हिंदी डॉक्टर सेक्स कहानी: रात की ड्यूटी
"डॉक्टर साहब... कमर में बहुत दर्द है," दरवाजे से आती आवाज ने क्लिनिक की रात वाली खामोशी को चीर दिया। जो उस रात मेरे साथ हुआ, वही मेरी जिंदगी की सबसे गरम हिंदी डॉक्टर सेक्स कहानी बन गया।
मैं डॉक्टर अर्जुन मल्होत्रा, छत्तीस साल का, इस छोटे से कस्बे के नर्सिंग होम में नाइट ड्यूटी पर था। घड़ी में रात के ग्यारह बज रहे थे और वार्ड बॉय रामू चाय लेने बाहर गया हुआ था।
दरवाजे पर खड़ी औरत बत्तीस के आसपास की थी। सलवार कमीज में लिपटी, बाल खुले, आंखों में एक अजीब सी चमक। उसने नाम बताया, कविता। शादीशुदा थी, यह उसके मांग के सिंदूर से साफ था।
"इतनी रात को? दर्द कब से है?" मैंने पूछा, स्टेथोस्कोप गले में डालते हुए।
उसने मुस्कुराकर कहा, "दर्द तो हफ्तों से है, डॉक्टर साहब।"
"पर दिन में शर्म आती है," उसने जोड़ा।
उसकी आवाज में शर्म कहीं नहीं थी। सिर्फ शरारत थी।
मैंने उसे एग्जामिनेशन टेबल की तरफ इशारा किया। "लेट जाइए, देखता हूं कहां दर्द है।"
वह टेबल पर पेट के बल लेट गई। मैंने उसकी कमीज थोड़ी ऊपर की तो गोरी कमर नजर आई। मेरी उंगलियां जैसे ही उसकी कमर पर पड़ीं, उसने हल्की सी आह भरी।
"यहीं... हां, यहीं दर्द है। थोड़ा जोर से दबाइए ना।" उसकी आवाज में दर्द से ज्यादा कुछ और था। मेरे हाथ रुक गए।
"मैडम, यह दर्द मांसपेशी का नहीं लग रहा," मैंने कहा। वह हंसी। एक खुली, बेखौफ हंसी।
"डॉक्टर साहब, आप तो बहुत सीधे हैं।"
वह पलटी और अब पीठ के बल लेटी थी। उसकी आंखें सीधे मेरी आंखों में थीं।
"दर्द का बहाना था। असली मर्ज कुछ और है।"
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। "क्या मतलब?" मैंने पूछा, हालांकि जवाब मैं समझ चुका था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी छाती पर रख दिया।
उसके ब्लाउज के नीचे उसके बूब्स का उभार मेरे हथेली में समा गया। वह गरम थी, सांसें तेज थीं।
"यही मर्ज है, डॉक्टर साहब। इसका इलाज कीजिए।"
मैंने हाथ हटाने की कोशिश की, पर उसने कसकर पकड़ रखा था। "पति तीन महीने से बाहर है। काम के सिलसिले में दुबई।"
"औरत हूं, डॉक्टर साहब। मेरी भी जरूरतें हैं।"
उसकी ईमानदारी ने मुझे हिला दिया। मैंने दरवाजे की तरफ देखा। रामू अभी बाहर था।
क्लिनिक में सिर्फ हम दोनों थे। रात के सन्नाटे में उसकी सांसों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।
"कविता जी, यह सही नहीं..." मैं बोल ही रहा था कि उसने मेरा कॉलर पकड़कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया। उसके होंठ मेरे होंठों से टकराए।
वह किस इतनी भूखी थी कि मेरे होश उड़ गए। उसकी जीभ मेरे मुंह में घुस आई, वह मेरे निचले होंठ को काट रही थी। मेरे हाथ अपने आप उसकी कमर पर चले गए।
"अब शर्माना बंद कीजिए, डॉक्टर साहब," उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा। "आज रात आप डॉक्टर नहीं, मर्द हैं। और मैं आपकी मरीज नहीं, आपकी औरत हूं।"
