चाची की चुदाई की कहानी: दूध वाली सुबह
"और तेज़ चलाओ विवेक, दूध गरम हो जाएगा!" बाइक के पीछे बैठी चाची की आवाज़ मेरे कान से टकराई और उनकी बाँह मेरी कमर के इर्द गिर्द कस गई। उस पल मुझे क्या पता था कि मुज़फ्फरनगर के इस गाँव में गर्मियों की ये सुबह की सैरें मेरी और चाची की चुदाई की कहानी की शुरुआत बनने वाली थीं।
मैं विवेक, चौबीस साल का, मेरठ के कॉलेज में हॉस्टल में रहता हूँ। गर्मियों की छुट्टियों में चाचा के घर आया था। चाचा रमेश दिल्ली में रेलवे में नौकरी करते हैं, हफ़्ते में सिर्फ़ इतवार को घर आते हैं। घर पर अकेली रहती हैं चाची सुनीता, छत्तीस साल की, और उनकी दो भैंसें जिनका दूध मैं रोज़ सुबह डेयरी तक पहुँचाता हूँ।
पहले दो दिन सब कुछ सीधा सादा था। सुबह साढ़े पाँच बजे चाची मुझे जगातीं, मैं बाइक निकालता, दूध के दो कनस्तर कैरियर पर बाँधता। चाची पीछे बैठतीं और हम दो किलोमीटर दूर डेयरी कलेक्शन पॉइंट तक जाते। रास्ते में बस खेतों की खुशबू और उनकी चूड़ियों की खनक।
तीसरे दिन कुछ बदला। गाँव की कच्ची सड़क पर एक गड्ढा आया, बाइक उछली, और चाची का सीना मेरी पीठ से ज़ोर से दब गया। "सॉरी चाची," मैंने कहा। उन्होंने हँसते हुए कहा, "सॉरी किस बात का? गड्ढा मैंने थोड़े ही बनाया है।" पर उनकी बाँह उस दिन से मेरी कमर पर थोड़ी ज़्यादा टिकी रहने लगी।
चौथे दिन डेयरी पर ताला लगा था। कलेक्शन वाला लड़का बोला, "भैया, आज मालिक शहर गया है, दूध एक घंटे बाद लेगा।" चाची ने कहा, "तो क्या हुआ, हम यहीं शेड में बैठते हैं।" डेयरी के पीछे एक छोटा सा टिन शेड था, जिसमें भूसे की बोरियाँ पड़ी थीं। हम दोनों अंदर बैठ गए।
शेड में सुबह की धूप टिन की दरारों से आ रही थी। चाची मेरे सामने बैठी थीं, उनका पल्लू कंधे से थोड़ा सरक गया था। "विवेक, तुम्हारे हॉस्टल में कोई गर्लफ्रेंड है?" उन्होंने अचानक पूछा। मैं हकलाया, "न... नहीं चाची।" वो मुस्कुराईं, "झूठ मत बोलो, इतने हैंडसम लड़के को कोई न कोई तो पसंद करती होगी।"
मैंने हिम्मत करके कहा, "पसंद करने वाली तो बहुत हैं चाची, पर मुझे तो..." मैं रुक गया। "तुम्हें तो क्या?" उनकी आँखों में शरारत थी। मेरा दिल धड़कने लगा। मैंने उनकी तरफ़ देखा और कहा, "मुझे तो आप जैसी पसंद हैं।" शेड में सन्नाटा छा गया, सिर्फ़ बाहर भैंसों की घंटियों की आवाज़।
चाची ने मेरी आँखों में देखा, फिर धीरे से अपना हाथ मेरे घुटने पर रखा। "विवेक, ये क्या कह रहे हो? मैं तुम्हारी चाची हूँ।" उनकी आवाज़ में डाँट कम, कँपकँपाहट ज़्यादा थी। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा, "और मैं आपका भतीजा हूँ चाची, पर इस दिल का क्या करूँ?" उन्होंने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया।
वो मेरे और क़रीब आईं। उनकी साँसों की गर्मी मेरे चेहरे पर महसूस हुई। "चाचा को पता चला तो?" उन्होंने फुसफुसाया। मैंने कहा, "चाचा इतवार को आएँगे चाची, आज तो मंगलवार है।" ये सुनकर वो हँस पड़ीं, और उस हँसी में डर से ज़्यादा इजाज़त थी।
