दरवाज़ा खुला और वह सामने खड़ी थी। कोई अभिवादन नहीं। कोई मुस्कान नहीं। सिर्फ नज़रें जो सीधे मेरे शरीर पर टिकी थीं। काली साड़ी में लिपटी हुई। बाल खुले। होंठ हल्के लाल। लेकिन आँखों में सिर्फ भूख।
मैंने उसे पहली बार बार में देखा था। अकेली बैठी हुई, व्हिस्की के गिलास को घुमाती हुई। हमारी नज़रें मिलीं। तीन सेकंड। उसने सिर हल्का सा हिलाया। मैं उठा। उसके पास गया। पास खड़े होकर पूछा कि अकेली हैं क्या। उसने हाँ कहा। फिर पूछा कि कमरा है क्या मेरे पास। मैंने कमरे का नंबर बताया। उसने गिलास खत्म किया। खड़ी हुई। और चल दी।
अब वह यहाँ थी। दरवाज़े पर।
उसने दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया। पीछे मुड़कर मेरी ओर देखा। फिर बिना एक शब्द बोले अपनी साड़ी की पिन खोली। साड़ी फर्श पर सरक गई। ब्लाउज के हुक खोले। ब्लाउज गिरा। उसके नीचे कुछ नहीं था। न ब्रा। न पेटीकोट। सिर्फ नंगी त्वचा। बड़े गोल स्तन जिनके निप्पल पहले से ही सख्त और काले थे। पेट सपाट। जांघें मोटी। और उनके बीच की जगह पहले से चमक रही थी। गीली।
मैंने अपनी शर्ट के बटन खोले। शर्ट उतारी। उसने पास आकर मेरी बेल्ट खोली। जिपर नीचे किया। पैंट और अंडरवियर एक साथ खींच दिए। मेरा लंड बाहर निकला। पहले से कठोर। नसें फूली हुई। सिरे से पहले से ही एक बूँद टपक रही थी।
उसने उसे हाथ में लिया। उंगलियों से सहलाया। हथेली से पूरा घेरा बनाया। ऊपर नीचे किया। फिर घुटनों के बल बैठ गई। फर्श पर। मेरे सामने।
उसके होंठ गर्म और मुलायम थे। उसने सिरे को जीभ से छुआ। चारों तरफ घुमाया। फिर मुँह में लिया। धीरे से। फिर और अंदर। गला तक। मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फँसाईं। वह और गहरा ले गई। आँखें ऊपर मेरी ओर। थूक उसके होठों से बहने लगा। गले की आवाज़ आने लगी। लेकिन उसने रोका नहीं। दोनों हाथों से मेरे अंडकोश को सहला रही थी। कभी हल्के से निचोड़ती। कभी नाखून से खरोंचती।
मैंने दस मिनट तक उसे चूसने दिया। फिर खींचकर उठाया। बिस्तर पर धकेल दिया। उसके पैर फैला दिए। घुटने मोड़ दिए। बीच की दरार पूरी तरह खुली और चमकदार थी। मैंने झुककर जीभ से चाटा। ऊपर से नीचे। क्लिट पर घुमाया। उंगलियाँ अंदर डालीं। दो। फिर तीन। अंदर की दीवारें पहले से ही सिकुड़ रही थीं। गर्म और चिकनी।
वह कराह उठी। तकिया पकड़ लिया। मैंने उंगलियाँ तेजी से चलाईं। जीभ क्लिट पर लगातार। उसका शरीर काँपने लगा। कमर उठने लगी। मैंने और जोर लगाया। वह चिल्लाई और पहला ऑर्गैज्म आ गया। जांघें मेरे सिर को कसकर पकड़ रही थीं। अंदर की मांसपेशियाँ उंगलियों को निचोड़ रही थीं।
मैंने उंगलियाँ निकालीं। अपना लंड उसकी गीली जगह पर रखा। सिरे से रगड़ा। फिर एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया। वह जोर से चिल्लाई। आँखें बंद। मुँह खुला। मैंने रुकने का इरादा नहीं किया। गहरे और तेज धक्के शुरू कर दिए। बिस्तर की टाँगें चरमरा रही थीं। हर धक्के पर उसकी साँस रुक रही थी। एड़ियाँ मेरी पीठ में धँस गईं। नाखून कंधों पर।
"और जोर से," उसने पहली बार कहा। आवाज़ कर्कश और टूटी हुई थी।
मैंने उसके कूल्हों को दोनों हाथों से पकड़ा। उंगलियाँ मांस में धँस गईं। और तेज किया। हर धक्के पर उसके स्तन हिल रहे थे। मैंने एक स्तन मुँह में लिया। निप्पल को जीभ से सहलाया। फिर दाँतों से हल्का काटा। वह और जोर से कराहने लगी। दूसरा स्तन भी उसी तरह।
