चुदाई कहानी: रात की ड्यूटी और एंबुलेंस ड्राइवर
मेरी इस चुदाई कहानी की शुरुआत मेरठ के एक छोटे से नर्सिंग होम में उस रात दो बजे हुई थी, जब एंबुलेंस ड्राइवर कुणाल चाय के दो कुल्हड़ लेकर ड्यूटी रूम का दरवाजा खोलकर अंदर घुस आया था। बाहर कॉरिडोर में गहरा सन्नाटा था, और उस वक्त पूरी बिल्डिंग में मेरे और उसके सिवा कोई जगा हुआ नहीं था।
"दीदी, आज रात आपकी ड्यूटी अकेली है क्या?" उसने एक कुल्हड़ मेरी तरफ बढ़ाते हुए पूछा, और उसकी आंखों में वही शरारत थी जो मैं पिछले दो महीनों से रोज देख रही थी। उसकी नजर मेरे चेहरे से फिसलकर मेरे सीने पर टिक गई थी, और उसने छिपाने की कोशिश भी नहीं की।
"अकेली ही हूं। वार्ड बॉय छुट्टी पर है, और डॉक्टर साहब राउंड लगाकर घर चले गए।" मैंने कुल्हड़ थाम लिया। उसकी उंगलियां जानबूझकर मेरी उंगलियों से रगड़ खा गईं, और मेरी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। "तुम्हें नींद नहीं आती क्या, कुणाल? रोज दो बजे चाय लेकर आ जाते हो।"
"नींद तो आपको देखकर उड़ जाती है, दीदी।" वो बेधड़क बोला, और मेरे सामने वाली कुर्सी खींचकर इतने पास बैठ गया कि हमारे घुटने टकरा गए। "सच बताऊं? ये चाय तो बहाना है।"
मैं उनतीस साल की नर्स हूं, नैना। शादी को छह साल हो गए हैं, पति दिल्ली में नौकरी करते हैं और हफ्ते में एक बार आते हैं। कुणाल इकतीस का है, नर्सिंग होम की एंबुलेंस चलाता है, कुंवारा है, और पिछले दो महीनों से मेरी नाइट ड्यूटी वाली हर रात को अपनी मौजूदगी से गर्म करता आ रहा था। पहले वो सिर्फ देखता था। फिर बातें बढ़ीं। फिर छूना शुरू हुआ, कंधे पर हाथ, कमर पर हल्का सा स्पर्श, और हर बार मेरी चुप्पी ने उसे और हिम्मत दी थी।
"बहाना किस चीज का?" मैंने पूछा, हालांकि जवाब मैं जानती थी। मेरे अंदर कुछ पिघल रहा था, कुछ ऐसा जो महीनों से बर्फ की तरह जमा पड़ा था।
उसने जवाब नहीं दिया। उसने अपना कुल्हड़ मेज पर रखा, मेरी कुर्सी को अपनी तरफ खींचा, और मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसके हाथ खुरदरे थे, स्टीयरिंग पकड़ने वाले हाथ, और मेरी नरम हथेलियों पर रगड़ खाते हुए उनमें एक अजीब सी गर्मी थी।
"नैना।" उसने पहली बार मेरा नाम लिया, दीदी नहीं। "आज रोक मत।"
मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा कॉरिडोर तक आवाज जाएगी। मैंने दरवाजे की तरफ देखा। वो समझ गया, उठा, दरवाजे के पास गया, और अंदर से कुंडी लगा दी। चटक की आवाज उस सन्नाटे में गोली जैसी गूंजी।
वो लौटा तो मैं खड़ी हो चुकी थी। उसने मुझे दीवार से सटा दिया, और उसके होंठ मेरे होंठों पर आ गिरे। ये कोई हल्का चुम्बन नहीं था। ये दो महीने की दबी हुई आग थी। उसकी जीभ मेरे मुंह में घुसी, और मैंने उसे चूस लिया। मेरे हाथ उसकी कमीज के अंदर उसकी पीठ पर फिरने लगे, और उसकी एक हथेली मेरी सलवार के ऊपर मेरी कमर को भींच रही थी।
"तुम्हारी बीवी नहीं है न?" मैंने हांफते हुए पूछा, उसके होंठों से अलग होकर।
"नहीं है। और आज के बाद शायद जरूरत भी न पड़े।" वो मुस्कुराया, और मेरे दुपट्टे को खींचकर एक तरफ फेंक दिया। मेरी कुर्ती के ऊपर से ही मेरे स्तन उभर आए थे, और उसकी नजर वहीं गड़ गई। "इन्हें कितने दिनों से देख रहा हूं, नैना। आज हाथ लगाने दे।"