मैंने पहली बार उनका गाल छुआ। उनकी त्वचा नरम और गर्म थी। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। मैंने धीरे से उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो पहले काँपीं, फिर मेरे कंधों को पकड़कर मुझे अपने में खींच लिया।
वो चुम्बन लंबा और गहरा था। उनकी जीभ मेरी जीभ से मिली और मेरे पूरे बदन में करंट दौड़ गया। मेरा हाथ उनके ब्लाउज़ के ऊपर से उनके सीने पर गया। उन्होंने मेरे हाथ को दबाया, हटाया नहीं। "धीरे," वो बोलीं, "कोई आ जाएगा।"
मैंने उनके ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। एक, दो, तीन। उनका गोरा सीना मेरे सामने था, काली ब्रा में कसा हुआ। मैंने ब्रा का हुक खोला और उनके दोनों उरोज़ आज़ाद हो गए। वो भारी और भरे हुए थे, निप्पल तने हुए।
मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। चाची के मुँह से एक सिसकी निकली, "आह... विवेक..." उनका हाथ मेरे बालों में था, वो मुझे अपने सीने पर दबा रही थीं। मैं बारी बारी से दोनों को चूसता रहा, चाटता रहा, हल्के से दाँतों से दबाता रहा।
"चाची, आपकी सलवार..." मैंने कहा। उन्होंने शर्माते हुए गाँठ खोली। मैंने सलवार नीचे सरकाई। उनकी जाँघें गोरी और चिकनी थीं, और उनकी चूत... मैं देखता रह गया। हल्के बाल, गीली और फूली हुई।
मैं घुटनों पर बैठ गया और उनकी चूत को चाटने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़। चाची की कमर हिलने लगी। "विवेक... मत करो... आह... करो..." वो खुद नहीं जानती थीं कि वो क्या कह रही हैं। मैंने उनकी चूत के दाने को जीभ से रगड़ा और वो सिहर उठीं।
"मैं... मैं..." चाची की साँसें तेज़ हो गईं। उनका बदन अकड़ गया और फिर ढीला पड़ गया। उनकी चूत से रस बह निकला जिसे मैंने चाट लिया। वो हाँफ रही थीं, माथे पर पसीना। "तुमने तो मुझे मार ही डाला," वो बोलीं।
तभी बाहर साइकिल की घंटी बजी। हम दोनों हड़बड़ाकर उठे। चाची ने जल्दी से कपड़े ठीक किए, मैंने बाइक की तरफ़ देखा। कलेक्शन वाला लड़का आ गया था। दूध देकर हम घर लौट आए, पर बाइक पर इस बार चाची मुझसे पूरी तरह चिपककर बैठी थीं।
उस दिन दोपहर को घर में अजीब सी खामोशी थी। चाची रसोई में थीं, मैं अपने कमरे में। शाम को उन्होंने खाना परोसा, पर नज़रें नहीं मिलाईं। मैं समझ गया, वो डरी हुई थीं। रात को मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था कि शायद सब कुछ खत्म हो गया।
रात के दस बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई। "विवेक, सो गए?" चाची की आवाज़ थी। मेरा दिल उछल पड़ा। "नहीं चाची, आइए।" वो अंदर आईं, हाथ में दूध का गिलास। "दूध पी लो, सुबह जल्दी उठना है।" उनकी आँखों में वही शरारत थी जो शेड में थी।
मैंने गिलास लिया और एक ही घूँट में आधा पी गया। "चाची, आप भी पिएँगी?" मैंने पूछा। वो मेरे बिस्तर के किनारे बैठ गईं। "मुझे दूध से ज़्यादा कुछ और पीने का मन है," वो बोलीं, और मेरी पैंट की तरफ़ देखा। मेरा लंड पहले से तना हुआ था।
