इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने हिंदी भवन के संगीत कक्ष में बारिश वाली मंगलवार की शाम साहित्य की छात्रा अनन्या ने इतिहास के छात्र कबीर के साथ वह छंद लिखा जो किसी रीतिकाल की कॉपी या शोध के गजट पर कभी दर्ज नहीं होता
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने हिंदी भवन की तीसरी मंजिल पर संगीत कक्ष शाम के सात बजते ही खाली हो जाता था। उस कमरे में एक टूटा हारमोनियम, तीन तबले और दीवार पर पीला पड़ा नेहरू का चित्र था। अनन्या शर्मा तीसरे वर्ष की छात्रा थी। वह क्लासिकल गायन नहीं करती थी। वह साहित्य पढ़ती थी। फिर भी हर मंगलवार वह उस कमरे में बैठती थी क्योंकि वहाँ पंखा चलता था और पुस्तकालय की तुलना में शोर कम था।
उस मंगलवार को बारिश अचानक आई। आंगन की ईंटें काली हो गईं। गलियारे में दीये की जगह ट्यूबलाइट झपकी। अनन्या ने खिड़की बंद की और अपनी कॉपी खोली। विषय था रीतिकाल की नायिका। वह लिख रही थी कि नायिका की लज्जा और इच्छा एक ही साँस में कैसे रहती हैं। कलम रुक गई। दरवाजे पर दस्तक हुई।
कबीर मिश्रा इतिहास विभाग का छात्र था। वह शोध के लिए पुराने गजट निकालने आया था। लाइब्रेरियन चले गए थे। चाबी संगीत कक्ष के पीछे एक कील पर लटकी रहती थी। कबीर ने दस्तक दी क्योंकि बारिश में उसका बैग भीग गया था और गलियारे में पानी जमा था।
अनन्या ने दरवाजा खोला। कबीर के बाल माथे पर चिपक गए थे। कमीज की आस्तीन गीली थी। वह बोला कि दो मिनट खड़ा रहना है। अनन्या ने उसे अंदर बुलाया। दोनों एक दूसरे को संकाय से पहचानते थे लेकिन बात कभी पूरी नहीं हुई थी। कबीर ने तबले के पास खड़े होकर पानी झाड़ा। अनन्या ने तौलिया दिया जो उसने गाने वालों के लिए रखा था।
बात छोटी शुरू हुई। बारिश कितनी तेज है। बिजली कब आएगी। शोध का विषय क्या है। कबीर ने बताया कि वह १८५७ के बाद इलाहाबाद के छोटे अदालती कागजों पर काम कर रहा है। अनन्या ने कहा कि रीतिकाल भी एक तरह का कागज है जिसमें इच्छा छुपती है। दोनों हँसे। हँसी कमरे में गूंजी और फिर शांत हो गई।
बिजली गई। हारमोनियम के पास रखी मोमबत्ती अनन्या ने जलाई। पीली रोशनी में चेहरे अलग लगे। कबीर की आࠖखों में थकान थी और कुछ और भी। अनन्या ने देखा कि उसकी कमीज की तीसरी बटन खुली है। उसने नजर हटाई। कबीर ने कमीज ठीक की लेकिन देर से।
बारिश और तेज हुई। नल के पाइप से पानी टपकने लगा। अनन्या ने बर्तन रखा। दोनों फर्श पर बैठ गए क्योंकि कुर्सियाࠖ गीली थीं। बात साहित्य से शरीर की ओर खिसकी बिना किसी योजना के। कबीर ने पूछा कि क्या वह कभी अकेली रात में लिखते समय रुक जाती है। अनन्या ने कहा कि रुकती है। कभी साࠖस अटकती है। कभी गर्दन गर्म हो जाती है और वह पंखा तेज कर देती है।
