दीदी की चुदाई की कहानी: बुटीक वाली रात
यह मेरी दीदी की चुदाई की कहानी है, और यह उस रात से शुरू हुई जब दीदी ने आधी शटर गिराकर मुझे दुकान के अंदर खींच लिया था। शाम के सात बज रहे थे, कासगंज के बाज़ार की भीड़ छँट रही थी, और दीदी का हाथ मेरी कलाई पर इतना कसकर जकड़ा था कि मुझे समझ ही नहीं आया वह मुझे अंदर खींच रही हैं या खुद बाहर भागने से रोक रही हैं।
"अंदर आ जा जल्दी, शटर गिरा रही हूँ," दीदी ने फुसफुसाकर कहा, और उनकी आवाज़ में वह जल्दबाज़ी थी जो मैंने आज तक उनमें कभी नहीं देखी थी। सुमन दीदी, तैंतीस साल की, शादीशुदा, कासगंज बाज़ार में "सुमन बुटीक" चलाती थीं, और उनका पति राकेश ट्रांसपोर्ट का काम करता था जो इस हफ़्ते चार दिन के टूर पर गया हुआ था।
करवा चौथ में सिर्फ़ पाँच दिन बचे थे और दुकान में तीस ब्लाउज़ का बल्क ऑर्डर पेंडिंग था। उनकी असिस्टेंट रिंकी दोपहर को ही घर चली गई थी क्योंकि उसके भाई की तबीयत खराब थी। "आज फिटिंग का काम तू करेगा," दीदी ने शटर नीचे खींचते हुए कहा, "ट्रायल वाले खुद पहनकर चेक करना पड़ता है, और मुझे खुद ही मॉडल बनना पड़ेगा।"
मैं हँस पड़ा। "दीदी, मुझे सिलाई थोड़ी आती है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे आज तक नहीं दिखा था। "सिलाई नहीं आती तो क्या हुआ, आँखें तो हैं। पीछे देखकर बता, हुक ठीक बैठ रहा है या नहीं। बस इतना काम है।"
दुकान के अंदर का माहौल एकदम बदल गया था। आधी शटर गिरी हुई, ट्यूबलाइट की सफ़ेद रोशनी, और चारों तरफ़ कपड़ों के ढेर। दीदी ने अपना दुपट्टा उतारकर काउंटर पर फेंका और अलमारी से एक गहरे मैरून रंग का ब्लाउज़ निकाला। "यह वाला पहनकर देखती हूँ। ट्रायल रूम में आ, पीछे से देख।"
ट्रायल रूम बस एक छोटी सी जगह थी, तीन तरफ़ पर्दे और एक बड़ा शीशा। दीदी अंदर गईं और पर्दा खींच लिया। मुझे बाहर खड़ा कर दिया गया, और अंदर से कपड़ों की सरसराहट सुनाई देने लगी। मेरा दिल धड़कने लगा था, और मैं खुद नहीं समझ पा रहा था कि क्यों।
"अमन, अंदर आ," दीदी की आवाज़ आई, थोड़ी धीमी, थोड़ी काँपती हुई। "पीछे देख, हुक लग रहा है या नहीं।" मैंने पर्दा हटाया और अंदर कदम रखा। दीदी शीशे के सामने खड़ी थीं, ब्लाउज़ पहने हुए, लेकिन पीछे के तीनों हुक खुले थे, और उनकी गोरी पीठ पूरी नंगी दिख रही थी।
मेरी साँस रुक गई। ब्लाउज़ का कपड़ा उनके कंधों से थोड़ा ढीला था, और शीशे में उनकी छाती का उभार साफ़ दिख रहा था। दीदी ने शीशे में मेरी आँखों में देखा और मुस्कराईं। "देख क्या रहा है, हुक लगा।" मैंने काँपते हाथों से पहला हुक पकड़ा।
"तेरे हाथ काँप क्यों रहे हैं?" दीदी ने पूछा, और उनकी आवाज़ में शरारत थी। "दीदी की पीठ देखी नहीं कभी?" मैंने कुछ नहीं कहा, बस दूसरा हुक लगाने की कोशिश की। मेरी उँगलियाँ उनकी नरम त्वचा को छू रही थीं, और वह छुअन मुझे बिजली की तरह लग रही थी।
"यह ब्लाउज़ थोड़ा टाइट है," दीदी ने कहा और ज़ोर से साँस खींची। "देख, सीने पर ठीक बैठ रहा है?" शीशे में उनका चेहरा लाल हो रहा था। मैंने तीसरा हुक लगाया, और जब मेरा हाथ उनकी पीठ से हटा, तो दीदी ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया।
"रुक," उन्होंने कहा। "पहले यह बता, मैं कैसी लग रही हूँ?" उनका सवाल सीधा था, और उनकी आँखों में वह नज़र थी जो किसी मर्द को पिघला दे। मैंने हकलाते हुए कहा, "बहुत... बहुत सुंदर दीदी।" वह हँसीं, और वह हँसी आज कुछ अलग थी।
