हिंदी शादी सेक्स कहानी: दूसरी शादी की पहली रात
"तुम्हें डर लग रहा है या शर्म आ रही है?" कल्पना ने दूल्हे के कमरे में कदम रखते ही हरीश से पूछा, और हरीश की हंसी छूट गई। इतनी रात को जयपुर की इस पुरानी हवेली के फूलों से सजे कमरे में दो ऐसे लोग पति पत्नी के रूप में खड़े थे जिनकी जिंदगी में पहले भी एक एक शादी हो चुकी थी, और उनकी हिंदी शादी सेक्स कहानी की शुरुआत किसी फिल्मी सीन जैसी नहीं बल्कि दो घबराए हुए दोस्तों की गुफ्तगू जैसी हो रही थी।
हरीश कुर्ते के बटन से खेलता रहा। "ईमानदारी से कहूँ तो दोनों। तुम?" कल्पना ने गहनों से भरे हाथ उठाकर उसके चेहरे को छुआ। "मैंने सोचा था इस उम्र में दूसरी शादी में घबराहट नहीं होगी। पर दरवाजे के बाहर मेहमानों की आवाजें सुनकर लगा जैसे मैं फिर से बाईस की दुल्हन हूँ।"
बत्तीस साल की कल्पना चार साल पहले विधवा हुई थी। अड़तीस का हरीश तीन साल से अकेला था। दोनों के परिवारों ने मिलकर यह रिश्ता तय किया था, कोई दबाव नहीं, बस दो अकेले लोगों को साथी मिल जाए इसलिए। हवेली के नीचे आँगन में अभी भी बारातियों की खुसर पुसर चल रही थी और ऊपर कमरे में सन्नाटा ऐसा था कि घड़ी की टिक टिक साफ सुनाई दे रही थी।
"चाय मंगाऊँ?" हरीश ने पूछा तो कल्पना ने हँसकर सिर हिलाया। "चाय नहीं। पहले दरवाजा बंद करो।" हरीश ने दरवाजा अंदर से बंद किया और कुंडी लगाई। जब वह मुड़ा तो कल्पना अपने गहने एक एक करके उतार रही थी। चूड़ियाँ खनखनाती हुईं और उसने उन्हें तकिए के पास रख दिया। "इतनी रात को गहनों की खनक से अच्छा है तुम्हारी धड़कन सुनूँ।"
हरीश उसके पास आया और उसके कंधों पर हाथ रखा। कल्पना का ब्लाउज गहरे लाल रंग का था और उस पर जरी का काम था। हरीश की उंगलियाँ काँप रही थीं। "धीरे धीरे," कल्पना ने फुसफुसाया। "मुझे जल्दी नहीं है। मुझे बस यह जानना है कि तुम सच में यहाँ हो।"
"मैं यहीं हूँ।" हरीश ने उसके माथे को चूमा। फिर गालों को। फिर होंठों को। पहला चुंबन धीमा था, जैसे दो लोग एक दूसरे का स्वाद याद कर रहे हों। कल्पना ने उसके निचले होंठ को हल्के से काटा और हरीश की साँस अटक गई। "यह तो शुरुआत है," उसने मुस्कुराकर कहा।
कल्पना ने खुद ही अपने ब्लाउज के हुक खोले। हरीश देखता रह गया। ब्लाउज उतरते ही उसका गोरा बदन दीये की रोशनी में चमक उठा। काली ब्रा में उसके बूब्स कसे हुए थे और हरीश की नजरें वहीं ठहर गईं। "देखते रहोगे या कुछ करोगे भी?" कल्पना ने शरारत से पूछा।
हरीश ने आगे बढ़कर ब्रा का हुक खोला। बूब्स आजाद होते ही कल्पना ने गहरी साँस ली। हरीश ने दोनों हाथों से उन्हें थामा, नरम और भारी। उसने एक निप्पल को उंगलियों से मरोड़ा और दूसरे को मुँह में ले लिया। कल्पना की उंगलियाँ उसके बालों में धंस गईं। "हाँ, ऐसे ही।"
