Hindi Love Sex Kahani: कॉलेज का अधूरा प्यार
"तुमने अब भी वही गंदी आदत नहीं छोड़ी, किताबें खरीदने से पहले उन्हें सूंघते हो।" यह आवाज़ सुनते ही आरव का हाथ हवा में रुक गया। उसने किताब चेहरे से हटाई, सामने ईशा खड़ी थी, और वह बोला, "लगता है हम किसी hindi love sex kahani में आ गए हैं।"
ईशा हंस पड़ी, वही खुली हंसी जो कॉलेज में लाइब्रेरी की खामोशी तोड़ देती थी। "पांच साल बाद पुणे के बुक फेयर में टकराना," आरव ने कहा। "तुम अब भी ड्रामा करते हो," उसने कहा और उसके कंधे पर मुक्का मारा।
आरव ने किताब स्टॉल पर रखी और उसे देखा। वह पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। बालों से पानी टपक रहा था और कुर्ता कंधों पर चिपका था।
"तुम यहां कैसे? तुम तो दिल्ली में थी," उसने पूछा। "दो साल से पुणे में हूं, पब्लिशिंग हाउस में एडिटर हूं," ईशा बोली। तभी ज़ोर की गड़गड़ाहट हुई और स्टॉल वाले ने किताबों पर प्लास्टिक डाल दिया।
बारिश तेज़ हो गई और दोनों एक छोटे शामियाने के नीचे सिमट आए। भीड़ धक्का दे रही थी और उसका कंधा उसके सीने से सट गया। उसे उसके बालों की जानी पहचानी खुशबू आई।
"तुम भीग रही हो," कहकर आरव ने जैकेट उसके कंधों पर डाल दी। "तुम नहीं बदले," ईशा ने धीरे से कहा। "बदलने की कोशिश की थी," वह बोला और नज़रें चुरा लीं।
पास की टपरी से चाय की खुशबू आ रही थी। "चलो, एक कटिंग हो जाए," आरव ने कहा। दोनों बेंच पर बैठ गए और कुल्हड़ थाम लिए।
"याद है कॉलेज वाली टपरी, जहां हम लेक्चर बंक करके जाते थे?" ईशा ने पूछा। "और जहां तुमने सबके सामने मेरा हाथ पकड़ा था," आरव हंस पड़ा। उसकी नज़र उसके हाथ पर गई, कोई अंगूठी नहीं थी।
ईशा ने देखा कि वह अब भी चाय फूंककर पीता है, बिल्कुल कॉलेज जैसा। "कुछ आदतें अच्छी होती हैं," वह बोली। आरव ने कुल्हड़ नीचे रखा, "और कुछ लोग भी।"
ईशा की हंसी धीमी पड़ी। "मुझे माफ़ करना, आरव," उसकी आवाज़ भारी थी। "पापा के ट्रांसफर पर मैं बिना कुछ कहे दिल्ली चली गई।"
"मैंने तुम्हें बहुत ढूंढा। नंबर बंद, इंस्टाग्राम से गायब," उसकी आवाज़ में पुराना दर्द था। "मैं कायर थी," ईशा ने सिर झुकाया। "लगा दूरी से सब आसान होगा।"
बारिश टिन की छत पर बज रही थी। ईशा ने सिर उठाया और उसकी आंखों में देखा। "पर आसान कुछ नहीं हुआ," वह कांप रही थी। "मैं कभी आगे नहीं बढ़ पाई।"
"दिल्ली में दो रिलेशनशिप आए," उसने कहा। "पर आंखें बंद करती तो तुम्हारा ही चेहरा दिखता था।" उसने भीड़ की परवाह किए बिना उसका हाथ थाम लिया।
"पांच साल से सोचती हूं, काश उस दिन रुक गई होती।" उसकी आंखों में आंसू थे। "मैंने भी तुम्हें कभी भुलाया नहीं," आरव ने उसका हाथ कस लिया।
ईशा हंसते हंसते रो पड़ी, "तो हम दोनों ही पागल हैं।" बारिश धीमी हो रही थी।
"मेरी सोसाइटी यहीं पास है," आरव उठ खड़ा हुआ। "छत से बारिश के बाद का पुणे खूबसूरत लगता है, चलोगी?" ईशा ने बैग उठा लिया, "चलो।"
छत पर ठंडी हवा चल रही थी और नीचे शहर की बत्तियां जगमगा रही थीं। ईशा रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई। हवा में उड़ती एक लट आरव ने उसके कान के पीछे कर दी।