कबीर चुप रहा। फिर बोला कि पुराने कागजों में एक चिट्ठी मिली थी जिसमें एक औरत ने लिखा था कि वह अपने पति के भाई को छूना चाहती है लेकिन छू नहीं सकती। अनन्या की उंगलियाࠖ कॉपी पर रुकीं। कमरे में मोमबत्ती की लौ काࠖपी।
अनन्या ने कहा कि रीतिकाल की नायिका भी छूना चाहती है और नहीं छूती। कबीर ने पूछा कि आज की नायिका क्या करती है। अनन्या ने जवाब नहीं दिया। उसने मोमबत्ती के पास हाथ बढ़ाया। लौ ने हथेली गर्म की। कबीर ने उसी हथेली को देखा जैसे कोई दस्तावेज पढ़ रहा हो।
दूरी कम हुई। पहले घुटने छुए। फिर कलाई। अनन्या की साड़ी का पल्लू तबले पर गिर गया। कबीर ने पल्लू उठाया और वापस दिया। उंगलियाࠖ रेशम पर रुकीं। अनन्या ने हाथ नहीं खींचा। बारिश की आवाज ने बाकी आवाजें दबा दीं।
पहला चुंबन जल्दबाजी में नहीं था। वह पूछताछ की तरह था। होंठ मिले, रुके, फिर मिले। अनन्या की साࠖस गरम थी। कबीर के गले में नमी थी बारिश की। अनन्या ने उसकी कमीज की गीली आस्तीन पकड़ी। बटन खुले। छाती पर हथेली रखी तो दिल तेज चला। कबीर ने उसकी कमर पकड़ी। साड़ी की गांठ ढीली पड़ी।
अनन्या पहली बार किसी को इतने पास ला रही थी। कॉलेज के तीन साल में चाय और नोट्स के अलावा कुछ नहीं हुआ था। शरीर ने इंतजार किया था बिना कहे। अब त्वचा ने याद दिलाया। कबीर ने उसके गले पर होंठ रखे। अनन्या की आࠖखें बंद हुईं। तबले की चमड़ी ठंडी थी पीठ के नीचे।
ब्लाउज के हुक एक एक खुलें। अनन्या ने शर्म से हाथ आगे किए फिर हटा लिए। स्तनों पर मोमबत्ती की रोशनी पड़ी। कबीर ने धीरे छुआ जैसे पुराना कागज फट न जाए। निप्पल सख्त हुए। अनन्या की कमर उठी। उसने कबीर के बाल पकड़े। मुࠖह स्तन पर गया। जीभ गोल घूमी। अनन्या ने दांत भींचे और फिर छोड़े। आवाज निकली जो उसने अपने कमरे में भी नहीं निकाली थी।
साड़ी पूरी खुली। पेटीकोट फर्श पर गिरा। कबीर ने जांघों के बीच हाथ फिराया। कपड़ा गीला था। अनन्या लज्जित हुई और फिर उस लज्जा को रखने नहीं दिया। उंगलियाࠖ अंदर गईं धीरे। अनन्या की साࠖस टूटी। उसने कबीर का हाथ पकड़ा नहीं हटाया। अंदर की गर्मी ने उंगलियों को खींचा। कबीर ने लय पकड़ी। अनन्या की एड़ियाࠖ फर्श पर रगड़ीं।
कबीर ने पेंट खोला। अनन्या ने पहली बार पुरुष को इतना पास देखा। वह डरी नहीं। उसने हाथ बढ़ाया। छुआ। गरम और भारी। कबीर की साࠖस कड़क गई। अनन्या ने उपर नीचे किया जैसे कोई नया छंद सीख रही हो। कबीर ने माथा उसके माथे से सटाया। दोनों की साࠖस एक हुई।
अनन्या लेटी। पीठ के नीचे उसकी अपनी दुपट्टा था। कबीर उसके उपर आया। प्रवेश धीमा था। दर्द हुआ। अनन्या ने नाखून उसकी पीठ पर गाड़े। कबीर रुका। अनन्या ने सिर हिलाया कि जारी रखो। धीरे धीरे शरीर खुला। दर्द गर्म हो गया फिर मधुर हो गया। लय बनी। तबले की तरह नहीं, बारिश की तरह।
