हिंदी सुहागरात कहानी: तीन साल बाद वाली रात
मनाली के उस होटल के कमरे में घुसते ही प्रिया की सांस रुक गई। बिस्तर पर गुलाब की पंखुड़ियां बिखरी थीं, कोने में मोमबत्तियां जल रही थीं, और खिड़की से बर्फ से ढके पहाड़ दिख रहे थे। कुणाल ने पीछे से उसकी आंखों पर हाथ रखा। "कैसी लगी तुम्हारी सुहागरात?" प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। "तीन साल देर से, मगर... बिल्कुल वैसी जैसी मैंने सपने में देखी थी। तीन साल के इंतजार के बाद आज यह हिंदी सुहागरात कहानी पूरी होने जा रही थी।"
तीन साल पहले उनकी शादी वाली रात कुणाल के पिताजी को दिल का दौरा पड़ा था। पूरी रात अस्पताल में गुजरी थी। फिर जिम्मेदारियां, फिर बच्चा, फिर जिंदगी। वह रात कभी आई ही नहीं। आज उनकी तीसरी सालगिरह पर कुणाल ने सब कुछ प्लान किया था। बच्चा नानी के घर, और वे दोनों मनाली में। "आज की रात हमारी पहली रात होगी," कुणाल ने उसके कान में कहा। "वैसे ही जैसे तीन साल पहले होनी चाहिए थी।"
प्रिया ने लाल साड़ी पहनी थी, वही जो उसने शादी पर पहनी थी। कुणाल ने उसका घूंघट उठाया। "तुम आज भी उतनी ही खूबसूरत लग रही हो जितनी उस दिन लगी थीं।" उसकी उंगलियां प्रिया के गाल पर थीं। प्रिया की सांसें तेज हो रही थीं। यह अजीब था, तीन साल की शादी, एक बच्चा, मगर आज उसका दिल किसी कुंवारी दुल्हन की तरह धड़क रहा था।
कुणाल ने उसे अपनी बाहों में लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह चुम्मा पहले वालों जैसा नहीं था। इसमें सब्र था, चाहत थी, तीन साल का इंतजार था। उसकी जीभ प्रिया के मुंह में घूम रही थी। प्रिया के हाथ उसकी पीठ पर थे, उसे अपने और करीब खींच रही थी।
कुणाल के हाथ प्रिया की साड़ी के पल्लू पर थे। उसने आहिस्ता से पल्लू खींचा। साड़ी कंधे से सरकी और फर्श पर गिरने लगी। प्रिया ने उसे पकड़ा। "रुको," उसने शर्माते हुए कहा। "मोमबत्तियां..." कुणाल मुस्कुराया। "नहीं। आज मैं तुम्हें देखना चाहता हूं। पूरी तरह।" उसने साड़ी का एक एक बल खोला। लाल कपड़ा फर्श पर ढेर हो गया।
अब प्रिया सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी। कुणाल ने उसे गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। गुलाब की पंखुड़ियां उसके जिस्म से चिपक गईं। उसने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए। एक, दो, तीन। प्रिया की छातियां नंगी हो गईं। कुणाल ने एक पल के लिए उन्हें देखा। "कितनी खूबसूरत हो तुम," उसने कहा और अपना चेहरा उनमें दबा दिया।
उसकी जीभ प्रिया के निप्पल पर घूम रही थी। कभी हल्के से चूसता, कभी दांतों से हल्का सा काटता। प्रिया की कमर बिस्तर से उठ गई। "आह... कुणाल..." उसके हाथ उसके बालों में थे। कुणाल का एक हाथ नीचे सरका। उसने पेटीकोट का नाड़ा खोला और उसे नीचे सरका दिया।
अब प्रिया पूरी नंगी थी। कुणाल ने उसकी टांगें फैलाईं और उसकी चूत को देखा। "तीन साल से मैं इस पल का इंतजार कर रहा हूं," उसने कहा। उसने अपनी उंगली उसकी चूत पर रखी। वह गीली थी, पूरी तरह तैयार। उसने उंगली अंदर डाली और आहिस्ता आहिस्ता अंदर बाहर करने लगा। प्रिया की सांसें उखड़ रही थीं।
प्रिया ने कुणाल की शर्ट के बटन खोले। उसकी छाती पर हाथ फेरा। फिर उसने उसकी पैंट की जिप खोली और उसका लंड बाहर निकाला। वह तना हुआ था, गर्म। उसने उसे हाथ में लिया और हिलाने लगी। "तुम्हें याद है शादी से पहले तुमने फोन पर क्या कहा था?" कुणाल ने पूछा। "क्या?" "कि तुम पहली रात को शर्माओगी नहीं।" प्रिया मुस्कुराई। "तो देख लो।"
उसने कुणाल के लंड को अपने मुंह में ले लिया। उसकी जीभ उसके गिर्द घूम रही थी। कुणाल के मुंह से सिसकारी निकल गई। "आह... प्रिया..." उसके हाथ उसके बालों में थे। प्रिया कभी पूरा अंदर लेती, कभी सिर्फ सिरे को चूसती। कुणाल का जिस्म कांप रहा था।
