हिंदी विधवा सेक्स कहानी: गैरेज वाला राज़
"अरे, ये कौन सा तरीका है, बगैर बताए सीधा गैरेज में घुस आए हो?" सुनीता ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ टिकाए Arjun को घूरा। ये हिंदी विधवा सेक्स कहानी उसी शाम से शुरू होती है, जब चार साल से धूल खा रही बुलेट पर किसी के हाथ क्या पड़े, सुनीता की बंद पड़ी ज़िंदगी में भी हलचल मच गई।
"घुसा नहीं हूँ, बुलाया गया हूँ," Arjun ने ग्रीस सने हाथ ऊपर उठाकर हँसते हुए कहा। "रमेश की बुलेट बेचने से पहले आखिरी बार उसे स्टार्ट करके देखना बनता है, भाभी।"
सुनीता की उम्र अड़तीस थी, और पति को गुज़रे चार साल हो चुके थे। लखनऊ के इस छोटे से मकान में वो अकेली रहती थी, घर से टिफिन सर्विस चलाकर गुज़ारा करती थी। गैरेज में पड़ी वो पुरानी बुलेट रमेश की सबसे प्यारी चीज़ थी, जिसे बेचने का फैसला उसने पिछले हफ़्ते ही किया था।
"रमेश होता तो खुद ही ठीक कर लेता," सुनीता बुदबुदाई, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी खीज उतर आई जो हर उस मर्द पर निकलती थी जो इस घर में बगैर इजाज़त कदम रखता था। पर आज उस खीज के नीचे कुछ और भी दबा था, कुछ अजीब सा गर्म।
Arjun बयालीस का था, रमेश का कॉलेज के ज़माने का दोस्त, लंबा, गठीला, और हाथों में वो हुनर जो मशीनों को ज़िंदा कर देता था। उसने टूलबॉक्स खोला और बुलेट के इंजन पर झुक गया, जैसे ये गैरेज उसका अपना हो।
"रमेश कहता था, मेरी बुलेट को हाथ लगाने का हक़ सिर्फ़ दो लोगों को है, मुझे और Arjun को," Arjun ने प्लग निकाला और बोला। "तो भाभी, इजाज़त तो चार साल पहले ही मिल चुकी थी।"
सुनीता कुछ कहने को हुई, पर रुक गई। रमेश की याद इस गैरेज में हर दीवार से चिपकी थी। उसने चुपचाप अंदर आकर स्टूल पर बैठ गई, और Arjun के काम को देखने लगी।
"पाना पकड़ाओ," Arjun ने हाथ बढ़ाया। सुनीता ने रिंच उठाकर उसके हाथ में दिया, और उंगलियाँ छू गईं। ग्रीस की चिकनाहट के बीच वो छुअन एक सेकंड ज़्यादा टिकी रही।
"तुम्हारे गाल पर ग्रीस लग गया है," Arjun ने अचानक कहा, और अंगूठा बढ़ाकर उसके गाल को छू लिया। उसका अंगूठा गर्म था, खुरदुरा था, और सुनीता की सांस एक पल को थम गई।
"हाथ संभाल के," सुनीता ने धीमी आवाज़ में कहा, पर वो पीछे नहीं हटी। उसका गाल अब भी उसके अंगूठे के नीचे था, और दोनों के बीच की हवा भारी हो चली थी।
Arjun हाथ धोकर आया, और दोनों आंगन में बैठकर चाय पीने लगे। "टिफिन सर्विस कैसी चल रही है?" उसने पूछा।
"तीस घरों का खाना बनाती हूँ रोज़," सुनीता ने गर्व से कहा। "रमेश के जाने के बाद किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया, ये बात मुझे सबसे ज़्यादा सुकून देती है।"
सुनीता की आंखें भर आईं, पर उसने मुस्कुराकर बात पलट दी। "और तुम? शादी क्यों नहीं की अब तक?"
