उस रात कोई सीमा नहीं थी जब होटल रूम में दो अजनबियों ने सारी हदें पार कर दीं और सिर्फ भूख बाकी रही
बारिश बहुत तेज हो रही थी। होटल के लॉबी में खड़ी आया ने अपनी गीली साड़ी ठीक की। बाल चेहरे पर चिपक गए थे। तभी किसी ने पीछे से कहा—
“टैक्सी नहीं मिलेगी अब।”
आवाज भारी थी। आया ने मुड़कर देखा। लंबा, काला टी-शर्ट, गीले बाल, और आँखों में वो नशा जो सिर्फ अजनबियों में होता है। नाम उसने नहीं पूछा। उसने भी नहीं बताया।
“मेरा रूम ऊपर है,” आया ने सीधे कहा। “आ सकते हो।”
आदमी कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा, फिर सिर हिलाया। लिफ्ट में दोनों चुप रहे। तीसरी मंजिल। कमरा 307। दरवाजा बंद होते ही आया ने खुद ताला लगा दिया।
आदमी ने एक कदम बढ़ाया। आया दीवार से सट गई। उसने उसका गला पकड़ा और जोर से चूमा। दाँत टकराए। जीभ अंदर तक चली गई। आया की साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया। आदमी ने उसका ब्लाउज दोनों हाथों से पकड़कर एक झटके में फाड़ दिया। बटन बिखर गए।
आया की साँस तेज हो गई। आदमी ने ब्रा को नीचे खींचा और दोनों स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लेकर दाँतों से काटा। आया की सिसकी निकल गई।
“और जोर से,” उसने कहा।
आदमी ने उसी पल उसे उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। साड़ी और पेटीकोट एक साथ उतर गए। पैंटी को उसने फाड़ दिया। आया की जाँघें खुली पड़ी थीं। आदमी ने बिना किसी देरी के अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी।
आया की कमर उछल गई। आदमी की जीभ तेज, मोटी और बेकाबू थी। वह उसके क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से आगे-पीछे करने लगा। आया के नाखून चादर में गड़ गए।
“आह्ह… रुक मत… और अंदर…”
आदमी ने तीसरी उँगली भी डाल दी और जीभ और तेज कर दी। आया का शरीर अकड़ गया। चरम इतना तेज था कि उसकी आवाज कमरे में गूँज गई। पैर काँप रहे थे।
आदमी ऊपर आया। उसने अपनी पैंट एक झटके में उतारी। आया की आँखें उसके कड़े, मोटे अंग पर टिक गईं। आदमी ने उसकी दोनों टाँगें फैलाईं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
आया चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत मोटा…”
आदमी नहीं रुका। उसने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगा। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। हर धक्का इतना गहरा था कि आया की साँसें अटक जा रही थीं। आदमी ने झुककर उसके निप्पल को फिर दाँतों से काटा।
आया की आवाजें अब बेकाबू हो चुकी थीं। आदमी ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया। मेघा की तरह नहीं—आया खुद अपनी टाँगें और फैला रही थी।
अचानक आदमी रुक गया। उसने आया को पलटा और घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने आया के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ आया की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
“बोल… कितना सह सकती है?” आदमी ने कान में गुर्राया।
“पूरा… तोड़ दो…” आया की आवाज टूटी हुई थी।
आदमी ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी ताकत से मारने लगा। थप्पड़ की आवाज कमरे में गूँज रही थी—उसने आया के नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। आया और जोर से चीखी, लेकिन पीछे हटने के बजाय और पीछे की ओर धकेलने लगी।
दूसरा चरम आया के शरीर में बिजली की तरह दौड़ा। उसके पैर लड़खड़ा गए। आदमी ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा। दोनों कुछ पल के लिए अचल रहे।
साँसें थामने के बाद भी आदमी बाहर नहीं निकला। उसने आया को साइड में लिटाया और उसी पोजीशन में फिर से धीरे-धीरे हिलना शुरू कर दिया। आया की आँखें बंद थीं, लेकिन उसके होंठ खुले हुए थे।
“फिर से…” उसने फुसफुसाया।
आदमी ने उसकी एक टाँग ऊपर उठाई और और गहराई तक जाने लगा। इस बार गति पहले से भी तेज थी। आया के स्तन हर धक्के के साथ काँप रहे थे। आदमी ने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का सा दबाया। आया की आँखें खुल गईं—मजे और थ्रिल से।
तीसरा चरम और भी लंबा था। आया की आवाज निकलना बंद हो गई। सिर्फ शरीर काँप रहा था। आदमी ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
दो घंटे बाद आया बाथरूम से निकली तो आदमी बिस्तर पर बैठा सिगरेट पी रहा था। आया नंगी ही उसके पास गई और उसके गोद में बैठ गई। उसने खुद उसका अंग फिर से कड़ा किया और धीरे-धीरे अपने अंदर ले लिया।
इस बार आया खुद ऊपर-नीचे हो रही थी। आदमी के हाथ उसके स्तनों पर थे, निप्पल्स को मरोड़ रहे थे। आया की गति तेज होती गई। आदमी ने उसके नितंबों को जोर से पकड़ लिया और नीचे से धक्के लगाने लगा।
“और तेज…” आया ने कहा।
आदमी ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और मिशनरी में पूरी ताकत लगा दी। आया की टाँगें उसके कंधों पर थीं। हर धक्का दीवार तक गूँज रहा था। आया ने उसके पीठ पर नाखून चला दिए। खून की हल्की लकीरें उभर आईं।
आदमी और बेकाबू हो गया। उसने आया के दोनों हाथ सिर के ऊपर पकड़ लिए और और जोर से मारने लगा। अंतिम चरम दोनों का एक साथ आया। आया की आवाज इस बार दब नहीं पाई।
सुबह चार बजे आदमी कपड़े पहनने लगा। आया चादर ओढ़े उसे देख रही थी।
“नाम?” उसने पूछा।
आदमी मुस्कुराया। “कोई जरूरत नहीं।”
दरवाजा बंद होते ही आया ने आँखें बंद कर लीं। शरीर में दर्द था, लेकिन वो दर्द मीठा था। जाँघों के अंदर अभी भी उसका अंश बह रहा था। नाखूनों और दाँतों के निशान पूरे शरीर पर थे।
उसने मुस्कुरा दिया।
उस रात कोई नाम नहीं था। कोई वादा नहीं था। सिर्फ दो शरीर थे जिन्होंने सारी सीमाएँ तोड़ दी थीं। और आया जानती थी—ये भूख अब कभी शांत नहीं होगी।
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