मथुरा की पुरानी साझी गली के साझा आंगन की छत पर बरसात की आधी रात विवाहित मालती ने पड़ोसी हारमोनियम वाले को वह राग दिया जो किसी पूजा की घंटी या पति की डायरी में कभी नहीं लिखा जाता
मथुरा की वह गली जो द्वारिकाधीश मंदिर से पीछे छूटती है, उसमें आज भी ब↠ड़ी सुबह नहीं आती। पीपल के पेड़ आंगन में गिरे हुए हैं। चार घरों पर कपड़े सुखते हैं। छत एक ही है जिसका चौखड़ा दोनों घरों के बीच में बँटा है। नीचे पे मालती का घर है। उसके पति हरिओम कबीर के गोदाम में काम करते हैं। उनके पास केशव रहता है। केशव हारमोनियम ठीक करता है और कभी कभी मंदिर के मंदिरों को राग सिखाता है।
मालती आठ साल की थी। दो बच्चे की माँ थीं। उसकी कमर में अभी वह गर्माई बची बची हुई थी जो ब्याह के बाद पहली बार में छिप जाती है। हरिओम उसे बच्चों की तरह देखता। लेकिन खरीदता। रात को खर्राटे के बाद के पलट पर सो जाता। उसकी उंगलियों में कभी अगली नहीं थी। सोने में जब केशव का हारमोनियम आता, मालती के हाथ रुक जाते। वह आवाज उसकी हड्डी में उतरता रहता। उसकी छाती में कंपन उठ जाता।
बरसात उस रात भारी थी। आंगन में पानी जमा था। छत पर कपड़े भीग हो गए थे। मालती ने बच्चों की तिनकी छत पर उठाई थी क्योंकि उन्हें गीली से न भीगें। केशव भी वहीं आया। उसके हाथ में फटा और कान्धे की गंध थी। मालती ने कहा, आज छत पर कपड़े गीले तो उतर जाएंगे। केशव ने जवाब दिया, आप गीले हो जाएंगे तो मेरे पास आजाइए। उसकी आवाज में एक हलकी थी जो मालती के पेट में उतरी।
दोनों के बीच में पानी खड़ी रही थी। मालती की साड़ी गीली हो गई थी। केशव ने उसकी कमर पर हाथ रखा। मालती की साँस रुक गई। उसने कहा, मत करो। यहाँ कोई देख सकता है। केशव ने कहा, मैं देख रहा हूँ। तुम देखना चाहती हो। उसकी आवाज में उतराहट था। मालती के मन में डर पड़ गया। वह डर उसी रात का डर था जो सालों से दबा हुआ था।
केशव ने उसकी कमर पर मुँह मारा। मालती के होठों से एक हलकी सी निकली। उसके स्तन के नीचे भीगे हो गए थे। केशव ने उन्हें चूमा। मालती की कमर कंपने लगी। वह चूमना उसके शरीर में उतरा। पैस्ट के कपड़े पर उतरा। पेट की खुली पर उतरा। गर्दन पर उतरा। मालती के मुँह से आवाज निकल गई। उसने केशव का हाथ पकड़ा। केशव के हाथ में मालती की कमर की गर्मी थी।
मालती ने कहा, हरिओम कल आ रहे हैं। यह गलत है। केशव ने कहा, मैं जानता हूँ। तुम भी जानती हो। यह रात हमारी है। मालती की साँस फिर गई। उसकी आँखें काँपने लगीं। केशव ने उन आँखों को चूमा। मालती की कमर कंपने लगी। वह चूमना उसके गले में उतरा। कन पर, गले की जड़ पर, और गर्दन पर। मालती के मुँह से एक औ आवाज निकली। केशव ने उस आवाज को चूस कर पी लिया।
दोनों ने कपड़े खींचे। केशव ने मालती की साड़ी को कमर से उतारा। उसकी छाती के नीचे काला धब्बा था। मालती ने दाँत दबाई। उसकी उंगलियाँ सट गईं। केशव ने उन्हें औ ज़ोर से दबाया। मालती के शरीर में गर्मी दौड़ उठी थी। केशव की जीभ उस गर्मी पर पड़ गई। मालती की साँस में कंपन और शर्म दोनों का खेल था। वह खेल उसे औ भी अच्छा लगा।
केशव ने मालती को छत की खुली पर लिटाया। पीठ की गीली से भीगी हो गई थी। केशव ने उसे चूमा। मालती के मुँह में उसकी जीभ आ गई। वह चूसना उसके मोटे में बी उतरा जैसे कोई प्यासा लगी हो। केशव ने उसकी साड़ी को औ खोल दिया। छाती के नीचे काले खुल गए। मालती की साँस में कंपन और शर्म दोनों का खेल था। केशव ने उसकी तरह पर हाथ फेरा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी।
केशव ने कहा, आज रात मैं तुम्हें अंदर तक चाहूंगा। मालती ने उसका बाल पकड़ा। उसकी उंगलियाँ में केशव का लुंब पूरी तरह से गुजर रहा था। वह आवाज को अंदर तक ले आई। केशव ने उसके मुँह में अपना लीया। मालती की पीठ अभी गीली से भरी हुई थी। केशव ने उसे चूसा, पीचा, चूसा। मालती के नखून से आवाजें निकल रही थीं। केशव ने उन आवाजों को चूसा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी।
केशव ने उसकी टाँगें दबाईं। मालती की पीठ के नीचे केशव की जीभ और उसकी गर्मी दोनों की गर्मी मिल गई। मालती ने केशव का हाथ पकड़ा। उसकी उंगलियाँ कस गईं। केशव ने उसे औ ज़ोर से भरा। छाती के नीचे भीगी छत की ईंट पर गिरी। केशव ने उसे उठाया, दबाया, उठाया। मालती के मुँह से आवाज निकल रही थी। केशव ने उन आवाजों को पीने पीने चूसा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी।
