सुहागरात की पहली रात

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"दरवाज़ा बंद कर दूं?" आदित्य ने पूछा।

काव्या ने सिर हिलाया। हां में या ना में, आदित्य समझ नहीं पाया। उसने दरवाज़ा बंद कर दिया। लॉक की क्लिक आवाज़ कमरे में गूंजी।

रात के बारह बज रहे थे। होटल के कमरे में हल्की पीली रोशनी थी। बिस्तर पर गुलाब की पंखुड़ियां बिखरी थीं। कमरा ठंडा था, पर दोनों के चेहरों पर पसीना था।

काव्या बिस्तर के किनारे बैठी थी। लाल जोड़े में। घूंघट आधा उठा हुआ। उसके हाथ गोद में थे, उंगलियां आपस में उलझी हुई। आदित्य खिड़की के पास खड़ा था। बाहर शहर की रोशनियां थीं। अंदर दो दिलों की धड़कनें।

अरेंज मैरिज थी। सगाई को चार महीने हुए थे। फोन पर बातें हुई थीं। दो बार कॉफी पी थी। पर ये पहली बार था जब दोनों के बीच कोई दीवार नहीं थी। कोई रिश्तेदार नहीं। कोई रस्म नहीं। सिर्फ दो लोग।

आदित्य उसके पास आकर बैठ गया। "डर लग रहा है?" उसने धीरे से पूछा।

"थोड़ा," काव्या ने सच कहा। "तुम्हें?"

"बहुत।"

दोनों हंस पड़े। उस हंसी ने कमरे की अकड़न तोड़ दी।

"पता है," आदित्य ने कहा, "मैंने सोचा था मैं कुछ डायलॉग मारूंगा। फिल्मों वाला। पर अब कुछ याद नहीं आ रहा।"

"अच्छा है। फिल्मी डायलॉग से मुझे एलर्जी है।"

आदित्य ने उसका हाथ पकड़ा। "सुनो काव्या। आज रात कोई जल्दी नहीं है। कोई दबाव नहीं। जो होगा, जब होगा, आराम से। ठीक?"

काव्या ने उसकी आंखों में देखा। उन आंखों में उसे वो मिला जो वो ढूंढ रही थी। इज्जत। उसने धीरे से सिर हिलाया।

आदित्य ने उसका घूंघट उठाया। काव्या का चेहरा शर्म से लाल था। पर आंखों में चमक थी। उसने उसके माथे पर चूमा। लंबा, नरम चुम्बन। फिर उसकी आंखों पर। फिर गालों पर।

काव्या की सांसें धीमी धीमी तेज होने लगीं।

"तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो," आदित्य ने कहा।

"तुमने तो मुझे बिना मेकअप के भी देखा है।"

"तभी तो कह रहा हूं।"

आदित्य ने उसके बालों से पिनें निकालीं। एक एक करके। बाल कंधों पर बिखर गए। फिर उसने उसके गहने उतारने शुरू किए। कंगन। चूड़ियां। हर गहना उतारते वक्त उसकी उंगलियां काव्या की त्वचा को छू जातीं। काव्या सिहर जाती।

"ये सब उतारने में तो आधी रात निकल जाएगी," काव्या ने हंसते हुए कहा।

"तो निकल जाने दो। मेरे पास पूरी रात है।"

जब बारी ब्लाउज की आई, तो काव्या ने आदित्य के हाथ पकड़ लिए। उसकी सांसें तेज थीं। "मैं... मैंने कभी..."

"मुझे पता है," आदित्य ने कहा। "मुझे भी पहली बार है। हम दोनों साथ सीखेंगे।"

उसने ब्लाउज के हुक खोले। एक। दो। तीन। ब्लाउज खुला। अंदर मैरून ब्रा। काव्या के गोरे boobs ब्रा में कसे हुए थे। आदित्य की सांस थम गई।

"काव्या..."

"हम्म?"

"तुम्हें देखकर लग रहा है जैसे मैंने कोई खजाना पा लिया हो।"

काव्या शर्मा गई। आदित्य ने ब्रा का हुक खोला। उसके boobs आज़ाद हो गए। बड़े, गोरे, निप्पल खड़े। आदित्य ने एक को मुंह में लिया।

काव्या के मुंह से सिसकारी निकली। "आदित्य..."