अनन्या की टाࠖगें उसकी कमर पर लिपटीं। हर धक्के के साथ हारमोनियम की एक कुंजी हल्की सी बज उठी जैसे कमरा भी साࠖस ले रहा हो। मोमबत्ती छोटी हुई। छायाࠖँ दीवार पर लंबी हुईं। कबीर ने उसकी कलाई पकड़ कर सिर के उपर किया। अनन्या ने आࠖखें खोलीं। दोनों ने एक दूसरे को देखा बिना छिपे।
गति बढ़ी। अनन्या की आवाज दबी रही फिर नहीं दब सकी। उसने मुࠖह उसके कंधे पर दबाया। शरीर ने लहर ली। अंदर सिकुड़न आई जो उसने किताबों में पढ़ी थी लेकिन जानी नहीं थी। कबीर ने भी रोका नहीं। गर्म तरल अंदर छूटा। दोनों थम गए। बारिश बाहर उसी गति से चलती रही।
वे जुड़े रहे कुछ देर। पसीना ठंडा हुआ। कबीर ने धीरे निकला। अनन्या ने टाࠖगें समेटीं। शर्म लौटी लेकिन पूरी नहीं। उसने ब्लाउज उठाया। कबीर ने उसकी पीठ पर हुक लगाए बिना पूछे। उंगलियाࠖ काࠖपीं। अनन्या मुस्कुराई छोटी सी।
मोमबत्ती और छोटी हुई। दोनों ने कपड़े पहने धीरे धीरे जैसे कोई परीक्षा खत्म हुई हो। अनन्या ने कॉपी बंद की। रीतिकाल का पृष्ठ अधूरा था। उसने उस पर कुछ नहीं लिखा जो अभी हुआ। कबीर ने अपना गीला बैग उठाया। दरवाजे के पास खड़ा हुआ।
उसने पूछा कि कल पुस्तकालय खुलेगा। अनन्या ने कहा कि खुलेगा। फिर दोनों चुप रहे। बात अधूरी छोड़ना दोनों को ठीक लगा। पूरा कहना उस कमरे को छोटा कर देता।
कबीर निकला। गलियारे में पानी था। अनन्या ने खिड़की से देखा। वह छाते के बिना भागा। बारिश ने उसकी कमीज फिर चिपका दी। अनन्या ने मोमबत्ती बुझाई। अंधेरे में उसका शरीर अभी भी याद रखे हुए था उंगलियों का नक्शा।
अगले मंगलवार वह संगीत कक्ष में गई। हारमोनियम वहीं था। कबीर नहीं आया पहले घंटे। दूसरे घंटे दरवाजे पर दस्तक हुई। अनन्या ने दरवाजा खोला बिना जल्दबाजी के। बारिश नहीं थी उस दिन। धूप खिड़की से गिर रही थी। दोनों मुस्कुराए जैसे कोई पुराना वाक्य दोहरा रहे हों।
उन्होंने बात की शोध की, कक्षा की, कैंटीन की चाय की। फिर चुप हुए। अनन्या ने हारमोनियम की एक कुंजी दबाई। आवाज बेसुरी निकली। कबीर हࠖसा। हࠖसी ने कमरे को फिर भर दिया। अनन्या ने उसका हाथ लिया। इस बार बिना बारिश के।
वे फर्श पर बैठे। कपड़े जल्दी नहीं उतरे। पहले माथा सटा। फिर होंठ। फिर गर्दन। अनन्या ने इस बार खुद ब्लाउज खोला। दिन की रोशनी में शरीर साफ दिखा। कबीर ने देर तक देखा। अनन्या ने नजर नहीं फेरी। छूना अब पूछताछ नहीं रहा। वह उत्तर था।
कबीर उसके पीछे बैठा। हाथ कमर से उपर गए। स्तनों को हथेलियों में लिया। अनन्या की गर्दन पीछे झुकी उसके कंधे पर। उसने पेंट खोला। अनन्या उसके गोद में बैठी पीठ उसकी छाती से सटाए। प्रवेश इस कोण से गहरा लगा। अनन्या की उंगलियाࠖ उसकी जांघों पर गड़ीं। लय धीमी रही लंबी रही।