उसके शब्दों ने मेरे अंदर का जानवर जगा दिया। मैंने उसके ब्लाउज के बटन एक एक करके खोले। उसके बूब्स ब्रा में कसे हुए बाहर आने को बेताब थे।
ब्रा का हुक खोलते ही उसके गोरे, भरे हुए बूब्स आजाद हो गए। निप्पल तने हुए, गहरे भूरे रंग के। मैंने एक निप्पल मुंह में ले लिया और जोर से चूसा।
"आह... डॉक्टर साहब..." वह कराही। उसकी उंगलियां मेरे बालों में घुस गईं। वह मेरा सिर अपनी छाती पर दबा रही थी।
"और जोर से... काटिए इन्हें।"
मैंने उसके निप्पल को हल्के से दांतों से दबाया। वह उछल पड़ी। उसके हाथ मेरी शर्ट के बटन खोलने लगे। कुछ ही पलों में मेरी शर्ट जमीन पर थी।
उसकी हथेलियां मेरी नंगी छाती पर घूम रही थीं। वह नीचे सरकती गई और मेरी पैंट की जिप पर उसके हाथ रुक गए। उसकी आंखों में शरारत नाच रही थी।
जिप खुलते ही मेरा तना हुआ लंड बाहर आ गया। वह उसे देखकर मुस्कुराई।
"इतना बड़ा? डॉक्टर साहब, आप तो छुपे रुस्तम निकले।"
उसने मेरे लंड को हाथ में लिया और धीरे धीरे हिलाने लगी। फिर वह टेबल से उतरी, मेरे सामने घुटनों पर बैठ गई। मेरे दिल की धड़कन कानों में गूंज रही थी।
उसने मेरे लंड के टिप को जीभ से चाटा। फिर धीरे धीरे पूरा लंड अपने मुंह में ले लिया। उसकी गरम, गीली जीभ मेरे लंड के चारों तरफ घूम रही थी।
"ओह... कविता..." मैं कराह उठा। वह मेरे लंड को गले तक ले रही थी, फिर बाहर निकालती, फिर अंदर। उसके हाथ मेरे अंडकोषों को सहला रहे थे।
उसका मुंह इतना हुनरमंद था कि मुझे लगा मैं अभी झड़ जाऊंगा। मैंने उसके बाल पकड़कर उसे रोका। "रुको... अभी नहीं।"
मैंने उसे खड़ा किया और टेबल पर बिठा दिया। अब मेरी बारी थी। मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोला। वह बिना किसी शर्म के अपनी सलवार उतारने में मेरी मदद करने लगी।
उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी। मैंने पैंटी एक झटके में उतार फेंकी। उसकी चूत मेरे सामने थी, गीली, फूली हुई, बाल हल्के से तराशे हुए।
मैं घुटनों पर बैठा और उसकी चूत को चाटने लगा। मेरी जीभ उसके भगनासे पर घूम रही थी। वह टेबल पर पीछे झुक गई, टांगें मेरे कंधों पर डाल दीं।
"हां... वहीं... डॉक्टर साहब... वहीं चाटिए..." वह चिल्ला रही थी। उसकी चूत का रस मेरी जीभ पर था, नमकीन और मीठा। मैंने दो उंगलियां उसकी चूत में डाल दीं।
मेरी उंगलियां अंदर बाहर हो रही थीं, जीभ भगनासे पर तेज तेज घूम रही थी। उसका बदन कांपने लगा। "मैं आने वाली हूं... आह... आ रही हूं..."
वह जोर से झड़ी। उसकी चूत से पानी निकला, उसका बदन टेबल पर ऐंठ गया। उसने मेरे बाल पकड़ रखे थे, सांसें फूल रही थीं।
मैं खड़ा हुआ। मेरा लंड लोहे जैसा तना था। मैंने उसकी टांगें फैलाइं और लंड का टिप उसकी गीली चूत पर रगड़ा। वह मुझे देख रही थी, होंठ काट रही थी।
"डालिए... अब और मत तड़पाइए..." उसने कहा। मैंने एक झटके में पूरा लंड उसकी चूत में धकेल दिया।
वह चीख पड़ी, "आह! डॉक्टर साहब!"