उसने दूसरे को हाथ से मसला। कभी हल्का, कभी ज़ोर से। काव्या ने उसके बालों में उंगलियां गड़ा दीं।

आदित्य नीचे बढ़ा। उसने उसकी साड़ी खोली। पेटीकोट का नाड़ा खोला। काव्या अब सिर्फ पैंटी में थी। आदित्य ने उसे देखा। उसकी आंखों में चाहत थी, हवस थी, पर ज़बरदस्ती नहीं थी।

"तुम्हारी इजाज़त हो तो?" उसने पूछा।

काव्या ने सिर हिलाया। आदित्य ने पैंटी उतार दी।

काव्या की चूत उसके सामने थी। साफ। गीली। आदित्य ने अपनी उंगली उस पर रखी। काव्या कांप गई।

"डरो मत," आदित्य ने कहा। उसने उंगली अंदर डाली। धीरे से।

काव्या ने बिस्तर की चादर मुट्ठी में भींच ली। "धीरे," वह फुसफुसाई।

आदित्य की उंगली अंदर बाहर होने लगी। काव्या की सांसें तेज होती गईं। उसके मुंह से दबी हुई आवाज़ें निकलने लगीं।

"अच्छा लग रहा है?" आदित्य ने पूछा।

"बहुत," काव्या ने कहा। "रुको मत।"

आदित्य ने अपने कपड़े उतारे। शर्ट। पैंट। अंडरवियर। उसका लंड खड़ा था। लंबा। मोटा।

काव्या ने उसे देखा। उसकी आंखें फैल गईं। "इतना बड़ा... दर्द होगा?"

आदित्य उसके पास आया। "पहले थोड़ा होगा। पर मैं धीरे करूंगा। और अगर तुम कहोगी रुक जाओ, तो मैं रुक जाऊंगा। वादा।"

काव्या ने उसका लंड हाथ में लिया। गर्म। सख्त। उसने उसे हिलाया। आदित्य के मुंह से आह निकली।

"ऐसे?" काव्या ने पूछा।

"ऐसे ही। तुम बहुत जल्दी सीख रही हो।"

काव्या मुस्कुराई। फिर उसने कुछ ऐसा किया जिसकी आदित्य को उम्मीद नहीं थी। उसने उसके लंड को मुंह में ले लिया।

"काव्या..." आदित्य हांफा। "तुम्हें ये... "

"सहेलियों ने बताया था," काव्या ने कहा, और फिर से मुंह में ले लिया।

आदित्य ने उसके बाल पकड़ लिए। कुछ देर बाद उसने उसे रोका। "बस। अब नहीं। अब असली काम।"

आदित्य काव्या के ऊपर आया। उसने अपना लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा। दोनों की आंखें मिलीं।

"तैयार हो?" उसने पूछा।

काव्या ने सिर हिलाया। आदित्य ने धीरे से दबाव डाला।

लंड अंदर जाने लगा। काव्या की सांस रुक गई। पहले थोड़ा दर्द हुआ। उसने आदित्य के कंधे पर नाखून गड़ा दिए।

"रुको," उसने कहा। "बस थोड़ा रुको।"

आदित्य रुक गया। वह उसके माथे को चूमता रहा। उसके बालों में हाथ फेरता रहा। कुछ देर बाद काव्या ने कहा, "अब करो। धीरे धीरे।"

आदित्य ने धक्का लगाया। लंड आधा अंदर गया। फिर पूरा। काव्या की आंखों में आंसू थे। पर वह मुस्कुरा रही थी।

"दर्द हो रहा है?" आदित्य ने पूछा।

"थोड़ा। पर अच्छा भी लग रहा है। अजीब सा।"

आदित्य हिलने लगा। धीमे। गहरे धक्के। काव्या की चूत उसके लंड को जकड़ रही थी। हर धक्के के साथ काव्या की सिसकारी बढ़ती गई।

"और," वह बोली। "और तेज़।"

आदित्य ने रफ्तार बढ़ाई। बिस्तर हिलने लगा। गुलाब की पंखुड़ियां बिखर गईं। काव्या के boobs उछल रहे थे। आदित्य ने उन्हें हाथों में लिया।

"आदित्य..." काव्या की आवाज़ बदल गई थी। "मुझे कुछ हो रहा है।"

"होने दो। डरो मत।"

काव्या की पूरी बॉडी कांपने लगी। वह पहली बार झड़ रही थी। उसकी चूत से पानी बह निकला। उसकी चीख कमरे में गूंजी।

आदित्य ने उसे कसकर पकड़ लिया और अपने धक्के जारी रखे। "मैं आने वाला हूं," वह हांफा।

