मेरी सुहागरात की कहानी: पहली रात का नशा
मेरी सुहागरात की कहानी उस दरवाज़े की ठकठक से शुरू हुई जिसे सुनकर मेरी उंगलियों ने घबराकर घूंघट को और कस लिया। दरवाज़े के उस पार से कबीर की आवाज़ आई, धीमी और थोड़ी हंसी में डूबी। "सुनो, मैं अंदर आ जाऊं? या तुम चाहो तो मैं बाहर ही सो जाता हूं।" मैंने घबराकर कहा, "आ जाओ।" लेकिन मेरी आवाज़ इतनी धीमी निकली कि मुझे खुद यकीन नहीं हुआ कि उन्होंने सुना भी या नहीं।
दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। कुंडी लगने की आवाज़ मेरे कानों में इतनी ज़ोर से गूंजी कि मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। पूरा दिन मेहंदी, फेरे, फोटो, रिश्तेदारों की भीड़, और अब यह कमरा। लाल चादर पर गुलाब की पंखुड़ियां बिखरी थीं, दीये की लौ हवा में कांप रही थी, और मैं बिस्तर के एक कोने पर बैठी अपने ही हाथों की अंगूठियां घुमा रही थी। कबीर ने धीरे से मेरा घूंघट ऊपर किया। उनकी आंखों में वो नज़र थी जो कह रही थी कि आज वो मुझे पहली बार सच में देख रहे हैं।
"तुम आज बहुत खूबसूरत लग रही हो, प्रिया," उन्होंने कहा और मेरे गाल पर उंगली से हल्की लकीर खींची। मेरा चेहरा गरम हो गया। उन्होंने मेरे पास बैठकर मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। उनकी हथेली गर्म और थोड़ी पसीने से नम थी। मुझे एहसास हुआ कि वो भी घबराए हुए हैं। "मुझे डर लग रहा है," मैंने सच कह दिया। कबीर हंस पड़े। "मुझे भी। लेकिन डर में भी मज़ा है, है ना?"
उन्होंने मेरा हाथ अपने होंठों से लगाया और हल्के से चूमा। फिर मेरी उंगलियों के बीच अपनी उंगलियां फंसाकर मुझे अपनी ओर खींचा। मैं उनके कंधे से टकरा गई। उनकी खुशबू, अतर और पसीने की मिली जुली महक, मेरे नथुनों में भर गई। उन्होंने मेरे कान के पास आकर फुसफुसाया, "आज रात कोई जल्दी नहीं। जो होगा, धीरे धीरे होगा।" उनकी सांस मेरे कान पर गिरी और मेरे पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई।
कबीर ने मेरे गले के हार को छुआ और फिर उसे खोलने लगे। हार खुलते ही मेरा गला खुला, और उनकी उंगलियां मेरी गर्दन पर फिसलने लगीं। उन्होंने मेरी गर्दन पर हल्का चुम्बन दिया। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। उनका मुंह मेरी गर्दन से होते हुए मेरे कंधे तक आया। हर चुम्बन के साथ मेरा बदन हल्का हल्का कांप रहा था। मैंने उनके बालों में अपनी उंगलियां डाल दीं और उन्हें और पास खींच लिया।
"प्रिया," उन्होंने मेरे ब्लाउज के हुक की ओर इशारा करते हुए पूछा, "इसे खोल दूं?" मैंने सिर्फ सिर हिलाया। हां कहने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन ना कहने का मन बिल्कुल नहीं था। उन्होंने एक एक करके मेरे ब्लाउज के हुक खोले। हर हुक खुलने के साथ मेरी सांस तेज़ होती गई। जब ब्लाउज खुला तो उनकी नज़र मेरे सीने पर टिक गई। मैं शरमा गई और हाथों से ढकने लगी, लेकिन उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए। "छुपाओ मत। आज की रात ये सब मेरा है।"
