जीजा साली की चुदाई: नाइट शिफ्ट वाली सुबह
छह बजकर चालीस मिनट। सीमा ने बाथरूम का नल खोला और चीख पड़ी। ठंडा पानी, बर्फ जैसा। ये जीजा साली की चुदाई वाली कहानी उसी ठंडे पानी से शुरू हुई, उस सुबह जब उसका गीजर मर चुका था और रात की बारह घंटे की शिफ्ट के बाद उसके बदन पर अस्पताल की गंध चिपकी हुई थी, पसीने और डेटॉल की।
"जिजा जी!" वो तौलिए में लिपटी बाथरूम के दरवाजे से चिल्लाई। "मेरे वाला गीजर खराब है!"
अर्जुन किचन से निकले, हाथ में अखबार। "मेरे बाथरूम का चल रहा है। अंदर जा के नहा ले। बस एक बात, अंदर से कुंडी मत लगाना।"
"क्यों?"
"वो वैसे भी टूटी हुई है," वो मुस्कराए। "बाहर से भी खुल जाता है।"
सीमा ने उनकी तरफ देखा। पैंतीस साल का बैंक मैनेजर, सुबह की नींद में उलझे बाल, बनियान में। उसके पति लेह में पोस्टेड थे, दीदी प्रिया ससुराल में शादी अटेंड कर रही थीं, और ये सात दिन सीमा को इस फ्लैट में अर्जुन के साथ अकेले गुजारने थे।
"ठीक है," उसने कहा, और तौलिया कस कर पकड़ लिया।
उनके बाथरूम में गर्म पानी की भाप उठ रही थी। सीमा ने दरवाजा भिड़ाया, तौलिया हुक पर टांगा, और शॉवर के नीचे खड़ी हो गई। पानी उसकी गर्दन पर गिरा, कंधों पर, पीठ पर लहराता हुआ नीचे। उसने आंखें बंद कर लीं। बारह घंटे। बारह घंटे बेड नंबर चार के मरीज की उल्टियां, बेड नंबर नौ की चीखें। अब सिर्फ पानी की आवाज।
तभी दरवाजा खुला।
"सीमा, मेरी शेविंग किट..." अर्जुन की आवाज बीच में ही अटक गई।
वो वहीं खड़ा रह गया। दरवाजे के फ्रेम में। उसकी आंखें उसके चेहरे से फिसल कर नीचे गईं, और वहीं ठहर गईं। पानी उसकी छातियों पर बह रहा था, निप्पल ठंडे और गर्म के बीच तन कर खड़े थे, बूंदें उसके पेट से होती हुईं जांघों के बीच गायब हो रही थीं।
"आंखें ऊपर, जिजा जी," सीमा ने कहा। उसकी अपनी आवाज उसे अजनबी लगी, धीमी और कांपती हुई।
अर्जुन ने झटके से नजरें उठाईं। उसका चेहरा लाल हो चुका था। "सॉरी, मैं... मुझे लगा तुम सुन लोगी। मैं बस..." वो पीछे हटा, दरवाजा बंद किया। बाहर से उसकी आवाज आई, "सॉरी, सीमा। सच में सॉरी।"
उसके कदम दूर होते गए। सीमा शॉवर के नीचे खड़ी रही। पानी अब भी गिर रहा था। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी धड़कन पानी की आवाज के ऊपर सुनाई दे रही थी। और सबसे अजीब बात ये थी कि उसे गुस्सा नहीं आ रहा था। बिल्कुल नहीं।
उसे कुछ और महसूस हो रहा था। जांघों के बीच एक अजीब सी गर्मी, एक खिंचाव। उसने खुद को छूने से रोका। अभी नहीं। अभी सिर्फ नहाना था।
नाश्ते पर दोनों चुप थे। अर्जुन ने पराठा तोड़ा, अचार लिया, चाय का कप उठाया। उसकी नजरें प्लेट पर थीं। सीमा ने देखा कि उसकी उंगलियां कांप रही थीं।
"रात की शिफ्ट कैसी रही?" उसने पूछा, बिना ऊपर देखे।
"एक मरीज गुजर गया। बेड नंबर चार।" सीमा ने चाय का घूंट लिया। "तुम्हारी शेविंग किट मिल गई?"