चाची ने मेरी पैंट का नाड़ा खोला और उसे नीचे सरकाया। मेरा लंड उछलकर बाहर आया, पूरा तना हुआ, नसें फूली हुईं। चाची ने उसे हाथ में लिया और धीरे से हिलाया। "इतना बड़ा... तुम्हारी उम्र में?" वो हैरान थीं।
उन्होंने उसे मुँह में लिया। गर्म, गीला मुँह। मेरी आँखें बंद हो गईं। वो धीरे धीरे चूस रही थीं, जीभ से सुपाड़े को चाट रही थीं। "आह चाची..." मैं कराह उठा। उनका हाथ मेरे अंडकोषों को सहला रहा था।
कुछ देर बाद उन्होंने मुँह हटाया और बोलीं, "अब मेरी बारी।" उन्होंने अपनी नाइटी उतार दी। नाइटी के नीचे कुछ नहीं था। उनका नंगा बदन लैंप की रोशनी में चमक रहा था। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया।
मैंने उनके पूरे बदन को चूमा, गर्दन से लेकर नाभि तक। उनकी चूत पहले से गीली थी। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और हिलाने लगा। चाची की कमर बिस्तर पर रगड़ने लगी। "विवेक... अब और मत तड़पाओ... डाल दो..."
मैंने उनकी टाँगें फैलाईं और अपना लंड उनकी चूत के मुँह पर रखा। धीरे से धक्का दिया। सुपाड़ा अंदर गया। चाची ने होंठ काट लिए। "आह... धीरे..." मैंने थोड़ा और दबाव डाला और पूरा लंड उनकी गीली चूत में समा गया।
उनकी चूत टाइट और गर्म थी, मेरे लंड को कसकर पकड़े हुए। मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। चाची की सिसकियाँ बढ़ने लगीं। "हाँ... ऐसे ही... और तेज़..." मैंने रफ़्तार बढ़ाई। बिस्तर चरमराने लगा।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें घोड़ी बनाया। उनकी गाँड ऊपर उठी हुई थी, चूत मेरे सामने। मैंने पीछे से लंड डाला और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाए। चाची चादर को मुँह में दबाए कराह रही थीं। "विवेक... मैं... मैं आने वाली हूँ..."
मैंने उन्हें अपनी तरफ़ घुमाया और वो मेरे ऊपर बैठ गईं। उनकी चूत मेरे लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी। उनके उरोज़ मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे। मैंने एक को मुँह में लिया। "आह! मैं झड़ रही हूँ!" चाची चिल्लाईं और उनका बदन काँपने लगा।
उनकी चूत ने मेरे लंड को ज़ोर से जकड़ लिया। मैं भी अब कगार पर था। मैंने उन्हें नीचे लिटाया, उनकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और आख़िरी ज़ोरदार धक्के लगाए। "चाची... मैं... मैं भी..." और मेरा वीर्य उनकी चूत में भर गया।
हम दोनों पसीने में भीगे एक दूसरे से लिपटे पड़े थे। चाची ने मेरे माथे को चूमा। "विवेक, ये ग़लत है, पर..." "पर क्या चाची?" "पर मुझे इसका कोई पछतावा नहीं।" वो मुस्कुराईं।
अगले दिन सुबह साढ़े पाँच बजे अलार्म बजा। चाची रसोई में थीं, दूध के कनस्तर तैयार। बाइक पर बैठते हुए उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, "आज डेयरी वाले को देर से आना चाहिए।" मैं हँस पड़ा। "चाची, आप तो..."