उसकी उंगलियां उसके गाल पर रुकीं और ईशा ने आंखें बंद कर लीं। "कितना सुकून है यहां," वह फुसफुसाई। आरव उसके पीछे आकर इतना करीब खड़ा हुआ कि सांस गर्दन पर महसूस हुई।
उसका अंगूठा उसके निचले होंठ पर रुक गया। ईशा की सांस थम गई। दोनों जानते थे कि अब पीछे हटना नामुमकिन है।
वह पलटी, दोनों आमने सामने। "कभी किसी को इतना चाहा कि डर लगे?" उसने पूछा। "सिर्फ तुम्हें," कहकर आरव ने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।
पहला चुंबन धीमा था, जैसे दोनों एक दूसरे को फिर से पहचान रहे हों। फिर ईशा ने उसके बालों में उंगलियां धंसाईं। आरव के हाथ उसकी कमर पर फिसले और उसने उसे रेलिंग से सटा लिया।
जब वे अलग हुए तो सांसें तेज़ थीं। "आरव, मैं..." "सोच लो," उसने कहा। "मैं जल्दबाज़ी नहीं चाहता।" ईशा ने उसकी उंगली हटाई, "मैंने पांच साल सोच लिया, अब और नहीं।"
उसने उसका हाथ पकड़ा, "तुम्हारा फ्लैट कौन सी मंज़िल पर है?" "तुम्हारे पैरों के ठीक नीचे।" फ्लैट में दीवारों पर किताबों की अलमारियां थीं। "आदत अब भी वैसी है," वह मुस्कुराई।
आरव ने अलमारी से टीशर्ट निकाली, "कपड़े भीगे हैं, बेडरूम उधर है।" "झांकोगे तो नहीं?" उसने शरारत से पूछा। "पांच साल इंतज़ार किया, पांच मिनट और सही।"
दरवाज़ा खुला और ईशा सिर्फ उसकी बड़ी टीशर्ट में बाहर आई। वह जांघों तक आ रही थी, पैर नंगे थे। आरव का गला सूख गया।
"ऐसे क्या देख रहे हो?" वह शरमाई। वह धीरे धीरे बढ़ा, "तुम्हें देख रहा हूं, सच में।" उसने गाल छुआ और होंठों पर झुक गया, इस बार कोई हिचकिचाहट नहीं थी।
उसने उसे दीवार से सटा लिया, होंठ गर्दन पर उतर आए। ईशा सिसकी और उसकी शर्ट के बटन खोलने लगी। जल्द ही शर्ट फर्श पर थी।
आरव ने उसे गोद में उठाया, उसने टांगें कमर में लपेट दीं। वह उसे बेडरूम ले गया और बिस्तर पर लिटा दिया।
चादर ठंडी थी और ईशा सिहर गई। आरव ने कंबल उसके कंधों तक खींच दिया। "गर्म हो जाओगी," वह बोला और उसके बगल में लेट गया।
कमरे में सिर्फ लैंप की रोशनी थी। आरव टीशर्ट उठाने लगा तो ईशा ने कलाई पकड़ ली। "मुझे डर लग रहा है," वह फुसफुसाई।
वह रुक गया और माथा चूमा। "डरो मत, मैं हूं," उसने कहा। "धीरे धीरे करेंगे।" उसने उसकी आंखों में देखा और कलाई छोड़ दी।
टीशर्ट ऊपर खिंची और उसका गोरा बदन चमक उठा। बूब्स गोल और भरे थे, निप्पल गुलाबी और कड़े। आरव की सांस रुक गई। उसने एक निप्पल मुंह में लिया।
ईशा के हाथ उसकी छाती पर फिसले, फिर पीठ पर। उसकी उंगलियां उसके कंधों में धंसीं। "तुम जिम जाने लगे हो," वह हंस दी।
ईशा सिसक पड़ी, "आह, आरव..." वह बारी बारी से दोनों को चूसता रहा। उसका हाथ उसके पेट पर गोल घूम रहा था। उसकी कमर अपने आप उठने लगी।
होंठ नीचे उतरे, पेट पर, फिर जांघों के अंदरूनी हिस्से पर। वह कांप रही थी। होंठ पैंटी के किनारे रुके, उसने सिर हिलाया और पैंटी नीचे खिसक गई।
उसकी चूत साफ और गुलाबी थी, उत्तेजना से भीगी। "मैंने कभी किसी के साथ यह नहीं किया," वह कांपी। "तुम पहले हो, सच में।"
उसका दिल भर आया। "तो आज की रात सिर्फ तुम्हारे लिए है," उसने कहा।
वह नीचे खिसका और जीभ उसकी चूत पर रख दी। वह उछली, "आह! यह क्या कर रहे हो!"