अर्जुन का हाथ रुक गया। "हां। मिल गई।"
"अच्छा।" सीमा ने मुस्कराते हुए कहा। "क्योंकि मुझे लगा, शायद तुम्हें कुछ और भी मिल गया हो।"
उसने पहली बार ऊपर देखा। उनकी आंखें मिलीं। तीन सेकंड। चार सेकंड। फिर उसने नजरें झुका लीं, लेकिन उसके होंठों के कोने में कुछ था। शर्म नहीं। कुछ और।
"मैं बैंक जा रहा हूं," वो उठ खड़ा हुआ। "दोपहर को हाफ डे है। घर आ जाऊंगा।"
"ठीक है," सीमा ने कहा। "मैं सो रही हूं। दरवाजा... खुला ही रहेगा।"
वो ठिठक गया। फिर बिना कुछ कहे बाहर निकल गया।
सीमा सो नहीं पाई। बिस्तर पर लेटी वो छत देखती रही। उसकी आंखों के सामने बार-बार वही पल आ रहा था। दरवाजे में खड़ा अर्जुन। उसकी आंखों में वो भूख। उसने करवट बदली। उसके पति को गए चार महीने हो चुके थे। फोन पर बातें होती थीं, वीडियो कॉल पर चेहरे दिखते थे, लेकिन बदन को जो चाहिए था, वो फोन नहीं दे सकता था।
तीन बजे दरवाजे की घंटी बजी। सीमा ने नाइटी के ऊपर दुपट्टा डाला और दरवाजा खोला। अर्जुन खड़ा था, टाई ढीली, फाइल हाथ में।
"तुम तो चार बजे आने वाले थे," उसने कहा।
"काम जल्दी निपट गया," वो अंदर आया। उसकी नजर उसके दुपट्टे पर पड़ी, फिर नीचे, जहां दुपट्टा ठीक से नहीं ढका था। उसने जल्दी से नजरें हटा लीं।
"चाय बनाती हूं," सीमा किचन की तरफ बढ़ी।
"मैं बना देता हूं। तुम आराम करो। रात भर जागी हो।"
"नहीं," उसने पलट कर कहा। "तुम बैठो। मैं बनाती हूं।"
किचन में वो चाय चढ़ा कर खड़ी थी। अर्जुन सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था, लेकिन सीमा जानती थी कि वो नहीं देख रहा। उसकी गर्दन पर उसकी नजरों का वजन महसूस हो रहा था। नाइटी पतली थी, दोपहर की धूप खिड़की से आ रही थी। उसने जानबूझ कर दुपट्टा कंधे से सरका दिया।
चाय के दो कप ले कर वो आई और उसके सामने वाली कुर्सी पर नहीं, सोफे पर, उसके बिल्कुल पास बैठ गई। उनकी जांघें छू गईं। कोई भी नहीं हिला।
"सुबह जो हुआ," अर्जुन ने धीरे से कहा, "मैं उसे भूल नहीं पा रहा।"
"मैंने कहा था भूलने को?" सीमा ने कप नीचे रखा।
उसने उसकी तरफ देखा। "सीमा, ये गलत है। तुम प्रिया की बहन हो।"
"और तुम मेरे जिजा हो," उसने कहा। "तो? गलत चीजें ही तो सबसे ज्यादा याद रहती हैं।"
अर्जुन ने कुछ कहना चाहा, लेकिन सीमा ने उसकी जांघ पर हाथ रख दिया। पैंट के ऊपर से ही उसे महसूस हुआ। वो सख्त था। पूरी तरह। उसकी सांस अटक गई।
"देखो," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम्हारा बदन मुझसे झूठ नहीं बोल रहा।"
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ा, हटाने के लिए। लेकिन हटाया नहीं। उसकी उंगलियां उसके हाथ पर कसी रहीं। "सीमा..."
