सौतेली माँ की चुदाई: लखनऊ के पुराने मकान का राज़
मीना के हाथ मेरी कमीज़ के बटन एक एक करके खोल रहे थे और मेरी नंगी छाती पर उसकी गर्म साँसें टकरा रही थीं। बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद था, पंखा पूरे ज़ोर पर घूम रहा था, फिर भी मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। मैंने इंटरनेट पर न जाने कितनी बार सौतेली माँ की चुदाई लिखकर सर्च किया था, लेकिन उस शाम लखनऊ के पुराने मकान के उस कमरे में वह कल्पना मेरी आँखों के सामने हकीकत बन रही थी।
उसका चेहरा मेरे चेहरे से बस दो इंच दूर था और उसकी आँखों में वह शरारत थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने मेरे कान के पास आकर धीरे से कहा, रुकना मत अरुण, और मेरी कमीज़ मेरे कंधों से नीचे खिसक गई। उस पल मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा वह भी उसे सुन रही होगी।
लेकिन यह कहानी वहाँ से शुरू नहीं हुई थी। यह शुरू हुई थी बस तीन घंटे पहले, जब मैं अपने कमरे में किताबों के ढेर के बीच बैठा सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था। बाहर आँगन में मीना की पार्लर वाली आखिरी ग्राहक जा चुकी थी और घर में अजीब सी खामोशी छाई थी। पापा ऑफिस के काम से शहर से बाहर गए थे और दो दिन बाद लौटने वाले थे।
तभी मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई और मीना की आवाज़ आई, अरुण बेटा, ज़रा स्टोर रूम में आना, यह लोहे की अलमारी हिलानी है। मैं किताब बंद करके उठा और स्टोर रूम की तरफ चल दिया। वहाँ पुराने बक्सों और टूटे फर्नीचर के बीच मीना हरी साड़ी में खड़ी थी और उसके चेहरे पर हल्का पसीना था।
उसने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और ब्लाउज़ उसकी भरी हुई छाती पर कसा हुआ था। मैंने नज़रें झुकाने की कोशिश की, लेकिन आँखें बार बार वहीं जा रही थीं। उसने मेरी नज़र पकड़ ली और हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, क्या देख रहा है, अलमारी पकड़। मैं हड़बड़ाकर अलमारी के दूसरे सिरे पर लग गया।
हम दोनों ने ज़ोर लगाया और भारी अलमारी दीवार से खिसककर कोने में जा लगी। धक्का देते वक्त उसका पल्लू कमर से छूटकर नीचे गिर गया था और अब उसका ब्लाउज़ पूरी तरह नज़र आ रहा था। उसने पल्लू उठाने की कोई जल्दी नहीं दिखाई। उसने बस मुझे देखा और आँख मारकर बोली, पसीना आ गया, चल पानी पीते हैं।
हम किचन में आए और उसने फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल निकाली। पानी पीते वक्त उसकी नज़रें मुझ पर टिकी थीं और उसके होंठों पर अजीब सी मुस्कान थी। उसने कहा, दिन भर किताबों में घुसे रहते हो, कंधे तो पत्थर जैसे हो गए होंगे। मैं रोज़ पार्लर में औरतों की गर्दन की अकड़न निकालती हूँ, तुम्हारी भी निकाल दूँ।
मैंने मना करने की कोशिश की, लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे कुर्सी पर बैठा दिया। वह तेल की शीशी लेकर आई और मेरे पीछे खड़ी हो गई। उसके नरम हाथ जब मेरे कंधों पर पड़े तो मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसकी उँगलियाँ मेरी गर्दन के नीचे गहराई तक दबाव डाल रही थीं और मैं धीरे धीरे ढीला पड़ रहा था।