उसकी चूत टाइट थी, गरम थी, मेरे लंड को कसकर जकड़ रही थी। मैंने धक्के लगाने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज। टेबल हिलने लगा।
मैंने उसके बूब्स पकड़ रखे थे, उन्हें मसल रहा था। हर धक्के के साथ वह कराह रही थी। "और जोर से... फाड़ दीजिए मेरी चूत... आह!"
उसके शब्दों ने मुझे पागल कर दिया। मैंने उसकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगा। उसकी चूत से फच फच की आवाज आ रही थी।
पसीना मेरे माथे से टपककर उसकी छाती पर गिर रहा था। उसकी आंखें बंद थीं, मुंह खुला था। वह हर धक्के पर कांप रही थी।
"पलटिए," मैंने हांफते हुए कहा। वह समझ गई। वह टेबल पर कुत्ते की तरह हो गई, हाथ टेबल पर, घुटने टेबल पर। उसकी गांड मेरी तरफ उठी हुई थी।
मैंने पीछे से उसकी चूत में लंड डाला। इस पोजीशन में लंड और गहराई तक जा रहा था। मैंने उसकी कमर पकड़ रखी थी और जोर जोर से धक्के लगा रहा था।
हर धक्के पर उसकी गांड मेरी जांघों से टकरा रही थी। थप थप की आवाज कमरे में गूंज रही थी। "हां... ऐसे ही... मेरी चुदाई कीजिए... आह..." वह चिल्ला रही थी।
मैंने उसके बाल पकड़े और पीछे खींचे। वह और ज्यादा उत्तेजित हो गई।
"जानवर बन जाइए, डॉक्टर साहब! आज रात मैं आपकी कुतिया हूं!"
मैंने उसे टेबल से उतारा और दीवार से लगा दिया। एक टांग उठाकर अपने हाथ पर रखी। इस पोजीशन में मैंने फिर से उसकी चूत में लंड पेल दिया।
दीवार के सहारे खड़े होकर चुदाई करना उसे पागल कर रहा था। वह मेरे कंधे पर काट रही थी। "काटिए मुझे... निशान बनाइए... ताकि याद रहे यह रात..."
उसकी बातों ने मेरे धक्कों को और रफ बना दिया। मैं उसे दीवार से सटाकर बुरी तरह चोद रहा था। उसकी चूत मेरे लंड को निचोड़ रही थी।
फिर मैंने उसे टेबल के किनारे बिठाया। उसकी टांगें मेरी कमर में लिपटी थीं। इस बार वह ऊपर थी, मेरे लंड पर खुद उछल रही थी। उसके बूब्स हर उछाल पर हिल रहे थे।
मैंने उसके बूब्स मुंह में ले लिए और चूसने लगा। वह मेरे लंड पर तेज तेज ऊपर नीचे हो रही थी। "ऐसे ही... चूसिए इन्हें... आह... मैं पागल हो रही हूं..."
