गर्मी की दोपहर भाभी के साथ अकेला घर जब साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था और जो हुआ दोपहर की गर्मी से भी ज्यादा गर्म था
जून की दोपहर थी। घर में पंखा जोर-जोर से चल रहा था लेकिन गर्मी फिर भी सता रही थी। पिताजी ऑफिस गए हुए थे और माताजी गाँव चली गई थीं। घर में सिर्फ मैं और भाभी थे।
भाभी रसोई में खड़ी सब्जी काट रही थीं। हल्की सी सूती साड़ी पहनी हुई थी। पल्लू बार-बार सरक कर उनके गले और स्तनों को आधा-अधूरा दिखा रहा था। मैं पानी का गिलास लेने के बहाने रसोई में गया।
भाभी ने मुड़कर देखा और मुस्कुरा दीं।
“इतनी गर्मी में क्या घूम रहे हो… जाकर आराम करो।”
मैंने गिलास लिया लेकिन उनकी तरफ से निगाहें नहीं हटाईं। भाभी ने ध्यान दिया। कुछ पल खामोशी रही। फिर उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा —
“इतनी देर से देख रहे हो… कुछ कहना है क्या?”
मैंने गिलास रखा और उनके करीब चला गया। उन्होंने पीछे हटने की बजाय मेरी आँखों में देखा। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। भाभी ने हल्का सा विरोध किया लेकिन जब मैंने उन्हें दीवार से सटाया तो उन्होंने मेरा विरोध नहीं किया।
मैंने उनका चेहरा अपने पास खींचा और होंठों पर होंठ रख दिए। भाभी ने पहले हल्के से चूमा, फिर जोर से जवाब देने लगीं। उनके शरीर से पसीने की हल्की सी खुशबू आ रही थी।
मैंने उनकी साड़ी का पल्लू हटाया और ब्लाउज़ के हुक खोल दिए। बड़े और भारी स्तन बाहर आ गए। निप्पल पसीने से चमक रहे थे। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। भाभी की कराह निकल गई।
“आह… दरवाज़ा बंद है ना…?”
मैंने सिर हिलाया और दूसरे निप्पल को भी चूसने लगा। दोनों स्तनों को मसलना और काटना शुरू कर दिया। भाभी के हाथ मेरे बालों में थे।
फिर मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर किए। पैंटी बीच से पूरी गीली थी। मैंने पैंटी साइड में सरकाई और दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। भाभी की टांगें कांपने लगीं।
मैंने उन्हें रसोई की स्लैब पर बैठा दिया। खुद घुटनों के बल बैठकर उनकी चूत चाटने लगा। क्लिट को चूसा, उंगलियाँ तेजी से हिलाईं। भाभी ने मेरा सिर और अंदर दबा दिया। उनकी आवाज़ें दबाने के लिए उन्होंने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
थोड़ी देर बाद भाभी ने मुझे ऊपर खींचा और मेरा पेंट नीचे किया। लंड हाथ में लेते ही उनकी आँखें थोड़ी फटी रह गईं। उन्होंने उसे मुँह में ले लिया और गले तक उतारने की कोशिश करने लगीं। मैंने उनके बाल पकड़कर हल्के धक्के मारने शुरू कर दिए।
फिर मैंने उन्हें स्लैब से उतारा और रसोई की दीवार से सटा दिया। एक पैर ऊपर उठाया और लंड अंदर डालना शुरू किया। जब पूरा अंदर गया तो दोनों की साँसें फूल गईं।
“उफ़्फ़… बहुत जोर से मत करना… आवाज़ निकल जाएगी…”
मैंने धीरे-धीरे धक्के शुरू किए, फिर रफ्तार बढ़ा दी। हर धक्के पर उनके स्तन उछल रहे थे। मैंने दोनों स्तन पकड़कर निप्पल मरोड़ने शुरू कर दिए। भाभी की आँखें बंद थीं और मुँह से दबी हुई कराहें निकल रही थीं।
थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें पलट दिया। हाथ स्लैब पर रखे और पीछे से पेलने लगा। एक हाथ से उनके बाल पकड़े हुए थे। भाभी अब खुद पीछे को धक्का दे रही थीं।
“और अंदर… पूरी तरह चोदो…”
मैंने और जोर लगा दिया। रसोई में सिर्फ शरीरों के टकराने और दबी आवाज़ों की आवाज़ आ रही थी।
आखिर में जब मैं करीब पहुँचा तो पूछा —
“कहाँ छोड़ूं भाभी?”
उन्होंने हांफते हुए कहा —
“अंदर… आज अंदर छोड़ दो…”
मैंने आखिरी जोरदार धक्के मारे और पूरा गरम वीर्य उनकी चूत के अंदर छोड़ दिया। भाभी का शरीर कांपने लगा। उनकी जाँघें काँप रही थीं।
दोनों पसीने से लथपथ खड़े थे। भाभी ने साड़ी ठीक करते हुए धीरे से कहा —
“शाम को माताजी आने वाली हैं… तब तक अपने कमरे में रहना। और हाँ… कल दोपहर फिर से भूख लग सकती है।”
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