"अंदर ही," काव्या ने कहा। "आज रात सब अंदर।"

आदित्य ने आखिरी धक्के के साथ अपना पूरा पानी काव्या की चूत में निकाल दिया। गर्म। गहरा। दोनों पसीने में भीग चुके थे।

आदित्य काव्या के ऊपर ही लेटा रहा। उसका लंड अभी भी उसकी चूत में था। दोनों की धड़कनें एक हो गई थीं।

"कैसा लगा?" आदित्य ने पूछा।

काव्या ने उसे कसकर पकड़ लिया। "पहली बार लग रहा है कि मैं घर आई हूं।"

कुछ देर बाद आदित्य ने करवट ली। काव्या उसके सीने पर सिर रखकर लेट गई। उसकी उंगलियां उसके सीने पर घूम रही थीं।

"एक बात बताओ," काव्या ने कहा। "तुमने कभी सोचा था तुम्हारी सुहागरात ऐसी होगी?"

"इससे अच्छी तो नहीं सोची थी।"

"झूठे।"

"सच। मैंने सोचा था मैं नर्वस होऊंगा। तुम रोओगी। अजीब सा माहौल होगा। पर तुमने तो..."

"मैंने तो क्या?"

"तुमने तो मुझे ही सिखा दिया।"

काव्या हंस पड़ी। "अभी तो बहुत कुछ सिखाना बाकी है।"

"जैसे?"

काव्या ने उसके कान में कुछ फुसफुसाया। आदित्य की आंखें फैल गईं। "सच में?"

"सच में। पर पहले थोड़ा आराम। फिर दूसरा राउंड।"

आदित्य ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। "तुम्हें पता है, मुझे लग रहा है मैंने लॉटरी जीत ली है।"

"लॉटरी नहीं," काव्या ने कहा। "पत्नी।"

"तुम्हें पता है," आदित्य ने कहा, काव्या के बालों में हाथ फेरते हुए। "सगाई के बाद जब हम फोन पर बात करते थे, तो मैं हर बार सोचता था। ये लड़की इतनी समझदार है। इतनी प्यारी है। क्या ये सच में मेरी पत्नी बनेगी?"

"और अब?" काव्या ने पूछा।

"अब सोच रहा हूं, मैं इतना lucky कैसे हो गया।"

काव्या ने उसके सीने पर चूमा। "मैं भी डरी हुई थी। सब सहेलियां डराती थीं। कहती थीं पहला दिन बहुत दर्द होता है। पर तुमने..."

"मैंने क्या?"

"तुमने दर्द को मज़े में बदल दिया।"

आदित्य ने उसे पलटा। अब वह उसके ऊपर था। उसने उसके boobs को फिर से मुंह में लिया। काव्या सिसक पड़ी। उसका लंड फिर से सख्त हो रहा था। काव्या ने उसे महसूस किया और मुस्कुराई।

"इतनी जल्दी तैयार?" उसने शरारत से पूछा।

"तुम्हारे साथ तो हमेशा तैयार।"

आदित्य ने उसकी टांगें फैलाईं। उसकी चूत अभी भी गीली थी। उसने अपना लंड फिर से अंदर डाला। इस बार दर्द नहीं था। सिर्फ मज़ा था।

काव्या ने उसकी कमर को अपनी टांगों से जकड़ लिया। "ऐसे ही," वह बोली। "रुको मत।"

आधे घंटे बाद जब दोनों की सांसें normal हुईं, तो काव्या ने आदित्य को अपनी तरफ खींचा। "अब मेरी बारी। तुम लेटो।"

इस बार काव्या ऊपर थी। उसने उसके लंड को खुद अपनी चूत में डाला। दर्द अब कम था। मज़ा ज़्यादा। वह हिलने लगी। आदित्य ने उसके boobs पकड़ रखे थे।

"ऐसे?" काव्या ने पूछा।

"परफेक्ट।"

दूसरी बार दोनों साथ झड़े। इस बार काव्या ने आदित्य के सीने पर अपना पानी महसूस किया। आदित्य ने उसकी चूत में अपना।

सुबह जब काव्या की आंख खुली, तो आदित्य उसे देख रहा था। "क्या देख रहे हो?" उसने पूछा।

"अपनी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबह।"

"और रात?"

"रात तो अभी बाकी है। हर रात।"

काव्या ने तकिया उठाकर उसके मुंह पर मारा। दोनों हंस पड़े। बाहर सूरज निकल रहा था। अंदर दो लोग थे जो अब अजनबी नहीं थे।

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