फिरोजाबाद की पुरानी काँच भट्ठी वाली गली में जब सावन की बारिश ने ठंडी भट्ठी की भाप निकाली तो विवाहित क्वालिटी चेक वाली ने फूँकने वाले को वह गरमी दी जो किसी उत्पादन रजिस्टर में नहीं चढ़ती
फिरोजाबाद की पुरानी काँच की भट्ठी वाली गली में बारिश हमेशा छत से नहीं, दीवारों के अंदर से उतरती थी। काँच पिघलने की गर्मी सालों से ईंटों में समाई हुई थी। उस गर्मी के उपर जब सावन की धार लगती, तो पूरी बस्ती में एक तीखी भाप उठती जो आँखों में चुभती और साँस को भारी कर देती।
सीमा उस भाप को पहचानती थी। पैंतीस साल की उम्र में वह भट्ठी की क्वालिटी चेक करने वाली थी। शादीशुदा। पति कानपुर की शीशा फैक्ट्री में शिफ्ट इंचार्ज। महीने में दो बार आता। बाकी रातें सीमा अकेली गुजारती, भट्ठी की लाल रोशनी खिड़की पर पड़ती रहती।
राजू बाईस का था। फूँकने वाला। गाल फूलते, होँठ जलते, छाती में हवा भरकर वह काँच की नली में जान डालता। उसके बाँहों पर जलने के निशान थे। पसीना उसकी कमर की रस्सी तक उतरता। सीमा उसे तीन महीने से देख रही थी। देखना ही काफी नहीं रह गया था।
उस रात भट्ठी को जानबूझकर ठंडा किया गया था। ईंधन कम था। मालिक ने कहा कि कल सुबह नया कोक आएगा। बारिश तेज हो गई। गली में पानी घुटनों तक आ गया। बिजली चली गई। जनरेटर का तेल भी खत्म। सिर्फ भट्ठी के मुँह से हल्की लालिमा बाकी थी, जैसे कोई घाव अभी पूरी तरह से न सूखा हो।
सीमा ने पिछली शेड का ताला अपने हाथ में लिया। चाबी उसके ब्लाउज के अंदर, स्तनों के बीच फँसी हुई थी। पसीने से गीली। राजू पीछे खड़ा था। बारिश उसके बालों से गर्दन पर गिर रही थी।
अंदर अंधेरा नहीं था। भट्ठी की बची गर्मी ने दीवारों को नारंगी रखा था। फ़र्श पर काँच के टूटे टुकड़े चमक रहे थे। हवा में सोडा और रेत की गंध। सीमा ने दरवाजा बंद किया। ताला अंदर से लग गया।
राजू बोला, दीदी, मालिक ने कहा था कि भट्ठी छूना मत। सीमा मुड़ी। ब्लाउज गीला था। निप्पल कपड़े से चिपककर साफ दिख रहे थे। उसने कहा, मालिक कानपुर में है। तेरा मालिक भी। आज रात कोई हिसाब नहीं चढ़ेगा।
उसने राजू का हाथ पकड़कर अपनी कमर पर रखा। राजू का हाथ काँपा। सीमा ने उस हाथ को नीचे सरकाया, साड़ी के पल्लू के नीचे, पेट पर, फिर और नीचे। राजू की हथेली ने महसूस किया कि पैंटी नहीं है। सिर्फ गरम, गीली खाल।
सीमा ने कहा, तीन महीने से तू फूँकता रहा। आज मैं फूँकूँगी। तू खड़ा रह। गाली दे। जोर से दे। मैं सुनना चाहती हूँ।
राजू ने साड़ी खींची। कपड़ा फ़र्श पर गिर गया। ब्लाउज के बटन उसने दाँतों से खोले। सीमा के स्तन भारी थे, निप्पल काले और सख्त। राजू ने मुँह लगाया। दाँत से काटा। सीमा की कमर लचकी। उसने राजू के बाल पकड़कर और जोर से अपने सीने में दबाया।
गंदी बातें उसके मुँह से निकलीं, ऐसी जो भट्ठी के रजिस्टर में कभी नहीं लिखी जातीं। राजू ने जवाब में और भारी गालियाँ दीं। सीमा हँसी, फिर कराह उठी जब राजू की दो उँगलियाँ अंदर घुसीं। गीलापन इतना था कि आवाज आई, चिपचिपी, साफ।
सीमा ने राजू की पैंट खोली। लंड बाहर निकला, मोटा, नसों वाला, सिर लाल। उसने घुटनों के बल बैठकर उसे मुँह में लिया। गला भर गया। आँखों से पानी आया। राजू ने उसके बाल पकड़कर सिर आगे पीछे किया। सीमा की आवाज दब गई। थूक गिरता रहा ठोड़ी से स्तनों पर।