"शशश," वो उसके और करीब आई। उसके होंठ उसके कान के पास थे। "सिर्फ एक बार कह दो कि तुम्हें भी वही चाहिए जो मुझे चाहिए। झूठ मत बोलना।"
एक लंबा पल। फिर अर्जुन ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो चुम्बन भूखा था। कोई धीमी शुरुआत नहीं, कोई शर्म नहीं। उसकी जीभ उसके मुंह में घुसी, उसके हाथ उसकी पीठ पर फिसले, नाइटी के ऊपर से ही उसके बदन को मापने लगे। सीमा ने उसके बालों में उंगलियां धंसाईं और उसे और करीब खींच लिया।
अर्जुन ने उसे सोफे पर लिटा दिया। वो उसके ऊपर था, उसका वजन उसके बदन पर। उसके हाथ ने नाइटी को ऊपर सरकाया, जांघों पर, और ऊपर। जब उसकी उंगलियां उसकी पैंटी के ऊपर पहुंचीं, तो वो गीली थी। पूरी तरह भीगी हुई।
"हे भगवान," वो बुदबुदाया।
"उंगली अंदर डालो," सीमा ने उसके कान में कहा। "अभी।"
उसने पैंटी को एक तरफ सरकाया और दो उंगलियां उसके अंदर धकेल दीं। सीमा की कमर उठ गई। "हां... ऐसे ही..." वो उसकी उंगलियों पर हिलने लगी, उसका अंगूठा उसकी सबसे नाजुक जगह को रगड़ रहा था। किचन में चाय ठंडी हो रही थी। बाहर गली में सब्जी वाले की आवाज आ रही थी। और यहां, सोफे पर, सीमा की दुनिया सिमट कर उस एक जगह पर आ गई थी जहां उसकी उंगलियां थीं।
जब वो झड़ी, तो उसने अपनी चीख को उसके कंधे में दबा दिया। उसके नाखून उसकी शर्ट में धंस गए। उसका बदन कांपा, फिर ढीला पड़ गया।
अर्जुन ने उंगलियां बाहर निकालीं और उन्हें देखा। फिर, उसकी आंखों में देखते हुए, उन्हें अपने मुंह में डाल लिया।
सीमा ने उसे घूरा। "तुम बहुत बुरे हो, जिजा जी।"
"अभी तो शुरुआत है," उसने कहा, और खड़ा हो गया। उसकी पैंट में तनाव साफ दिख रहा था। "मैं नहा कर आता हूं। ठंडे पानी से।"
वो बाथरूम की तरफ गया। सीमा सोफे पर लेटी रही, नाइटी अस्त-व्यस्त, जांघें अब भी कांप रही थीं। उसने छत की तरफ देखा और हंसी। पागलों जैसी हंसी।
रात के दस बजे। सीमा अपने कमरे में थी, किताब हाथ में, लेकिन एक लाइन भी नहीं पढ़ पाई थी। दरवाजे पर दस्तक हुई। हल्की सी।
"आ जाओ।"
अर्जुन अंदर आया। उसने पजामा और बनियान पहना था। उसके हाथ में दो गिलास दूध था। "नींद नहीं आ रही," उसने कहा। "सोचा, तुम्हें भी नहीं आ रही होगी।"
सीमा ने किताब बंद की। "तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि मुझे पता है कि तुम क्या सोच रही हो," वो बिस्तर के किनारे बैठ गया। "वही जो मैं सोच रहा हूं।"
उसने दूध के गिलास साइड टेबल पर रखे। सीमा ने उसकी बनियान के नीचे उसके सीने को देखा। चौड़ा सीना, हल्के बाल। उसने अपना हाथ बढ़ाया और बनियान को ऊपर खींच दिया। अर्जुन ने उसे उतारने में मदद की।
अब वो उसके सामने नंगा सीना लिए बैठा था। सीमा ने उसके सीने पर हाथ फेरा, नीचे, उसके पेट पर, और पजामे के नाड़े तक। उसने नाड़ा खींचा। पजामा ढीला हो गया।
"रुको," अर्जुन ने कहा। वो उठा और दरवाजे की तरफ गया। उसने कुंडी लगाई। इस बार कुंडी काम कर रही थी। "अब कोई नहीं आएगा।"
वो बिस्तर पर लौटा और सीमा को अपनी बाहों में ले लिया। इस बार चुम्बन धीमा था। गहरा। उसके हाथ उसकी नाइटी के बटन खोलने लगे, एक-एक करके। नाइटी उसके कंधों से फिसल कर बिस्तर पर गिर गई। अब वो सिर्फ पैंटी में थी।
अर्जुन ने पीछे हट कर उसे देखा। "तुम बहुत खूबसूरत हो, सीमा।"
"झूठ मत बोलो," उसने कहा, लेकिन उसकी आंखों में चमक थी। "छूओ मुझे।"
उसके हाथ उसकी छातियों पर आए। बड़े, गर्म हाथ। उसने उन्हें दबाया, मला, फिर झुक कर एक निप्पल को मुंह में ले लिया। सीमा ने कराहते हुए उसके सिर को पकड़ लिया। उसकी जीभ निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, दांत हल्के से चुभ रहे थे।
"दूसरा भी," वो फुसफुसाई।
वो दूसरी तरफ गया। उसका एक हाथ नीचे सरक रहा था, उसकी पैंटी के अंदर। उसकी उंगलियां फिर से उस गीली गर्मी में थीं। "तुम तो पहले से ही तैयार हो," वो बुदबुदाया।
"सुबह से तैयार हूं," सीमा ने कहा। "उस दरवाजे के खुलने के बाद से।"
उसने उसकी पैंटी उतार दी। अब वो पूरी नंगी थी। अर्जुन ने उसे बिस्तर पर लिटाया और खुद नीचे सरका। उसके होंठ उसकी नाभि पर थे, फिर नीचे, और नीचे। जब उसकी जीभ उसकी चूत पर लगी, तो सीमा की कमर बिस्तर से उठ गई।
"अर्जुन..."