उन्होंने मेरी ब्रा का हुक भी खोल दिया। मेरे भारी उभार आज़ाद हो गए। कबीर की आंखों में एक भूख उतर आई जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उन्होंने मेरे एक उभार को हाथ में लिया, उसे धीरे धीरे दबाया, और फिर अपने मुंह में ले लिया। मैंने ज़ोर से सिसकारी भरी। "आह, कबीर।" उनकी जीभ मेरे निप्पल पर घूम रही थी, कभी चूसती, कभी हल्के से काटती। मैं बिस्तर की चादर को मुट्ठियों में भींच रही थी।
दूसरे हाथ से वो मेरे दूसरे उभार को मसल रहे थे। उनके अंगूठे मेरे निप्पल को रगड़ रहे थे और हर रगड़ मेरे पेट के नीचे एक गर्म लहर भेज रही थी। मेरी चूत में हल्की गीलापन महसूस होने लगा। मैंने पहले कभी अपने बदन को इस तरह महसूस नहीं किया था। "तुम्हारे हाथ बहुत गर्म हैं," मैंने फुसफुसाया। "और तुम्हारा बदन बहुत नरम," उन्होंने जवाब दिया और मेरी नाभि पर चुम्बन दिया।
कबीर ने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा। साड़ी बिस्तर पर फिसलती चली गई। फिर उन्होंने मेरी पेटीकोट की डोरी खोली। मैं अब सिर्फ पैंटी में उनके सामने थी। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और एक गहरी सांस ली। "तुम सपने जैसी हो।" मैंने शरमाते हुए कहा, "तुम भी तो कपड़े उतारो ना।" वो हंसे और अपनी शेरवानी के बटन खोलने लगे।
जब कबीर ने अपनी शर्ट उतारी तो मैंने उनका चौड़ा सीना देखा। हल्के बाल, पसीने की चमक। उन्होंने अपनी पैंट भी उतार दी। उनके अंडरवियर में उनका लंड साफ़ तना हुआ दिख रहा था। मेरी आंखें वहीं अटक गईं। मैंने पहले कभी किसी मर्द का लंड नहीं देखा था। डर और उत्सुकता दोनों एक साथ मेरे दिल में धड़क रहे थे। कबीर ने मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने लंड पर रख दिया।
"छूकर देखो। डरो मत," उन्होंने कहा। मैंने कांपते हाथों से उनके अंडरवियर के ऊपर से उनके लंड को छुआ। वो गर्म और सख्त था, और मेरी छुअन पर हल्का फड़क रहा था। कबीर ने अपना अंडरवियर उतार दिया। उनका लंड अब पूरी तरह नंगा मेरे सामने था। लंबा, मोटा, नसों से भरा, और टिप पर हल्का गीलापन। मैंने उसे अपनी हथेली में लिया और धीरे धीरे ऊपर नीचे करने लगी।
कबीर की सांसें तेज़ हो गईं। "हां, ऐसे ही। थोड़ा और कसकर पकड़ो।" मैंने उनकी बात मानी। मेरी मुट्ठी उनके लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी और वो मेरे बालों को सहला रहे थे। "तुम्हें पता है," उन्होंने कहा, "मैंने इस पल का कितना इंतज़ार किया है।" मैंने ऊपर देखा और मुस्कुराई। "अब इंतज़ार खत्म।" फिर मैंने हिम्मत करके उनके लंड के टिप पर अपनी जीभ लगाई।
नमकीन स्वाद मेरी जीभ पर फैला। कबीर ने ज़ोर से सांस खींची। मैंने उनके लंड को अपने मुंह में लिया और धीरे धीरे चूसने लगी। पहले सिर्फ टिप, फिर आधा, फिर जितना अंदर जा सका। मेरी जीभ उनके लंड के नीचे वाली नस पर घूम रही थी। वो मेरे सिर को पकड़कर हल्के धक्के दे रहे थे। "प्रिया, बहुत अच्छा लग रहा है।" मैं और जोश से चूसने लगी। उनका लंड मेरे मुंह में और सख्त हो रहा था।