भट्ठी की गर्मी पीठ पर पड़ रही थी। पसीना दोनों के शरीर से एक होकर फ़र्श पर टपक रहा था। सीमा उठी। उसने राजू को दीवार से सटाया। काँच के टुकड़े पैर के नीचे चटकते रहे। उसने एक पैर उठाया। राजू ने कमर पकड़ी और एक ही धक्के में अंदर तक घुस गया।
सीमा चिल्लाई। आवाज शेड में गूँजी। राजू रुका नहीं। उसने और जोर लगाया। हर धक्के पर सीमा की पीठ दीवार से टकराती। स्तन काँपते। निप्पल राजू की छाती से रगड़ खाते।
सीमा ने कहा, और जोर। मुझे अपनी औरत समझ। पति की तरह मत कर। पति तो महीने में दो बार आता है और झुककर करता है। तू खड़ा रहकर मार।
राजू ने कमर और कसकर पकड़ी। नाखून गड़े। उसने सीमा को घुमाया, हाथ पीछे किए, और पीछे से घुसा। और गहरा। सीमा का माथा दीवार से लगा। साँस फूल गई। राजू ने एक हाथ से उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। दूसरा हाथ स्तन पर, निप्पल मरोड़ता हुआ।
आवाजें मिलीं। मांस की थप थप। बारिश की छत पर बौछार। कहीं दूर कुत्ते का भौंकना। सीमा का शरीर काँप रहा था। वह बार बार भीग रही थी, हर धक्के पर और गीली। राजू ने महसूस किया कि अंदर की दीवारें उसे कस रही हैं।
उसने सीमा को फ़र्श पर लिटाया। काँच के छोटे टुकड़े पीठ में चुभे लेकिन सीमा ने हटना नहीं चाहा। राजू उसके उपर आ गया। घुटने उसकी जाँघों को और खोलते। उसने दोनों हाथ सीमा के गले के पास रखे, दबाया नहीं, सिर्फ वजन दिया। सीमा की आँखें खुली रहीं। मुँह से गाली और कराह एक साथ निकलीं।
राजू ने गति बढ़ाई। सीमा की एड़ियाँ उसकी कमर पर जकड़ गईं। पसीना उसकी पलकों में घुसा। उसने आँखें बंद कीं और एक लंबी आवाज निकाली जो गले के अंदर से आई। शरीर लहराया। अंदर की पकड़ इतनी तेज हुई कि राजू भी रुक गया, फिर और जोर से धकेला।
सीमा उठी। उसने राजू का हाथ पकड़कर भट्ठी के मुँह के पास खींचा। गर्मी चेहरे पर पड़ी। लाल रोशनी ने दोनों के शरीर को रंग दिया। सीमा झुकी, हाथ भट्ठी की ईंट पर टिकाए, कमर बाहर निकाली। राजू ने फिर से घुसाया। इस बार कोण ऐसा था कि हर बार अंत तक जाता।
सीमा ने कहा, नाम लेकर गाली दे। मेरा नाम लेकर। अपने लंड का नाम लेकर। मैं सुनूँगी। राजू ने सुनाया। शब्द भारी थे, गंदे थे, और सीमा के शरीर को और खोलते गए। उसने पीछे हाथ बढ़ाकर राजू की जाँघ पकड़ी और खुद को और पीछे धकेला।
बारिश तेज हुई। छत से एक बूँद सीधी सीमा की पीठ पर गिरी और भाप बनकर उठी। राजू ने उस भाप को चाटा। जीभ पीठ की हड्डी के गड्ढ़े में चली। फिर नीचे, जहाँ दोनों शरीर जुड़ रहे थे। उसने बाहर निकाला, जीभ घुमाई, फिर से घुसाया। सीमा की आवाज टूट गई।
उन्होंने मुद्रा बदली। सीमा राजू की गोद में बैठ गई, आमने सामने। भट्ठी की रोशनी उनके चेहरों पर। सीमा ने राजू के कंधे काटे। दाँत के निशान रहे। राजू ने उसके नितंब दोनों हाथों से फैलाए और नीचे से उपर ठोके। सीमा की स्तन उसके मुँह में आ गए। उसने दोनों को बारी बारी चूसा, काटा, जीभ घुमाई।