मैंने उसकी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिए। एक, दो, तीन। उसकी छाती चौड़ी थी, हल्के बालों से ढकी। मैंने अपनी हथेली उसकी छाती पर रखी और उसके दिल की धड़कन महसूस की, मेरी तरह ही बेकाबू। उसने मेरी कुर्ती को नीचे से पकड़ा और एक झटके में ऊपर खींच दी। ठंडी हवा मेरे पेट से टकराई, और मैं सिर्फ ब्रा में उसके सामने खड़ी थी।
उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया, खुद मेरे सामने घुटनों पर बैठ गया, और मेरी ब्रा का हुक खोल दिया। मेरे भारी स्तन आजाद होकर बाहर झूल गए। उसने एक को मुंह में भर लिया और दूसरे को हाथ से मसलने लगा। उसकी जीभ मेरे निप्पल पर घूम रही थी, कभी चूसती, कभी हल्के से काटती। मेरे मुंह से सिसकारी निकल गई। "आह, कुणाल।"
"चिल्लाना मत, दीदी। दीवारें पतली हैं।" वो हंसा, और मेरी सलवार का नाड़ा खींच दिया। सलवार मेरे पैरों में ढेर हो गई। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी, और उसकी आंखों में भूख साफ दिख रही थी। उसने पैंटी को एक तरफ सरकाया और अपनी दो उंगलियां मेरी चूत में धकेल दीं।
"उफ्फ।" मैं कुर्सी की बाहों को भींचकर रह गई। मेरी चूत पूरी तरह गीली थी, और उसकी उंगलियां अंदर बाहर हो रही थीं। उसने अपना अंगूठा मेरे दाने पर रखा और गोल गोल घुमाने लगा। मेरा शरीर कांपने लगा। "कुणाल, प्लीज, और मत तड़पा।"
"तड़पाना तो अभी शुरू किया है।" उसने उंगलियां निकालीं, उन्हें अपने मुंह में डालकर चाटा, और फिर खड़ा हो गया। उसने अपनी पैंट खोली और नीचे सरका दी। उसका लंड बाहर निकल आया, लंबा, मोटा, और पूरी तरह तना हुआ। मेरी आंखें फैल गईं। "डर गई क्या?"
"डरी नहीं, भूखी हूं।" मैंने कहा, और उसे खींचकर अपने मुंह के पास कर लिया। मैंने उसके लंड के टोपे को चाटा, फिर पूरा मुंह में भर लिया। वो गर्म था, और उसकी नसें मेरी जीभ पर धड़क रही थीं। मैंने उसे अंदर बाहर करना शुरू किया, और मेरे हाथ उसके अंडकोषों को सहला रहे थे।
कुणाल के मुंह से गहरी सांसें निकल रही थीं। उसने मेरे बाल पकड़ लिए और मेरे मुंह में धक्के लगाने लगा। "नैना, बहुत बढ़िया। ऐसे ही।" मेरा गला उसके लंड से भर गया था, और मेरी आंखों में पानी आ गया, लेकिन मैंने रुकने का नाम नहीं लिया। तभी कॉरिडोर में किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
हम दोनों जम गए। कदम पास आए, फिर दूर चले गए। शायद चौकीदार था। कुणाल ने राहत की सांस ली और मुझे खड़ा किया। उसने मेज पर पड़ी चादरें एक तरफ हटाईं, मुझे मेज पर बिठाया, और मेरी टांगें फैला दीं। "अब बारी मेरी।"
उसने मेरी चूत को चाटना शुरू किया। उसकी जीभ मेरे दाने पर, फिर अंदर, फिर बाहर। मैं मेज पर लेट गई, मेरी टांगें उसके कंधों पर थीं। उसने मेरी चूत में अपनी जीभ घुसेड़ दी और अंदर घुमाने लगा। मेरे हाथ मेज के किनारों को भींच रहे थे। "कुणाल, मैं। मैं झड़ने वाली हूं।"
"झड़ जा, मेरी जान।" उसने कहा, और उसकी उंगलियां फिर अंदर चली गईं, इस बार तेजी से। मेरा शरीर अकड़ गया, फिर एक जोरदार लहर मेरे पूरे बदन में दौड़ गई। मैं झड़ गई, और मेरी चूत का पानी उसकी उंगलियों और ठोड़ी पर था। उसने उसे चाटकर साफ किया और मुस्कुराया।
लेकिन रात अभी बाकी थी। उसने मुझे मेज से उतारा, मेरी पैंटी पूरी तरह उतार फेंकी, और मुझे दीवार की तरफ घुमाया। "हाथ दीवार पर रख।" मैंने वैसा ही किया। उसने पीछे से मेरी चूत में अपना लंड रगड़ा, और फिर एक झटके में अंदर धकेल दिया।