खिड़की खुली थी थोड़ी। हवा आई। अनन्या की आवाज हवा में मिल गई। कबीर ने उसके बाल पकड़े धीरे। अनन्या ने कहा और अंदर। शब्द छोटे थे लेकिन पूरे। शरीर ने माना। दूसरी लहर पहले से तेज आई। अनन्या ने आࠖखें बंद रखीं और फिर खोलीं जब सब थम गया।
वे लेटे रहे धूप में। पसीना सुखा। अनन्या ने कहा कि रीतिकाल की नायिका कभी दिन में नहीं मिलती। कबीर ने कहा कि इतिहास की चिट्ठियाࠖ भी दोपहर में नहीं लिखी जातीं। दोनों हࠖसे। हࠖसी के बाद चुंबन छोटा सा।
सप्ताह बीते। कभी संगीत कक्ष। कभी पुस्तकालय की पिछली पंक्ति जहाࠖ अलमारियाࠖ छत तक थीं। कभी नदी के घाट पर शाम को जब भीड़ छंट जाती। हर बार कुछ नया और वही पुराना। अनन्या की कॉपी में रीतिकाल पूरा हुआ। उसने नायिका की लज्जा के नीचे एक पंक्ति और लिखी जो कक्षा में नहीं पढ़ी जाती।
कबीर का शोध आगे बढ़ा। पुराने कागजों में उसे और चिट्ठियाࠖ मिलीं। उसने एक शाम अनन्या को सुनाई जिसमें एक स्त्री ने लिखा था कि शरीर याद रखता है वह नाम जो मुࠖह नहीं लेता। अनन्या चुप रही। फिर उसके माथे पर होंठ रखे।
परीक्षाࠖ आईं। समय कम हुआ। एक रात संगीत कक्ष में ताला पहले से पड़ा था। दोनों सीढ़ियों पर बैठे। बात की भविष्य की। शहर अलग हो सकते हैं। यह वाक्य हवा में टंग गया। अनन्या ने उसका हाथ नहीं छोड़ा। कबीर ने उसकी उंगलियों को चूमा एक एक कर।
आखिरी मंगलवार दोनों ने कमरा खोला। मोमबत्ती नहीं जलाई। ट्यूबलाइट चली। सब साफ दिखा। कपड़े उतरे बिना जल्दी के। शरीर अब एक दूसरे के नक्शे जानते थे। कहाࠖ दबाने से साࠖस रुकती है। कहाࠖ चूमने से कमर उठती है। कबीर ने उसे मेज पर बैठाया। अनन्या की एड़ियाࠖ उसकी पीठ पर गईं। प्रवेश गहरा था। मेज हिली। हारमोनियम की कुंजी फिर छुई।
अनन्या ने उसके कान में कहा कि मत रोकना। कबीर नहीं रुका। दोनों एक साथ गिरे उस किनारे पर जहाࠖ शब्द खत्म हो जाते हैं। बाद में अनन्या की आࠖखों में पानी था जो बारिश नहीं था। कबीर ने पोंछा। कुछ नहीं पूछा।
वे कपड़े पहनकर निकले। गलियारा खाली था। नीचे चौकीदार सो रहा था। आंगन सूखा था। अनन्या ने कहा कि कल कक्षा है। कबीर ने कहा कि हाࠖ। हाथ छूटे गेट पर। मुड़ना दोनों ने एक साथ किया और फिर नहीं देखा पीछे।
वर्षों बाद अनन्या एक कॉलेज में पढ़ाती थी दूसरे शहर में। रीतिकाल का पेपर देते हुए कभी कभी उसकी उंगलियाࠖ रुकतीं। छात्रों को लगता कि वह सोच रही है। वह सोचती थी संगीत कक्ष की पीली रोशनी की, गीली कमीज की, तबले की ठंडी चमड़ी की। शरीर अब भी वह नक्शा रखता था।
कबीर ने शोध पूरा किया। एक किताब छपी पुराने कागजों पर। समर्पण पृष्ठ खाली था। उसने अनन्या को प्रति नहीं भेजी। भेजने की जरूरत दोनों को नहीं लगी। जो हुआ वह किसी रजिस्टर पर नहीं चढ़ा था और चढ़ाने लायक भी नहीं था। वह दो लोगों की एक शाम थी जो बारिश ने खोल दी और धूप ने दोहरा दी।