उसने उसके हाथ पकड़े और चाटता रहा, जीभ दाने पर गोल घूम रही थी। "प्लीज़, कुछ हो रहा है," वह हांफ रही थी। उसने दो उंगलियां धीरे से अंदर डालीं।
उसकी चीख निकली और बदन अकड़ गया। वह झड़ गई, थरथराती हुई।
आरव ऊपर आया और उसे गले लगाया। "कैसा लगा?" वह मुस्कुराया।
"पता नहीं था ऐसा भी होता है," वह उससे लिपट गई। "अब मेरी बारी," कहकर उसने उसे लिटा दिया। जींस का बटन खोला, ज़िप खींची, तना लंड बाहर निकला।
उसने डरते डरते उसे हाथ में लिया, गर्म और सख्त। "इतना बड़ा अंदर जाएगा?" वह घबराई।
"धीरे धीरे," उसने बाल सहलाए। वह झुकी और टोपे को मुंह में लिया।
"आह, ईशा..." उसकी जीभ टोपे पर घूमने लगी। "बस, रुक जाओ," वह हांफा और उसे खींच लिया। "ऐसे करती रही तो अभी झड़ जाऊंगा।"
"मैं तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूं," उसने कहा। उसकी आंखों में चमक आई। उसने ड्रॉअर की तरफ हाथ बढ़ाया तो ईशा ने रोक दिया, "आज बिना।"
"कोई दीवार नहीं, मैं पिल पर हूं," वह फुसफुसाई। वह उसके ऊपर आया और लंड को भीगी चूत पर रगड़ा। उसने टांगें फैला दीं, "आराम से।"
धीरे दबाव पर टोपा अंदर फिसला। वह दर्द से सिसकी, नाखून उसकी पीठ में धंस गए। "रुको," वह फुसफुसाई। वह तुरंत रुक गया।
"सांस लो," उसने होंठ चूमे, बूब्स सहलाए। बदन ढीला पड़ा तो उसने सिर हिलाया। वह इंच दर इंच अंदर धंसता गया।
जब वह पूरा समा गया तो दोनों ठहर गए। "तुम मेरे अंदर हो," उसकी आंखों में आंसू थे। "और अब तुम मेरी हो," उसने आंसू पोंछे।
"आरव," वह उसका नाम बड़बड़ाई, जैसे कोई दुआ पढ़ रही हो। उसने उसके माथे को चूमा। "मैं यहीं हूं, हमेशा के लिए।"
फिर वह धीरे हिलने लगा। हर धक्के के साथ सिसकारी बढ़ी। दर्द मीठे एहसास में बदला। "और तेज़," वह बड़बड़ाई।
"तुम्हारी चूत कितनी टाइट है," वह हांफा। "तुम्हारा लंड मुझे भर रहा है," उसने बेशर्मी से कहा। उसकी उत्तेजना दोगुनी हो गई।
उसने उसे पलटकर खुद ऊपर बैठ गई, "अब मैं।" वह लंड पर बैठी और ऊपर नीचे होने लगी। उसने बूब्स हाथों में भरे। बाल बिखरे, चेहरे पर मस्ती।
फिर उसने उसे घुटनों के बल किया और पीछे से घुसा। वह ज़ोर से कराही, "हां, ऐसे ही चोदो मुझे।" उसने बाल पकड़े और गहरे धक्के मारे।
"मैं झड़ने वाली हूं," वह चीखी। "साथ में," उसने रफ्तार बढ़ाई। "अंदर ही, प्लीज़ अंदर ही," वह बड़बड़ाई।
आखिरी धक्के पर वह उसके अंदर झड़ गया, गर्म धार उतर गई। उसी पल उसका बदन अकड़ा और चूत ने लंड को जकड़ लिया। दोनों हांफते ढेर हो गए।
"दर्द हो रहा है?" उसने पूछा। "थोड़ा, पर अच्छा वाला," वह मुस्कुराई।
वह तौलिया लाया और धीरे साफ किया, हल्का खून भी था। "पहली बार में नॉर्मल है।"
वह किचन से पानी का गिलास लाया और उसे पिलाया। ईशा ने दो घूंट पिए और हंस दी। "पहली बार के बाद पानी पिलाना भी किताबों में लिखा था?"
