हाईवे के ढाबे पर एक रात
ट्रक की हेडलाइट ने ढाबे के आँगन में जमी धूल को चीर दिया। रानी ने आखिरी मेज़ पोंछते हुए हाथ रोका और पलटकर देखा। एक बड़ा कंटेनर ट्रक शटर के सामने आकर गरजता हुआ रुका।
इंजन की घरघराहट थमी, दरवाज़ा खटका और एक लंबा चौड़ा लड़का नीचे उतरा। कंधे पर गमछा, चेहरे पर दिन भर की धूल। उसने आँगन में नज़र घुमाई और सीधा रानी की तरफ बढ़ आया।
"खाना मिलेगा दीदी।" उसने कहा। आवाज़ में थकान थी, पर आँखों में कुछ और भी। "बहुत भूख लगी है। जयपुर तक का माल है, टाइम से पहुँचना है।"
रानी ने दीवार घड़ी की तरफ देखा। ग्यारह बजकर बीस मिनट। "रसोई तो बंद होने वाली थी, पर तुम्हारे लिए ताज़ा बना देती हूँ। दाल फ्राई और तंदूरी रोटी चलेगी।" उसने गीला कपड़ा निचोड़ते हुए कहा।
"बस यही चाहिए।" लड़का मेज़ पर बैठ गया और गमछे से चेहरा पोंछा। "नाम सूरज है। दिल्ली से चला हूँ सुबह, हाईवे पर ढाबे ढूँढते ढूँढते यहीं आँख लगी।"
रानी मुस्कुराई। "मैं रानी। ये ढाबा मेरा ही है।" उसने तंदूर की तरफ इशारा किया। "छोटू तो चला गया, अब खाना मैं ही बनाऊँगी। हाथ मुँह धो लो, पीछे नल है।"
सूरज उठा और पीछे के आँगन की तरफ गया। नल के नीचे उसने मुँह पर पानी के छींटे मारे और गर्दन भीगी की। जब वो लौटा तो रानी आटा गूँध रही थी। उसकी बाँहें कोहनी तक नंगी थीं, और झुकने पर दुपट्टा कंधे से सरक गया था।
सूरज की नज़र ठहर गई। रानी ने महसूस किया, पर उसने दुपट्टा ठीक नहीं किया। उसने आटा ज़ोर से पटका और बोली, "ऐसे क्या देख रहे हो। आटा गूँधते हुए पहली बार देखा है क्या।"
"आटा तो बहुत देखा है।" सूरज ने हँसते हुए कहा और वहीं पास आकर खड़ा हो गया। "पर गूँधने वाली इतनी अच्छी पहली बार देखी है।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी।
रानी के हाथ एक पल को रुके। उसने ऊपर देखा। सूरज बिल्कुल पास खड़ा था, इतना पास कि उसके पसीने और डीजल की मिली जुली गंध आ रही थी। उसने आँखें झपकाईं और फिर से आटे में हाथ डाल दिए।
"बातें कम बनाओ, जाकर बैठो। पाँच मिनट में रोटी सेंकती हूँ।" उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में डाँट नहीं थी। सूरज हँसा और जाकर मेज़ पर बैठ गया, पर उसकी नज़रें रानी पर ही टिकी रहीं।
रोटी तंदूर में चिपकी, दाल में तड़का लगा। खुशबू पूरे ढाबे में फैल गई। रानी ने थाली सजाई। दाल फ्राई, चार तंदूरी रोटी, प्याज़ और हरी मिर्च। उसने थाली सूरज के सामने रखी।
"गरम है, आराम से खाओ।" उसने कहा। सूरज ने पहला निवाला तोड़ा और आँखें बंद करके चबाया। "वाह दीदी। क्या दाल बनाई है। हाईवे पर इतना अच्छा खाना कहीं नहीं मिला।"
"दीदी मत बोलो।" रानी उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। "रानी बोलो। दीदी सुनकर बूढ़ा लगने लगता है।" उसने शरारत से कहा। सूरज ने रोटी का टुकड़ा उठाते हुए उसकी तरफ देखा। "रानी। नाम भी अच्छा, खाना भी।"
