hindi naukrani sex kahani: कमला और अर्जुन की गर्म दोपहर
"अर्जुन बाबा, सच सच बताओ, दोपहर को घर में अकेले क्या करते हो?" कमला किचन के दरवाजे पर खड़ी थी, हाथ में बर्तन पोंछने का कपड़ा, चेहरे पर वही शरारती मुस्कान जो मैं पिछले आठ दिनों से देख रहा था। मैंने चाय का कप नीचे रख दिया। उसके अंदाज़ में कुछ ऐसा था कि मेरे गले में गाँठ पड़ गई, जैसे कोई hindi naukrani sex kahani का किरदार अचानक मेरे सामने खड़ा हो गया हो।
कमला छत्तीस की थी। छह साल से इस साउथ दिल्ली की कोठी में काम करती थी, भैया और भाभी के पूरे भरोसे वाली नौकरानी। साँवला रंग, भरा हुआ बदन, और आँखों में एक ऐसी बेखौफी जो मैंने किसी औरत में नहीं देखी थी। मैं कनाडा से दो महीने के लिए आया था, और हफ़्ते के दिनों में दोपहर को घर में सिर्फ हम दोनों होते थे।
पहले हफ़्ते में उसने मुझे कई बार अजीब नज़रों से देखा था। कभी बर्तन धोते हुए कमर मटकाकर, कभी पोछा लगाते हुए झुककर। मैं छब्बीस का था, पर उसके सामने खुद को बच्चा महसूस करता था। उस दिन जब उसने वह सवाल पूछा, तो मेरे हाथ काँपने लगे।
"क्यों, कुछ खास नहीं, लैपटॉप पर काम..." मेरी आवाज़ बीच में अटक गई। वह हँसी। उसकी हँसी में कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ एक खुला इशारा। "लैपटॉप से जो होता है, वो तो मैं भी जानती हूँ बाबा।" उसने कपड़ा सिंक पर फेंका और मेरी तरफ एक कदम बढ़ाया।
"डरते हो क्या मुझसे?" उसने इतने करीब आकर पूछा कि उसके बदन की गर्मी मेरे सीने से टकराने लगी। मैंने सिर हिलाया, हाँ या ना, खुद नहीं जानता था। उसने मेरी ठुड्डी पकड़कर चेहरा ऊपर किया। "डरो मत।
मैं खा नहीं जाऊँगी। बस चखूँगी।"
फिर उसने मुझे खींचकर अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। यह कोई धीमा, शर्मीला चुंबन नहीं था। उसने मेरे निचले होंठ को दाँतों से काटा, अपनी जीभ मेरे मुँह में घुसेड़ दी।
मेरे हाथ अनजाने में उसकी कमर पर चले गए। उसने मेरी बेल्ट को एक झटके में खींचा।
"रुको..." मैं बोला, पर मेरी आवाज़ में कोई दम नहीं था। "चुप," उसने कहा और घुटनों के बल बैठ गई। किचन के फर्श पर, दिन के उजाले में, उसने मेरी पैंट की ज़िप खोल दी।
मेरा लंड पहले से तना हुआ था। उसने उसे हाथ में लिया, ऊपर नीचे किया, और फिर अपने मुँह में भर लिया।
उसकी जीभ मेरे लंड के सिरे पर घूम रही थी। वह अनुभवी थी, यह हर हरकत से साफ था। कभी वह धीरे चूसती, कभी गले तक ले जाती। मेरे मुँह से सिसकारी निकली।
उसने ऊपर देखा, आँखों में जीत की चमक। "अच्छा लग रहा है ना?" उसने लंड मुँह से निकाले बिना बुदबुदाया।
मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचा। उसने खुद ही ब्लाउज के बटन खोल दिए। उसके बड़े, भरे हुए बूब्स सामने आ गए, निप्पल कड़े और गहरे रंग के। मैंने उन्हें दोनों हाथों से दबोचा।