समय का पता नहीं चला। शरीर थके लेकिन रुके नहीं। राजू ने सीमा को फिर दीवार से सटाया। एक पैर उसके कंधे पर। इस कोण में सीमा की साँस अटक गई। उसने राजू का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा और माथा से माथा मिलाया। पसीना मिला। साँस मिली।
सीमा फुसफुसाई, निकाल मत। अंदर। आज हिसाब नहीं। राजू की गति बिगड़ी। उसने और गहरा किया। सीमा की उँगलियाँ उसकी पीठ पर खरोंच छोड़ गईं। दोनों एक साथ काँपे। गर्मी अंदर फैली, बाहर भाप की तरह। फ़र्श पर गिरते गिरते कुछ और भी गिरा, गाढ़ा, गरम।
वे वहीं बैठे रहे। भट्ठी की लालिमा कम हो रही थी। बारिश की आवाज धीमी पड़ी। सीमा के बाल चिपके थे। राजू की छाती उठ रही थी। सीमा ने उसका लंड हाथ में लिया जो अभी भी भारी था। धीरे धीरे फिर से सख्त किया। राजू की आँखें खुलीं।
सीमा मुस्कुराई। कहा, एक बार और। इस बार तू लेटकर। मैं उपर। मैं बताऊँगी कितना जोर चाहिए।
राजू लेटा। सीमा उसके उपर बैठी। हाथ से रास्ता बनाकर धीरे धीरे बैठी जब तक पूरा अंदर न चला गया। फिर वह हिले। पहले गोलाकार। फिर उपर नीचे। स्तन राजू के चेहरे पर झूलते। राजू ने मुँह उठाकर निप्पल पकड़ा। सीमा की कमर तेज हुई।
उसने राजू के हाथ अपने गले पर रखे। दबा। थोड़ा और। साँस की कमी ने शरीर को और संवेदनशील कर दिया। हर बैठक पर वह काँपती। राजू नीचे से धक्का देता। दोनों की आवाज अब शेड की दीवारों से टकराकर लौटती।
सीमा झुकी। बाल राजू के चेहरे पर गिरे। उसने कान में कहा, कल जब भट्ठी जलेंगी, तू फूँकेगा और मैं देखूँगी। याद रखना यह गर्मी। यह पकड़। यह गाली।
राजू ने कमर पकड़कर उसे और जोर से बैठाया। सीमा की आवाज फिर टूटी। दूसरी बार शरीर ने मान लिया। अंदर की नमी फिर बह निकली। राजू भी रुक न सका। दोनो चिपके रहे जब तक काँपना बंद न हुआ।
वे कपड़े पहनने लगे। साड़ी गीली थी। ब्लाउज के बटन दो टूट चुके थे। राजू की पैंट का फीता कमजोर पड़ गया था। सीमा ने चाबी स्तनों के बीच से निकाली। ताला खोला। बारिश अब रिमझिम थी। गली में पानी उतर रहा था।
बाहर हवा ठंडी लगी। सीमा ने राजू की कलाई दबाई। कहा, रजिस्टर में आज की शिफ्ट खाली छोड़ देना। मैं सुबह लिख दूँगी कि भट्ठी ठंडी थी, काम नहीं हुआ।
राजू ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में अभी भी वह लाल रोशनी थी। सीमा मुड़ी और पानी भरी गली में चल दी। पीठ पर राजू के नाखूनों के निशान कपड़े के नीचे जल रहे थे। हर कदम पर शरीर याद दिलाता रहा कि अंदर अभी भी भरा हुआ है।
दूसरे दिन भट्ठी जली। काँच पिघला। राजू ने फूँका। सीमा ने टुकड़े जाँचे। उनके हाथ एक दूसरे के पास से गुजरे जब एक गिलास का मुँह नापा जा रहा था। कोई नहीं देखा कि उंगलियाँ एक पल ज्यादा रुकीं। कोई नहीं सुना कि सीमा ने बहुत धीमे स्वर में वही गाली दोहराई जो रात शेड में गूँजी थी।
पति जब कानपुर से आया तो सीमा ने कहा कि बारिश में भट्ठी ठंडी रही, काम कम हुआ। पति थक कर सो गया। रात को सीमा खिड़की के पास खड़ी रही। सामने वाली छत पर राजू का साया एक पल को दिखा और गायब हो गया। सीमा की उंगलियाँ साड़ी के पल्लू के नीचे चली गईं। शरीर ने फिर से वही गर्मी माँगी जो रजिस्टर में नहीं चढ़ती।
