गाँव की उस दोपहर की आग जब खाली आँगन में दो शरीर ने सारी मर्यादाएँ जला दीं और कोई रोकने वाला नहीं था
दोपहर के तीन बज रहे थे। गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था। गर्मी इतनी तेज थी कि लोग घरों के अंदर दुबके हुए थे।
सुमित्रा आँगन में बैठी चक्की चला रही थी। साड़ी का पल्लू सिर पर था, लेकिन पसीने से ब्लाउज शरीर से चिपक गया था। तभी पीछे से आवाज आई—
“पानी पिला देना बहू।”
सुमित्रा ने मुड़कर देखा। भोला था। गाँव का ही लड़का, लेकिन शहर से पढ़कर आया था। लंबा, मजबूत शरीर, और आँखों में वो बात जो गाँव के और लड़कों में नहीं होती।
सुमित्रा ने घड़ा उठाया और लोटा भरकर दिया। भोला ने पानी पीते हुए उसकी ओर देखा। नजरें कुछ देर तक अटकी रहीं। सुमित्रा की साँस तेज हो गई। उसने नजरें चुरा लीं।
“घर में कोई है?” भोला ने धीरे से पूछा।
सुमित्रा ने सिर हिलाया। “सास-ससुर खेत गए हैं। पति… शहर में है।”
भोला ने लोटा वापस रखा और एक कदम करीब आ गया। “तो अकेली हो?”
सुमित्रा कुछ नहीं बोली। भोला ने उसका हाथ पकड़ लिया। सुमित्रा काँप गई, लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। भोला ने उसे घर के अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया।
अंदर आते ही भोला ने सुमित्रा को दीवार से सटा दिया। साड़ी का पल्लू खींचकर फर्श पर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। सुमित्रा की साँसें तेज चल रही थीं। भोला ने ब्रा को ऊपर उठाया और दोनों स्तनों को अपने हाथों में ले लिया। जोर से मसला, फिर निप्पल को मुँह में लेकर चूसने लगा।
सुमित्रा की कमर अपने आप आगे बढ़ गई। “भोला… कोई देख लेगा…”
“कोई नहीं आएगा,” भोला ने कहा और उसके निप्पल को दाँतों से हल्का काटा। सुमित्रा की सिसकी निकल गई।
भोला ने उसकी साड़ी खोल दी। पेटीकोट भी नीचे गिर गया। सुमित्रा अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। भोला ने उसे चारपाई पर लिटा दिया। पैंटी को एक झटके में नीचे खींचा और उसकी जाँघें फैला दीं।
सुमित्रा की आँखें बंद हो गईं। भोला ने अपनी जीभ उसके बीच में रख दी। गाँव की औरत पहली बार ऐसा एहसास कर रही थी। भोला की जीभ तेज और अनुभवी थी। वह उसके क्लिट को चूस रहा था, फिर उंगलियाँ अंदर डालकर जोर-जोर से हिला रहा था।
सुमित्रा के नाखून चारपाई की रस्सी में गड़ गए। “आह्ह… भोला… ये क्या कर रहे हो…”
भोला नहीं रुका। उसकी जीभ और उंगलियाँ और तेज हो गईं। सुमित्रा का शरीर अकड़ गया और वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। उसके मुँह से एक लंबी आवाज निकली जो उसने खुद दबाने की कोशिश की।
भोला ऊपर आया। उसने अपनी धोती खोल दी। सुमित्रा की आँखें उसके कड़े अंग पर फट गईं। भोला ने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही धक्के में अंदर तक घुस गया।
सुमित्रा चीख पड़ी। “आह्ह… बहुत जोर से…”
भोला ने जवाब में और गहरा धक्का मारा। चारपाई चरमरा रही थी। हर धक्का इतना तीव्र था कि सुमित्रा की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। भोला ने उसके स्तनों को पकड़ रखा था और निप्पल्स को मरोड़ रहा था।
“बोल बहू… कैसा लग रहा है?” भोला ने गुर्राते हुए पूछा।
सुमित्रा की आवाज टूट रही थी। “अच्छा… और जोर से करो…”
भोला ने उसकी टाँगें और फैला दीं और पूरी ताकत से मारने लगा। सुमित्रा की आवाजें अब दब नहीं पा रही थीं। भोला ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया और और तेज हो गया।
थोड़ी देर बाद भोला ने उसे पलटा और घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से अंदर घुस गया। इस बार और गहरा। उसने सुमित्रा के बाल पकड़ लिए और जोर से खींचे। हर धक्के के साथ सुमित्रा की गर्दन पीछे की ओर झुक रही थी।
भोला ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। आवाज आँगन तक गूँज गई। सुमित्रा और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी।
“पूरा ले लो भोला… तोड़ दो…”
भोला ने उसकी कमर और नीचे झुका दी और पूरी शक्ति लगा दी। सुमित्रा का दूसरा चरम इतना तेज था कि उसके पैर लड़खड़ा गए। भोला ने भी उसी समय उसके अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। गर्म और गाढ़ा अंश उसके अंदर भर गया।
दोनों चारपाई पर गिरे पड़े थे। पसीने से लथपथ। सुमित्रा की साँसें अभी भी तेज चल रही थीं।
भोला ने उसका स्तन सहलाते हुए कहा, “आज रात फिर आऊँगा।”
सुमित्रा चुप रही। फिर धीरे से बोली, “आ जाना… दरवाजा खुला छोड़ दूँगी।”
रात के ग्यारह बजे भोला फिर आया। इस बार सुमित्रा ने खुद दरवाजा खोला। साड़ी पहने थी, लेकिन अंदर कुछ नहीं। भोला ने उसे देखते ही उठा लिया और चारपाई पर ले जाकर पटक दिया।
इस बार कोई धीरे-धीरे वाला खेल नहीं था। भोला ने उसकी साड़ी फाड़ दी और सीधे अंदर घुस गया। सुमित्रा की टाँगें उसके कमर के चारों ओर लिपट गईं। भोला जोर-जोर से धक्के लगा रहा था। चारपाई इतनी जोर से चरमरा रही थी कि लगता था टूट जाएगी।
सुमित्रा अब खुद अपनी टाँगें और फैला रही थी। “और अंदर… पूरा…”
भोला ने उसकी दोनों टाँगें हवा में उठा लीं और खड़े होकर मारने लगा। सुमित्रा का शरीर पूरी तरह उसके हाथों में था। हर धक्का इतना गहरा था कि सुमित्रा की आँखें पीछे की ओर फिर रही थीं।
तीसरा चरम दोनों का एक साथ आया। सुमित्रा की आवाज इस बार गाँव की खामोशी में गूँज गई। भोला ने उसके अंदर ही छोड़ दिया और कुछ देर तक उसी पोजीशन में रहा।
सुबह होने से पहले भोला चला गया। सुमित्रा चारपाई पर लेटी रही। शरीर में दर्द था, जाँघों के अंदर उसका अंश अभी भी बह रहा था, और गले पर दाँतों के निशान थे।
उसने मुस्कुरा दिया।
गाँव की उस दोपहर की आग अब रात में भी जल रही थी। और सुमित्रा जानती थी—ये आग अब बुझने वाली नहीं।
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