वह ज़ोर से कराही। "और ज़ोर से दबाओ बाबा, डरो मत।"
उसने मुझे किचन काउंटर की तरफ धकेला और खुद काउंटर पर बैठ गई। साड़ी ऊपर खींची, पैंटी एक झटके में उतार फेंकी। उसकी चूत गीली और फूली हुई थी। "सुनो," उसने कहा, "पहली बार में ही बता देती हूँ, मैं नरमी से नहीं करती।"
मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और एक ही झटके में अंदर धकेल दिया। वह चीखी, पर उस चीख में दर्द कम, मज़ा ज़्यादा था। "हाँ... ऐसे ही... और अंदर..." उसने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। मैंने धक्के तेज़ कर दिए।
काउंटर हिलने लगा। बर्तन खनखनाने लगे।
मैंने उसके बूब्स को मुँह में लिया, निप्पल चूसे, हल्के से काटे। उसने मेरी गर्दन पर काटा। हमारी साँसें तेज़ हो गईं। "मैं झड़ने वाला हूँ..." मैं हाँफा।
"अंदर ही झड़ो," उसने कहा, "आज से यह तुम्हारी भी है।" मैंने आखिरी ज़ोरदार धक्का मारा। उसका पानी मेरे लंड पर बह निकला और मेरा वीर्य उसकी चूत के अंदर उतर गया।
हम दोनों हाँफ रहे थे। उसने मेरी छाती पर सिर टिका दिया। "कैसा लगा?" उसने पूछा। मैं कुछ नहीं बोल पाया।
वह हँसी। "कल दोपहर को नहाने के वक्त बाथरूम में आना। मैं सिखाऊँगी कि असली मज़ा क्या होता है।"
अगली दोपहर मैं बाथरूम में घुसा तो वह पहले से शॉवर के नीचे खड़ी थी, पूरी नंगी। पानी उसकी पीठ पर बह रहा था। उसने मुझे अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद कर दिया।
"कपड़े उतारो," उसने आदेश दिया। मैं काँपते हाथों से नंगा हुआ।
उसने साबुन लिया और मेरे पूरे बदन पर लगाया। उसके हाथ मेरे सीने पर, पेट पर, और फिर नीचे गए। उसने मेरे लंड को साबुन से मलना शुरू किया। फिसलन भरे हाथों का एहसास पागल कर देने वाला था।
"देखो," उसने कहा, "औरत को खुश करना सीखो। पहले नरम, फिर सख्त।"
वह घुटनों पर बैठ गई, शॉवर का पानी हम दोनों पर गिर रहा था। उसने मेरे लंड को मुँह में लिया। पानी और उसके मुँह की गर्मी का मेल बेमिसाल था।
वह मेरे अंडकोष भी चूस रही थी, जीभ से सहला रही थी। मैंने उसके गीले बाल पकड़ लिए।
"बस," उसने कहा और खड़ी हो गई। उसने मुझे दीवार से लगा दिया। "अब मेरी बारी।" उसने मेरी एक उँगली पकड़कर अपनी चूत पर रखी। "अंदर डालो।" मैंने दो उँगलियाँ डालीं।
वह कराही। उसने मेरी उँगलियों को अंदर बाहर करना सिखाया, अपने दाने को रगड़ना सिखाया।
उसकी चूत से पानी बहने लगा, मेरी उँगलियाँ पूरी भीग गईं। "अब," उसने कहा और मेरी तरफ पीठ करके झुक गई। "पीछे से डालो।" मैंने उसका कूल्हा पकड़ा और लंड उसकी चूत में धकेला। गीली चूत में लंड फिसलता हुआ अंदर चला गया।