मसाज करते करते वह थोड़ा झुक गई और उसके ब्लाउज़ में कसे हुए मम्मे मेरी पीठ पर दबने लगे। मेरी साँस अटक गई। मैंने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। उसके हाथ मेरे कंधों से फिसलकर मेरी छाती की तरफ बढ़ रहे थे और मेरी पैंट में मेरा लंड सख्त होने लगा था।
उसने मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया, तुम्हें आराम की ज़रूरत है अरुण, बहुत ज़्यादा। उसके हाथ अब मेरी कमीज़ के अंदर थे और मेरी नंगी छाती को सहला रहे थे। मैंने कुर्सी की बाहें कसकर पकड़ लीं। मेरा पूरा बदन गर्म हो चुका था और दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वह भी सुन रही होगी।
अचानक उसने कुर्सी घुमाई और मेरा सामना किया। अगले ही पल वह मेरी गोद में बैठ गई, मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर। उसकी आँखों में अब कोई शरारत नहीं थी, सिर्फ़ भूख थी। उसने कहा, आज कोई किताब नहीं, कोई पढ़ाई नहीं, और उसके होंठ मेरे होंठों पर आ गिरे।
उसका चुंबन धीमा नहीं था। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई और मैं उसके स्वाद में डूब गया। मेरे हाथ उसकी पीठ पर फिसल रहे थे और ब्लाउज़ के हुक मेरी उँगलियों के नीचे थे। एक एक करके मैंने हुक खोले और ब्लाउज़ उसके कंधों से नीचे खिसक गया। उसकी ब्रा में कसे हुए गोरे मम्मे मेरी छाती से टकरा रहे थे।
मैंने उसकी ब्रा का हुक भी खोल दिया और उसके मम्मे आज़ाद हो गए। वे भरे हुए, गोल और भारी थे, निप्पल गहरे भूरे रंग के और सख्त। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा तो उसके मुँह से सिसकारी निकली, आह अरुण। उसका हाथ मेरे बालों में था और वह मेरा सिर अपनी छाती पर दबा रही थी।
वह मेरी गोद में हिल रही थी और उसकी साड़ी ऊपर खिसकती जा रही थी। मेरी पैंट में मेरा लंड पूरी तरह तना हुआ था और उसकी जाँघों के बीच दब रहा था। उसने नीचे देखा और शरारती मुस्कान के साथ बोली, इतना बेसब्र, और उसकी हथेली मेरी पैंट के ऊपर मेरे लंड पर आ टिकी। मैंने ज़ोर से साँस खींची।
वह गोद से उठी और मेरे सामने खड़ी हो गई। धीरे धीरे उसने साड़ी का बचा हुआ हिस्सा भी खोल दिया और साड़ी फर्श पर ढेर हो गई। फिर पेटीकोट का नाड़ा खुला और वह भी नीचे गिर गया। आखिर में उसने पैंटी भी उतार दी। वह पूरी नंगी मेरे सामने खड़ी थी, बयालीस साल की भरी पूरी औरत, जिसकी चूत पर हल्के बाल थे और जिसकी आँखों में बेशर्म आमंत्रण था।
उसने मेरी कमीज़ उतारी, फिर मेरी पैंट का बटन खोला और पैंट नीचे खिसका दी। मेरा लंड आज़ाद होते ही तनकर खड़ा हो गया। उसने उसे अपने हाथ में लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी। उसकी पकड़ मज़बूत थी और उसका अँगूठा मेरे सुपारे पर घूम रहा था। मैं कुर्सी पर बैठा काँप रहा था।
