हिंदी सेक्स स्टोरी: जयपुर वाली दोपहर
दरवाज़े की घंटी बजी तो मैंने सोचा कोई डिलीवरी वाला होगा, पर दरवाज़ा खोला तो रोहन खड़ा था, कंधे पर बैग, चेहरे पर वही पुरानी शरारती मुस्कान। कभी सोचा नहीं था कि मेरी ज़िंदगी खुद एक हिंदी सेक्स स्टोरी बन जाएगी, लेकिन उस दोपहर जब मैंने उसे देखा तो दिल ने धक से किया। "अरे, कॉलेज की मल्लिका घर में ही है?" वो बोला और बिना बुलाए अंदर घुस आया, ठीक वैसे ही जैसे दस साल पहले करता था।
मैंने उसका बैग सोफ़े पर पटका और पूछा कि अचानक जयपुर कैसे। वो बोला कि दिल्ली जा रहा था, फ्लाइट मिस हो गई, और जयपुर रुककर पुरानी दोस्त से मिलना ही बेहतर लगा। उसकी आंखें मेरे ऊपर नीचे हुईं, और मैंने महसूस किया कि मैं सिर्फ़ एक सूती कुर्ते और पजामे में थी, अंदर ब्रा भी नहीं पहनी थी। "पति कहां है?" उसने पूछा और मैंने कहा कि मुंबई गए हैं, बिज़नेस ट्रिप, चार दिन बाद लौटेंगे।
वो सोफ़े पर पसर गया और बोला, "तो मतलब आज घर तुम्हारा है, और मैं तुम्हारा मेहमान।" मैंने कहा कि मेहमाननवाज़ी में कोई कमी नहीं रहेगी, और किचन की तरफ़ चली गई। पीछे से उसकी आवाज़ आई, "वही खाना बनाना जो कॉलेज में बनाती थी, मैगी?" मैंने पलटकर कहा, "अब मैं बीवी हूं, दाल चावल बनेगा।" दोनों हंस पड़े, पर उसकी हंसी में कुछ और था, एक पुरानी गर्मी।
खाना बनाते हुए वो किचन के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया और बोला, "तुम वैसी ही हो, बस थोड़ी और... भरी हुई।" मैंने चम्मच हिलाते हुए कहा, "रोहन, तमीज़ से बात कर।" वो हंसा, "कॉलेज में तो तुम ही कहती थीं कि तमीज़ बोरिंग है।" मेरा चेहरा लाल हो गया, क्योंकि सच था, कॉलेज में हम दोनों के बीच एक अधूरी सी कहानी थी जो कभी पूरी नहीं हुई।
लंच टेबल पर बैठे तो बातें पुराने दिनों की चलीं। कौन किसे पसंद करता था, किसने किसका नोट्स चुराया था, हॉस्टल की वो रात जब हम छत पर बैठे थे। "याद है उस रात?" उसने पूछा, और उसकी उंगली टेबल के नीचे मेरी उंगली से टकराई। मैंने उंगली नहीं हटाई। "याद है," मैंने धीरे से कहा, "तुमने कहा था कि एक दिन..." "कि एक दिन तुम्हें चूमूंगा," उसने वाक्य पूरा किया, और कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने प्लेट उठाकर किचन में रखी, हाथ कांप रहे थे। वो पीछे आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा। "अंजलि," उसने कहा, "मैं झूठ नहीं बोलूंगा, मैं आज यहां सिर्फ़ फ्लाइट मिस होने की वजह से नहीं आया।" मैं पलटी, और वो इतना करीब था कि उसकी सांस मेरे चेहरे पर लग रही थी। "तो किसलिए आए?" मैंने पूछा, आवाज़ कांप रही थी। "तुम्हें देखने," उसने कहा, "और वो अधूरी रात पूरी करने।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने खुद उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो चुम्बन धीमा था, पहले झिझक भरा, फिर भूखा। उसके हाथ मेरी कमर पर आए, मुझे खींचकर अपने से चिपका लिया। मेरा कुर्ता ऊपर सरक गया और उसकी हथेलियां मेरी नंगी कमर पर थीं। "तुम्हारे पति को पता चलेगा तो?" उसने होंठों के बीच में पूछा। "वो मुंबई में हैं," मैंने कहा, "और ये घर आज मेरा है।"