चूसते चूसते हरीश का हाथ नीचे सरका। कल्पना की साड़ी का पल्लू पहले ही गिर चुका था। उसने पेटीकोट का नाड़ा खींचा और साड़ी धीरे धीरे फिसलकर फर्श पर ढेर हो गई। काली पैंटी में उसकी चूत की उभार साफ दिख रही थी और हरीश ने पैंटी के ऊपर से ही उसे सहलाया। गीली पैंटी उसकी उंगलियों से चिपक रही थी।
"तुम तो पहले से तैयार हो," हरीश ने कहा। कल्पना ने उसकी कमर पकड़कर उसे बिस्तर की ओर धकेला। "चार साल से किसी मर्द ने मुझे छुआ तक नहीं। आज रात मैं शर्माने नहीं आई हूँ।" उसने हरीश के कुर्ते के बटन एक एक करके खोले और कुर्ता उतार फेंका।
हरीश की छाती चौड़ी थी और उस पर हल्के बाल थे। कल्पना ने उसकी छाती पर जीभ फिराई, निप्पलों को चूमा और नीचे सरकती गई। उसने पायजामे का नाड़ा खोला और हरीश का लंड बाहर निकाल लिया। वह पहले से तना हुआ था, लंबा और मोटा, नसें उभरी हुईं।
कल्पना ने उसे हाथ में पकड़ा और ऊपर नीचे सहलाया। हरीश ने आह भरी। फिर उसने लंड के टोपे को जीभ से छुआ, चारों ओर घुमाया और धीरे धीरे पूरा मुँह में ले लिया। हरीश की कमर अपने आप हिलने लगी। "रुको, मैं झड़ जाऊँगा," उसने हाँफते हुए कहा।
कल्पना ने मुँह हटाया और शैतानी मुस्कान के साथ बोली, "अभी नहीं। अभी तो रात शुरू हुई है।" उसने लंड को फिर से मुँह में लिया और इस बार गहराई तक। उसके गले से गुर्राहट जैसी आवाज निकली और हरीश ने बिस्तर की चादर मुट्ठियों में भींच ली।
कुछ देर बाद कल्पना उठी और बिस्तर पर लेट गई। टाँगें फैलाकर उसने हरीश को इशारा किया। "अब तुम्हारी बारी।" हरीश ने उसकी पैंटी उतारी। उसकी चूत गीली और फूली हुई थी, होंठ खुले हुए। हरीश ने पहले उंगली से उसे छुआ, फिर दो उंगलियाँ अंदर डालीं।
कल्पना की कमर उठ गई। "हाँ, अंदर तक।" हरीश ने उंगलियों को अंदर बाहर किया और अँगूठे से उसके दाने को रगड़ा। कल्पना की साँसें तेज हो गईं। फिर हरीश ने मुँह लगाया। जीभ चूत के होंठों पर फिरती रही, दाने को चूसती रही। कल्पना ने तकिया मुँह में दबा लिया ताकि आवाज बाहर न जाए।
कल्पना ने हरीश का हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रखा। "उंगली से ऐसे करो," उसने उसकी उंगली को अंदर बाहर करना सिखाया। हरीश जल्दी सीख गया। दो उंगलियाँ गहराई तक जातीं और अँगूठा दाने को रगड़ता। कल्पना की टाँगें काँपने लगीं और उसने हरीश के बाल जोर से खींचे। "बस, अब और बर्दाश्त नहीं होता।"
"हरीश, बस अब। अंदर डालो।" कल्पना की आवाज में बेसब्री थी। हरीश उसके ऊपर आया। लंड चूत के मुँह पर रखा और धीरे से धक्का दिया। टोपा अंदर गया और कल्पना ने उसके कंधे नोच लिए। "पूरा डालो।"
हरीश ने एक जोर का धक्का दिया और पूरा लंड अंदर समा गया। दोनों की एक साथ आह निकली। चूत इतनी टाइट और गीली थी कि हरीश को लगा जैसे वह पिघल रहा है। उसने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। कल्पना ने टाँगें उसकी कमर पर लपेट लीं।