"की थी," Arjun ने चाय का घूंट लिया। "पांच साल चली। वो कहती थी, मैं मशीनों से ज़्यादा प्यार करता हूँ। शायद सच कहती थी।"
तभी पूरे मोहल्ले की बत्ती गुल हो गई। लखनऊ की गर्म शाम में पावर कट कोई नई बात नहीं थी, पर आज अंधेरा कुछ ज़्यादा ही घना लग रहा था।
"इनवर्टर भी जवाब दे गया लगता है," सुनीता ने मोमबत्ती जलाई और गैरेज में ले आई। मोमबत्ती की रोशनी में Arjun का चेहरा और भी गहरा लग रहा था।
"थोड़ा और काम बाकी है, मोमबत्ती की रोशनी में ही कर लेता हूँ," Arjun ने कहा, और फोन की टॉर्च जलाकर इंजन पर झुक गया। उसकी पीठ की मांसपेशियां शर्ट के नीचे साफ़ दिख रही थीं।
सुनीता मोमबत्ती पकड़े उसके पास खड़ी थी। रोशनी हिल रही थी, और Arjun का चेहरा उसके इतना करीब था कि उसकी गर्म सांसें सुनीता के हाथ पर महसूस हो रही थीं।
"हो गया," Arjun ने अचानक कहा, और चाबी घुमाई। बुलेट का इंजन एक बार खांसा, दो बार खांसा, और फिर धड़धड़ाकर स्टार्ट हो गया। गैरेज गूंज उठा।
सुनीता की आंखों में आंसू आ गए। चार साल से चुप पड़ी ये आवाज़ रमेश की यादों को ज़िंदा कर गई थी। Arjun ने इंजन बंद किया और उसके आंसू देखकर धीरे से बोला, "रो मत, भाभी।"
"भाभी मत कहो," सुनीता ने अचानक कहा, आवाज़ कांप रही थी। "आज के बाद मुझे सिर्फ़ सुनीता कहो।"
Arjun ने उसकी आंखों में देखा, और फिर धीरे से उसके गाल पर हाथ रखा। इस बार सुनीता पीछे नहीं हटी। मोमबत्ती की रोशनी में दोनों के चेहरे इतने करीब आ गए कि सांसें टकराने लगीं।
पहला चुंबन Arjun ने उसके माथे पर लिया, फिर धीरे से उसके होंठों पर। सुनीता ने पहले तो हाथ से उसे धकेलना चाहा, पर अगले ही पल उसके होंठ खुल गए, और चार साल की प्यास एक ही चुंबन में बह निकली।
Arjun के हाथ उसकी कमर पर थे, ग्रीस की गंध अब भी उसके हाथों में बसी थी। सुनीता की साड़ी का पल्लू ढीला होकर कंधे से सरक गया, और ब्लाउज़ के ऊपर से उसके उभारों की गर्मी Arjun की छाती से टकरा रही थी।
"सुनीता," Arjun ने उसके कान में फुसफुसाया, और उसके कान की लोब को हल्के से काट लिया। सुनीता के पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई, और उसके मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई।
Arjun का हाथ उसकी पीठ पर सरकता हुआ ब्लाउज़ के हुक तक पहुंचा। सुनीता ने उसकी कलाई थाम ली, पर छोड़ा नहीं।
"अंदर चलो," सुनीता ने हांफते हुए कहा। "पहले खाना खाएंगे, फिर... फिर देखेंगे।"
रसोई में मोमबत्ती की रोशनी में सुनीता ने दाल, रोटी और आलू की सब्ज़ी परोसी। Arjun ज़मीन पर बैठकर खाने लगा, और सुनीता उसके सामने बैठ गई। दोनों के बीच की ख़ामोशी में कुछ पक रहा था।
खाते खाते Arjun का पैर अनजाने में सुनीता के पैर से टकराया। सुनीता ने पैर हटाया नहीं, बल्कि धीरे से अपना पैर उसके पैर पर रख दिया।
"सब्ज़ी में नमक ठीक है?" सुनीता ने पूछा, आवाज़ में शरारत थी।