फिर वह घुटनों के बल बैठ गई और मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया। उसकी गर्म जीभ मेरे सुपारे पर फिर रही थी और वह धीरे धीरे अंदर तक ले रही थी। मैंने उसका सिर पकड़ लिया और वह और गहराई तक लेने लगी। मेरे मुँह से कराह निकली और मेरी जाँघें काँपने लगीं। उसने मुझे चूसते हुए ऊपर देखा और उसकी आँखों में जीत की चमक थी।
मैंने उसे ऊपर खींचा और गोद में उठाकर बेडरूम की तरफ चल दिया। बिस्तर पर लिटाकर मैंने उसकी टाँगें फैलाईं। उसकी चूत मेरे सामने थी, गीली और फूली हुई, हल्के बालों के बीच गुलाबी दरार चमक रही थी। मैंने अपनी उँगली उसकी चूत पर फेरी तो वह सिसक उठी। उसकी चूत का पानी मेरी उँगली पर लग गया था।
मैंने अपना चेहरा उसकी जाँघों के बीच दबा दिया और उसकी चूत को चाटने लगा। मेरी जीभ उसकी दरार पर ऊपर नीचे फिर रही थी और वह बिस्तर पर तड़प रही थी। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में धँसी थीं और वह मेरा सिर अपनी चूत पर दबा रही थी। आह, और चाटो, ऐसे ही, उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसकी चूत का पानी मेरी जीभ पर था और मैं उसे पी रहा था।
उसका बदन ऐंठने लगा और अचानक उसकी चूत से पानी की धार निकली। वह झड़ गई थी और बिस्तर की चादर गीली हो गई थी। वह हाँफ रही थी, उसकी छाती ऊपर नीचे हो रही थी। उसने मुझे ऊपर खींचा और बोली, अब और मत तड़पाओ, अंदर डालो। मैंने अपना लंड उसकी गीली चूत के मुँह पर टिकाया।
मैंने धीरे से धक्का दिया और मेरा सुपारा उसकी चूत में घुस गया। उसकी चूत बहुत टाइट और गर्म थी। मैंने एक और ज़ोरदार धक्का दिया और मेरा पूरा लंड उसकी चूत में समा गया। उसकी नाखून मेरी पीठ में धँस गए और हम दोनों एक साथ सिसक उठे।
मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ उसका बदन हिल रहा था और उसके मम्मे उछल रहे थे। मैंने एक मम्मा मुँह में लिया और चूसते हुए धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी। वह बोली, और ज़ोर से, हाँ ऐसे ही, मुझे चोदो अरुण। उसकी गालियाँ सुनकर मेरा जोश दोगुना हो गया।
उसने अपनी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं और अब मेरा लंड उसकी चूत की गहराई तक जा रहा था। कमरे में सिर्फ़ हमारी साँसों की आवाज़ थी और बिस्तर के चरमराने की आवाज़। अचानक उसका बदन अकड़ गया, उसकी चूत ने मेरे लंड को कसकर जकड़ लिया और वह चीख पड़ी। वह दूसरी बार झड़ रही थी और उसकी चूत का पानी मेरे लंड पर बह रहा था।
मैं अभी झड़ा नहीं था। मैंने उसे पलटा और घुटनों के बल किया। उसकी गाँड मेरे सामने थी, गोरी और गोल। मैंने उसकी कमर पकड़ी और अपना लंड पीछे से एक झटके में उसकी चूत में डालकर तेज़ धक्के लगाने लगा।
मेरा हर धक्का उसकी चूत की गहराई में उतर रहा था। मैंने उसकी गाँड पर एक थप्पड़ मारा तो वह और ज़ोर से कराही। और मारो, मुझे ऐसे ही अच्छा लगता है, वह बोली। मैंने धक्कों की रफ़्तार और बढ़ा दी। मेरा बदन पसीने से तर था और मेरी साँसें फूल रही थीं।
अचानक मेरे पेट के नीचे गर्म लहर उठी। मैंने उसके बाल पकड़े और आखिरी ज़ोरदार धक्कों के साथ अपना पूरा पानी उसकी चूत में छोड़ दिया। मेरा लंड उसकी चूत में फड़क रहा था और मेरा वीर्य अंदर बह रहा था। वह भी उसी पल झड़ी और हम दोनों बिस्तर पर ढेर हो गए।