दीदी ने धीरे-धीरे ब्लाउज़ के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए, और मेरी आँखें फैलती चली गईं। "तू तो मेरा भाई है, तुझसे क्या शर्माना," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ में शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं थी। ब्लाउज़ उनके कंधों से सरककर नीचे गिर पड़ा।
अब दीदी सिर्फ़ गहरे रंग की ब्रा में थीं, और उनकी बड़ी-बड़ी छातियाँ ब्रा से बाहर निकलने को बेताब लग रही थीं। शीशे में हम दोनों दिख रहे थे, मैं उनके पीछे खड़ा, और वह मेरी आँखों में देखती हुई। "छूकर देख," दीदी ने कहा, "कपड़ा अच्छा है या नहीं, ग्राहक को बताना पड़ेगा।"
यह बहाना था, और हम दोनों जानते थे। मैंने अपने दोनों हाथ उनकी छातियों पर रख दिए, ब्रा के ऊपर से। वह नरम, गर्म, और भारी थीं। दीदी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी साँस छोड़ी। "आह... धीरे दबा..." उनकी आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी।
मैंने ब्रा के ऊपर से ही उनकी छातियों को मसलना शुरू किया, और दीदी की साँसें तेज़ होती चली गईं। फिर उन्होंने खुद ही ब्रा का हुक खोल दिया, और उनकी नंगी छातियाँ मेरी हथेलियों में आ गिरीं। उनके निप्पल कड़े हो चुके थे, छोटे-छोटे काले अंगूरों जैसे।
"इन्हें मुँह में ले," दीदी ने आदेश दिया, और मैं घुटनों पर बैठ गया। मैंने उनका एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। दीदी का हाथ मेरे बालों में घुस गया, और वह मेरे सिर को अपनी छाती पर दबाने लगीं। "हाँ... ऐसे ही... और ज़ोर से चूस..."
मैं बारी-बारी से दोनों निप्पल चूस रहा था, काट रहा था, चाट रहा था। दीदी की चूत से निकलता रस उनकी पैंटी को भिगो रहा था, और ट्रायल रूम में उनकी सिसकियों की गूँज भर गई थी। "अमन... मेरी चूत में आग लगी है... बुझा दे इसे..."
दीदी ने मुझे खड़ा किया और मेरी पैंट की ज़िप खोली। जब मेरा खड़ा लंड बाहर निकला, तो उनकी आँखें चमक उठीं। "इतना बड़ा..." उन्होंने फुसफुसाया, "राकेश का तो इससे आधा भी नहीं है..." उन्होंने मेरे लंड को अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे हिलाने लगीं।
फिर दीदी घुटनों पर बैठ गईं और मेरे लंड को अपने मुँह में ले लिया। उनकी जीभ मेरे लंड के टोपे पर घूम रही थी, और वह इतनी सफ़ाई से चूस रही थीं कि मुझे लगा मैं अभी झड़ जाऊँगा। "दीदी... मैं..." "नहीं," उन्होंने मुँह से लंड निकालकर कहा, "अभी नहीं। पहले मैं।"
दीदी खड़ी हुईं और अपनी सलवार का नाड़ा खोल दिया। सलवार उनके पैरों में गिर पड़ी, और अब वह सिर्फ़ गीली पैंटी में थीं। उन्होंने पैंटी भी उतार फेंकी, और उनकी नंगी चूत मेरे सामने थी, रस से चमकती हुई, फूली हुई। "देख, तेरी दीदी की चूत तेरे लिए कितनी गीली है।"
मैंने उन्हें ट्रायल रूम के छोटे स्टूल पर बिठाया और उनकी टाँगें फैला दीं। मैंने अपना मुँह उनकी चूत पर लगाया और चाटना शुरू किया। दीदी चीख पड़ीं, "आआह... अमन...!" उनकी चूत का रस मेरे मुँह में भर रहा था, नमकीन और मीठा, और मैं पागलों की तरह चाट रहा था।
मेरी जीभ उनकी चूत के दाने पर घूम रही थी, और दीदी का शरीर काँप रहा था। "और... और ज़ोर से... मैं आने वाली हूँ..." अचानक दीदी का शरीर अकड़ गया, और उनकी चूत से रस की धार छूट पड़ी। वह ज़ोर-ज़ोर से सिसक रही थीं, और उनका हाथ मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाए हुए था।
मैं खड़ा हुआ, और दीदी ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। "अब अंदर डाल," उन्होंने हाँफते हुए कहा, "मेरी चूत में अपना लंड डाल दे।" मैंने अपने लंड को उनकी गीली चूत के मुँह पर रखा और धीरे से धक्का दिया। वह इतनी गीली थीं कि मेरा लंड आधा अंदर फिसल गया।