उसने मुझे उठाकर किचन के स्लैब पर बिठा दिया। मेरी टांगें उसके कमर के इर्द-गिर्द लिपट गईं। वो मेरे गले को चूम रहा था, काट रहा था, और मैं सिसक रही थी। "रोहन, प्लीज़," मैं बोली, और खुद नहीं जानती थी कि मैं क्या मांग रही थी। उसने मेरा कुर्ता ऊपर खींचा और मेरे दूध जैसे गोरे पेट को चूमा, नाभि में जीभ घुमाई। मैं कांप रही थी, पूरी तरह गीली हो चुकी थी।
उसने मेरा कुर्ता उतार फेंका। मेरे बोबे आज़ाद हो गए, और उसने एक को मुंह में ले लिया। उसकी जीभ मेरे निप्पल पर घूम रही थी, दांत हल्के से काट रहे थे। "तुम्हारे दूध कितने भरे हैं," वो बड़बड़ाया, और मैं शर्म से लाल हो गई, पर अंदर से और गर्म। मैंने उसके बाल पकड़ लिए और उसे और दबा लिया। मेरी चूत में आग लगी थी, पजामा गीला हो चुका था।
"उतारो," उसने कहा, और मैंने पजामा नीचे सरका दिया। अब मैं स्लैब पर नंगी बैठी थी, टांगें फैली हुईं। वो घुटनों पर बैठा और मेरी चूत को देखा, फिर जीभ से चाटा। मैं चीख पड़ी। उसकी जीभ मेरी चूत के दाने पर थी, अंदर बाहर हो रही थी, और मैं उसके सिर को पकड़े हुए थी। "रोहन, मत रुको," मैं हांफ रही थी। उसने दो उंगलियां मेरी चूत में डालीं और जीभ से दाना रगड़ा, मैं पागल हो रही थी।
मेरा बदन अकड़ने लगा, और फिर मैं झड़ गई, ज़ोर से, उसकी जीभ पर। मेरा पानी उसके मुंह में था और उसने सब चाट लिया। "मीठा है," वो मुस्कराया, और खड़ा होकर अपनी शर्ट उतारने लगा। उसकी छाती चौड़ी थी, पेट पर हल्के बाल। जब उसने पैंट उतारी तो उसका लंड बाहर आया, लंबा और मोटा, पूरी तरह खड़ा। मैंने उसे देखा और मेरी चूत फिर से गीली हो गई। "इतना बड़ा?" मैंने हंसकर कहा। "तुम्हारे लिए ही बड़ा हुआ है," वो बोला।
मैंने स्लैब से उतरकर घुटनों पर बैठ गई और उसका लंड मुंह में ले लिया। वो मोटा था, मेरे मुंह में पूरा नहीं आ रहा था, पर मैंने जीभ से उसके टोपे को चाटा, फिर धीरे धीरे अंदर लिया। वो सिसका, "अंजलि, फक..." मैंने उसके लंड को चूसा, हाथ से हिलाया, और उसके अंडों को सहलाया। उसका लंड मेरे मुंह में और सख्त हो रहा था, नसें फूल रही थीं। "बस," उसने कहा, "अब अंदर डालना है।"
उसने मुझे स्लैब पर लिटा दिया, मेरी टांगें अपने कंधों पर रखीं। उसका लंड मेरी चूत के मुंह पर था, रगड़ रहा था। "तैयार?" उसने पूछा। "हां," मैंने कहा, "डालो।" उसने धक्का दिया और उसका लंड मेरी चूत में घुस गया, धीरे धीरे, पूरा। मैं चीखी, दर्द और मज़े का मिला जुला एहसास। वो रुककर बोला, "ठीक हो?" मैंने कहा, "हिलाओ, ज़ोर से।"