"आआह।" मेरी चीख निकलते निकलते रह गई। उसका लंड मेरी चूत को चीरता हुआ अंदर तक गया था। उसने मेरे कूल्हों को पकड़ा और धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ मेरी चूत में आग सी लग रही थी। "और जोर से, कुणाल। और जोर से।"
उसने मेरी एक टांग उठाकर अपने हाथ में ले ली, जिससे उसका लंड और गहराई तक जाने लगा। मैं दीवार से सटी हांफ रही थी, और मेरे स्तन हर धक्के के साथ हिल रहे थे। उसने आगे झुककर मेरे स्तन को मुंह में लिया, और नीचे धक्के जारी रखे। मैं दूसरी बार झड़ने के कगार पर थी।
"मैं आ रहा हूं, नैना।" वो हांफा।
"अंदर ही छोड़ दो। आज सेफ दिन है।" मैंने कहा, और उसने आखिरी जोरदार धक्का लगाया। उसका गर्म वीर्य मेरी चूत में भर गया, और हम दोनों एक दूसरे से लिपटकर हांफते रहे।
हमने जल्दी जल्दी कपड़े पहने। तभी मेरे फोन पर वार्ड से बजर बजा, एक मरीज को दवा देनी थी। मैं बाहर निकली, काम निपटाया, और आधे घंटे बाद लौटी तो कुणाल लिनन स्टोर के दरवाजे पर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था। "एक राउंड और? स्टोर में कोई नहीं आता।"
स्टोर में चादरों और कंबलों की अलमारियों के बीच उसने मुझे एक गद्दे पर लिटा दिया। इस बार मैं ऊपर थी। मैं उसके लंड पर बैठी और धीरे धीरे ऊपर नीचे होने लगी। मेरे स्तन उसके चेहरे के सामने झूल रहे थे, और वो बारी बारी से दोनों को चूस रहा था। मेरे हाथ उसके सीने पर थे, और मैं अपनी रफ्तार बढ़ा रही थी।
"तुम्हारी चूत बहुत टाइट है, नैना।" वो बड़बड़ाया।
"और तुम्हारा लंड बहुत मोटा है।" मैंने जवाब दिया, और तेजी से उछलने लगी। चादरों की सरसराहट और हमारी सांसों के सिवा स्टोर में कोई आवाज नहीं थी। मैं तीसरी बार झड़ी, और उसके ठीक बाद वो भी झड़ गया, इस बार मेरे पेट पर। उसने अपनी कमीज से मुझे पोंछा, और हम दोनों हंस पड़े।
सुबह के चार बज रहे थे। कुणाल ने कहा, "चलो, एंबुलेंस में बैठकर थोड़ी हवा खाते हैं। कोई नहीं देखेगा।" हम पिछले हिस्से से निकलकर पार्किंग में खड़ी एंबुलेंस में घुस गए। उसने पीछे का दरवाजा अंदर से बंद किया और स्ट्रेचर पर चादर बिछा दी।
एंबुलेंस की हल्की नीली बत्ती की रोशनी में हमने तीसरा राउंड शुरू किया। इस बार उसने मुझे स्ट्रेचर पर घोड़ी बनाया। मैं घुटनों और हाथों के बल थी, और वो पीछे से मेरी चूत में धक्के लगा रहा था। हर धक्के पर स्ट्रेचर हल्का सा हिलता, और एंबुलेंस की बॉडी में गूंज होती। उसने मेरे बाल पकड़े और मुझे अपनी तरफ खींचा, जिससे मेरी पीठ धनुष की तरह मुड़ गई।
"कुणाल, धीरे। कोई सुन लेगा।" मैंने फुसफुसाया, लेकिन मेरे शरीर ने साथ नहीं दिया। मेरी चूत उसके लंड को भींच रही थी।
"सुनने दो।" उसने मेरे कान में कहा, और मेरे दाने को उंगलियों से रगड़ने लगा। मैं चीखते चीखते रह गई, और एक और जबरदस्त झड़न ने मुझे हिला दिया। वो भी उसी वक्त झड़ा, और हम स्ट्रेचर पर ढेर हो गए।
पौने पांच बजे हम एंबुलेंस से निकले। आसमान में हल्की लाली थी। कुणाल ने मुझे नर्सिंग होम के गेट तक छोड़ा। जाते जाते उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोला, "कल रात भी आपकी ही ड्यूटी है न, दीदी?"
मैंने सिर हिलाया। "तो कल चाय तीन कुल्हड़ लाना। एक मेरे लिए, एक तुम्हारे लिए।" मैंने उसकी आंखों में देखकर कहा, "और तीसरा उस रात के लिए, जो अभी बाकी है।"
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