उसकी रफ्तार देखकर मैं हैरान था। वह पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी। उसके नाखून मेरी छाती पर निशान बना रहे थे। पसीना हम दोनों के बदन से टपक रहा था।
फिर मैंने उसे गोद में उठाया। वह मेरी कमर से लिपट गई, टांगें मेरी कमर में। मैं उसे उठाए उठाए चोद रहा था, हर धक्के पर वह ऊपर उछलती।
"मैं फिर आने वाली हूं... डॉक्टर साहब... जोर से... जोर से..." उसकी चूत कसने लगी। मैंने महसूस किया कि मेरा भी पानी निकलने वाला है।
मैंने उसे फिर टेबल पर लिटाया। मिशनरी पोजीशन में मैंने आखिरी तेज धक्के लगाए। हम दोनों पसीने में भीगे थे, सांसें फूल रही थीं।
"अंदर ही निकालिए... आज सुरक्षित दिन है..." उसने हांफते हुए कहा। यह सुनकर मैंने पूरी ताकत से आखिरी धक्का लगाया और उसकी चूत में ही झड़ गया।
मेरा वीर्य उसकी चूत में भर गया। वह भी उसी पल जोर से झड़ी। उसका बदन ऐंठा, नाखून मेरी पीठ में धंस गए। हम दोनों एक साथ चरम पर पहुंचे थे।
कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे। मेरा लंड अभी भी उसकी चूत में था, धीरे धीरे नरम हो रहा था। उसकी उंगलियां मेरी पीठ पर घूम रही थीं।
"दर्द ठीक हुआ?" मैंने पूछा, उसके माथे पर पसीना पोंछते हुए। वह हंसी।
"कमर का दर्द तो बहाना था, डॉक्टर साहब। असली दर्द तो अब मिटा है।"
वह उठी और अपने कपड़े पहनने लगी। मैंने भी पैंट पहनी। तभी बाहर रामू की आवाज आई, "डॉक्टर साहब, चाय लाया हूं।"
हम दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए। कविता ने दरवाजा खोला और बाहर निकली।
"रामू, डॉक्टर साहब बहुत अच्छे हैं। मेरी कमर का दर्द बिल्कुल ठीक कर दिया।"
रामू ने चाय का कप मुझे दिया। कविता दरवाजे पर रुकी और पलटी।
वह धीरे से बोली, "कल फिर आऊंगी। फॉलो अप के लिए। कमर तो ठीक हो गई... अब कुछ और दर्द है।"
कविता के जाने के बाद मैं केबिन में बैठा था, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी। उसकी चूत की गर्मी अभी भी मेरे लंड पर महसूस हो रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
"डॉक्टर साहब, मैं अपना दुपट्टा भूल गई," कविता अंदर आई। उसकी आंखों में वही शरारत थी। दुपट्टा उसके कंधे पर ही था। हम दोनों हंस पड़े।
"झूठी," मैंने कहा और उसे अपनी तरफ खींच लिया। उसने कोई विरोध नहीं किया। उसके होंठ फिर मेरे होंठों से मिल गए, इस बार और भी भूखे।
मैंने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। रामू बाहर वार्ड में सो चुका था। अब यह रात सिर्फ हमारी थी। मैंने उसे अपनी टेबल पर बिठा दिया।
"टेबल पर तो हो गया," वह बोली, मेरी पैंट की जिप खोलते हुए। "अब बताइए, डॉक्टर साहब के कमरे में क्या क्या होता है?" मेरा लंड फिर तन चुका था।
उसने इस बार धीरे धीरे मेरे लंड को मुंह में लिया। उसकी जीभ हर नस पर घूम रही थी। वह मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी, लंड मुंह में लिए हुए।
मैंने उसे टेबल पर पेट के बल लिटाया। उसकी सलवार फिर नीचे थी। मैंने उसकी गांड पर हल्का सा थप्पड़ मारा। वह कराही, "आह... मारिए..."
मैंने पीछे से उसकी चूत में लंड पेला। वह टेबल को पकड़े हुए थी, हर धक्के पर आगे सरक रही थी। मैंने उसके बूब्स पीछे से पकड़ रखे थे।
"धीरे... आवाज बाहर जाएगी..." मैंने कहा। उसने अपना हाथ अपने मुंह पर रख लिया, पर उसकी कराहें रुक नहीं रही थीं। उसकी चूत मेरे लंड को कसकर जकड़ रही थी।
मैंने उसे उठाया और दीवार से लगा दिया। उसकी एक टांग मेरी कमर पर थी। इस पोजीशन में धक्के और गहरे लग रहे थे। वह मेरे कंधे पर सिर रखे हांफ रही थी।
"मैं आ रही हूं..." उसने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी चूत कसी, पानी निकला। मैंने भी उसी पल उसके अंदर झड़ने का फैसला किया। आखिरी तेज धक्कों के साथ मैं उसकी चूत में झड़ गया।
हम दोनों फर्श पर बैठ गए, एक दूसरे से लिपटे। "अब दुपट्टा सच में ले जाइए," मैंने कहा। वह हंसी, "दुपट्टा तो बहाना था, डॉक्टर साहब। असली चीज तो मिल गई।"
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