पहली चुदाई की कहानी: सपनों वाली रात
सपना इतना असली था कि संदीप की आँख खुली तो उसे एक पल लगा कि काजल अभी भी उसके ऊपर है। उसकी पहली चुदाई की कहानी सपने में शुरू हुई थी, पर आज रात वो सच होने वाली थी।
सुबह के पाँच बजे थे। मेरठ का वो छोटा सा मकान, बाहर गली में कुत्तों का भौंकना, और बगल के कमरे में माँ के खर्राटे। संदीप ने करवट बदली। काजल उसके बगल में सो रही थी, चादर में लिपटी। शादी को पंद्रह दिन हो गए थे। पंद्रह रातें। और वो दोनों अभी तक एक नहीं हो पाए थे।
शुरू में शर्म थी। फिर घर में लोग थे। माँ बगल के कमरे में, पिताजी आँगन में। दीवारें पतली थीं। एक दो बार कोशिश की, पर हर बार कोई न कोई आ जाता। काजल की आँखों में अब सवाल रहने लगा था। क्या मुझमें कोई कमी है?
पर आज का दिन अलग था। आज शाम को माँ पिताजी बगल के गाँव में रिश्तेदार की शादी में जा रहे थे। रात भर वहीं रुकेंगे। घर में सिर्फ संदीप और काजल।
संदीप ने सपने को याद किया। सपने में काजल ने लाल साड़ी पहनी थी। उसने संदीप का हाथ पकड़ा था और कहा था, "आज डरो मत।" फिर जो हुआ था, वो इतना मीठा था कि संदीप का बदन अब भी गर्म था। वो सपना उसे आज रात का वादा लग रहा था।
उसने काजल के माथे पर चूमा। काजल की आँख खुल गई।
"क्या हुआ?" उसने नींद में पूछा।
"कुछ नहीं। सो जाओ।" संदीप ने कहा। "आज की रात हमारी है।"
काजल की आँखों में नींद उड़ गई। "सच?"
"सच।"
दिन बहुत लंबा लगा। संदीप मोबाइल की दुकान पर था, पर उसका मन काम में नहीं लग रहा था। उसने काजल को दो बार फोन किया। दोनों बार बस यही कहा, "जल्दी आ जाओ।"
दुकान पर उसका दोस्त अमित आया। "क्या बात है, आज चेहरा चमक रहा है," अमित ने कहा।
संदीप हँस दिया। "बस ऐसे ही।"
"भाभी से झगड़ा सुलझ गया क्या?" अमित ने छेड़ा।
"झगड़ा नहीं था," संदीप ने कहा। पर उसके मन में था, आज झगड़ा नहीं, कुछ और सुलझेगा। उसने घड़ी देखी। पाँच बज रहे थे। एक घंटा और।
घर पहुँचते ही उसने देखा, काजल ने बाल धोए थे। गीले बालों से गुलाब की खुशबू आ रही थी। उसने नई सलवार पहनी थी, पीली, जिसमें वो और भी खिल रही थी।
"तैयार हो?" संदीप ने पूछा।
"तुमसे ज़्यादा," काजल ने कहा, और दोनों हँस दिए।
शाम के छह बजे माँ पिताजी तैयार होकर निकले। माँ ने कहा, "खाना फ्रिज में है, गर्म कर लेना। और बहू का ख्याल रखना।"
"जी, माँ।"
दरवाज़ा बंद हुआ। ताला लगा। संदीप ने पलटकर काजल को देखा। वो दरवाज़े के पास खड़ी थी, पीली सलवार में। दोनों की नज़रें मिलीं और दोनों हँस दिए। घबराई हुई हँसी।
"तो," संदीप ने कहा, "घर खाली है।"
"तो," काजल ने कहा, "अब क्या करोगे?"
