ससुर बहू सेक्स कहानी: पुरानी चिट्ठी
मीरा ने जब स्टोर रूम के पुराने ट्रंक से वो पीली पड़ी चिट्ठियों की गठरी निकाली, तो उसे क्या पता था कि ये एक ससुर बहू सेक्स कहानी का पहला पन्ना है।
दोपहर के बारह बजे थे। इटावा का वो पुराना मकान, आँगन में नीम का पेड़, और स्टोर रूम में सालों से बंद पड़ा लोहे का ट्रंक। मीरा सफाई कर रही थी। उसके पति को दुबई गए आठ महीने हो चुके थे। ससुर रामलाल नीचे अपने कमरे में अखबार पढ़ रहे थे।
गठरी लाल धागे से बँधी थी। ऊपर एक पर्ची थी, "मेरी जान के नाम"। मीरा की उँगलियाँ काँप गईं। उसने एक चिट्ठी खोली।
"मेरी जान, कल रात तुम्हें सपने में देखा। तुम उसी लाल साड़ी में थीं जो मैंने तुम्हें पहली दीवाली पर दी थी। मेरा दिल चाहा कि तुम्हें अपनी बाहों में भर लूँ और कभी न छोड़ूँ..."
मीरा ने दूसरी चिट्ठी खोली। तीसरी। हर चिट्ठी में आग थी। वो आग जो उसने अपने पति की आँखों में कभी नहीं देखी थी। रामलाल, जो अब अठावन साल के शांत, गंभीर रिटायर्ड टीचर थे, कभी ऐसे दीवाने थे?
उसने गठरी वापस बाँधी और अपने कमरे में छिपा दी। पर चिट्ठियों के शब्द उसके दिमाग में घूमते रहे। "तुम्हारे होंठों का स्वाद", "तुम्हारी साँसों की गर्मी"। मीरा ने अपनी साड़ी के पल्लू को मुट्ठी में भींच लिया।
दोपहर को उसने रामलाल को खाना परोसा। दाल, चावल, आलू की सब्ज़ी। रामलाल चुपचाप खा रहे थे, जैसा रोज़ खाते थे। पर आज मीरा उन्हें देख रही थी। उनके हाथ, जो कभी इतने जोशीले खत लिखते थे। उनकी आँखें, जिनमें अब भी कोई चिंगारी बाकी थी क्या?
"बाबूजी," मीरा ने कहा, "आपने कभी किसी से प्रेम किया था?"
रामलाल ने चौंककर देखा। "ये कैसा सवाल है, बहू?"
"बस ऐसे ही।" मीरा मुस्कुराई। "आपकी आँखें कहती हैं कि कहानी लंबी है।"
रामलाल कुछ नहीं बोले। खाना खत्म करके अपने कमरे में चले गए। पर मीरा ने देखा, उनके कान लाल हो गए थे।
शाम के छह बजे मीरा चाय लेकर बरामदे में आई। रामलाल आरामकुर्सी पर बैठे थे। मीरा ने चाय का कप उनके हाथ में दिया और पास ही मूढ़े पर बैठ गई।
"बाबूजी, एक बात पूछूँ? नाराज़ तो नहीं होंगे?"
"पूछो।"
मीरा ने अपनी साड़ी के आँचल से वो एक चिट्ठी निकाली। "ये मैंने स्टोर रूम में पाई। आपकी लिखी हुई है।"
रामलाल का चेहरा सफेद पड़ गया। "वो... वो पुरानी बातें हैं। दे दो मुझे।"
"पहले एक सुन तो लीजिए।" मीरा ने चिट्ठी खोली और पढ़ने लगी। "'मेरी जान, आज तुम्हें बाज़ार में देखा। नीली साड़ी में। मेरा मन किया कि सबके सामने तुम्हें गले लगा लूँ। रात को तुम्हारी याद में मेरा बुरा हाल था।'"
"बस करो, बहू!" रामलाल ने कहा, पर उनकी आवाज़ में गुस्से से ज़्यादा घबराहट थी।
"क्यों, बाबूजी? शर्म आ रही है?" मीरा और करीब सरक आई। "मुझे तो जलन हो रही है। इतना प्यार करने वाला मर्द... और मैं... मेरे पति को गए आठ महीने हो गए। उन्होंने तो कभी मुझे ऐसा खत नहीं लिखा।"
रामलाल ने उसकी तरफ देखा। मीरा की आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान। उन्तीस साल की बहू, अकेली, प्यासी।
"बहू, ये ठीक नहीं," रामलाल ने धीरे से कहा।
"क्या ठीक नहीं, बाबूजी?" मीरा ने उनका हाथ पकड़ लिया। "आपने ही तो लिखा था, 'प्यार पाप नहीं होता'। ये आपकी चिट्ठी के शब्द हैं।"
रामलाल का हाथ काँप रहा था। मीरा ने उसे अपने गाल पर रख लिया। "छूकर देखिए। मैं भी इंसान हूँ।"
रामलाल ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर मीरा ने पकड़ मज़बूत कर दी। फिर उसने कुछ ऐसा किया जिसकी रामलाल ने कल्पना भी नहीं की थी। उसने उनके हाथ की उँगलियों को अपने होंठों से छुआ।
रामलाल की साँसें तेज़ हो गईं। "मीरा..."
