Hindi Padosi Sex Kahani: छत वाली भाभी और जिम ट्रेनर
"भाभी, आपकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा है," छत पर कपड़े सुखा रही मीरा ने पीछे मुड़कर देखा। कबीर, बगल वाले फ्लैट का चौबीस साल का लड़का, जिम बैग कंधे पर डाले सीढ़ियों पर खड़ा मुस्करा रहा था। मीरा ने झट से पल्लू संभाला, पर कबीर की नज़रें पहले ही वह देख चुकी थीं जो उसे नहीं देखना चाहिए था। यही वो शाम थी जब एक आम hindi padosi sex kahani उसके घर की छत पर शुरू हुई।
"तुम्हारी नज़रें बहुत तेज़ हैं, कबीर," मीरा ने ताना मारा, पर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। कबीर ने बैग नीचे रखा और दो कदम आगे बढ़ा। "नज़रें तेज़ नहीं, भाभी, नज़ारा ही ऐसा है।" मीरा का दिल एक धड़कन चूक गया। तैंतीस साल की उम्र में, दो बच्चों की माँ बनने के बाद, उसे किसी ने इस लहजे में बहुत दिनों बाद देखा था।
कबीर जिम ट्रेनर था। सुबह छह बजे निकलता, रात नौ बजे लौटता। मीरा ने उसे सीढ़ियों पर, लिफ्ट में, पार्किंग में सैकड़ों बार देखा था, पर आज पहली बार उसने उसे ग़ौर से देखा। गीली बनियान में चिपके चौड़े कंधे, बाज़ुओं की उभरी नसें, और वो मुस्कान जो कह रही थी कि वो जानता है कि मीरा उसे देख रही है।
"चाय पियोगे?" मीरा ने पूछा, खुद हैरान कि ये शब्द उसके मुँह से कैसे निकले। कबीर की भौहें उठीं। "भाभी के हाथ की चाय? ज़रूर।" वो उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ उतरने लगा। मीरा की साड़ी का पल्लू फिर हवा में लहराया, और इस बार उसने उसे संभालने की जल्दी नहीं की।
रसोई में चाय बनाते हुए मीरा को अपनी ही हरकत पर हैरानी हो रही थी। उसका पति राकेश महीने में बीस दिन टूर पर रहता था, और घर में सन्नाटा ही उसका साथी था। कबीर स्लैब से टिककर खड़ा उसे देख रहा था। "भाभी, आप जिम क्यों नहीं आतीं? आपकी उम्र की कई औरतें आती हैं।" मीरा हँसी। "मेरी उम्र की? मैं बूढ़ी लगती हूँ?" कबीर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। "आप बूढ़ी नहीं, भाभी। आप तो।।।" वो रुका, और मीरा की साँस थम गई।
"मैं तो क्या?" मीरा ने पूछा। कबीर ने चाय का कप उठाया, उसकी उँगलियाँ मीरा की उँगलियों को छू गईं। "आप तो वो हैं जिन्हें देखकर जिम के सारे लड़के वॉर्म-अप भूल जाते हैं।" मीरा के गाल लाल हो गए। उसने कप उठाया और पलटी, पर कबीर ने उसकी कलाई पकड़ ली। "रुको, भाभी। एक बात कहनी है।"
"क्या?" मीरा की आवाज़ काँप रही थी। कबीर ने धीरे से कहा, "जब आप छत पर कपड़े सुखाती हैं, तो मैं अपनी बालकनी से देखता हूँ। रोज़।" मीरा का दिल ज़ोर से धड़का। "तुम।।। तुम मुझे घूरते हो?" कबीर ने सिर हिलाया। "घूरता नहीं, देखता हूँ। और सोचता हूँ कि राकेश भैया कितने खुशनसीब हैं।" मीरा ने कलाई छुड़ाई। "ये गलत है, कबीर।" पर वो वहाँ से हिली नहीं।