खाते खाते बातें होती रहीं। सूरज ने बताया कि वो छब्बीस का है, पाँच साल से ट्रक चला रहा है। रानी ने बताया कि ढाबा उसके पति का था, चार साल पहले वो गुज़र गए, तब से वो अकेली ही चलाती है।
"अकेली। रात को भी।" सूरज ने पूछा। रानी ने सिर हिलाया। "आदत हो गई है। छोटू दिन में मदद करता है, रात को मैं शटर गिरा देती हूँ। आज तुम आ गए तो रुक गई।"
खाना खत्म हुआ। सूरज ने हाथ धोए और रानी ने थाली उठाई। "शटर गिरा दूँ।" सूरज ने कहा। "तुम अकेली ये भारी शटर कैसे गिराती हो।" रानी हँसी। "रोज़ गिराती हूँ। पर आज तुम हो तो मदद कर दो।"
दोनों ने मिलकर शटर गिराया। खड़खड़ाहट के साथ ढाबा बाहर की दुनिया से कट गया। अंदर सिर्फ ट्यूबलाइट की रोशनी और तंदूर की बची हुई आँच थी। अचानक सब कुछ बहुत शांत लगने लगा।
"चाय पियोगे।" रानी ने पूछा। सूरज ने सिर हिलाया। रानी चाय चढ़ाने रसोई की तरफ बढ़ी। सूरज भी उसके पीछे पीछे आ गया। रसोई छोटी थी, दोनों के बीच बस एक हाथ का फासला था।
रानी ने चाय की पतीली उठाई। तभी सूरज ने पीछे से उसकी कलाई पकड़ ली। रानी ठिठक गई। पतीली उसके हाथ में ही रही, पर उसका पूरा ध्यान उस पकड़ पर था। मज़बूत, गरम, और माँगती हुई।
"रानी।" सूरज की आवाज़ उसके कान के बिल्कुल पास थी। रानी ने पतीली नीचे रखी और धीरे से पलटी। उनकी साँसें टकरा रही थीं। उसने कुछ नहीं कहा, बस सूरज की आँखों में देखा।
सूरज ने उसे अपनी तरफ खींचा। रानी की पीठ रसोई की दीवार से लगी। उसके होंठ सूरज के होंठों से मिले। पहले धीमे, फिर भूखे। रानी ने उसके कंधे पकड़ लिए, नाखून कमीज़ में धँस गए।
"दरवाज़ा।" रानी ने साँसों के बीच कहा। "शटर गिरा है। कोई नहीं आएगा।" सूरज ने जवाब दिया और उसके ब्लाउज़ के बटन खोलने लगा। एक, दो, तीन। रानी ने उसे रोका नहीं।
ब्लाउज़ खुला। रानी की भारी छातियाँ ब्रा में कसी थीं। सूरज ने ब्रा का हुक खोला और दोनों बूब्स को हाथों में भर लिया। वो गरम थे, भारी थे, और रानी की साँस तेज़ हो गई।
सूरज ने एक निप्पल को मुँह में लिया और चूसा। रानी के मुँह से सिसकी निकली। "आह। धीरे नहीं। ज़ोर से।" उसने सूरज के बाल पकड़ लिए और उसका सिर अपनी छाती में दबा दिया।
सूरज ने दूसरा निप्पल चूसा, फिर दाँतों से हल्के से काटा। रानी काँप गई। उसने सूरज की पैंट की ज़िप पर हाथ रखा। "तुम्हारा भी तो देखूँ।" उसने ज़िप नीचे खींची।
सूरज का लुंड कच्छे में तना हुआ था। रानी ने कच्छा नीचे सरकाया और लुंड बाहर निकाला। लंबा, मोटा, नसों वाला। उसने उसे हाथ में लिया और धीरे धीरे हिलाने लगी। सूरज ने आँखें बंद कर लीं।
रानी घुटनों पर बैठ गई। उसने लुंड के टोपे को जीभ से चाटा, फिर पूरा मुँह में ले लिया। सूरज के मुँह से गहरी साँस निकली। "रानी। बहुत अच्छा।" उसने उसके बाल पकड़े।
रानी ने लुंड को अंदर बाहर किया, जीभ से टोपे को रगड़ा। सूरज की जाँघें काँपने लगीं। तभी रानी रुकी और खड़ी हो गई। "अभी नहीं।" उसने शरारत से कहा। "अभी तो शुरुआत है।"