"बोलिए मत," मीरा ने कहा। "बस महसूस कीजिए।"
मीरा ने उनका हाथ अपनी गर्दन पर रखा। गर्दन की नरम त्वचा पर बूढ़ी उँगलियों का स्पर्श उसे गुदगुदा गया। फिर उसने वो हाथ धीरे धीरे नीचे सरकाया, कंधे से होता हुआ, ब्लाउज़ के ऊपर से उसके बूब्स पर। रामलाल ने आँखें बंद कर लीं।
"बाबूजी, आपके हाथ काँप रहे हैं," मीरा ने फुसफुसाकर कहा। "डर लग रहा है या कुछ और?"
"पता नहीं," रामलाल ने कहा। "तीस साल से किसी औरत को इस तरह नहीं छुआ।"
"तो आज छू लीजिए," मीरा ने कहा। "मैं आपकी बहू हूँ, पर आज रात के लिए आपकी 'जान' बन जाती हूँ। वही जान, जिसके नाम आप चिट्ठियाँ लिखते थे।"
ये सुनकर रामलाल की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने मीरा के गाल को थामा। "तुम्हारी सास मरने के बाद मैंने सोचा था, मेरी ज़िंदगी की किताब बंद हो गई। पर तुमने आज वो किताब फिर खोल दी।"
"तो पढ़िए उसे," मीरा ने कहा और उनके और करीब आ गई। "पहले पन्ने से।"
"इतने सालों में किसी ने मुझे ऐसे नहीं छुआ," मीरा फुसफुसाई। "आपकी चिट्ठियों वाला जोश... क्या वो मर गया, बाबूजी?"
रामलाल ने आँखें खोलीं। उनमें वो चिंगारी थी, जो मीरा ढूँढ रही थी। उन्होंने मीरा को अपनी तरफ खींचा और उसके होंठों पर होंठ रख दिए।
वो चुम्बन लंबा था, गहरा था। रामलाल के होंठ काँप रहे थे, पर उनमें जुनून था। मीरा ने उनकी गर्दन में बाहें डाल दीं।
"अंदर चलो," रामलाल ने कहा। "यहाँ कोई देख लेगा।"
रामलाल का कमरा नीचे था, बड़ा सा, पुराने ज़माने का पलंग। दरवाज़ा बंद हुआ, कुंडी लगी। मीरा पलंग पर बैठ गई।
रामलाल उसके सामने खड़े थे। "तुम्हें डर नहीं लगता?"
"लगता था," मीरा ने कहा। "पर आपकी चिट्ठियों ने डर निकाल दिया।"
मीरा ने अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया। फिर एक एक करके साड़ी खोली। रामलाल उसे देख रहे थे। ब्लाउज़, पेटीकोट। फिर ब्लाउज़ भी उतर गया।
रामलाल ने आगे बढ़कर उसके बूब्स को हाथों में लिया। "तुम्हारी सास भी ऐसी ही थीं," उन्होंने कहा। "भरी हुई, गोरी।"
"तो उन्हें जैसे प्यार करते थे, वैसे मुझे करो," मीरा ने कहा।
रामलाल ने एक निप्पल मुँह में लिया। चूसा। मीरा ने उनके सफेद बालों में उँगलियाँ फँसा लीं। "हाँ, बाबूजी। ऐसे ही।"
रामलाल का दूसरा हाथ नीचे गया। पेटीकोट का नाड़ा खोला। मीरा की चूत गीली थी, तैयार थी। रामलाल ने उँगली से छुआ तो मीरा सिसक उठी।
"इतनी गीली," रामलाल ने कहा।
"आठ महीने की प्यास है," मीरा ने कहा।
रामलाल ने अपना कुर्ता उतारा, पायजामा उतारा। उनका लंड तना हुआ था, उम्र के हिसाब से हैरान करने वाला। मीरा ने उसे देखा और मुस्कुराई।
"चिट्ठियों वाला जोश अभी बाकी है," उसने कहा।
रामलाल ने उसे पलंग पर लिटाया। पहले उन्होंने उसकी चूत को चूमा, चाटा। मीरा तड़पने लगी। "बाबूजी, अब और मत तड़पाओ।"
रामलाल ऊपर आए और अपना लंड उसकी चूत पर रखा। धीरे से अंदर डाला। मीरा ने लंबी साँस ली। लंड मोटा था, गर्म था।
"पूरा डालो," मीरा ने कहा।
रामलाल ने पूरा लंड अंदर कर दिया और हिलने लगे। धीरे धीरे, हर धक्के में प्यार। मीरा ने अपनी टाँगें उनकी कमर के गिर्द लपेट लीं।
