गाँव की उस उजड़ी कोठरी में जब देह ने सारी मर्यादाओं को जलाकर राख कर दिया
दोपहर के तीन बज रहे थे। गाँव में गर्मी अपनी चरम पर थी। खेतों में कोई नहीं था। ज्यादातर लोग घरों के अंदर दुबके हुए थे।
सुमित्रा पुरानी कोठरी में बैठी थी। सास-ससुर बाजार गए थे। पति शहर में मजदूरी कर रहा था। घर पूरी तरह खाली। तभी किवाड़ पर हल्की सी आहट हुई।
भोला अंदर आ गया। गाँव का ही लड़का, लेकिन शहर से लौटा था। शरीर मजबूत, आँखों में वो बात जो गाँव के और मर्दों में नहीं होती। उसने किवाड़ बंद किया और सिटकिनी लगा दी।
सुमित्रा उठी। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। भोला पास आया। सुमित्रा पीछे नहीं हटी। भोला ने उसका गला पकड़ा और जोर से चूमा। चुंबन में कोई नरमी नहीं थी। दाँत टकराए, जीभ अंदर तक चली गई। सुमित्रा की साड़ी का पल्लू एक झटके में उतर गया।
भोला ने उसका ब्लाउज दोनों हाथों से पकड़कर फैला दिया। हुक टूट गए। ब्रा को ऊपर उठाया और दोनों स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लेकर दाँतों से काटा। सुमित्रा की सिसकी निकल गई।
“भोला… कोई आ जाएगा…”
“कोई नहीं आएगा,” भोला ने कहा और उसके निप्पल को और जोर से चूसा। सुमित्रा की कमर अपने आप आगे बढ़ गई।
भोला ने उसे चारपाई पर पटक दिया। साड़ी और पेटीकोट एक साथ खींचकर फेंक दिए। पैंटी को फाड़ दिया। सुमित्रा की जाँघें काँप रही थीं। भोला ने उसकी जाँघें फैलाईं और बिना किसी देरी के अपनी जीभ उसके बीच में धँस दी।
सुमित्रा की कमर जोर से उछली। भोला की जीभ तेज और अनुभवी थी। वह क्लिट को जोर-जोर से चूस रहा था, फिर तीन उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिला रहा था। सुमित्रा के नाखून चारपाई की रस्सी में गड़ गए।
“आह्ह… भोला… रुक…”
भोला नहीं रुका। उसकी जीभ और उंगलियाँ और तेज हो गईं। सुमित्रा का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसकी आवाज कोठरी में गूँज गई।
भोला ऊपर आया। उसने अपनी धोती खोल दी। सुमित्रा की आँखें उसके मोटे, कड़े अंग पर फट गईं। भोला ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुस गया।
सुमित्रा चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत जोर से… दर्द हो रहा है…”
भोला रुका नहीं। उसने कमर पकड़कर पूरी ताकत से धक्के लगाने लगे। चारपाई जोर-जोर से चरमरा रही थी। हर धक्का इतना गहरा था कि सुमित्रा की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। भोला ने उसके दोनों स्तनों को पकड़ रखा था और निप्पल्स को मरोड़ रहा था।
“बोल बहू… कैसा लग रहा है?” भोला ने गुर्राते हुए पूछा।
सुमित्रा की आवाज टूट रही थी। “अच्छा… और जोर से करो…”
भोला ने उसकी टाँगें और फैला दीं और पूरी ताकत से मारने लगा। सुमित्रा की आवाजें अब नहीं रुक रही थीं। भोला ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया।
थोड़ी देर बाद भोला ने उसे पलटा। सुमित्रा अब घुटनों के बल थी। भोला ने पीछे से फिर से अंदर घुस गया—इस बार और गहरा। उसने सुमित्रा के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ सुमित्रा की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
भोला ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। आवाज कोठरी में गूँज गई। सुमित्रा और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी।
“पूरा ले लो भोला… तोड़ दो…”
भोला ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी शक्ति लगा दी। सुमित्रा का दूसरा चरम इतना तेज था कि उसके पैर लड़खड़ा गए। भोला ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा अंश उसके अंदर भर गया।
दोनों चारपाई पर गिरे पड़े थे। पसीने से लथपथ। सुमित्रा की साँसें अभी भी तेज चल रही थीं।
भोला ने उसका स्तन सहलाते हुए कहा, “आज रात फिर आऊँगा।”
सुमित्रा चुप रही। फिर धीरे से बोली, “आ जाना… किवाड़ खुला छोड़ दूँगी।”
रात के ग्यारह बजे भोला फिर आया। इस बार सुमित्रा ने खुद किवाड़ खोला। साड़ी पहने थी, लेकिन अंदर कुछ नहीं। भोला ने उसे देखते ही उठा लिया और चारपाई पर ले जाकर पटक दिया।
इस बार कोई धीरे-धीरे वाला खेल नहीं था। भोला ने उसकी साड़ी फाड़ दी और सीधे अंदर घुस गया। सुमित्रा की टाँगें उसकी कमर के चारों ओर लिपट गईं। भोला जोर-जोर से धक्के लगा रहा था। चारपाई इतनी जोर से चरमरा रही थी कि लगता था टूट जाएगी।
सुमित्रा अब खुद अपनी टाँगें और फैला रही थी। “और अंदर… पूरा…”
भोला ने उसकी दोनों टाँगें हवा में उठा लीं और खड़े होकर मारने लगा। सुमित्रा का शरीर पूरी तरह उसके हाथों में था। हर धक्का इतना गहरा था कि सुमित्रा की आँखें पीछे की ओर फिर रही थीं।
तीसरा चरम दोनों का एक साथ आया। सुमित्रा की आवाज इस बार कोठरी की खामोशी में गूँज गई। भोला ने उसके अंदर ही छोड़ दिया और कुछ देर तक उसी पोजीशन में रहा।
सुबह होने से पहले भोला ने चौथी बार सुमित्रा को लिया। इस बार पीछे से, बाल पकड़कर, थप्पड़ मारते हुए। सुमित्रा की आवाजें अब दबाने की कोशिश भी नहीं कर रही थीं।
जब भोला ने आखिरी बार उसके अंदर छोड़ा, सुमित्रा का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। जाँघों के अंदर उसका अंश बह रहा था। नितंबों पर थप्पड़ों के गहरे लाल निशान थे। गले और स्तनों पर दाँतों के निशान थे।
भोला ने उसके बालों में उँगली फेरते हुए कहा, “मैं शहर वापस जा रहा हूँ… लेकिन जब भी गाँव आऊँगा, सबसे पहले यहीं आकर तुझे लूँगा।”
सुमित्रा ने आँखें बंद किए हुए जवाब दिया, “आ जाना… कोठरी तेरा इंतजार करेगी।”
भोला मुस्कुराया। गाँव की उस उजड़ी कोठरी में उस दिन जो आग लगी थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी। दोनों जानते थे—ये सिर्फ शुरुआत है।
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