उस सुबह शेड में हमने दूध देने से पहले एक और जंग लड़ी, इस बार बिना किसी डर के। चाची ने खुद मेरे कपड़े उतारे और बोलीं, "आज मैं ऊपर रहूँगी।" और वो रहीं, देर तक, जब तक सूरज टिन शेड की दरारों से अंदर न झाँकने लगा।
छुट्टियाँ खत्म होने में अभी बारह दिन बाकी थे। हर सुबह दूध की सैर, हर रात दूध का गिलास। चाचा इतवार को आते, सोमवार को चले जाते, और हमें अपनी दुनिया वापस मिल जाती। गाँव वालों को क्या पता था कि डेयरी तक का दो किलोमीटर का रास्ता हम दोनों के लिए क्या बन गया था।
आख़िरी रात चाची मेरे कमरे में आईं। इस बार दूध का गिलास नहीं था, सिर्फ़ वो थीं। हमने धीरे धीरे, बिना जल्दी के, एक दूसरे को चाहा। जैसे कोई आख़िरी बार किसी चीज़ का स्वाद लेता है।
सुबह जब मैं बैग लेकर बाइक पर बैठा, चाची ने दूध का कनस्तर कैरियर पर बाँधा और बोलीं, "अगली छुट्टियों में ज़रूर आना। दूध वाली सुबहें तुम्हारा इंतज़ार करेंगी।" मैंने उनकी आँखों में देखा और कहा, "चाची, ये सुबहें तो अब मेरी हर रात के सपने बन गई हैं।"
Readers who enjoyed “चाची की चुदाई की कहानी: दूध वाली सुबह” also read
8 curated storiesशादीशुदा शरीर की भूख जब पति के दोस्त के साथ एक रात की गलती ने दोनों को हमेशा के लिए बाँध दिया
पति के दोस्त के साथ एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा खींच लिया कि अब पीछे मुड़ना नामुमकिन हो गया। शादीशुदा औरत की दबी हुई भूख की सबसे बेबाक कहानी।
शादीशुदा औरत की रात पति के दोस्त के साथ जब उसने दरवाज़ा खोला और साड़ी में लिपटी वो औरत पूरी तरह खुलने वाली थी
पति ऑफिस ट्रिप पर था। उसकी बीवी ने दरवाज़ा खोला तो मैं हैरान रह गया। साड़ी में लिपटी वो औरत आज पूरी तरह खुलने वाली थी।
ससुराल में अकेली देवर के साथ रात जब पति गाँव गया था और सिर्फ हम दो बचे थे रात भर जो हुआ वो किसी को पता नहीं चलना चाहिए
पति गाँव गया था। ससुराल में सिर्फ मैं और देवर बचे थे। रात भर जो हुआ वो किसी को पता नहीं चलना चाहिए।
पति के दोस्त ने जब मेरी हर सीमा को पार कर दिया एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा बाँध दिया कि पीछे मुड़ना नामुमकिन हो गया
एक रात की गलती ने दोनों को इतना गहरा बांध दिया कि अब पति के घर में भी किसी और की साँसें गूँजने लगीं। शादीशुदा शरीर की बेकाबू भूख की कहानी।
ससुर बहू की कहानी: गाँव की शाम में भड़की आग
ससुर बहू की कहानी: गाँव की उस शाम कविता ने पहली बार अपने ससुर रघुनाथ को उस नज़र से देखा, और फिर कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
सolo ट्रिप की उस रात जब लोकल गाइड ने मेरी सारी अकेलापन मिटा दी
पति से दूर, पहाड़ों में अकेली। लोकल गाइड के साथ बिताई वो रात जिसने शादीशुदा शरीर की सारी प्यास जगा दी।
मौसी की चुदाई: बदली नज़र, भाग 2
बदली नज़र भाग 2: आधी रात को दरवाज़े पर मामा सूरज की वापसी के बाद विक्रम और नैना मौसी के बीच खतरा और बढ़ गया। दोपहर का वो कमरा और रात की वो आहट।
जब पति के शहर जाने के बाद मेरे शरीर ने किसी और को अपना घर बना लिया
पति के तीन दिन के दौरे ने दरवाजा खोल दिया एक ऐसी भूख का जो सालों से दबी हुई थी। एक शादीशुदा औरत और उसके पति के दोस्त के बीच वो गहरा, गंदा और बेकाबू रिश्ता जिसने दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।