वो हिलने लगा, पहले धीमा, फिर तेज़। स्लैब हिल रहा था, बर्तन खनक रहे थे। उसकी हर ठोकर मेरी चूत की गहराई में लग रही थी। "तुम्हारी चूत कितनी टाइट है," वो हांफ रहा था। "तुम्हारा लंड कितना मोटा है," मैं चीख रही थी। मैंने उसकी पीठ को नाखूनों से खरोंचा। वो और तेज़ हुआ, पसीना उसकी छाती से टपक रहा था। "मैं झड़ने वाला हूं," उसने कहा। "मेरे अंदर मत," मैंने कहा, "बाहर।"
उसने लंड बाहर निकाला और मेरे पेट पर झड़ गया, गर्म वीर्य की धारें। मैं हांफ रही थी, पूरी तरह नंगी, स्लैब पर लेटी हुई। वो मेरे ऊपर झुका और मेरे होंठ चूमे। "पहला सीन," वो मुस्कराया, "अभी दो बाकी हैं।" मैंने उसकी छाती पर मारा, "बेशर्म।" पर मैं खुद मुस्करा रही थी, क्योंकि अंदर से मैं और चाहती थी।
हम बाथरूम गए और साथ नहाए। गर्म पानी में वो मेरे पीछे खड़ा था, उसके हाथ मेरे बोबों पर, उसका लंड मेरी कमर पर दबा हुआ। "तुम्हें पता है," उसने कहा, "कॉलेज में मैं हर रात तुम्हारे बारे में सोचकर हिलाता था।" मैंने पलटकर कहा, "झूठे।" "सच," उसने कहा, "और आज वो सपना सच हो रहा है।" मैंने उसका लंड पकड़ लिया, वो फिर से खड़ा हो रहा था। "इतनी जल्दी?" मैंने पूछा। "तुम्हारे साथ हमेशा जल्दी," वो बोला।
नहाकर हम बेडरूम में आए। मैंने एक पतली नाइटी पहनी, उसने सिर्फ़ तौलिया लपेटा। बिस्तर पर लेटते ही वो मुझ पर टूट पड़ा। नाइटी एक झटके में उतर गई। "तुम्हारा बदन," वो बोला, "मैं इसे खा जाऊंगा।" उसने मेरे पूरे बदन को चूमा, गले से लेकर पेट तक, फिर मेरी चूत पर आया। इस बार उसने देर तक चाटा, उंगलियां अंदर, जीभ बाहर, मैं दो बार झड़ गई, चीख चीखकर।
"अब मेरी बारी," मैंने कहा, और उसे लिटाकर उसके लंड पर बैठ गई। मैंने उसका लंड पकड़कर अपनी चूत में डाला और धीरे धीरे नीचे बैठी। वो पूरा अंदर गया और मैं सिसकी। "अंजलि, तुम..." वो बोल नहीं पाया। मैं उसके ऊपर हिलने लगी, ऊपर नीचे, गोल गोल। मेरे बोबे उछल रहे थे और उसने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ लिया, निप्पल मसलते हुए।
"तेज़," वो बोला, "और तेज़।" मैं तेज़ हुई, पसीना बह रहा था, बाल चेहरे पर चिपके थे। मेरी चूत उसके लंड को निचोड़ रही थी। "मैं झड़ रही हूं," मैं चीखी, और मेरा बदन कांपा, पानी निकला, उसकी जांघों पर बहा। वो भी नहीं रुका, उसने मुझे पलटकर नीचे किया और पीछे से घुस गया। डॉगी स्टाइल में उसकी ठोकरें और गहरी लग रही थीं। उसने मेरे बाल पकड़े और खींचा, मैं चिल्लाई, "हां, ऐसे ही।"
वो झड़ने वाला था, मैंने महसूस किया, उसकी ठोकरें बेकाबू हो रही थीं। "कहां?" उसने पूछा। "मेरे मुंह में," मैंने कहा, और पलटकर घुटनों पर बैठ गई। उसने अपना लंड मेरे मुंह में डाला और झड़ गया, गर्म वीर्य मेरे गले में। मैंने सब निगल लिया और उसे देखा। "तुम बदल गई हो," वो बोला। "अच्छे के लिए?" मैंने पूछा। "बहुत अच्छे के लिए," उसने कहा।
शाम ढल रही थी, खिड़की से नारंगी रोशनी आ रही थी। हम बिस्तर पर लेटे थे, नंगे, एक दूसरे से लिपटे। "तुम्हें जाना कब है?" मैंने पूछा। "कल सुबह की फ्लाइट है," उसने कहा, "पर आज रात... आज रात मैं कहीं नहीं जा रहा।" मैंने उसके सीने पर सिर रखा और उसकी धड़कन सुनी। "रोहन," मैंने कहा, "ये गलत है।" "पता है," उसने कहा, "पर आज के लिए गलत को भूल जाते हैं।"