कबीर ने एक कदम और बढ़ाया। अब वो इतना करीब था कि मीरा को उसके पसीने और डिओ की मिली-जुली खुशबू आ रही थी। "गलत क्या है, भाभी? देखना गलत है, या चाहना?" उसने मीरा के गाल पर आई लट को उँगली से हटाया। मीरा ने आँखें बंद कर लीं। तेरह साल की शादी में राकेश ने उसे इस तरह कभी नहीं छुआ था, इस चाहत से कभी नहीं देखा था।
"कबीर।।।" मीरा के होंठों से सिर्फ़ उसका नाम निकला। और फिर कबीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसके होंठ मीरा के होंठों पर थे, भूखे, बेसब्र। मीरा ने पहले विरोध किया, उसके कंधों पर हाथ मारे, पर फिर उसके हाथ कबीर के बालों में धँस गए। रसोई की स्लैब से उसकी कमर टकराई, और कबीर ने उसे स्लैब पर बैठा दिया।
कबीर की जीभ मीरा के मुँह में थी, और उसके हाथ मीरा की साड़ी के पल्लू को खींच रहे थे। पल्लू गिरा, ब्लाउज़ के हुक खुले, और मीरा की भारी छातियाँ उसके सामने थीं। कबीर ने उन्हें हाथों में भरा और दबाया। "इतनी नरम।।।" वो बुदबुदाया, और फिर उसने एक निप्पल को मुँह में ले लिया। मीरा की कमर खम हो गई। "आह।।। कबीर।।।"
मीरा ने कबीर की बनियान ऊपर खींची। उसके सीने के पसीने से भीगे मसल्स देखकर मीरा की चूत गीली होने लगी। उसने उसके सीने पर जीभ फिराई, निप्पलों को चूसा। कबीर ने उसकी साड़ी ऊपर खींची और उसकी जाँघों को सहलाने लगा। जब उसकी उँगलियाँ मीरा की पैंटी तक पहुँचीं, तो वो पूरी भीगी हुई थी।
"भाभी, आप तो पूरी तैयार हैं," कबीर मुस्कराया। मीरा ने शर्म से आँखें झुका लीं। "तेरह साल से कोई मर्द मुझे इस तरह नहीं छुआ, कबीर। मैं क्या करूँ?" कबीर ने उसकी ठुड्डी उठाई। "कुछ मत करो। बस मुझे करने दो।" उसने मीरा की पैंटी एक झटके में उतार दी और अपनी दो उँगलियाँ उसकी चूत में डाल दीं।
मीरा चीख पड़ी। कबीर की उँगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं, और उसका अँगूठा उसके दाने को रगड़ रहा था। "कबीर।।। और।।। और अंदर।।।" मीरा बड़बड़ा रही थी। कबीर ने उँगलियाँ और तेज़ कीं, और मीरा का बदन काँपने लगा। उसका रस कबीर के हाथ पर बह निकला। "पहली बार में ही झड़ गईं, भाभी?" कबीर हँसा। "अभी तो असली खेल बाकी है।"
मीरा ने कबीर के लोअर का नाड़ा खोला। उसका लंड बाहर निकला, लंबा, मोटा, तना हुआ। मीरा ने उसे हाथ में लिया और सहलाने लगी। "इतना बड़ा।।।" वो बुदबुदाई। कबीर ने उसे स्लैब से उतारा और घुटनों के बल बैठाया। "चूसो, भाभी।" मीरा ने उसका लंड मुँह में लिया।
वो उसे चूसती रही, जीभ से उसके टोपे को सहलाती, होंठों से उसे अंदर-बाहर करती। कबीर के मुँह से गहरी आहें निकलने लगीं। उसने मीरा के बाल पकड़े और उसके मुँह को अपने लंड पर दबाया। "भाभी।।। तुम्हारा मुँह।।।" मीरा ने उसे और अंदर लिया, गले तक, और कबीर काँपने लगा। पर उसने खुद को रोका। "नहीं, अभी नहीं। मैं तुम्हारी चूत में झड़ना चाहता हूँ।"
