गाँव के उस अंधेरे कमरे में जब देह ने सारी मर्यादाएँ जला दीं रात का गहरा अंधेरा खाली मकान और दो शरीर जिन्होंने सब कुछ राख कर दिया
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। गाँव में अंधेरा पसरा हुआ था। ज्यादातर घरों की लाइटें बुझ चुकी थीं।
कमला अपने मायके के पुराने मकान में अकेली थी। पति शहर गया हुआ था। सास-ससुर भी रिश्तेदारों के यहाँ रुके थे। घर पूरी तरह खाली। तभी आँगन में हल्की सी आहट हुई।
दरवाजे पर दस्तक नहीं हुई। सीधा किवाड़ खुला और सुरेश अंदर आ गया। गाँव का ही लड़का, लेकिन सालों से शहर में था। आज वापस आया था। कमला ने दीया की रोशनी में उसका चेहरा पहचाना।
“इतनी रात को?” कमला की आवाज में घबराहट थी।
सुरेश ने किवाड़ बंद किया और सिटकिनी लगा दी। “तभी तो आया हूँ।”
वह पास आया। कमला पीछे हटती गई जब तक उसकी पीठ दीवार से नहीं लगी। सुरेश ने उसका गला पकड़ा और जोर से चूमा। चुंबन में कोई नरमी नहीं थी। दाँत, जीभ, सब कुछ। कमला की साड़ी का पल्लू एक झटके में उतर गया।
सुरेश ने उसका ब्लाउज दोनों हाथों से पकड़कर फैला दिया। हुक टूट गए। ब्रा को ऊपर उठाया और दोनों स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लेकर दाँतों से काटा। कमला की सिसकी निकल गई।
“सुरेश… मत करो… कोई सुन लेगा…”
“कोई नहीं सुनने वाला,” सुरेश ने कहा और उसके निप्पल को और जोर से चूसा। कमला की कमर अपने आप आगे बढ़ गई।
सुरेश ने उसे उठाया और अंदर वाले कमरे में ले गया। चारपाई पर पटक दिया। साड़ी और पेटीकोट एक साथ खींचकर फेंक दिए। पैंटी को फाड़ दिया। कमला की जाँघें काँप रही थीं।
सुरेश ने उसकी जाँघें फैलाईं और बिना किसी देरी के अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी। कमला की कमर जोर से उछली। सुरेश की जीभ तेज और अनुभवी थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, फिर तीन उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिला रहा था। कमला के नाखून चारपाई की रस्सी में गड़ गए।
“आह्ह… सुरेश… रुक…”
सुरेश नहीं रुका। उसकी जीभ और उंगलियाँ और तेज हो गईं। कमला का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसकी आवाज दबाने के बावजूद कमरे में गूँज गई।
सुरेश ऊपर आया। उसने अपनी धोती खोल दी। कमला की आँखें उसके मोटे, कड़े अंग पर फट गईं। सुरेश ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
कमला चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत जोर से… दर्द हो रहा है…”
सुरेश रुका नहीं। उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। चारपाई जोर-जोर से चरमरा रही थी। हर धक्का इतना गहरा था कि कमला की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। सुरेश ने उसके दोनों स्तनों को पकड़ रखा था और निप्पल्स को मरोड़ रहा था।
“बोल… कैसा लग रहा है?” सुरेश ने गुर्राते हुए पूछा।
कमला की आवाज टूट रही थी। “अच्छा… और जोर से करो…”
सुरेश ने उसकी टाँगें और फैला दीं और पूरी ताकत से मारने लगा। कमला की आवाजें अब नहीं रुक रही थीं। सुरेश ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया।
थोड़ी देर बाद सुरेश ने उसे पलटा। कमला अब घुटनों के बल थी। सुरेश ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने कमला के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ कमला की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
सुरेश ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। आवाज पूरे मकान में गूँज गई। कमला और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी।
“पूरा ले लो… तोड़ दो मुझे…” कमला चिल्ला रही थी।
सुरेश ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी शक्ति लगा दी। कमला का दूसरा चरम इतना तेज था कि उसके पैर लड़खड़ा गए। सुरेश ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा अंश उसके अंदर भर गया।
दोनों चारपाई पर गिरे पड़े थे। पसीने से लथपथ। कमला की साँसें अभी भी तेज चल रही थीं।
सुरेश ने उसका स्तन सहलाते हुए कहा, “आज रात यहीं रुकोऊँगा।”
कमला चुप रही। फिर धीरे से बोली, “रुक जा… सुबह तक।”
रात के दो बजे दोनों ने फिर से एक-दूसरे को लिया। इस बार कमला खुद सुरेश के ऊपर बैठ गई। उसने उसका अंग अपने अंदर लिया और जोर-जोर से ऊपर-नीचे होने लगी। सुरेश के हाथ उसके स्तनों पर थे। कमला की आँखें बंद थीं और मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं।
सुरेश ने उसकी कमर पकड़ ली और नीचे से धक्के लगाने लगा। कमला की गति और तेज हो गई। तीसरा चरम दोनों का एक साथ आया। कमला सुरेश की छाती पर गिर गई।
सुबह चार बजे सुरेश ने फिर से कमला को पेट के बल लिटाया और पीछे से लिया। इस बार और भी बेकाबू। थप्पड़, बाल खींचना और गहरे धक्के। कमला की आवाजें अब दबाने की कोशिश भी नहीं कर रही थीं।
जब सुरेश ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, कमला का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। जाँघों के अंदर उसका अंश बह रहा था। नितंबों पर थप्पड़ों के लाल निशान थे। गले और स्तनों पर दाँतों के निशान थे।
सुरेश ने उसके बालों में उँगली फेरते हुए कहा, “मैं शहर वापस जा रहा हूँ… लेकिन जब भी आऊँगा, यहीं आकर तुझे लूँगा।”
कमला ने आँखें बंद किए हुए जवाब दिया, “आ जाना… दरवाजा खुला रहेगा।”
सुरेश मुस्कुराया। गाँव के उस अंधेरे कमरे में उस रात जो आग लगी थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी। दोनों जानते थे—ये सिर्फ शुरुआत है।
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