"नमक से ज़्यादा मीठा वो है जो तुम खिला रही हो," Arjun ने कहा, और रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसके मुंह की ओर बढ़ाया। उसकी उंगलियां उसके होंठों को छू गईं, और सुनीता ने उन्हें चूम लिया।
सुनीता ने वो टुकड़ा उसके हाथ से मुंह में लिया, और जानबूझकर उसकी उंगली को ज़बान से छू लिया। Arjun की आंखें फैल गईं, और उसके हाथ की उंगलियाँ कांपने लगीं।
"तुम बहुत खतरनाक औरत हो, सुनीता," Arjun ने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी नज़र उसके होंठों पर टिकी थी, हटने का नाम नहीं ले रही थी।
"चार साल से सोया हुआ ज्वालामुखी हूँ," सुनीता ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा। "आज फटने का मन कर रहा है।"
खाना खत्म होते होते बत्ती अब भी नहीं आई थी। सुनीता ने थालियां समेटीं, और Arjun ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "बर्तन सुबह मांज लेना।"
सुनीता ने उसकी ओर देखा, फिर बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे बेडरूम की ओर चल दी। मोमबत्ती बेडरूम में पहले से रखी थी, जैसे किस्मत ने पहले ही इंतज़ाम कर रखा हो।
दरवाज़ा बंद होते ही Arjun ने सुनीता को दीवार से लगा लिया। उसके होंठ उसकी गर्दन पर थे, और हाथ साड़ी के अंदर उसकी कमर को सहला रहे थे। सुनीता की सांसें तेज़ हो चली थीं।
साड़ी एक एक करके ज़मीन पर गिरती गई। ब्लाउज़ के हुक खुले, और सुनीता के गोरे उभार मोमबत्ती की रोशनी में चमकने लगे। Arjun ने उन्हें दोनों हाथों में भर लिया और धीरे से दबाने लगा।
"आह," सुनीता के मुंह से सिसकी निकली। Arjun ने उसके एक निप्पल को मुंह में लिया और चूसने लगा, दूसरा हाथ से मसलता रहा। सुनीता की उंगलियाँ उसके बालों में धंस गईं।
सुनीता ने उसकी शर्ट के बटन खोलकर ज़मीन पर फेंक दी। उसकी चौड़ी छाती पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और सुनीता का हाथ नीचे सरकता चला गया।
Arjun की पैंट का बटन खुला, और उसका लंड बाहर निकल आया, तना हुआ, गर्म, नसों से भरा। सुनीता ने उसे हाथ में लिया और धीरे से सहलाने लगी। चार साल बाद किसी मर्द का लंड हाथ में लेकर उसकी आंखों में चमक आ गई।
"इसे मुंह में लो," Arjun ने हांफते हुए कहा। सुनीता घुटनों पर बैठ गई और लंड को मुंह में ले लिया। उसकी ज़बान लंड के टोपे पर घूम रही थी, और Arjun के मुंह से गहरी आहें निकल रही थीं।
सुनीता चूसती रही, कभी धीरे, कभी तेज़, हाथ से लंड के निचले हिस्से को सहलाती हुई। Arjun ने उसके बाल पकड़ लिए और धीरे धीरे उसके मुंह में धक्के लगाने लगा।
"बस, अब नहीं," Arjun ने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसने उसकी पैंटी उतारी, और सुनीता की चूत उसके सामने खुल गई, गीली, फूली हुई, बेकरार।
Arjun ने अपनी उंगली उसकी चूत पर फेरी, और सुनीता का बदन ऐंठ गया। "इतनी गीली," वो फुसफुसाया, और दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। सुनीता चीख पड़ी, "आह, Arjun।"