दूसरा ऑर्गैज्म उसके लिए और जोरदार था। पूरा शरीर अकड़ गया। अंदर की पकड़ इतनी कस हो गई कि मेरा लंड लगभग बाहर निकलने को था। लेकिन मैंने रोका नहीं। धक्के जारी रखे। वह काँपती रही। आँखों से पानी आने लगा।
मैंने उसे पलटा। पेट के बल। घुटने मोड़कर ऊपर उठाए। गांड हवा में। पीछे से फिर घुस गया। एक हाथ उसके बालों में कसकर पकड़ा। दूसरा कमर पर। इस बार और गहरा। पूरा। हर धक्के पर उसकी गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। आवाज़ गंदी और गीली थी।
मैंने थप्पड़ मारा। दाएँ तरफ। जोर से। लाल निशान। फिर बाएँ। वह और भीग गई। "फिर से मारो," उसने कहा। मैंने दोनों तरफ लगातार मारे। उसके कूल्हे लाल हो गए। वह और जोर से पीछे धकेल रही थी।
तीसरा ऑर्गैज्म आया तो उसके पैर काँपने लगे। मैंने उसे थामे रखा। अपनी गति और बढ़ाई। गर्म तरंगें महसूस हुईं। मैंने अंदर ही छोड़ दिया। गहरी धड़कनें। वह सिसक रही थी। पूरा शरीर ढीला पड़ गया।
मैं बाहर निकला। सफेद गाढ़ा तरल उसकी जांघों पर बहने लगा। नीचे तक। बिस्तर पर दाग। वह करवट लेकर लेट गई। साँसें तेज। छाती ऊपर नीचे।
पांच मिनट बाद वह फिर उठी। मुझे पीठ के बल लिटाया। खुद ऊपर चढ़ गई। अपने हाथ से मेरे लंड को सीधा किया। जो अभी भी सख्त था। फिर खुद को उस पर बैठा लिया। एक ही बार में पूरा अंदर। आँखें बंद करके कराह उठी।
वह ऊपर नीचे होने लगी। धीरे शुरू किया। फिर तेज। स्तन मेरे चेहरे के पास हिल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा। निप्पलों को उंगलियों से मरोड़ा। वह और तेज हुई। कमर घुमाने लगी। आगे पीछे। गोल।
मैंने उसकी कमर पकड़कर खुद भी नीचे से धक्के देने शुरू किए। ऊपर की ओर। वह झुक गई। बाल मेरे चेहरे पर गिर रहे थे। होंठ मिले। जीभ अंदर। हम दोनों पसीने से तर थे। कमरा गर्म हो चुका था।
चौथा ऑर्गैज्म उसके लिए था। शरीर अकड़ गया। अंदर की पकड़ इतनी कस थी कि मैं भी किनारे पर पहुँच गया। मैंने उसे नीचे दबाया। कूल्हे ऊपर उठाकर और गहरा किया। अंदर ही फिर से छोड़ दिया। इतना कि वह बाहर निकलने लगा तुरंत।
वह मेरे ऊपर गिर पड़ी। दिल की धड़कनें एक दूसरे से टकरा रही थीं। पसीना मिला हुआ। साँसें एक साथ।
थोड़ी देर बाद वह बगल में लेट गई। उंगली से मेरे सीने पर घुमा रही थी। निप्पल के आसपास।
"नाम क्या है तुम्हारा?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने बताया। उसने भी अपना नाम बताया। फिर चुप्पी। कोई और सवाल नहीं। कोई कहानी नहीं। सिर्फ शरीर।
रात अभी बाकी थी। बहुत बाकी।
मैंने उसे फिर खींचा। इस बार मुँह के बल लिटाया। तकिया सिर के नीचे। पैर फैलाए। मैंने पीछे से जीभ डाली। उसकी गीली दरार को चाटा। ऊपर से नीचे। क्लिट पर घुमाया। उंगलियाँ अंदर। तीन। तेजी से। वह तकिए में मुँह दबाकर कराह रही थी। गांड हिला रही थी।
जब वह फिर से काँपने लगी तो मैंने उठकर पीछे से घुस गए। इस बार धीरे शुरू किया। पूरा अंदर। फिर बाहर। फिर अंदर। धीरे धीरे गति बढ़ाई। एक हाथ उसकी गर्दन पर हल्का सा दबाया। दूसरा नीचे जाकर क्लिट को सहलाया। गोल गोल।
वह पागलों की तरह काँप रही थी। मैंने रफ्तार नहीं घटाई। जब पाँचवाँ ऑर्गैज्म आया तो उसकी आवाज़ दब गई। शरीर ऐंठ गया। मैंने भी उसी समय छोड़ दिया। इतना कि वह तुरंत टपकने लगा। जांघों से होता हुआ बिस्तर तक।