"तुम्हें कैसे पता?" "किताबों में पढ़ा है," वह हंस पड़ा। दोनों कंबल में दुबके, बाहर फिर बारिश थी। "पांच साल बर्बाद कर दिए," वह फुसफुसाई।
"बर्बाद नहीं," उसने बाल चूमे। "आज की रात के लिए ज़रूरी थे।"
तभी फोन बजा, उसने उठाकर साइलेंट किया और दूर रखा। "आज रात सिर्फ हम," उसने कहा। "कल सुबह तुम मुझे फिर से किताबों की दुकान ले चलोगे, वही पुरानी वाली।"
सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर ईशा के चेहरे पर पड़ी और वह कुनमुनाई। आरव की बांह अब भी उसकी कमर पर थी। उसने आंखें खोलीं और मुस्कुरा दी, रात का हर पल ताज़ा था।
बदन में हल्का दर्द था, पर वह मीठा था। उसने करवट बदली और आरव के सीने पर सिर रख दिया। उसकी धड़कन सुनकर उसे सुकून मिला। "उठ गए?" आरव की नींद भरी आवाज़ आई।
"हम्म," ईशा ने कहा और उसकी छाती पर उंगली से गोल घुमाए। "रात को तुमने कहा था किताबों की दुकान ले चलोगे।" आरव हंस पड़ा, "पहले चाय, फिर दुकान।"
वह उठा और किचन में चला गया। ईशा ने उसकी टीशर्ट पहनी और उसके पीछे आई। उसने पीछे से उसे गले लगाया और उसकी पीठ को चूम लिया। आरव के हाथ थम गए।
"ईशा, चाय जल जाएगी," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। "जलने दो," वह बोली और उसके कंधे पर दांत गड़ा दिए। उसके हाथ उसकी बनियान के अंदर फिसल गए।
आरव पलटा और उसे किचन की स्लैब से सटा लिया। "तुम्हें दर्द नहीं हो रहा?" उसने पूछा। "हो रहा है," ईशा ने शरारत से कहा। "पर अब अच्छा लग रहा है।" उसने उसके होंठों पर झुककर चूम लिया।
चुंबन धीमा और गहरा था। आरव के हाथ टीशर्ट के अंदर गए और उसके बूब्स को थाम लिया। वह उन्हें मसलने लगा और ईशा सिसक पड़ी। उसके निप्पल उसकी हथेलियों में कड़े हो रहे थे।
ईशा ने उसकी बनियान ऊपर खींची और उसकी छाती को चूमने लगी। वह नीचे उतरी और उसके लंड को पजामे के ऊपर से पकड़ लिया, वह पहले से तना था। "सुबह सुबह?" आरव हंस पड़ा।
"रात अधूरी रह गई थी," वह बोली और पजामा नीचे खिसका दिया। उसने लंड को हाथ में लिया और धीरे धीरे हिलाने लगी। फिर झुककर टोपे को चूमा और मुंह में ले लिया।
आरव ने सिसकारी भरी और उसके बाल पकड़ लिए। वह उसे चूसती रही, अब पहले से आत्मविश्वास के साथ। "बस," वह हांफा। "बेडरूम चलो।"
बिस्तर पर उसने उसे लिटाया और टीशर्ट उतार दी। उसकी चूत अब भी हल्की सूजी थी, पर भीगी हुई। उसने उंगली से छुआ तो वह कांप गई। "धीरे," वह फुसफुसाई।
वह उसके ऊपर आया और धीरे से अंदर फिसला। इस बार दर्द कम था, सिर्फ मीठा खिंचाव। ईशा ने टांगें उसकी कमर में लपेट दीं और उसे खींच लिया।
सुबह की धूप में दोनों धीरे धीरे हिले। "तुम्हारे अंदर होना सबसे अच्छा एहसास है," आरव बड़बड़ाया। "तो अंदर ही रहो," ईशा ने कहा और उसकी पीठ को खरोंच दिया।
रफ्तार बढ़ी और ईशा की सिसकारियां तेज़ हुईं। "मैं आ रही हूं," वह चीखी। आरव ने गहरे धक्के मारे और दोनों साथ झड़ गए, उसका वीर्य उसके अंदर उतर गया।
वे हांफते हुए लेटे रहे। "चाय तो जल गई होगी," ईशा हंस दी। "नई बना लेंगे," आरव ने कहा। "और किताबों की दुकान?" "वह भी, पर पहले एक और बार।"
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