धक्के तेज होते गए। बिस्तर चरमराने लगा। कल्पना ने हरीश के होंठों को चूमा, उसकी पीठ को नोचा। "और जोर से। मुझे दर्द चाहिए, मुझे महसूस करना है कि मैं जिंदा हूँ।" हरीश ने उसकी बात मान ली। हर धक्के के साथ कल्पना की चूत से गीली आवाजें आने लगीं।
कल्पना का बदन अकड़ने लगा। "मैं झड़ रही हूँ।" उसकी चूत ने लंड को कसकर जकड़ लिया और वह काँपती हुई झड़ गई। पानी निकलते ही हरीश का भी बाँध टूट गया। उसने गहरी हुंकार के साथ अपना सारा माल उसकी चूत में छोड़ दिया। दोनों पसीने से तरबतर एक दूसरे से लिपटे रहे।
कुछ देर बाद कल्पना ने उसके सीने पर सिर रखा। "पहली शादी में सुहागरात पर मैं इतनी डरी थी कि कुछ याद नहीं। आज..." हरीश ने उसके बाल सहलाए। "आज क्या?" कल्पना ने उसकी आँखों में देखा। "आज मुझे लगा जैसे मैं पहली बार औरत बनी हूँ।"
हरीश ने उसे कसकर गले लगाया। "तुम्हें पता है, मैं सोच रहा था कि इस उम्र में दूसरी शादी में वह बात नहीं होगी।" कल्पना ने उसके लंड को फिर से हाथ में लिया जो नरम पड़ चुका था। "वह बात तो अब शुरू होगी," उसने कहा और उसे सहलाने लगी।
हरीश का लंड फिर से तनने लगा। कल्पना उसके ऊपर चढ़ गई। उसने लंड को अपनी चूत पर रखा और धीरे धीरे बैठ गई। पूरा लंड अंदर जाते ही उसने आँखें बंद कर लीं। "ऊपर से करना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। कंट्रोल मेरे हाथ में रहता है।"
कल्पना ऊपर नीचे होने लगी। उसके बूब्स हर उछाल के साथ हिल रहे थे और हरीश ने उन्हें हाथों से थाम लिया। निप्पलों को मरोड़ते हुए उसने नीचे से भी धक्के लगाने शुरू किए। कल्पना की रफ्तार बढ़ती गई। पसीना उसकी गर्दन से बहकर बूब्स के बीच उतर रहा था।
"तुम्हारी चूत बहुत टाइट है," हरीश ने हाँफते हुए कहा। "और तुम्हारा लंड बहुत मोटा है।" कल्पना ने जवाब दिया और रफ्तार और बढ़ा दी। कमरे में सिर्फ उनकी हाँफने की आवाजें और बदनों के टकराने की थप थप गूँज रही थी।
अचानक कल्पना रुकी और मुड़ी। "पीछे से करो।" वह घुटनों के बल हुई और कमर झुकाई। हरीश उसके पीछे आया और लंड को चूत में डाला। इस पोजीशन में लंड और गहराई तक गया। कल्पना ने चादर मुँह में दबा ली।
हरीश ने उसके कूल्हों को पकड़ा और जोर जोर से धक्के लगाए। हर धक्के के साथ कल्पना का बदन आगे झुकता। "हाँ, ऐसे ही चोदो मुझे।" उसकी आवाज दबी हुई थी पर बेसब्री साफ थी। हरीश की रफ्तार पागलों जैसी हो गई।
कल्पना फिर से चरम पर पहुँची। इस बार उसकी चीख तकिए में दब गई पर बदन बुरी तरह काँपा। हरीश ने भी आखिरी धक्कों के साथ अपना पानी उसकी चूत में छोड़ दिया। वह उसके ऊपर ही ढेर हो गया और दोनों हाँफते रहे।
हरीश ने करवट बदली और कल्पना को अपनी बाँहों में ले लिया। उसकी चूत से दोनों का मिला जुला पानी बह रहा था और चादर गीली हो चुकी थी। किसी को परवाह नहीं थी। कल्पना ने उसके सीने पर उंगली से लिखा, "मेरे पति।" हरीश ने उसके हाथ को चूमा। "मेरी पत्नी। हमेशा के लिए।"
बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर कल्पना ने धीरे से कहा, "सुबह रिश्तेदार पूछेंगे कि रात कैसी रही।" हरीश ने मुस्कुराकर पूछा, "तो क्या जवाब दोगी?" कल्पना ने उसकी छाती पर उंगली से दिल बनाते हुए कहा, "सच बता दूँगी। कि दूल्हा घबराया हुआ था और दुल्हन ने उसे संभाल लिया।"
सुबह के पाँच बजे थे। हवेली में अभी सन्नाटा था, मेहमान नीचे वाले कमरों में सो रहे थे। कल्पना की आँख खुली तो हरीश गहरी नींद में था, उसका हाथ अब भी उसकी कमर पर था। कल्पना मुस्कुराई और धीरे से बिस्तर से उठी।
उसने बाथरूम का दरवाजा खोला और अंदर जाकर शॉवर चलाया। गर्म पानी की आवाज से हरीश की आँख खुल गई। उसने कल्पना को बाथरूम की ओर जाते देखा और उठकर पीछे पीछे चला गया। दरवाजा अंदर से बंद था पर कुंडी नहीं लगी थी।
हरीश अंदर घुसा तो कल्पना शॉवर के नीचे खड़ी थी, पानी उसके नंगे बदन पर बह रहा था। "तुम्हें नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा। हरीश ने अपने कपड़े उतारे और शॉवर में घुस गया। पानी दोनों को भिगो रहा था।
कल्पना ने साबुन हाथ में लिया और हरीश की छाती पर मलने लगी। झाग के नीचे उसकी उंगलियाँ निप्पलों को छूतीं और नीचे सरकती गईं। हरीश का लंड फिर से तनने लगा। कल्पना ने उसे साबुन से धोया, धीरे धीरे सहलाते हुए।
"मेरी बारी," हरीश ने कहा और साबुन लेकर कल्पना के बूब्स पर लगाया। झाग भरे बूब्स को उसने दोनों हाथों से मला, निप्पलों को उंगलियों के बीच दबाया। कल्पना ने दीवार का सहारा लिया। हरीश का हाथ नीचे सरका और साबुन लगी उंगलियाँ उसकी चूत में घुसीं।
पानी और साबुन की चिकनाहट में उंगलियाँ आसानी से अंदर बाहर हो रही थीं। कल्पना ने एक टाँग उठाकर बाथटब के किनारे रखी। "और अंदर," उसने हाँफते हुए कहा। हरीश ने दो उंगलियाँ गहराई तक डालीं और अँगूठे से दाने को रगड़ा।
कल्पना का बदन काँपने लगा। शॉवर का पानी उनकी हाँफती साँसों के साथ बह रहा था। "हरीश, मुझे दीवार से लगाकर करो," उसने कहा। हरीश ने उसे घुमाया, उसके हाथ दीवार पर टिकाए और पीछे से लंड चूत में डाल दिया।
गीले बदन एक दूसरे से फिसल रहे थे। हरीश ने उसके कूल्हों को पकड़ा और तेज धक्के लगाए। बाथरूम में थप थप की आवाजें गूँज रही थीं, शॉवर की आवाज में दबी हुई। कल्पना ने होंठ काट लिए।
"मैं झड़ रही हूँ," कल्पना ने फुसफुसाया और उसका बदन अकड़ गया। चूत ने लंड को जकड़ लिया। हरीश ने भी आखिरी धक्कों के साथ अपना पानी अंदर छोड़ दिया। दोनों शॉवर के नीचे ही एक दूसरे से लिपटे खड़े रहे, पानी उनके ऊपर बहता रहा।
"अगर कोई उठ गया तो?" हरीश ने पूछा। कल्पना ने हँसकर कहा, "तो कह देंगे कि नई दुल्हन को नहाने में देर लग गई।" दोनों हँस पड़े और एक दूसरे को तौलिए से पोंछने लगे। सुबह की यह शुरुआत रात से कम मीठी नहीं थी।
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