कुछ देर बाद कबीर ने मुझे रोका। "रुको। अगर तुम ऐसे ही करती रहीं तो मैं अभी झड़ जाऊंगा।" उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरी पैंटी उतार दी। मैं पूरी नंगी उनके सामने लेटी थी। उन्होंने मेरी टांगें फैलाइं और मेरी चूत को देखा। "इतनी गीली," वो बुदबुदाए। फिर उन्होंने अपना मुंह मेरी चूत पर रख दिया।
उनकी जीभ मेरी चूत की फांकों पर फिसली। मैं चीख पड़ी। "आह। कबीर।" उन्होंने मेरी चूत को चाटना शुरू किया, ऊपर से नीचे, फिर नीचे से ऊपर। उनकी जीभ मेरे दाने पर टिक गई और उसे चूसने लगी। मेरे पैर कांपने लगे। मैंने उनके सिर को अपनी चूत पर दबा दिया। "मत रुको। प्लीज़ मत रुको।" वो और तेज़ चाटने लगे। उनकी एक उंगली मेरी चूत में घुस गई।
उंगली अंदर बाहर हो रही थी और जीभ दाने को चूस रही थी। मुझे लगा जैसे मेरे बदन में बिजली दौड़ रही है। मेरी कमर बिस्तर से उठने लगी। "कबीर, मुझे कुछ हो रहा है।" "होने दो," उन्होंने कहा और और तेज़ चाटा। अचानक मेरे पूरे बदन में एक ज़ोरदार लहर उठी। मेरी चूत से पानी छूटा और मैं कांपती रह गई। मेरा पहला चरम। मैं हांफ रही थी, पसीने से तर।
कबीर मेरे ऊपर आए और मुझे चूमा। मेरे होंठों पर मेरी ही चूत का स्वाद था। "कैसा लगा?" उन्होंने पूछा। "जैसे मैं मरकर जी उठी," मैंने कहा और हम दोनों हंस पड़े। उन्होंने अपना लंड मेरी चूत के मुंह पर रखा। "अब असली काम। तैयार हो?" मैंने उनकी आंखों में देखा। "हां। लेकिन धीरे से।" उन्होंने सिर हिलाया और धीरे धीरे धक्का दिया।
उनके लंड का टिप मेरी चूत में घुसा। एक तेज़ दर्द उठा। मैं चीख पड़ी। "रुको। दर्द हो रहा है।" कबीर रुक गए। उन्होंने मेरे माथे को चूमा। "सांस लो। आराम से।" कुछ पल बाद दर्द कम हुआ। उन्होंने थोड़ा और धक्का दिया। इस बार लंड और अंदर गया। दर्द के साथ एक अजीब सा भरा हुआ एहसास भी था। मैंने उनकी पीठ को नाखूनों से खरोंचा।
धीरे धीरे उनका पूरा लंड मेरी चूत में समा गया। दर्द अब हल्की चुभन में बदल गया था। कबीर धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगे। हर धक्के के साथ मेरी चूत उनके लंड को और कसकर पकड़ रही थी। "तुम बहुत टाइट हो," वो हांफते हुए बोले। "और तुम बहुत बड़े हो," मैंने जवाब दिया। उन्होंने मेरी टांगें अपने कंधों पर रख लीं और गहरे धक्के देने लगे।
अब दर्द पूरी तरह मज़े में बदल चुका था। हर धक्का मेरी चूत के अंदर एक मीठी आग जला रहा था। मैं उनके हर धक्के के साथ अपनी कमर उठा रही थी। "और तेज़। कबीर, और तेज़।" वो और तेज़ धक्के देने लगे। बिस्तर हिलने लगा। गुलाब की पंखुड़ियां बिखर गईं। हमारी सांसें, हमारी सिसकारियां, कमरे में गूंज रही थीं।