कभी कभी इलाहाबाद में जब अचानक बारिश पड़ती है हिंदी भवन की तीसरी मंजिल पर कोई खिड़की खुलती है। हारमोनियम वहीं है। कुंजी अब भी बेसुरी है। कमरा खाली है। लेकिन फर्श पर अगर कोई देर तक बैठे तो उसे पुरानी मोमबत्ती की हल्की गंध मिल सकती है। वह गंध किसी सिलेबस में नहीं है।
Readers who enjoyed “इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने हिंदी भवन के संगीत कक्ष में बारिश वाली मंगलवार की शाम साहित्य की छात्रा अनन्या ने इतिहास के छात्र कबीर के साथ वह छंद लिखा जो किसी रीतिकाल की कॉपी या शोध के गजट पर कभी दर्ज नहीं होता” also read
8 curated storiesHindi Honeymoon Sex Kahani: Pehli Raat Ka Nasha
नए जोड़े विक्रम और रिया की hindi honeymoon sex kahani, गोवा के बीच रिसॉर्ट में उनकी पहली रात जब शर्मीली दुल्हन ने सारी शर्म छोड़ दी।
हिंदी सुहागरात कहानी: तीन साल बाद वाली रात
तीन साल पहले अस्पताल की एक रात ने उनकी सुहागरात छीन ली थी। आज मनाली में कुणाल ने प्रिया के लिए वह रात फिर से सजाई है। एक हिंदी सुहागरात कहानी।
हिंदी कुँवारी लड़की सेक्स कहानी: पहली रात का सच
हिंदी कुँवारी लड़की सेक्स कहानी: तेईस साल की रितु ने अपनी पहली रात खुद चुनी। कबीर के स्टूडियो में वो शाम कैसे उसकी ज़िंदगी की सबसे बोल्ड रात बन गई, जानिए इस कहानी में।
गर्लफ्रेंड की सील शादी से पहली रात तोड़ी: लखनऊ में श्रेया और आदित्य की आखिरी रात
गर्लफ्रेंड की सील शादी से पहली रात तोड़ी, लखनऊ की एक रात में श्रेया अपनी शादी से पहले आदित्य से मिलने आती है और एक पुराना मखमली डिब्बा उनकी अधूरी कहानी को फिर से जगा देता है।
शहर छोड़ने से पहले की आखिरी रात जब दोस्ती ने सीमाएँ तोड़ दीं
सालों की दोस्ती, शहर छोड़ने से पहले की आखिरी रात और वो पल जब दोनों ने एक-दूसरे को दोस्त से कुछ ज्यादा महसूस किया।
Hindi Love Sex Kahani: कॉलेज का अधूरा प्यार
पांच साल बाद पुणे बुक फेयर में टकराए कॉलेज के प्रेमी। ये hindi love sex kahani है अधूरे प्यार के दोबारा मिलने की, बारिश, छत और एक पहली बार की।
पहली बार जब शरीर ने खुद को पूरी तरह खोल दिया घबराहट दर्द और फिर बेकाबू मजे की वो रात जिसने सारी हिचक जला दी
एक रात, एक कमरा और वो पहला अनुभव जिसने दोनों के अंदर की सारी हिचक जला दी। पहली बार की घबराहट, दर्द और फिर बेकाबू मजे की कहानी।
ज़बरदस्त रात जब उसने बाल खींचकर चोदा और साफ कहा कि आज नर्मियत नहीं चलेगी सिर्फ गंदी और ज़ोरदार सेक्स
उसने मेरा बाल पकड़कर खींचा और बोली – आज नर्मियत नहीं चलेगी। फिर जो हुआ वो सिर्फ गंदी और ज़ोरदार सेक्स था।