फिर कुणाल ने प्रिया को सीधा लिटाया। उसने अपना लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा। "तैयार हो?" प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। "तीन साल से तैयार हूं।" कुणाल ने एक धक्का मारा और पूरा अंदर चला गया। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। "आहहह..." यह दर्द नहीं था, यह तीन साल के इंतजार का फटना था।
कुणाल आहिस्ता आहिस्ता अंदर बाहर कर रहा था। हर झटके के साथ प्रिया की चीखें बढ़ रही थीं। "और... और जोर से..." उसकी टांगें कुणाल की कमर के गिर्द लिपटी थीं। कुणाल ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी। बिस्तर चरचरा रहा था। गुलाब की पंखुड़ियां हवा में उड़ रही थीं।
फिर कुणाल ने प्रिया को अपने ऊपर बिठाया। प्रिया उसके लंड पर बैठी थी, खुद ऊपर नीचे हो रही थी। उसके बाल बिखरे थे, पसीना उसके जिस्म पर चमक रहा था। "मैं... मैं आने वाली हूं..." उसकी चूत ने कुणाल के लंड को कस लिया। एक जोरदार लहर उसके जिस्म में दौड़ी और वह चीखती हुई झड़ गई।
थोड़ी देर दोनों यूं ही लेटे रहे। फिर कुणाल उठा और बाथरूम से गीला तौलिया लाया। उसने बड़े प्यार से प्रिया का जिस्म पोंछा। उसकी उंगलियां जहां जहां छूतीं, प्रिया के जिस्म में फिर से सिहरन दौड़ जाती। "तुम्हें पता है," कुणाल ने कहा, "मैंने यह सब तीन महीने से प्लान किया था। होटल वाला भी हंस रहा था जब मैंने कहा कि बिस्तर पर गुलाब की पंखुड़ियां चाहिए।"
प्रिया हंसी। "और मोमबत्तियां?" "वह तो मैंने खुद खरीदीं।" कुणाल ने उसके पास लेटकर उसे अपनी बाहों में लिया। "मुझे उस रात का अफसोस हमेशा रहा। तुम्हारी आंखों में उस दिन जो उदासी थी, मैं कभी नहीं भूला।" प्रिया ने उसकी छाती पर सिर रखा। "उस दिन तुमने अपने पापा को चुना। कोई भी अच्छा बेटा वही करता।" "और आज मैंने अपनी बीवी को चुना," कुणाल ने उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा।
बाहर से हल्की बारिश की आवाज आने लगी। कुणाल उठा और खिड़की के पास गया। "आओ," उसने हाथ बढ़ाया। प्रिया ने चादर अपने गिर्द लपेटी और उसके पास गई। दोनों खिड़की से बाहर देख रहे थे। बर्फीले पहाड़ों पर बारिश की बूंदें चमक रही थीं। कुणाल ने पीछे से उसे पकड़ा। चादर ढीली होकर गिर गई। उसके हाथ प्रिया की नंगी कमर पर थे।
"तुम्हें ठंड नहीं लग रही?" कुणाल ने उसके कान में फुसफुसाया। "तुम हो तो ठंड कैसी," प्रिया ने जवाब दिया और पलटकर उसके होंठ चूम लिए। इस बार चुम्मा जंगली था। प्रिया ने कुणाल को दीवार से लगा दिया। उसके हाथ उसकी छाती पर थे, नीचे सरक रहे थे। उसने उसका लंड पकड़ा, जो फिर से तनने लगा था।
"इतनी जल्दी तैयार?" प्रिया ने शरारत से कहा। "तुम्हारे लिए हमेशा," कुणाल ने जवाब दिया और उसे गोद में उठा लिया। वह उसे खिड़की के पास वाली आरामकुर्सी पर ले गया और उसे अपनी गोद में बिठाया। प्रिया उसकी गोद में थी, उसका लंड उसकी चूत के मुंह पर। वह धीरे धीरे नीचे बैठी और उसे अपने अंदर ले लिया।
दोनों का चेहरा खिड़की की तरफ था। बाहर बारिश तेज हो रही थी। प्रिया कुणाल की गोद में ऊपर नीचे हो रही थी। उसकी पीठ कुणाल की छाती से चिपकी थी। कुणाल के हाथ उसकी छातियों पर थे, उन्हें दबा रहे थे, मसल रहे थे। "आह... यह... यह बहुत अच्छा लग रहा है..." प्रिया की आवाज में नशा था।
कुणाल ने उसकी गर्दन पर काटा, हल्का सा। प्रिया की चीख निकल गई। "और जोर से दबाओ," वह बोली। कुणाल ने उसकी एक टांग उठाकर कुर्सी के हत्थे पर रख दी। अब वह और गहरा जा रहा था। हर धक्के के साथ प्रिया का जिस्म उछल रहा था। बारिश की आवाज में उनकी सिसकारियां घुल रही थीं।