रानी ने अपनी सलवार का नाड़ा खोला और सलवार नीचे सरका दी। उसकी चूत गीली थी, पैंटी पर गीलापन साफ दिख रहा था। सूरज ने पैंटी भी उतार दी और उसे रसोई की बड़ी मेज़ पर बिठा दिया।
सूरज ने उसकी टाँगें फैलाईं और चूत को देखा। गुलाबी, फूली हुई, पानी से चमकती। उसने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। रानी ने मेज़ का किनारा पकड़ लिया। "आह। और अंदर।"
सूरज ने उँगलियों को अंदर बाहर किया, अँगूठे से दाने को रगड़ा। रानी की कमर उठने लगी। "सूरज। अब मत तड़पाओ। डालो ना।" उसकी आवाज़ में बेसब्री थी।
सूरज ने लुंड को चूत के मुँह पर रखा और एक धक्के में अंदर डाल दिया। रानी चीख पड़ी। "आह माँ। कितना मोटा है।" सूरज ने धक्के लगाने शुरू किए। मेज़ हिलने लगी।
हर धक्के के साथ रानी की बूब्स उछलतीं। सूरज ने उन्हें पकड़ लिया और चोदता रहा। "तुम्हारी चूत बहुत टाइट है रानी।" उसने हाँफते हुए कहा। "चार साल से।" रानी ने जवाब दिया और अपनी टाँगें उसकी कमर में लपेट दीं।
सूरज ने रफ्तार बढ़ाई। रसोई में सिर्फ धक्कों की आवाज़ और दोनों की साँसें गूँज रही थीं। रानी की चूत ने लुंड को कसकर जकड़ लिया। "मैं झड़ने वाली हूँ।" वो चिल्लाई।
"साथ में।" सूरज ने कहा और आखिरी ज़ोरदार धक्के लगाए। रानी की चूत से पानी निकला, उसकी पूरी देह काँपी। उसी पल सूरज भी झड़ा, गरम वीर्य उसकी चूत में भर गया।
दोनों हाँफते हुए एक दूसरे से लिपटे रहे। सूरज का लुंड अभी भी रानी की चूत में था, धीरे धीरे नरम पड़ता हुआ। रानी ने उसके माथे पर पसीना पोंछा। "चाय तो रह गई।" वो हँसी।
"चाय बाद में।" सूरज ने कहा और उसे मेज़ से उतारा। रानी ने सलवार उठाई, पर सूरज ने रोक दिया। "ऐसे ही चलो। मेरे ट्रक में बिस्तर है। वहाँ आराम करेंगे।"
रात के सन्नाटे में दोनों ट्रक की तरफ गए। रानी ने सिर्फ दुपट्टा लपेटा था। सूरज ने केबिन का दरवाज़ा खोला और उसे ऊपर चढ़ाया। पीछे की बर्थ पर गद्दा बिछा था।
रानी बर्थ पर लेटी। सूरज ने दुपट्टा हटाया। ट्यूबलाइट की पीली रोशनी में उसका नंगा बदन चमक रहा था। सूरज ने उसके ऊपर चढ़कर उसके होंठ चूमे, फिर गर्दन, फिर बूब्स।
रानी ने उसकी कमीज़ उतारी। सूरज का सीना चौड़ा था, पसीने से चमकता हुआ। उसने उसकी छाती पर हाथ फेरा, निप्पलों को उँगलियों से मरोड़ा। सूरज ने सिसकी भरी।
"अब मेरी बारी।" रानी ने कहा और सूरज को पीठ के बल लिटा दिया। वो उसके ऊपर चढ़ी। उसने लुंड को पकड़ा, जो फिर से तनने लगा था, और अपनी चूत में डाल लिया।
रानी ऊपर नीचे होने लगी। उसकी बूब्स सूरज के चेहरे के सामने उछल रही थीं। सूरज ने उन्हें पकड़ा और चूसा। रानी की रफ्तार बढ़ती गई। "हाँ। ऐसे ही। मेरी चूत को भरो।"
सूरज ने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से धक्के लगाने लगा। दोनों की लय मिल गई। बर्थ चरमराई। रानी ने सिर पीछे फेंका, बाल बिखर गए। "मैं फिर झड़ रही हूँ।"