कबीर ने मीरा को उठाया और बेडरूम की तरफ़ ले गया। मीरा ने उसे रोका। "नहीं, बेडरूम में नहीं। वहाँ राकेश की तस्वीर है।" कबीर समझ गया। उसने मीरा को सोफ़े पर लिटाया, उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं, और अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा। मीरा ने उसकी आँखों में देखा और सिर हिलाया।
एक धक्का, और वो उसके अंदर था। मीरा चीखी। तेरह साल बाद किसी मर्द का लंड उसकी चूत में था, और वो इतना बड़ा था कि उसे लगा वो फट जाएगी। "धीरे।।। कबीर।।। धीरे।।।" कबीर ने धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ मीरा की चूत उसे और अंदर खींचती। "भाभी, तुम्हारी चूत कितनी टाइट है।।।" कबीर हाँफ रहा था।
धीरे-धीरे धक्के तेज़ हुए। मीरा की चीखें कमरे में गूँजने लगीं। "हाँ।।। ऐसे ही।।। और ज़ोर से।।। मुझे चोदो कबीर।।।" उसके नाखून कबीर की पीठ पर निशान छोड़ रहे थे। कबीर ने उसकी एक टाँग ऊपर उठाई और और गहरा घुसा। मीरा का बदन काँपने लगा। "मैं।।। मैं फिर आने वाली हूँ।।।"
फिर मीरा ने कबीर को धक्का दिया और वो सोफ़े पर पीठ के बल गिरा। "अब मेरी बारी," वो बोली, और उसके लंड पर बैठ गई। उसने उसे अपनी चूत में लिया और ऊपर-नीचे होने लगी। कबीर ने उसकी कमर पकड़ रखी थी और नीचे से धक्के मार रहा था। मीरा के मम्मे उछल रहे थे, और कबीर ने एक को मुँह में ले लिया। "भाभी, तुम तो पूरी रंडी बन गई हो," वो हँसा। "तेरे लिए," मीरा हाँफते हुए बोली।
मीरा की रफ़्तार बढ़ती गई। उसकी चूत कबीर के लंड को निचोड़ रही थी। "कबीर।।। मैं।।।" वो चिल्लाई, और एक ज़ोरदार झटके के साथ वो झड़ी। कबीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और उसे सोफ़े पर लिटा दिया। "अभी एक बार और, भाभी," वो बोला। "आज रात मैं तुम्हें पूरी तरह थका दूँगा।" मीरा ने थकी हुई मुस्कान के साथ अपनी टाँगें फिर खोल दीं।
कबीर ने उसे पलटाया। मीरा सोफ़े पर घुटनों के बल हुई, और कबीर पीछे से उसमें घुसा। इस पोज़ में वो और गहरा गया। उसने मीरा के बाल पकड़े और उसे अपनी तरफ़ खींचा। "बोलो, भाभी, किसका लंड अच्छा है? राकेश भैया का या मेरा?" मीरा बड़बड़ाई, "तेरा।।। तेरा लंड।।। और ज़ोर से चोद।।।" कबीर के धक्के और तेज़ हो गए।
मीरा का बदन ऐंठने लगा। उसकी चूत ने कबीर के लंड को कसा, और वो ज़ोर से झड़ी, उसका रस बह निकला। उसके साथ ही कबीर भी छूटा, उसका गर्म पानी उसके अंदर उतरता गया। दोनों हाँफते हुए सोफ़े पर ढेर हो गए। मीरा कबीर के सीने पर सिर रखकर लेटी थी, और कबीर उसके बाल सहला रहा था।