कुछ देर हम यूँ ही पड़े रहे, पसीने में तर, हाँफते हुए। पंखा अब भी घूम रहा था। उसने करवट लेकर मुझे देखा और बोली, पानी पिलाओगे या प्यासे ही मारोगे। मैं उठा और किचन से पानी की बोतल लाया। उसने घूँट भरा और बोली, तुम्हारे पापा को गए अभी एक ही दिन हुआ है।
मैंने पूछा, तो, और उसने बोतल रखकर मुझे फिर अपनी तरफ खींच लिया। उसका हाथ मेरी जाँघ पर था और धीरे धीरे ऊपर बढ़ रहा था। उसने कहा, तो यह कि आज की रात अभी बाकी है। मेरा लंड उसकी छुअन से फिर खड़ा होने लगा था। उसकी आँखों में वही भूख लौट आई थी।
इस बार वह मेरे ऊपर आई। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरी छाती पर बैठ गई। उसकी गीली चूत मेरे पेट पर रगड़ खा रही थी। उसने मेरा लंड पकड़ा और अपनी चूत पर टिकाकर धीरे धीरे नीचे बैठ गई। मेरा लंड उसकी चूत में धँसता चला गया और उसने सिसकारी भरी।
वह मेरे ऊपर उछलने लगी, पहले धीरे, फिर तेज़। उसके मम्मे मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे और मैंने दोनों को बारी बारी मुँह में लेकर चूसा। उसके निप्पल मेरी जीभ पर सख्त हो रहे थे। वह बोली, तुम्हारा लंड मेरी चूत में इतना अच्छा लग रहा है, मत रोको।
मैंने उसकी कमर पकड़कर नीचे से भी धक्के लगाने शुरू कर दिए। अब हर धक्का दोगुना गहरा था। वह आगे झुकी और उसके होंठ मेरे होंठों पर आ गए। हम चूमते हुए चुदाई कर रहे थे, उसकी जीभ मेरे मुँह में और मेरा लंड उसकी चूत में। कमरे की हवा भारी हो चुकी थी।
अचानक वह मेरे ऊपर से उठी और बोली, पीछे से करो, मुझे वह ज़्यादा पसंद है। वह फिर घुटनों के बल हो गई और मैंने पीछे से अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। इस बार धक्के और भी तेज़ थे। बिस्तर दीवार से टकरा रहा था। उसकी कराहें अब चीखों में बदल रही थीं।
मैंने उसकी गाँड पर थप्पड़ मारे और उसके बाल खींचे। वह बोली, हाँ, ऐसे ही चोदो मुझे, मैं तुम्हारी हूँ। मेरे धक्के बेकाबू हो गए थे। उसकी चूत ने मेरे लंड को जकड़ लिया और वह ज़ोर से झड़ी। उसकी चूत का पानी मेरी जाँघों पर बह रहा था।
उसी पल मेरा भी पानी निकलने को हुआ। मैंने आखिरी धक्कों के साथ अपना सारा वीर्य उसकी चूत में उड़ेल दिया। हम दोनों पसीने में तर बिस्तर पर गिर पड़े। उसकी चूत से हमारा मिला जुला पानी बह रहा था। कमरे में सिर्फ़ हमारी हाँफने की आवाज़ थी।
बहुत देर तक हम यूँ ही लेटे रहे। फिर उसने मेरा हाथ अपने मम्मों पर रखा और बोली, कल तुम्हारे पापा का फोन आएगा, कहना सब ठीक है। मैंने हँसकर कहा, सब तो ठीक से ज़्यादा है। उसने मेरी छाती पर सिर रखा और बोली, यह बात सिर्फ़ हम दोनों के बीच रहेगी।
मैंने पूछा, और अगर पापा जल्दी आ गए तो। उसने मेरी तरफ देखा, आँख मारी और बोली, तो हम दरवाज़ा बंद कर लेंगे। फिर उसने मुझे अपनी बाहों में खींचा और फुसफुसाया, अभी सोना मत अरुण, एक राउंड और बाकी है।
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