इस बार रानी ज़ोर से चीखी। उसकी चूत ने लुंड को निचोड़ा। सूरज ने उसे कसकर पकड़ा और खुद भी झड़ा। दोनों पसीने में भीगे एक दूसरे पर गिर पड़े।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ दोनों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। विंडशील्ड से तारे दिख रहे थे। रानी ने सूरज की छाती पर सिर रखा। "पानी पिलाओ।"
सूरज ने बोतल से पानी पिलाया। फिर दोनों केबिन से उतरे। रात की ठंडी हवा ने बदन को छुआ। ढाबे के पीछे रानी की चारपाई बिछी थी। "वहाँ चलो।" रानी ने कहा।
चारपाई पर बिस्तर बिछा था। दोनों लेट गए। ऊपर आसमान में तारे थे, दूर हाईवे पर कभी कभार कोई ट्रक गुज़रता। रानी सूरज की तरफ करवट लेकर लेटी।
सूरज ने उसे अपनी तरफ खींचा। उनके नंगे बदन आपस में चिपके। इस बार जल्दी नहीं थी। सूरज ने धीरे धीरे उसकी पीठ सहलाई, बूब्स को हथेलियों में तौला। रानी ने आँखें बंद कर लीं।
"तुम्हारा बदन।" सूरज ने उसके कान में कहा। "इतना गरम।" उसने उसकी चूत में उँगलियाँ डालीं। वो अभी भी गीली थी। रानी ने टाँगें फैला दीं। "चोदो मुझे। धीरे धीरे।"
सूरज उसके ऊपर आया। उसने लुंड को चूत में डाला, इस बार बहुत धीमे। पूरा अंदर गया, फिर पूरा बाहर। रानी ने उसके कंधे पकड़े। "हाँ। बस ऐसे ही।"
धीमे धक्कों में एक अलग नशा था। हर बार लुंड पूरा अंदर जाता और रानी की साँस रुक जाती। सूरज ने उसके होंठ चूमे, जीभ उसकी जीभ से लड़ी। नीचे दोनों के बदन एक लय में हिल रहे थे।
रानी ने अपनी टाँगें उसकी कमर में कस दीं। "और अंदर।" सूरज ने रफ्तार थोड़ी बढ़ाई। चारपाई चरमराई। रानी के मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं।
"रानी। तुम्हारी चूत में इतना मज़ा।" सूरज हाँफ रहा था। "तो रोज़ आओ ना।" रानी ने कहा और उसके होंठ काट लिए। "मैं रोज़ खिलाऊँगी। खाना भी।" वो हँसी, पर हँसी सिसकी में बदल गई।
अचानक रानी की देह अकड़ गई। तीसरी बार उसका पानी निकला, इस बार धीमे और गहरा। सूरज ने उसे कसकर पकड़े रखा और धक्के लगाता रहा, जब तक वो खुद न झड़ गया।
दोनों निढाल होकर चारपाई पर पड़े रहे। सूरज का सिर रानी की छाती पर था। दूर कहीं मुर्गे ने बाँग दी। पूरब में हल्की लाली दिखने लगी थी।
रानी उठी। उसने सलवार कमीज़ पहनी और तंदूर जलाया। "रोटी नहीं, पराठे बनाती हूँ। रास्ते के लिए।" सूरज ने भी कपड़े पहने और उसके पास आकर खड़ा हो गया।
पराठे सिके, अचार की शीशी पैक हुई। रानी ने पोटली सूरज के हाथ में दी। "अगली बार जल्दी आना।" उसने कहा। सूरज ने पोटली ली और उसका हाथ दबाया।
"अब तो हर हफ़्ते का रूट यही होगा।" उसने कहा और ट्रक की तरफ बढ़ गया। रानी शटर के पास खड़ी उसे देखती रही, जब तक हेडलाइट धूल में गुम न हो गई।
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