"ये गलत था," मीरा बुदबुदाई। कबीर ने उसके माथे को चूमा। "गलत होता तो इतना अच्छा क्यों लगता, भाभी?" मीरा मुस्कराई। "कल शाम को छत पर आना। कपड़े सुखाने।" कबीर की आँखें चमकीं। "पक्का?" मीरा ने उसकी छाती पर उँगली से लिखा: "पक्का। और इस बार पल्लू नहीं संभालूँगी।" दोनों हँस पड़े, और मीरा ने चाय के ठंडे कप उठा लिए। कबीर ने जाते हुए उसके गाल पर एक हल्का सा बोसा दिया। "भाभी, एक बात याद रखना," वो दरवाज़े पर रुककर बोला। "जिम में मैं रोज़ कितनी ही लड़कियों को ट्रेन करता हूँ, पर जिस्म की जो आग तुम्हारी आँखों में है, वो मैंने कहीं नहीं देखी।" मीरा का दिल फिर धड़का। उसने दरवाज़ा बंद किया, आईने में खुद को देखा, और तय कर लिया कि कल वो अपनी सबसे पतली वाली साड़ी पहनेगी।
अगली शाम मीरा ने अपनी सबसे पतली वाली गुलाबी साड़ी पहनी, वही जिसमें से सब कुछ झलकता था, और जानबूझकर ब्लाउज़ का एक हुक खुला छोड़ दिया। छत पर कपड़े सुखाते हुए उसने देखा, कबीर अपनी बालकनी में खड़ा इंतज़ार कर रहा था, नज़रें उसी पर। उसने हल्का सा इशारा किया, पानी की टंकी की तरफ, और मीरा का दिल धड़का। दिन का उजाला था, खतरा था, पर मज़ा भी उतना ही।
वो टंकी के पीछे गई, साड़ी का पल्लू हवा में लहराता। कबीर पहले से वहाँ था, उसकी आँखों में भूख। "भाभी, आज तो आपने क़त्ल कर दिया," वो बोला, उसकी नज़र मीरा के बदन पर फिसल रही थी। मीरा ने उसे दीवार से लगाया। "शोर मत कर। कोई आ गया तो?" कबीर ने उसकी साड़ी ऊपर खींची, उसकी जाँघों को सहलाते हुए। "तो आने दो। आज मैं डरने वाला नहीं। आज मैं आपको दिन के उजाले में चाहता हूँ।"
टंकी के पीछे, खुले आसमान के नीचे, कबीर ने मीरा को अपनी बाँहों में भरा। उसका हाथ मीरा की पैंटी में था, उँगलियाँ उसकी गीली चूत में, और मीरा का हाथ उसके लोअर में, उसके तने हुए लंड को सहलाता। "कबीर, जल्दी," मीरा बुदबुदाई, उसकी साँसें तेज़। "कोई भी आ सकता है।" कबीर ने अपना लंड निकाला, मीरा की पैंटी एक तरफ सरकाई, और एक ही धक्के में उसके अंदर कर दिया। मीरा ने उसके कंधे पर काट खाया ताकि चीख न निकले, उसके नाखून उसकी पीठ में धँस गए।
धक्के तेज़ थे, खतरे का नशा दोनों पर था। कबीर ने मीरा को टंकी से लगाया, उसकी एक टाँग उठाई, और और गहरा घुसा। नीचे से किसी के आने की आवाज़ आई, सीढ़ियों पर चप्पल की चटचट। दोनों रुक गए, साँस रोके, कबीर अभी भी उसके अंदर। आवाज़ दूर हुई, और कबीर ने फिर धक्के मारने शुरू किए, और तेज़, और बेखौफ़। मीरा झड़ी, उसका बदन काँपा, फिर कबीर छूटा, उसका गर्म पानी उसके अंदर। दोनों हाँफते हुए अलग हुए, कपड़े ठीक किए।
"कल फिर?" कबीर ने पूछा, उसके माथे पर पसीना। मीरा ने अपनी साड़ी ठीक की, बाल सँवारे, ब्लाउज़ का हुक लगाया। "कल नहीं। परसों। और परसों मैं लाल वाली साड़ी पहनूँगी, वो जो तुम्हें सबसे ज़्यादा पागल करती है।" वो सीढ़ियाँ उतर गई, पल्लू लहराता, और कबीर टंकी के पीछे खड़ा मुस्कराता रहा। छत अब उनकी गुप्त जगह थी, और हर शाम एक नया इंतज़ार।
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