संदीप उसके पास गया और उसे गले लगा लिया। पहली बार, बिना डर के, बिना जल्दबाज़ी के। काजल ने अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं।
"मुझे डर लग रहा है," काजल ने फुसफुसाकर कहा।
"मुझे भी," संदीप ने कहा। "पर आज डरेंगे नहीं।"
उसने काजल के होंठों पर होंठ रख दिए। धीरे से। काजल ने पहले तो हिचकिचाहट दिखाई, फिर उसके होंठ खुल गए। जीभें मिलीं। वो चुम्बन लंबा चला, मीठा, बिना जल्दबाज़ी का।
"कमरे में चलें?" संदीप ने पूछा।
काजल ने सिर हिलाया।
कमरा छोटा था, पर आज वो उनका महल था। संदीप ने दरवाज़ा बंद किया। कुंडी लगाई। काजल पलंग पर बैठ गई, हाथ गोद में।
संदीप उसके सामने घुटनों पर बैठ गया। "काजल, देखो मुझे।"
काजल ने देखा। उसकी आँखों में डर था, पर चाहत भी।
"मैं तुम्हें कभी दुख नहीं दूँगा," संदीप ने कहा। "आज रात, सिर्फ प्यार होगा।"
उसने काजल का हाथ पकड़ा और चूमा। फिर उसकी उँगलियों को एक एक करके चूमा। काजल की साँसें तेज़ होने लगीं।
"तुम्हें पता है," संदीप ने कहा, "शादी वाले दिन जब तुम्हें पहली बार देखा था, घूँघट में, तो मैंने सोचा था, ये लड़की मेरी ज़िंदगी बदल देगी।"
"बदली?" काजल ने पूछा।
"आज बदलेगी," संदीप ने कहा। "पूरी तरह।"
संदीप ने उसका कुर्ता उतारा। काजल ने हाथों से अपना सीना ढकने की कोशिश की। संदीप ने उसके हाथ हटाए।
"शर्माओ मत," उसने कहा। "तुम मेरी हो।"
काजल के बूब्स छोटे थे, कसे हुए, गोरे। संदीप ने उन्हें हाथों में लिया। नरम। उसने एक निप्पल को जीभ से छुआ। काजल सिसक उठी।
"अच्छा लग रहा है?" संदीप ने पूछा।
"बहुत," काजल ने कहा।
संदीप ने सलवार का नाड़ा खोला। काजल ने कूल्हे उठाकर मदद की। अब वो सिर्फ पैंटी में थी। संदीप ने पैंटी भी उतार दी।
काजल नंगी थी, पलंग पर लेटी। संदीप उसे देखता रहा। इतनी खूबसूरत। इतनी उसकी।
"तुम भी," काजल ने कहा।
संदीप ने अपने कपड़े उतारे। उसका लंड तना हुआ था। काजल ने उसे देखा और शर्मा गई।
"इतना बड़ा," उसने कहा। "दर्द होगा?"
"शुरू में थोड़ा," संदीप ने ईमानदारी से कहा। "पर मैं धीरे करूँगा। और दर्द के बाद जो मज़ा आएगा, वो तुम सोच भी नहीं सकतीं।"
संदीप उसके ऊपर आया। उसने अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा। काजल गीली थी, पर टाइट थी। संदीप ने धीरे से धकेला।
काजल ने आँखें भींच लीं। "आह।"
"रुको," संदीप ने कहा। उसने रुककर उसके माथे पर चूमा, उसके बूब्स को सहलाया। "आराम से। साँस लो।"
काजल ने लंबी साँस ली। संदीप ने फिर धकेला, थोड़ा और अंदर। काजल की चूत ने लंड को कसकर पकड़ लिया।
"बस," काजल ने कहा। "बस थोड़ा रुको।"
संदीप रुका। वो उसके ऊपर लेटा रहा, उसे चूमता रहा, उसके बालों में उँगलियाँ फेरता रहा। कुछ देर बाद काजल ने कहा, "अब करो।"
संदीप ने धीरे धीरे हिलना शुरू किया। हर धक्का नापा हुआ, प्यार भरा। काजल की पकड़ ढीली होने लगी। दर्द की जगह कुछ और आने लगा।
"संदीप," काजल ने कहा, "अजीब लग रहा है। अच्छा अजीब।"
संदीप मुस्कुराया। उसने रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई। काजल की टाँगें अपने आप उसकी कमर के गिर्द लिपट गईं।
"हाँ," काजल बोली, "ऐसे ही।"
संदीप का लंड अब पूरी तरह अंदर बाहर हो रहा था। काजल की आवाज़ें बढ़ने लगीं। वो संदीप की पीठ को पकड़े थी।
"मैं... मुझे कुछ हो रहा है," काजल ने कहा।
"होने दो," संदीप ने कहा।
काजल का बदन अकड़ गया। वो पहली बार झड़ी। उसकी चूत ने लंड को भींचा। संदीप ने कुछ और धक्के मारे और उसके अंदर झड़ गया।
दोनों हाँफ रहे थे। संदीप काजल के ऊपर ही लेट गया। काजल की आँखों में आँसू थे।
"रो क्यों रही हो?" संदीप ने पूछा।
"खुशी के," काजल ने कहा। "इतना अच्छा होगा, सोचा नहीं था।"
संदीप ने उसके आँसू पोंछे। "ये तो शुरुआत है।"
वो दोनों कुछ देर ऐसे ही लेटे रहे। संदीप ने काजल के बालों में उँगलियाँ फेरीं। काजल ने उसके सीने पर सिर रखा और उसकी धड़कन सुनी।
"संदीप," काजल ने कहा, "सहेलियाँ कहती थीं, पहली बार में बहुत दर्द होता है, मज़ा नहीं आता।"
"और तुम्हें?"