शॉवर के नीचे, खड़े खड़े, मैंने उसे पीछे से चोदा। हर धक्के पर पानी उछलता। उसके बूब्स हिल रहे थे। उसने दीवार पकड़ रखी थी।
"और तेज़... हाँ... ऐसे ही..." उसकी आवाज़ बाथरूम में गूँज रही थी। मैंने उसकी कमर पकड़कर धक्के और तेज़ कर दिए।
वह झड़ी, उसकी चूत ने मेरे लंड को ज़ोर से जकड़ लिया। "मैं भी..." मैं चिल्लाया। "मेरे मुँह में," उसने कहा और तेज़ी से घूमी। मैं उसके मुँह में झड़ गया।
उसने वीर्य निगल लिया और मुस्कुराई। "अब तुम सीख रहे हो।"
उस रात मैं सो नहीं पाया। कमला की हर हरकत मेरी आँखों के सामने घूम रही थी। तीसरी दोपहर उसने मुझे मास्टर बेडरूम में बुलाया।
"आज पूरा खेल बिस्तर पर होगा," उसने कहा। "और आज तुम सिर्फ मेरे हो।"
बेडरूम में घुसते ही उसने दरवाज़ा बंद किया और मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। वह मेरे ऊपर चढ़ गई। उसने अपनी साड़ी खुद उतारी, एक एक परत।
उसका नंगा बदन बिस्तर की चादर पर चमक रहा था। "देखो," उसने कहा, "छत्तीस की औरत का बदन कैसा होता है।"
उसने मेरे कपड़े फाड़ने के अंदाज़ में उतारे। फिर वह मेरे लंड पर बैठ गई। उसकी चूत ने मेरे लंड को निगल लिया। वह ऊपर नीचे होने लगी, पहले धीरे, फिर तेज़।
उसके बूब्स मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे। मैंने उन्हें पकड़ लिया और चूसा।
"तुम्हारी भाभी को पता चला तो?" मैंने हाँफते हुए पूछा। उसने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। "भाभी ऑफिस में है। भैया ऑफिस में है।
यह घर दोपहर को हमारा है। अब चुपचाप चोदो।" उसकी बेखौफी ने मुझे और ज़्यादा गर्म कर दिया।
मैंने उसे पलटकर नीचे लिया। उसने अपने दोनों पैर मेरे कंधों पर रख दिए। गहराई बढ़ गई।
वह चीखने लगी। "हाँ... बहुत अंदर तक... फाड़ दो..." मैंने धक्के इतने तेज़ किए कि बिस्तर दीवार से टकराने लगा।
फिर मैंने उसे घोड़ी बनाया। पीछे से उसकी चूत में लंड डालकर मैंने उसके बाल पकड़ लिए। वह जानवरों जैसी आवाज़ें निकाल रही थी। मैंने उसके कूल्हे पर थप्पड़ मारा।
वह और ज़ोर से कराही। "मारो... और मारो..."
मैंने उसे खड़ा किया और दीवार से लगा दिया। उसकी एक टाँग उठाकर अपने कंधे पर रखी और लंड फिर उसकी चूत में उतार दिया। इस पोज़ में हर धक्का उसके सबसे गहरे हिस्से को छू रहा था। उसने मेरी गर्दन पकड़ ली, नाखून गड़ा दिए।
"तुम्हें किसने सिखाया इतना अच्छा चोदना?" वह हाँफी। "तुमने," मैंने कहा और धक्के और तेज़ कर दिए।
फिर वह बिस्तर पर लेट गई और अपनी टाँगें फैला दीं। "अब चाटो," उसने आदेश दिया। "जैसे मैंने तुम्हारा चूसा था।" मैंने उसकी चूत पर मुँह रखा। उसका नमकीन, गीला स्वाद मेरी जीभ पर फैल गया।
मैंने उसके दाने को चूसा, जीभ अंदर डाली। वह बिस्तर पर तड़पने लगी, चादर मुट्ठियों में भींच ली। "हाँ... वहीं... मत रुको..."
