जब नफरत ने अचानक सबसे गंदी भूख का रूप ले लिया

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बारिश बहुत तेज हो रही थी। पुराने गेस्ट हाउस का कमरा नंबर 7 अंधेरा और उमस भरा था। बिजली गई हुई थी। सिर्फ मोबाइल की टॉर्च जल रही थी।

आयुषी और कर्ण एक-दूसरे के सामने खड़े थे। दोनों के कपड़े भीग चुके थे। दोनों एक-दूसरे से नफरत करते थे—सालों से। पारिवारिक दुश्मनी, प्रॉपर्टी का झगड़ा, और कई पुरानी बातें। आज मजबूरन एक ही गाड़ी में फँस गए थे और बारिश ने उन्हें यहीं रोक दिया था।

“मुझे तेरी सूरत भी नहीं देखनी,” आयुषी ने घृणा से कहा।

कर्ण ने एक कदम बढ़ाया। “तो आँखें बंद कर ले।”

अगले ही पल उसने आयुषी का गला पकड़ लिया और जोर से दीवार से सटा दिया। चुंबन नहीं था—यह हमला था। दाँत, जीभ, सब कुछ। आयुषी ने उसके सीने पर मुक्का मारा, लेकिन कर्ण ने दोनों हाथ पकड़कर उसके सिर के ऊपर दबा दिए।

आयुषी की साँसें तेज हो गईं। नफरत अभी भी आँखों में थी, लेकिन शरीर कुछ और कह रहा था। कर्ण ने उसकी कुर्ती के बटन एक-एक करके खोले—नहीं, फाड़े। ब्रा को नीचे खींचा और निप्पल को जोर से दाँतों से काट लिया। आयुषी की चीख निकल गई।

“दर्द हो रहा है ना?” कर्ण ने गुर्राते हुए पूछा। “सह ले। तूने सालों तक मुझे जलाया है।”

उसने आयुषी की जींस का बटन खोला और एक झटके में नीचे खींच दिया। पैंटी को फाड़ दिया। आयुषी की जाँघें काँप रही थीं—गुस्से से या कुछ और से, दोनों को समझ नहीं आ रहा था।

कर्ण ने उसे बिस्तर पर पटक दिया। आयुषी ने विरोध किया, नाखून चलाए, लेकिन कर्ण ने उसके दोनों हाथ एक हाथ से पकड़ लिए और दूसरी हाथ से उसकी जाँघें फैला दीं। फिर अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी।

आयुषी की कमर जोर से उछली। “निकल… निकल जा यहाँ से…”

कर्ण नहीं निकला। उसकी जीभ तेज और गुस्से से भरी हुई थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, कभी दाँतों से हल्का काट रहा था। आयुषी के विरोध के बावजूद उसका शरीर गीला हो चुका था। कर्ण ने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं और तेजी से हिलाने लगा।

आयुषी की आवाज अब विरोध से सिसकी में बदलने लगी थी। कर्ण ने और जोर से चूसा। आयुषी का शरीर अकड़ गया। चरम उसके नियंत्रण से बाहर आ गया। उसने तकिया मुँह में दबा लिया लेकिन आवाज दब नहीं पाई।

कर्ण ऊपर आया। उसने अपनी पैंट खोली। आयुषी की आँखों में अभी भी नफरत थी, लेकिन जब कर्ण ने उसकी टाँगें फैलाईं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया, तो उसकी आँखें फट गईं।

“आह्ह…Bastard…” आयुषी चीखी।

कर्ण मुस्कुराया। “अब तेरी नफरत भी मेरे अंदर समा गई।”

उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने शुरू कर दिए। बिस्तर चरमरा रहा था। हर धक्का गुस्से और भूख से भरा हुआ था। आयुषी नाखून चला रही थी, गाली दे रही थी, लेकिन उसकी टाँगें कर्ण की कमर के चारों ओर लिपटती जा रही थीं।

कर्ण ने उसके दोनों निप्पल्स को बारी-बारी से काटना शुरू कर दिया। आयुषी की आवाजें अब गाली और सिसकी का मिश्रण बन चुकी थीं। कर्ण ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया।

थोड़ी देर बाद कर्ण ने उसे पलटा। आयुषी अब पेट के बल थी। कर्ण ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने आयुषी के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ आयुषी की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।

“नफरत कर… लेकिन शरीर तो मेरा हो गया,” कर्ण ने कान में कहा।

आयुषी ने जवाब में और जोर से पीछे की ओर धकेल दिया। कर्ण ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। आयुषी की आवाज अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी।

दूसरा चरम इतना तेज था कि आयुषी की आँखों से आँसू निकल आए। कर्ण ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। दोनों हांफते हुए बिस्तर पर गिरे रहे।

कुछ देर की खामोशी के बाद आयुषी ने धीरे से कहा, “निकाल… अब निकल जा।”

कर्ण बाहर निकला लेकिन उठा नहीं। उसने आयुषी को पलटा और उसकी आँखों में देखा। “निकलूँगा। लेकिन पहले एक बार और।”

आयुषी ने विरोध किया, लेकिन जब कर्ण ने फिर से उसके स्तनों को मुँह में लिया और उंगलियाँ अंदर डालीं, तो उसका शरीर फिर से प्रतिक्रिया देने लगा। नफरत अभी भी थी, लेकिन शरीर अब हार चुका था।

तीसरी बार कर्ण ने आयुषी को दीवार से सटाया। एक टाँग ऊपर उठाई और खड़े-खड़े अंदर घुस गया। आयुषी की पीठ दीवार से रगड़ रही थी। कर्ण के धक्के इतने तेज थे कि तस्वीरें हिलने लगीं। आयुषी अब गाली भी नहीं दे पा रही थी—सिर्फ सिसकियाँ निकल रही थीं।

जब कर्ण ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, आयुषी का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। जाँघों के अंदर उसका अंश बह रहा था। पूरे शरीर पर नाखूनों, दाँतों और थप्पड़ों के निशान थे।

कर्ण कपड़े पहनने लगा। जाने से पहले उसने आयुषी के गाल पर उँगली फेरी—इस बार नरमी से नहीं।

“नफरत आगे भी रहेगी,” उसने कहा। “लेकिन अगली बार जब बारिश होगी… तू खुद बुलाएगी।”

आयुषी ने कुछ नहीं कहा। बस आँखें बंद कर लीं। शरीर में दर्द था, गुस्सा था, लेकिन सबसे ज्यादा एक अजीब सी खालीपन था जो सिर्फ कर्ण ने भरा था।

दरवाजा बंद होते ही आयुषी ने दीवार से सिर टिका लिया। नफरत अभी भी थी। लेकिन अब वह नफरत अकेली नहीं थी। उसके साथ एक गंदी, खतरनाक भूख भी रह गई थी।

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