"आप तो जवानों से अच्छा करते हो," मीरा ने हाँफते हुए कहा।
"तुम्हारी सास को भी यही कहती थीं," रामलाल ने मुस्कुराकर कहा।
रफ़्तार बढ़ी। पलंग चरमराने लगा। मीरा की आवाज़ें बढ़ने लगीं। उसने रामलाल की पीठ को नाखूनों से खुरच दिया।
"रुको," रामलाल ने अचानक कहा। उन्होंने लंड बाहर निकाला।
"क्या हुआ?" मीरा ने हाँफते हुए पूछा।
"तुम्हें वैसे प्यार करूँगा, जैसे चिट्ठी में लिखा था।" रामलाल ने उसे उठाया और खिड़की के पास ले गए। चाँदनी अंदर आ रही थी। उन्होंने मीरा को खिड़की के सहारे खड़ा किया और पीछे से लंड डाला।
मीरा ने खिड़की की सलाखें पकड़ लीं। चाँदनी में उसका नंगा बदन चमक रहा था। रामलाल ने उसके कंधे पर चूमा और धक्के मारने लगे।
"चिट्ठी में तुमने लिखा था, 'चाँदनी रात में तुम्हें बाहों में भर लूँ'," मीरा ने कहा। "आज वो रात है, बाबूजी।"
"मैं झड़ रही हूँ, बाबूजी," मीरा चीखी।
उसका बदन अकड़ गया। चूत ने लंड को भींच लिया। रामलाल ने कुछ और धक्के मारे और फिर उसके अंदर झड़ गए। गर्म धार।
दोनों पसीने में भीगे थे। रामलाल मीरा के ऊपर ही लेट गए। मीरा ने उनके माथे पर चूमा।
"कैसा लगा?" मीरा ने पूछा।
"जैसे तीस साल पीछे चला गया," रामलाल ने कहा।
"तो रोज़ जाया करो," मीरा ने शरारत से कहा।
रामलाल हँसे। इतने सालों बाद उनकी हँसी में जान थी।
रात को खाना खाने के बाद रामलाल अपने कमरे में चले गए। मीरा बर्तन माँजकर आई और दबे पाँव उनके कमरे में घुस गई।
"सोए नहीं?" रामलाल ने पूछा।
"नींद कहाँ आएगी," मीरा ने कहा और पलंग पर चढ़ गई।
इस बार मीरा ऊपर आई। उसने रामलाल के लंड को अपनी चूत में लिया और खुद हिलने लगी। उसके बूब्स उछल रहे थे। रामलाल ने उन्हें पकड़ लिया।
"तुम तो पूरी औरत हो," रामलाल ने कहा।
"तुम्हारी बनाई हुई," मीरा ने कहा।
मीरा की रफ़्तार बढ़ती गई। वो अपने कूल्हे घुमा घुमाकर लंड को अंदर ले रही थी। रामलाल ने नीचे से धक्के मारने शुरू कर दिए।
"हाँ, बाबूजी, ऐसे ही," मीरा बोली। "मुझे आपकी चिट्ठियों वाली औरत बनाओ।"
कुछ ही देर में दोनों एक साथ झड़े। मीरा रामलाल के सीने पर गिर पड़ी। दोनों की धड़कनें एक जैसी थीं।
"ये हमारा राज़ रहेगा," रामलाल ने कहा।
"चिट्ठियों की तरह," मीरा ने कहा। "गठरी बाँधकर रख देंगे।"
सुबह के पाँच बजे थे। मीरा रसोई में चाय बना रही थी। रामलाल पीछे से आए और उसे कमर से पकड़ लिया।
"बाबूजी, कामवाली आती होगी," मीरा ने कहा, पर वो हटी नहीं।
रामलाल ने उसकी साड़ी ऊपर उठाई और पीछे से अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। रसोई के चबूतरे के सहारे मीरा झुक गई।
तेज़, गहरा, चुपचाप। कुछ ही मिनटों में दोनों झड़ गए। मीरा ने जल्दी से साड़ी ठीक की।
तभी बाहर कामवाली की आवाज़ आई। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए।
चाय पीते हुए मीरा ने रामलाल की तरफ देखा और धीरे से कहा, "चिट्ठियाँ तो पुरानी थीं, बाबूजी। पर लिखने वाला आज भी जवान है।"
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