उसका बदन ऐंठने लगा। उसने मेरे सिर को अपनी चूत पर दबा दिया। "मैं झड़ रही हूँ..." वह चीखी और उसका पानी मेरे चेहरे पर बह निकला। मैंने आखिरी बूँद तक चाटा।
वह हाँफती हुई बिस्तर पर पसर गई, आँखों में नशा। "अब आओ," उसने बाँहें फैलाकर कहा, "अब असली वाली चुदाई होगी।"
हम पसीने में भीग चुके थे। चादर गीली हो गई थी। उसने मुझे फिर ऊपर खींच लिया।
"अब तुम झड़ोगे, पर मेरी शर्त पर।" वह मेरे लंड पर इतनी तेज़ उछलने लगी कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। "मैं आ रहा हूँ..." "आओ," उसने कहा, "मेरे अंदर आओ।"
मैं उसकी चूत के अंदर झड़ गया। वह भी उसी पल झड़ी, उसका बदन काँपा, उसके नाखून मेरी पीठ में धँस गए। हम दोनों बिस्तर पर ढेर हो गए। कुछ देर तक सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ कमरे में थी।
"तुम तो कहते थे डरते हो," उसने मेरी छाती पर उँगली घुमाते हुए कहा। "अब डर नहीं लगता," मैंने कहा। वह हँसी।
"अच्छा है। क्योंकि अगले दो महीने तक हर दोपहर यही होगा।"
उसने उठकर साड़ी पहनी, बाल सँवारे। दरवाज़े पर रुककर उसने पीछे देखा। "और हाँ," उसने कहा, "यह बात इस घर की दीवारों के बाहर नहीं जाएगी।
समझे, अर्जुन बाबा?" मैंने सिर हिलाया। वह मुस्कुराई और बाहर चली गई, और मैं बिस्तर पर लेटा उसकी अगली दोपहर का इंतज़ार करने लगा।
अगले हफ़्ते रविवार को भैया और भाभी सुबह ही एक रिश्तेदार की शादी में निकल गए थे। शाम से पहले लौटने वाले नहीं थे। मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर था जब दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। कमला अंदर आई, हाथ में चाय की ट्रे। उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।
"आज भाभी नहीं है, पर तुम्हारी चाय का टाइम तो हो गया ना?" उसने ट्रे मेज़ पर रखी और मेरी कुर्सी के पीछे आकर खड़ी हो गई। उसके हाथ मेरे कंधों पर आए, दबाने लगे। "कल रात सपने में तुम आए थे। बहुत गंदा सपना था।"
मैंने कुर्सी घुमाई। उसने मेरी गोद में बैठने से पहले अपनी साड़ी ऊपर खींची। "आज पैंटी पहनी ही नहीं," वह मेरे कान में फुसफुसाई। "सुबह से सोच रही थी, आज रविवार है, टाइम भी ज़्यादा मिलेगा।" उसकी नंगी चूत मेरी पैंट पर रगड़ खाने लगी।
मैंने उसे उठाया और अलमारी से लगा दिया। उसकी टाँग उठाकर मैंने पैंट खोली। मेरा लंड तना हुआ था। उसने उसे पकड़ा, अपनी चूत के मुँह पर रखा। "डालो," उसने कहा। मैं एक झटके में अंदर चला गया। वह मेरे कंधे पर काटने लगी।
अलमारी हिलने लगी। मैंने उसके ब्लाउज के बटन खोले, बूब्स बाहर निकाले। हर धक्के के साथ मैं उसके निप्पल चूसता। "धीरे नहीं," वह हाँफी, "आज कोई जल्दी नहीं, पर मुझे सख्त चाहिए।" मैंने उसकी कमर पकड़कर धक्के और गहरे कर दिए।
उसकी चूत ने मेरे लंड को जकड़ना शुरू किया। "मैं झड़ रही हूँ..." वह काँपी। मैंने लंड बाहर निकाला और उसके बूब्स पर झड़ गया। वीर्य की धार उसके सीने पर बह निकली। उसने पल्लू से पोंछा और मुझे चूम लिया।
तभी नीचे दरवाज़े की घंटी बजी। हम दोनों ठिठक गए। वह हँसी, बाल सँवारे और बोली, "दूधवाला होगा। तुम यहीं रुको, मैं देखकर आती हूँ।" वह दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली और मैं बिस्तर पर लेटकर उसकी वापसी का इंतज़ार करने लगा।
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