उंगलियाँ अंदर बाहर हो रही थीं, और सुनीता की कमर बिस्तर से उठ रही थी। फिर Arjun ने अपना चेहरा उसकी चूत पर रख दिया और ज़बान से चाटने लगा।
सुनीता पागल हो गई, टांगें Arjun के कंधों पर, चूत से रस बहता हुआ। "चाटो, और चाटो," वो चिल्ला रही थी, शर्म का हर पर्दा उतर चुका था।
Arjun चाटता रहा, कभी अंदर, कभी दाने पर। सुनीता का बदन अकड़ा, और एक ज़ोर की सिसकी के साथ वो झड़ गई।
"अब अंदर डालो," सुनीता ने हांफते हुए कहा, टांगें फैलाकर। "चार साल से जो सूखा पड़ा है, आज उसे भिगो दो।"
Arjun उसके ऊपर आया, लंड को चूत के मुंह पर रखा, और एक ही धक्के में पूरा अंदर डाल दिया। सुनीता की चीख कमरे में गूंज गई, "आह, कितना बड़ा है।"
चुदाई शुरू हो गई। Arjun के धक्के धीरे धीरे तेज़ हो रहे थे, और हर धक्के के साथ सुनीता की चूत उसके लंड को कसकर पकड़ रही थी। बिस्तर चरमराने लगा।
"और तेज़, और तेज़," सुनीता चिल्ला रही थी, नाखून उसकी पीठ पर धंस गए थे। Arjun ने उसकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं, और अब लंड और भी गहरा जा रहा था।
सुनीता की आंखें बंद थीं, मुंह खुला था, और हर धक्के पर उसके मुंह से "आह, आह" निकल रहा था। उसके बूब्स हर धक्के के साथ हिल रहे थे, और Arjun ने झुककर एक निप्पल को मुंह में ले लिया।
फिर Arjun ने उसे पलटा और घोड़ी बना दिया। पीछे से लंड चूत में घुसा, और सुनीता के मुंह से जानवरों जैसी आवाज़ें निकलने लगीं। उसके हाथ चादर को मुट्ठियों में भींच रहे थे।
Arjun ने उसके बाल पकड़कर पीछे खींचे और धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी। "तुम्हारी चूत कितनी टाइट है," वो हांफ रहा था। "लगता ही नहीं चार साल से बंद पड़ी थी।"
"तुम्हारे लिए ही बची थी," सुनीता ने पीछे मुड़कर कहा, और Arjun ने उसके होंठों पर एक जंगली चुंबन दे दिया। उस चुंबन में चार साल का इंतज़ार घुला था।
धक्के तूफ़ान बन चुके थे। सुनीता पसीने से तर थी, और अचानक उसका बदन अकड़कर वो दूसरी बार झड़ गई, चीखते हुए, "मैं आ गई।"
उसकी चूत के सिकुड़ने से Arjun भी बेकाबू हो गया। उसने लंड बाहर निकाला और सुनीता की पीठ पर अपना पानी छोड़ दिया, गर्म, गाढ़ा, लंबी धार में। दोनों हांफ रहे थे।
Arjun उसके बगल में लेट गया, और सुनीता उसकी छाती पर सिर रखकर लेट गई। मोमबत्ती बुझने को थी, और कमरे में उनकी सांसों के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी।
"बुलेट मत बेचना," सुनीता ने धीरे से कहा, उसकी छाती पर उंगली से गोले बनाते हुए। उसकी आवाज़ में अब कोई झिझक नहीं थी, सिर्फ़ हक़ था।
Arjun ने उसकी उंगली पकड़ ली। "क्यों? अब तो वो स्टार्ट हो गई है।"
"क्योंकि अब इसकी मरम्मत करने वाला घर पर ही रहेगा," सुनीता ने कहा, और अंधेरे में मुस्कुरा दी। Arjun ने उसका हाथ पकड़कर अपने दिल पर रख लिया।
तभी बत्ती आ गई, और कमरे में रोशनी फैल गई। Arjun ने उसे देखा, बिखरे बाल, चमकती आंखें, और बोला, "कल सुबह टिफिन में मेरे लिए भी दो रोटी ज़्यादा बनाना।"