मैं उठी और किचन में चाय बनाने गई, नंगी ही, सिर्फ़ एक दुपट्टा लपेटकर। वो पीछे आया और दुपट्टा खींच लिया। "चाय बाद में," उसने कहा, "पहले तीसरा सीन।" मैंने हंसकर कहा, "तुम थकते नहीं?" "तुम्हें देखकर थकान भाग जाती है," वो बोला, और मुझे दीवार से लगा दिया। उसका लंड फिर से खड़ा था, मेरी जांघ पर दबा हुआ।
उसने मुझे किचन की दीवार से लगाया, मेरी एक टांग उठाकर अपने कंधे पर रखी। उसका लंड मेरी चूत में घुसा, खड़े खड़े। "रोहन," मैं सिसकी, "धीरे..." पर वो धीमा नहीं हुआ। दीवार से मेरी पीठ रगड़ रही थी, उसके हाथ मेरे बोबों को मसल रहे थे। "तुम्हारी चूत में मेरा लंड," वो बड़बड़ाया, "कितना सही लग रहा है।" मैंने उसके होंठों को काटा, खून का हल्का स्वाद आया।
फिर वो मुझे उठाकर डाइनिंग टेबल पर ले गया। टेबल पर लिटाकर उसने मेरी टांगें फैलाईं और फिर से घुस गया। इस बार वो धीमा था, गहरा, हर ठोकर में पूरा लंड बाहर निकालकर फिर अंदर। "देखो मुझे," उसने कहा, और मैंने उसकी आंखों में देखा। उस पल में सिर्फ़ हम दोनों थे, कोई पति नहीं, कोई दुनिया नहीं। "मैं तुमसे..." वो रुक गया। "मत कहो," मैंने कहा, "बस करते रहो।"
टेबल हिल रही थी, मेरा बदन पसीने से भीगा था। वो झुका और मेरे निप्पल को काटा, मैं चीखी। "झड़ो," उसने कहा, "मेरे लंड पर झड़ो।" मैंने अपनी चूत को सिकोड़ा, उसके लंड को निचोड़ा, और मैं झड़ गई, तीसरी बार उस शाम, ज़ोर से चिल्लाते हुए। उसने भी खुद को नहीं रोका, इस बार मेरे अंदर झड़ गया, गहराई में, गर्म धार। "सॉरी," उसने कहा, "रुक नहीं पाया।" "कोई बात नहीं," मैंने कहा, "सेफ हूं।"
रात हो गई थी। हमने चाय बनाई, कपड़े पहने, और बालकनी में बैठे। जयपुर की रात की हवा चल रही थी, दूर कहीं शहनाई बज रही थी। "तुम्हें पछतावा है?" उसने पूछा। मैंने चाय का घूंट लिया और कहा, "अभी नहीं। कल सोचूंगी।" वो हंसा, "तुम हमेशा ऐसी ही थीं, कल पर टालने वाली।" मैंने कहा, "और तुम हमेशा ऐसे ही थे, आज में जीने वाले।"
वो मेरे करीब आया और मेरा हाथ पकड़ लिया। "अंजलि, एक बात कहूं? ये दोपहर मैं कभी नहीं भूलूंगा।" मैंने उसका हाथ दबाया और कहा, "मैं भी नहीं।" फिर मैंने उसके कान में फुसफुसाकर कहा, "पर अगर तुमने किसी को बताया, तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगी।" वो हंसा, "प्रॉमिस, ये राज़ सिर्फ़ हम दोनों का।"
रात को वो गेस्ट रूम में सोया, मैं अपने बेडरूम में। पर आधी रात को दरवाज़ा खुला और वो अंदर आया, नंगा। "नींद नहीं आ रही," उसने कहा। मैं हंसी, "मुझे पता था तुम आओगे।" वो बिस्तर में घुसा और मुझे पीछे से पकड़ लिया, उसका लंड मेरी कमर पर। "सो जाओ," मैंने कहा, "सुबह तुम्हारी फ्लाइट है।" "एक बार और?" उसने पूछा। मैंने पलटकर उसे चूमा और कहा, "सुबह। अभी सो जाओ, बदमाश।"