"मुझे..." काजल ने शर्माकर उसका सीना थपथपाया। "मुझे बहुत मज़ा आया। तुम बहुत अच्छे हो।"
"तुमने भी तो हिम्मत दिखाई," संदीप ने कहा। "डर के बावजूद।"
"तुम्हारे लिए," काजल ने कहा।
आधी रात को काजल जागी। संदीप सो रहा था। उसने संदीप के सीने पर हाथ रखा। धड़कन। उसका पति। उसका पहला मर्द।
उसने संदीप के लंड को हाथ में लिया। सहलाया। लंड जागने लगा।
संदीप की आँख खुली। "क्या कर रही हो?"
"इस बार मैं करूँगी," काजल ने कहा। उसमें अब डर नहीं था। "तुम लेटे रहो।"
काजल उसके ऊपर आई। उसने लंड को अपनी चूत में लिया और धीरे से बैठ गई। इस बार दर्द नहीं था। सिर्फ भरा हुआ एहसास।
वो हिलने लगी। ऊपर नीचे। संदीप ने उसके कूल्हों को पकड़ लिया और मदद करने लगा।
"तुम तो सीख गईं," संदीप ने हँसकर कहा।
"अच्छा टीचर मिला है," काजल ने कहा।
काजल की रफ़्तार बढ़ती गई। उसके बूब्स उछल रहे थे। संदीप ने एक निप्पल मुँह में ले लिया।
"मैं फिर झड़ रही हूँ," काजल बोली।
इस बार उसका चरम लंबा था, गहरा था। वो संदीप के सीने पर गिर पड़ी, काँपती हुई। संदीप ने उसे पलटा और खुद ऊपर आकर कुछ ही धक्कों में झड़ गया।
सुबह के चार बजे थे। दोनों जाग रहे थे, एक दूसरे की बाहों में।
"सपने में क्या देखा था?" काजल ने पूछा।
संदीप ने बताया। लाल साड़ी। "आज डरो मत।"
काजल हँसी। "सपने वाली मैं ज़्यादा समझदार थी।"
"असली वाली ज़्यादा खूबसूरत है," संदीप ने कहा।
काजल ने उसके गाल पर चूमा। "संदीप, एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"पंद्रह दिन से मैं सोचती थी, कहीं तुम मुझसे प्यार नहीं करते। इसीलिए दूर रहते हो।" काजल की आवाज़ भर्रा गई। "आज पता चला, तुम तो बस सही रात का इंतज़ार कर रहे थे।"
संदीप ने उसे कसकर गले लगाया। "मैं तुमसे शादी वाले दिन से प्यार करता हूँ, पगली।"
फिर वो उठी और खिड़की के पास गई। बाहर हल्की रोशनी थी।
"माँ पिताजी सुबह आएँगे," उसने कहा।
"आने दो," संदीप ने कहा। "अब हमें किसी से डर नहीं।"
काजल पलटी। उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो संदीप ने सपने में देखी थी।
"संदीप," उसने कहा, "अगली बार सपना देखने की ज़रूरत नहीं। मैं रोज़ हूँ।"
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