सुनीता हँस दी, वो हँसी जो चार साल से उसके गले में अटकी थी। "दो नहीं, चार बनाऊंगी। मेहमान नहीं, घरवाले हो अब तुम।"
सुबह छह बजे सुनीता की आंख खुली तो Arjun बगल में नहीं था। घबराकर वो उठी, और गैरेज से बुलेट के इंजन की घरघराहट सुनाई दी। वो चाय की ट्रे लेकर गैरेज पहुंची, तो देखा Arjun बनियान में इंजन पर झुका था, पसीने से तर।
"इतनी सुबह?" सुनीता ने ट्रे रखी। Arjun ने मुड़कर उसे देखा, रात वाली नाइटी में, बाल बिखरे, और उसकी आंखों में वही चमक लौट आई। उसने गैरेज का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।
"चाय बाद में," वो बोला, और सुनीता को बुलेट की सीट पर बिठा दिया। उसके हाथ नाइटी के अंदर सरक गए, और सुनीता की सांसें तेज़ हो गईं। "टिफिन वाले साढ़े सात बजे आएंगे," वो हांफते हुए बोली।
"तो हमारे पास डेढ़ घंटा है," Arjun ने उसकी नाइटी ऊपर सरकाई और पैंटी एक झटके में उतार दी। उसकी उंगलियाँ सुनीता की चूत पर थीं, रात की चुदाई के बाद भी वो गीली थी। सुनीता ने बुलेट का हैंडल पकड़ लिया।
Arjun घुटनों पर बैठा और उसकी चूत चाटने लगा। सुबह की ठंडी हवा और उसकी गर्म ज़बान का मेल सुनीता को पागल कर रहा था। उसके मुंह से दबी सिसकियां निकल रही थीं, "धीरे, कोई सुन लेगा।"
"सुनने दो," Arjun ने कहा, और ज़बान और अंदर डाल दी। सुनीता का बदन कांपने लगा, और दस मिनट में ही वो झड़ गई, बुलेट की सीट पर बैठे बैठे, उसका रस सीट पर बह रहा था।
फिर Arjun खड़ा हुआ, पजामा नीचे सरकाया, और तना हुआ लंड उसके सामने कर दिया। सुनीता ने उसे मुंह में लिया, सुबह की ताज़गी में उसका स्वाद और भी नशीला लग रहा था। वो चूसती रही, और Arjun उसके बालों में हाथ फेरता रहा।
"अब बैठ जाओ इस पर," Arjun ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया, खुद ज़मीन पर बैठकर। सुनीता उसके लंड पर बैठी, और लंड पूरी गहराई तक उसकी चूत में समा गया। दोनों के मुंह से एक साथ आह निकली।
सुनीता ऊपर नीचे होने लगी, बुलेट का हैंडल पकड़े, उसके बूब्स नाइटी के अंदर उछल रहे थे। Arjun ने नाइटी फाड़ सी दी और बूब्स को मुंह में लेकर चूसने लगा। गैरेज में सिर्फ़ उनकी आहों और चमड़े की सीट की चरमराहट गूंज रही थी।
"और तेज़ करो, जान," Arjun हांफ रहा था। सुनीता की रफ़्तार बढ़ गई, उसकी चूत लंड को निचोड़ रही थी। अचानक उसका बदन अकड़ा और वो चीख पड़ी, सुबह की ख़ामोशी में उसकी चीख दूर तक गई होगी।
उसके झड़ते ही Arjun ने उसे उठाया, दीवार से लगाया, और पीछे से लंड डाल दिया। खड़े खड़े धक्के, जंगली, बेकाबू। दो मिनट में Arjun भी झड़ गया, अपना गर्म पानी उसकी चूत में ही छोड़ते हुए।
दोनों हांफ रहे थे, पसीने से तर। तभी गेट पर टिफिन वालों की घंटी बजी। सुनीता ने जल्दी से नाइटी ठीक की, Arjun ने दरवाज़ा खोला, और दोनों ऐसे बाहर आए जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर सुनीता की आंखों में वो चमक थी जो अब रोज़ दिखने वाली थी।
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