"आह... कितना बड़ा है..." दीदी ने मेरे कंधों को पकड़ लिया। मैंने एक और धक्का दिया, और मेरा पूरा लंड उनकी चूत में समा गया। उनकी चूत की दीवारें मेरे लंड को कसकर जकड़े हुए थीं, गर्म और गीली। मैंने धक्के मारने शुरू किए, पहले धीरे, फिर तेज़।
ट्रायल रूम की दीवारें हमारी आवाज़ों से गूँज रही थीं। "और तेज़... और तेज़ चोद मुझे..." दीदी चिल्ला रही थीं, और उनकी छातियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं। मैंने उनकी कमर पकड़ ली और पूरी ताक़त से धक्के मारने लगा। उनकी चूत से फच्च-फच्च की आवाज़ आ रही थी।
अचानक दीदी ने मुझे रोका और स्टूल से उतरकर उल्टी हो गईं, हाथ शीशे पर टिकाकर। "पीछे से कर," उन्होंने कहा, "मुझे पीछे से चाहिए।" मैंने उनके पीछे खड़े होकर अपना लंड उनकी चूत में फिर से डाला, और इस बार धक्के और भी गहरे थे।
मैं उनकी चूत को पीछे से चोद रहा था, और शीशे में हम दोनों की नंगी शक्लें दिख रही थीं। दीदी का चेहरा वासना से लाल था, उनकी आँखें बंद थीं, और उनके मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं। "हाँ... ऐसे ही... मेरी चूत फाड़ दे..."
मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनकी छाती को मसलना शुरू किया, और दूसरे हाथ से उनकी चूत के दाने को रगड़ा। दीदी पागल हो गईं। "मैं... मैं फिर आने वाली हूँ... मत रुक...!" उनकी चूत ने मेरे लंड को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि मुझे लगा वह मुझे निचोड़ लेंगी।
दीदी दूसरी बार झड़ीं, और इस बार उनकी चीख़ इतनी तेज़ थी कि मुझे डर लगा कहीं बाहर सुनाई न दे जाए। लेकिन बाज़ार की आवाज़ें और आधी गिरी शटर ने हमारी आवाज़ों को ढक रखा था। उनकी टाँगें काँप रही थीं, और वह शीशे पर लटकी हुई थीं।
मैंने उन्हें सीधा किया और शीशे से टिकाकर उनकी एक टाँग उठा ली। "एक बार और," मैंने कहा, और अपना लंड उनकी चूत में डाल दिया। इस पोज़ में मेरा लंड और भी गहरा जा रहा था। दीदी ने मेरे गले में बाँहें डाल दीं और मेरे होंठों को चूमने लगीं।
हम चूमते हुए चुदाई कर रहे थे, उनकी जीभ मेरे मुँह में, मेरा लंड उनकी चूत में। "अमन... तूने तो मुझे जवान कर दिया..." दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, "राकेश ने महीनों से मुझे छुआ तक नहीं..." मुझे उन पर तरस भी आया और जोश भी।
मैं अब झड़ने वाला था। "दीदी... मैं आने वाला हूँ..." "अंदर ही छोड़ दे," दीदी ने कहा, "आज सुरक्षित दिन है... अपनी दीदी की चूत को भर दे..." मैंने आख़िरी के तेज़ धक्के मारे और उनकी चूत के अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य की धार उनकी चूत में भर गई।
हम दोनों हाँफ रहे थे, पसीने से तरबतर, नंगे। दीदी ने मुझे कसकर गले लगा लिया। "तूने आज मेरी बरसों की प्यास बुझा दी," उन्होंने कहा। फिर वह हँसीं, और उस हँसी में अब कोई शर्म नहीं थी। "वैसे, फिटिंग का काम तो रह ही गया।"
दीदी ने ज़मीन से ब्लाउज़ उठाया और पहनने लगीं। मैंने उनकी पीठ के हुक लगाए, इस बार मेरे हाथ नहीं काँप रहे थे। "कल फिर आना," दीदी ने शटर उठाते हुए कहा, और बाहर की ठंडी हवा अंदर आई। "आज से तू मेरा पक्का फिटर है।"
मैं मुस्कराते हुए दुकान से बाहर निकला। पीछे मुड़कर देखा तो दीदी काउंटर पर बैठी ब्लाउज़ के नाप ठीक कर रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर वह मुस्कान थी जो मैंने आज से पहले कभी नहीं देखी थी। कासगंज के बाज़ार की भीड़ में खोते हुए मैंने सोचा, करवा चौथ में अभी पाँच दिन बाकी हैं, और मुझे रोज़ शाम को दुकान जाना है।
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