तीसरे हफ्ते फिर ईंधन कम हुआ। मालिक ने फिर भट्ठी ठंडी करने को कहा। सीमा ने चाबी पहले ही जेब में रख ली थी। राजू शेड के पीछे इंतजार कर रहा था। बारिश इस बार हल्की थी लेकिन भाप वही थी। ताला फिर अंदर से लगा। भट्ठी की बची लालिमा ने फिर दोनों को रंग दिया।
इस बार राजू ने रस्सी इस्तेमाल की जो काँच की नली बाँधने के काम आती थी। सीमा के हाथ पीछे बँधे। मुँह पर उसका ही पल्लू। आवाज दबी रही लेकिन शरीर ने सब कह दिया। धक्के और गहरे हुए। फ़र्श पर पसीने के घेरे और बड़े बने। जब रस्सी खुली तो कलाई पर निशान थे जो चूड़ी से छिप गए।
सीमा ने उस रात राजू से कहा, तू फूँकने वाला है। मैं जाँचने वाली। जो चीज भट्ठी से निकलती है उसका हिसाब मैं रखती हूँ। जो चीज हमारे बीच से निकलती है उसका हिसाब कोई नहीं रखेगा। याद रखना।
राजू ने जवाब में केवल उसे और कसकर पकड़ा। दोनो फिर दीवार से सटे। फिर फ़र्श पर। फिर भट्ठी के मुँह की गर्म ईंटों के पास। रात लंबी थी। शरीर ने बार बार माँग की और बार बार दिया। जब ताला खुला तो गली में सवेरा नहीं, सिर्फ धुंधली रोशनी थी जिसमें काँच के टुकड़े सितारों जैसे चमकते थे।
फिरोजाबाद की वह गली अब भी भाप उगलती है जब बारिश भट्ठी की पुरानी गर्मी से टकराती है। लोग कहते हैं कि ठंडी भट्ठी के दिन काम नहीं होता। सीमा के रजिस्टर में भी वही लिखा रहता है। लेकिन शेड के अंदर की दीवारें जानती हैं कि कुछ हिसाब काँच पर नहीं, शरीर पर उतरते हैं, और वे हिसाब धुलते नहीं।
सीमा जब कभी अकेली भट्ठी के पास खड़ी होती है तो उसकी हथेली ईंट पर रख देती है। गर्मी बाकी रहती है। उसी गर्मी में राजू की पकड़ याद आती है, गाली याद आती है, और वह भीगना याद आता है जो बारिश से अलग था। पति के आने की तारीख कैलेंडर पर होती है। राजू की रातें रजिस्टर के खाली खानों में छिपी रहती हैं।
एक शाम मालिक ने कहा कि अगले महीने नई मशीन आएगी। फूँकने का काम कम हो जाएगा। सीमा की पलक नहीं हिली। उसने केवल इतना कहा कि पुरानी भट्ठी जब तक ठंडी की जाएगी, जाँच का काम तो रहेगा। राजू पीछे खड़ा सुन रहा था। दोनों की नजर मिली। कोई मुस्कुराहट नहीं। केवल एक वादा जो शब्द नहीं बनता।
रात हुई। बारिश नहीं हुई। फिर भी शेड में भाप उठी। ताला अंदर से लगा। इस बार उन्होंने बात कम की। शरीर ज्यादा बोला। गालियाँ कम, साँस ज्यादा। आखिर में सीमा ने राजू का सिर अपने पेट पर रखा। पेट के नीचे अभी भी धड़कन थी। राजू की साँस उस धड़कन से मिल गई।
बाहर गली सो रही थी। काँच के ढेर चाँदनी में सफेद लग रहे थे। सीमा ने सोचा कि कुछ चीजें पिघलती हैं और नया रूप लेती हैं। कुछ चीजें ठंडी होकर भी अंदर से लाल रहती हैं। वह दोनों में से दूसरी थी। राजू भी। भट्ठी भी।
सुबह रजिस्टर खुला। खाना खाली था। सीमा ने कलम उठाई और लिखा, भट्ठी ठंडी। उत्पादन शून्य। गुणवत्ता जाँच स्थगित। कलम की स्याही सूख गई। उंगलियों की गंध अभी भी काँच और पसीने की थी। उसने दराज बंद की। शिफ्ट शुरू हुई। जीवन चलता रहा। शेड का ताला जेब में ठंडा पड़ा रहा, जैसे कोई चाबी इंतजार कर रही हो अगली बारिश की, अगली ठंडी भट्ठी की, अगली उस रात की जिसका कोई कॉलम नहीं होता।
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