कबीर ने मुझे पलटा और घोड़ी बनाया। मैं अपने हाथों और घुटनों पर थी। उन्होंने पीछे से मेरी चूत में अपना लंड डाला। इस पोज़ में वो और गहरा जा रहा था। "आह। बहुत गहरा।" मैंने कहा। उन्होंने मेरी कमर पकड़ी और तेज़ तेज़ धक्के देने लगे। उनके हर धक्के पर मेरे उभार हिल रहे थे। उन्होंने एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरे उभार को पकड़ लिया और मसलने लगे।
मैं पागलों जैसी सिसकारियां भर रही थी। "चोदो मुझे। ज़ोर से चोदो।" मेरे मुंह से ये शब्द सुनकर कबीर और जोशीले हो गए। उन्होंने मेरी चूत में ताबड़तोड़ धक्के देने शुरू किए। मेरी चूत से फच फच की आवाज़ आ रही थी। गीलापन मेरी जांघों पर बह रहा था। मुझे लगा कि मैं फिर से झड़ने वाली हूं। "कबीर, मैं आ रही हूं।"
"मैं भी," वो चिल्लाए। उन्होंने कुछ और ज़ोरदार धक्के दिए और फिर उनका लंड मेरी चूत में फड़कने लगा। गर्म वीर्य मेरी चूत में भर गया। मैं भी उसी पल झड़ गई। मेरा बदन बुरी तरह कांपा। हम दोनों एक दूसरे पर गिर पड़े, हांफते हुए, पसीने से तर। कबीर का लंड अभी भी मेरी चूत में था, धीरे धीरे नरम पड़ रहा था।
कुछ देर हम ऐसे ही लेटे रहे। फिर कबीर ने मुझे अपनी बाहों में लिया। "तुम ठीक हो?" उन्होंने पूछा। मैंने उनके सीने पर सिर रखा। "मैंने सोचा था कि पहली बार डरावनी होगी। लेकिन तुमने उसे खूबसूरत बना दिया।" उन्होंने मेरे माथे को चूमा। "और अभी रात बाकी है।" मैंने उनकी आंखों में देखा। उनमें फिर से वही भूख थी।
मैंने हिम्मत करके उनके लंड को फिर से हाथ में लिया। वो धीरे धीरे फिर से सख्त हो रहा था। "इस बार मैं ऊपर रहूंगी," मैंने कहा। कबीर हंस पड़े। "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, दुल्हन साहिबा।" मैं उनके ऊपर बैठी और उनके लंड को अपनी चूत में डाला। इस बार कोई दर्द नहीं था, सिर्फ भरा हुआ मज़ा। मैं उनके ऊपर ऊपर नीचे होने लगी।
मेरे उभार उनके चेहरे के सामने हिल रहे थे। उन्होंने एक निप्पल मुंह में ले लिया। मैं तेज़ तेज़ उनके लंड पर उछल रही थी। "हां, ऐसे ही।" वो बोले। मैंने उनकी छाती पर हाथ टिकाए और अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। मेरी चूत उनके लंड को निचोड़ रही थी। कुछ ही मिनटों में हम दोनों फिर से चरम पर पहुंच गए। इस बार मैंने ज़ोर से चीखकर अपना नाम पुकारा।
हम दोनों पसीने से तर बिस्तर पर लेटे थे। कबीर ने चादर हम दोनों पर डाल दी। मैंने उनके सीने पर सिर रखा और उनकी धड़कन सुनी। "कबीर," मैंने कहा। "हम्म?" "अगली बार जब कोई मुझसे पूछेगा कि मेरी सुहागरात कैसी थी, तो मैं क्या कहूंगी?" वो हंसे। "कह देना कि तुम्हारे पति ने तुम्हें दो बार जन्नत दिखाई।" मैंने उन्हें हल्के से मारा। "बेशर्म।" "तुम्हारा बेशर्म," उन्होंने कहा और मुझे कसकर गले लगा लिया।
बाहर से शहनाई की धीमी आवाज़ आ रही थी। दीया बुझने को था। मैंने कबीर के कान में फुसफुसाया, "सोना मत। अभी रात बाकी है।" उन्होंने मेरी ओर देखा, मुस्कुराए, और मुझे फिर से अपनी बाहों में खींच लिया।
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