रोहन के जाने के बाद मैंने घर की सफाई की, चादरें बदलीं, और सारे निशान मिटा दिए। पर एक निशान ऐसा था जो धुल नहीं सकता था, वो मेरी यादों में था। दो दिन बाद पति मुंबई से लौटे, थके हुए, और मुझे गले लगाया। "तुम्हें मिस किया," उन्होंने कहा। मैंने कहा, "मैंने भी।" पर मेरे दिमाग में रोहन का चेहरा था।
रात को पति मेरे करीब आए, प्यार से, धीरे से। उन्होंने मुझे चूमा और मैं जवाब दे रही थी, पर मेरा बदन कहीं और था। जब उन्होंने मेरे बोबों को छुआ, मैंने आंखें बंद कर लीं और सोचा कि ये हाथ रोहन के हैं। जब वो मेरे ऊपर आए, मैंने अपनी टांगें फैला दीं और सोचा कि अब जो घुसेगा वो लंबा और मोटा होगा। पर जो घुसा वो जाना पहचाना था, नरम, जल्दी झड़ने वाला।
पति दो मिनट में झड़ गए और मेरी छाती पर सिर रखकर सो गए। मैं छत को देखती रही। मैंने धीरे से अपनी उंगलियां नीचे ले जाईं, चुपके से, ताकि वो न जागें। मेरी चूत अभी भी गीली थी, उनकी वजह से नहीं, यादों की वजह से। मैंने अपने दाने को रगड़ा, धीरे धीरे, और रोहन को याद किया।
उसकी जीभ, उसका लंड, उसकी आवाज़ जो कहती थी, "मेरे लंड पर झड़ो।" मैं हांफने लगी, हाथ तेज़ हुआ। पति खर्राटे ले रहे थे, बेखबर। मैं झड़ गई, चुपचाप, तकिए में मुंह दबाकर। मेरा पानी उंगलियों पर था। मैंने उंगलियां चाट लीं और सोचा, ये राज़ मैं किसी को नहीं बताऊंगी, न पति को, न रोहन को। ये सिर्फ़ मेरा है।
सुबह पति ने कहा, "तुम कल रात बहुत खूबसूरत लग रही थीं।" मैंने मुस्कराकर कहा, "थैंक यू।" उन्होंने मेरा माथा चूमा और ऑफिस चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही मैंने फोन उठाया और रोहन का नंबर डायल करने लगी, फिर रुक गई। नहीं, मैंने सोचा, कुछ कहानियां एक ही बार जी जाती हैं। मैंने फोन रख दिया।
उस दिन दोपहर को मैं बालकनी में बैठी चाय पी रही थी। फोन बजा, अनजान नंबर। मैंने उठाया। "अंजलि," वो आवाज़ थी, रोहन की। मेरा दिल धड़कने लगा। "तुमने नंबर कैसे...?" "तुम्हारे फोन से ले लिया था," वो हंसा, "चोरी चोरी।" मैंने कहा, "तुम बहुत बड़े चोर हो।" "सिर्फ़ तुम्हारे लिए," उसने कहा। फिर धीरे से बोला, "कल रात तुम्हारे बारे में सोचकर हिलाया।"
मेरा चेहरा लाल हो गया, पर मैंने फोन नहीं काटा। "अच्छा?" मैंने कहा। "हां," उसने कहा, "और सोच रहा था कि अगली बार जब आऊंगा, तो पूरी रात..." "रोहन," मैंने उसे टोका, पर आवाज़ में डांट नहीं थी। "बोलो न, क्या करोगे?" मैंने पूछा, और खुद हैरान थी कि मैं ये कह रही थी। उसने धीरे धीरे बताया, हर डिटेल, और मैं बालकनी में बैठी गीली होती रही।
"बस," मैंने कहा, "अब रखो, कोई आ जाएगा।" "एक आखिरी बात," उसने कहा, "वो दोपहर... क्या तुम दोहराना चाहोगी?" मैं चुप रही, फिर बोली, "फोन रखो, बदमाश।" उसने हंसकर फोन रख दिया। मैं चाय का कप पकड़े बैठी रही, दिल धड़क रहा था। मैंने तय किया, अगली बार मैं खुद उसे अंदर खींचूंगी।
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