प्रिया का दूसरा चरम करीब था। "मैं... मैं फिर से..." उसकी चूत ने कुणाल के लंड को भींच लिया। वह चीखती हुई झड़ गई। उसका पानी कुणाल की गोद में बह गया। कुणाल ने भी अपनी रफ्तार बढ़ा दी और अपना सारा माल उसके अंदर छोड़ दिया। दोनों हांफ रहे थे, बारिश की ठंडी हवा उनके गर्म जिस्मों को छू रही थी।
कुणाल ने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटाया। "अब सो जाओ," उसने कहा। "कल सुबह जल्दी उठना है।" "क्यों?" प्रिया ने पूछा। "क्योंकि कल मैं तुम्हें मनाली घुमाऊंगा। और परसों..." वह रुका। "परसों क्या?" "परसों हम फिर से सुहागरात मनाएंगे।" प्रिया हंसी और उसके सीने पर मुक्का मारा। "बेशर्म।" "सिर्फ तुम्हारे लिए," कुणाल ने कहा और लाइट बुझा दी।
कुणाल ने उसे पलटा और पीछे से उसमें घुस गया। उसके हाथ उसकी छातियों को दबा रहे थे। हर धक्का गहरा था। "प्रिया... मैं भी..." उसने अपना सारा पानी उसकी चूत में छोड़ दिया। दोनों बिस्तर पर गिर पड़े, हांफ रहे थे।
उस रात प्रिया ने कुणाल के कंधे पर सिर रखकर बहुत देर तक पहाड़ों को देखा। उसे वह शादी वाली रात याद आई, अस्पताल का वह सफेद कमरा, उसकी आंखों के आंसू। और आज यह रात। जिंदगी ने उससे एक रात छीनी थी, और आज उसी जिंदगी ने उसे तीन गुना लौटा दी थी। उसने कुणाल का हाथ थामा और अपनी उंगलियां उसकी उंगलियों में फंसा लीं।
कुणाल ने प्रिया को अपनी बाहों में लिया। बाहर बर्फ गिर रही थी। "तो कैसी रही तुम्हारी सुहागरात?" प्रिया ने उसकी छाती पर सिर रखा। "तीन साल इंतजार के बाद... यह मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत रात थी।" कुणाल ने उसके माथे पर बोसा दिया। "और यह सिर्फ शुरुआत है।" प्रिया मुस्कुराई और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। मनाली की वह रात उन दोनों की पहली रात बन गई, तीन साल देर से, मगर पूरी तरह उनकी।
सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई तो प्रिया की आंख खुली। कुणाल उसे देख रहा था। "क्या देख रहे हो?" उसने शर्माते हुए चादर खींची। "अपनी दुल्हन को," कुणाल ने कहा और चादर खींचकर एक तरफ कर दी। सुबह की रोशनी में प्रिया का नंगा जिस्म चमक रहा था।
कुणाल ने उसके ऊपर आकर उसके होंठ चूमे। उसका हाथ उसकी चूत पर था, जो अभी भी रात की गीली थी। "एक बार और?" उसने पूछा। प्रिया ने जवाब में उसकी गर्दन में बाहें डाल दीं। इस बार कोई जल्दी नहीं थी। कुणाल की उंगलियां उसके अंदर थीं, आहिस्ता आहिस्ता, और उसकी जीभ उसके निप्पल पर।
प्रिया ने करवट बदली और कुणाल के ऊपर आ गई। उसने उसके लंड को अपनी चूत में खुद डाला और धीरे धीरे हिलने लगी। सुबह की ठंडी हवा और गर्म जिस्मों का मेल। "तुम्हें पता है," वह हांफते हुए बोली, "तीन साल पहले वाली रात अगर ऐसी होती तो..." "तो क्या?" "तो हमारा बच्चा दो साल का होता।" दोनों हंस पड़े, और हंसी के बीच ही दोनों एक साथ झड़ गए।
नाश्ते के बाद जब वे होटल से निकले तो प्रिया ने कुणाल का हाथ थामा। "अगली सालगिरह पर कहां?" कुणाल मुस्कुराया। "जहां तुम कहो। बस शर्त एक है।" "क्या?" "लाल साड़ी फिर से पहननी पड़ेगी।" प्रिया ने उसे धक्का दिया और दोनों बर्फीली धूप में हंसते हुए चल दिए।
दोपहर को जब वे माल रोड पर घूम रहे थे तो प्रिया ने एक दुकान से वही लाल रंग की चूड़ियां खरीदीं जो उसने शादी पर पहनी थीं। "अब हर सालगिरह पर नई चूड़ियां," उसने कहा। कुणाल ने उसका हाथ थामा। "और हर सालगिरह पर नई सुहागरात।" प्रिया शर्माकर हंसी। शाम को होटल लौटकर कुणाल ने उसे फिर से अपनी बाहों में लिया, और मनाली की दूसरी रात भी पहली से कम नहीं थी।
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