मालती ने कहा, मेरी शादी लोग बोलती है। पति कल आ नहीं देखता। केशव ने कहा, आज तुम मेरे पास हो तो शादी की बात मत करो। मैं तुम्हें देख रहा हूँ। मालती की आँखें बंद हो गईं। केशव ने उन आँखों को पकड़ा। मालती ने उसका बाल पकड़ा। उसकी उंगलियाँ में दर्द और सुख दोनों का मिला हुआ था। केशव ने उसे पीछे से पकड़ा। मालती की छाती के नीचे भीगी छत की ईंट पर गिरी।
नीचे पे हरिओम सो रहा था। मालती को पता नहीं था। केशव की माँ भी सो रही थी। दोनों घरों की खिड़कियाँ बंद थीं। मालती की साड़ी के नीचे केशव की जीभ इतनी तेजी से चल रही थी। केशव ने उसे पीछे से पकड़ा। मालती की उंगलियाँ में दर्द और सुख दोनों का मिला हुआ था। केशव ने मालती को गोद में लिटाया। मालती की पीठ अभी गीली से भरी हुई थी। केशव ने उसे चूसा। मालती के नखून से आवाजें निकलीं।
केशव ने उन आवाजों को चूसा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी। केशव ने उसकी टाँगें दबाईं। मालती की पीठ के नीचे केशव की जीभ और उसकी गर्मी दोनों की गर्मी मिल गई। मालती ने केशव का हाथ पकड़ा। उसकी उंगलियाँ कस गईं। केशव ने उसे औ ज़ोर से भरा। छाती के नीचे भीगी छत की ईंट पर गिरी। केशव ने उसे उठाया, दबाया, उठाया। मालती के मुँह से आवाज निकल रही थी। केशव ने उन आवाजों को पीने पीने चूसा।
मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी। रात गहरी होती गई। बरसात थम गई। छत पर दोनों के शरीर गिले हुए थे। मालती की आँखें बंद हो गईं। केशव ने उसकी कमर पर हाथ रखा। मालती ने उसका बाल पकड़ा। उसकी उंगलियाँ में केशव का लुंब पूरी तरह से गुजर रहा था। वह आवाज को अंदर तक ले आई। केशव ने उसके मुँह में अपना लीया। मालती की पीठ अभी गीली से भरी हुई थी। केशव ने उसे चूसा, पीचा, चूसा।
सुबह होते होते आंगन में उतरी। मालती और केशव छत पर बैठे रहे थे। मालती की साड़ी के नीचे केशव की जीभ इतनी तेजी से चल रही थी। केशव ने उसे पीछे से पकड़ा। मालती की उंगलियाँ में दर्द और सुख दोनों का मिला हुआ था। केशव ने मालती को गोद में लिटाया। मालती की पीठ अभी गीली से भरी हुई थी। केशव ने उसे चूसा। मालती के नखून से आवाजें निकलीं। केशव ने उन आवाजों को चूसा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी।
केशव ने उसकी टाँगें दबाईं। मालती की पीठ के नीचे केशव की जीभ और उसकी गर्मी दोनों की गर्मी मिल गई। मालती ने केशव का हाथ पकड़ा। उसकी उंगलियाँ कस गईं। केशव ने उसे औ ज़ोर से भरा। छाती के नीचे भीगी छत की ईंट पर गिरी। केशव ने उसे उठाया, दबाया, उठाया। मालती के मुँह से आवाज निकल रही थी। केशव ने उन आवाजों को पीने पीने चूसा। मालती की कमर काँपने लगी। वह चीखने लगी। रात गहरी होती गई। बरसात थम गई।
सुबह ने आंगन को धोया दिया। मालती और केशव ने कपड़े उठाए। जैसे कपड़े उठाना उनका काम था। मालती की साड़ी के नीचे केशव की जीभ इतनी तेजी से चल रही थी। केशव ने उसे पीछे से पकड़ा। मालती की उंगलियाँ में दर्द और सुख दोनों का मिला हुआ था। केशव ने मालती को गोद में लिटाया। मालती की पीठ अभी गीली से भरी हुई थी। केशव ने उसे चूसा। मालती के नखून से आवाजें निकलीं।
वह राग जो उन्होंने उस रात गाया, वह न पूजा की घंटी में बजा, न हरिओम की डायरी में। वह सिर्फ आंगन की छत पर रह गया। जहाँ पीपल के पेड़ बारिश के बाद भी गिरे हुए थे। जहाँ दो घरों की दीवारें एक दूसरी में खुली रहती रहीं। मालती ने अगली सुबह में अपने कपड़े उठाए। केशव ने अपना हारमोनियम बजाया। लेकिन ने कुछ नहीं पूछा। पर छत ने वह सब देख लिया जो लिखा नहीं जाता। आज भी जब मालती छत पर कपडे सुखाती है, उसकी कमर में वही गर्मी बची रह जाती है जो केशव के हाथ में उतरी थी।
मालती की शादी में अब भी वही रात रही है। हरिओम जब कबीर से लौटता है तो मालती उसे चाय देती है। लेकिन को सुबह में जल्दी देती है। पर जब छत पर अंधेरा होता है तो उसकी नजर केशव की और तरफ जाती है। वह तरफ कोई पूजा की घंटी में नहीं बजती। वह कोई पति की डायरी में नहीं चढ़ती। वह सिर्फ मथुरा की उस गली की छत पर रहती है जहाँ दो घर एक दूसरी में खुले रहते हैं और आंगन की दीवारें कुछ नहीं कहतीं।
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