हम दोनों बिस्तर पर फैले पड़े थे। कमरा पूरी तरह सेक्स की गंध से भरा था। पसीने की। वीर्य की। उसकी योनि की।
सुबह तीन बजे वह फिर उठी। बाथरूम गई। पानी की आवाज़ आई। वापस आकर सीधे मेरे लंड को मुँह में ले लिया। आधे सोए हुए। धीरे धीरे चूसती रही। जीभ घुमाती रही। जब तक वह फिर पूरी तरह सख्त नहीं हो गया। नसें फूलीं।
फिर वह ऊपर चढ़ गई। इस बार मुँह मेरे मुँह से सटाकर। आँखें खुलीं। एक दूसरे को देखते हुए। धीमे धीमे हिले। लंबे समय तक। कोई जल्दबाजी नहीं। सिर्फ अंदर की गर्मी। स्तन मेरे सीने से दबे।
जब हम दोनों फिर से आए तो वह मेरे कंधे पर सिर रखकर लेट गई। उंगली से मेरे बाल सहला रही थी।
"मैं सुबह जल्दी निकल जाऊँगी," उसने फुसफुसाया। आवाज़ में थकान थी लेकिन संतुष्टि भी।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसके बाल सहलाए। पीठ पर हाथ फेरता रहा।
सूरज निकलने से पहले वह उठी। कपड़े पहने। साड़ी फिर से लपेटी। ब्लाउज पहना। बाल ठीक किए। आईने में एक बार देखा। फिर मेरे पास आई। बिस्तर पर बैठकर मेरे माथे पर एक बार होंठ रखे। कोई शब्द नहीं।
दरवाज़ा खोला। बाहर निकली। दरवाज़ा बंद होते समय एक बार मुड़ी। नज़र मिली। आँखों में वही भूख नहीं थी। कुछ और था। फिर चली गई।
कमरे में उसकी खुशबू रह गई। इत्र की। पसीने की। सेक्स की। बिस्तर पर बड़े बड़े गीले निशान। तकिए पर बाल। और एक रात की याद जो कभी नहीं मिटने वाली थी।
मैंने खिड़की खोली। बाहर शहर अभी अंधेरे में था। दूर कोई गाड़ी की आवाज़। लेकिन मेरा शरीर अभी भी जल रहा था। हर जगह उसकी छुअन महसूस हो रही थी। अंदर अभी भी भरा हुआ लग रहा था।
एक रात। बस एक। लेकिन काफी थी। पूरे शरीर को याद रखने लायक।
बाद में जब मैंने शावर लिया तो पानी गरम था। लेकिन उसकी उंगलियों की याद ठंडी नहीं हुई। बालों में। स्तनों पर। अंदर। हर जगह।
बिस्तर पर फिर लेटकर मैंने छत को देखा। मन में वही दृश्य बार बार चल रहे थे। दरवाज़ा खुलना। साड़ी गिरना। घुटनों के बल बैठना। गहरे धक्के। कराहें। बार बार आना। थप्पड़। बाल खींचना। गर्दन दबाना। सब।
सुबह दस बजे तक नींद नहीं आई। शरीर थका था। मांसपेशियाँ दर्द कर रही थीं। लेकिन मन शांत था। एक अजीब सी तृप्ति।
चेक आउट करते समय रिसेप्शन पर लड़की ने मुस्कुराकर पूछा कि रात कैसी रही सर। मैंने सिर्फ सिर हिलाया। कोई जवाब नहीं दिया।
बाहर निकलकर टैक्सी पकड़ी। रास्ते में खिड़की से शहर देखता रहा। लोग जा रहे थे। दुकानें खुल रही थीं। लेकिन दिमाग में वही होटल रूम था। वही औरत। वही एक रात। कोई नाम याद रखने लायक नहीं। सिर्फ शरीर। सिर्फ रात।
कभी कभी जिंदगी ऐसे तोहफे देती है जो ना तो माँगे जाते हैं। ना दोबारा मिलते हैं। बस एक बार। पूरे जोर से। बिना किसी वादे के। और फिर खत्म। जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन शरीर जानता है। त्वचा याद रखती है।
मैंने फोन निकाला। कोई मैसेज नहीं था। नंबर भी नहीं लिया था उसने। ना मैंने दिया। सही था। एक रात का खेल पूरा हो चुका था। कोई अगला अध्याय नहीं।
टैक्सी वाले ने पूछा कहाँ जाना है। मैंने घर का पता बताया। पीछे मुड़कर होटल की इमारत को देखा। खिड़कियाँ बंद। जैसे रात में कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन हुआ था। बहुत कुछ। और वह याद मेरे साथ रहेगी। जब तक शरीर में जान है।
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