उसकी जीभ अंदर घुसी, बाहर आई, फिर उसकी सबसे संवेदनशील जगह पर टिक गई। वो चाटता रहा, चूसता रहा, उसकी उंगलियां एक बार फिर उसके अंदर थीं। सीमा ने चादर को मुट्ठियों में भींच लिया। उसकी जांघें उसके सिर के चारों ओर कस गईं।
"मैं... मैं फिर से..."
"झड़ जाओ," उसने कहा, बिना रुके। "मेरे मुंह पर झड़ जाओ।"
और वो झड़ गई। दूसरी बार उस दिन। उसकी चीख तकिए में दब गई। उसका बदन कांपा, उसकी उंगलियां उसके बालों में धंसी रहीं।
अर्जुन ऊपर आया। उसके होंठ गीले थे। सीमा ने उसे खींच कर चुम्बन किया, अपना ही स्वाद उसके मुंह में चखा। "अब मेरी बारी," उसने कहा।
उसने उसे पलट दिया। अब वो पीठ के बल लेटा था। उसने उसका पजामा नीचे खींचा। उसका लंड बाहर आया, सख्त, लंबा, नसों से भरा। सीमा ने उसे देखा और उसके होंठों पर जीभ फेरी।
"इतना बड़ा," वो बुदबुदाई। "दीदी खुशकिस्मत हैं।"
"प्रिया का नाम मत लो," अर्जुन ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में कोई गुस्सा नहीं था। "अभी सिर्फ तुम और मैं हैं।"
सीमा ने उसके लंड को हाथ में लिया और धीरे-धीरे हिलाया। फिर झुक कर उसके टोपे को मुंह में लिया। अर्जुन ने जोर से सांस ली। उसकी जीभ टोपे के चारों ओर घूमी, फिर वो उसे गहरे तक लेने लगी। ऊपर, नीचे। उसके हाथ उसके अंडकोषों को सहला रहे थे।
"बस... बस करो," अर्जुन ने हांफते हुए कहा। "नहीं तो अभी निकल जाएगा।"
सीमा ऊपर आई, उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान। "तो निकलने दो ना। लेकिन अंदर।"
वो उसके ऊपर चढ़ गई। उसने उसके लंड को पकड़ा और अपनी चूत के मुंह पर रखा। धीरे-धीरे वो नीचे बैठी। वो उसके अंदर घुसा, इंच दर इंच। दोनों ने एक साथ सांस ली।
"हे भगवान," सीमा ने कहा। "तुम बहुत अंदर हो।"
वो हिलने लगी। ऊपर, नीचे। धीरे-धीरे, फिर तेज। अर्जुन के हाथ उसकी छातियों पर थे, उन्हें दबा रहे थे, उसके निप्पलों को मरोड़ रहे थे। कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की आवाज थी, बिस्तर की चरमराहट, और गीली टकराहट।
"तेज," वो कह रहा था। "और तेज, सीमा।"
उसने रफ्तार बढ़ाई। उसका बदन पसीने से चमक रहा था। उसके बाल चेहरे पर चिपक गए थे। वो जंगली लग रही थी। और अर्जुन को ये देख कर पागलपन छा रहा था।
अचानक उसने उसे पलट दिया। अब वो ऊपर था। उसने उसकी टांगें अपने कंधों पर रखीं और एक ही झटके में पूरा अंदर घुस गया। सीमा चिल्लाई।
"चुप," वो बुदबुदाया, लेकिन खुद भी हांफ रहा था। "पड़ोसी सुन लेंगे।"
"सुनने दो," उसने कहा, और उसे अपनी तरफ खींचा।
वो धक्के मारता रहा। गहरे, तेज धक्के। हर धक्के के साथ सीमा की दुनिया हिल रही थी। उसे लगा कि वो फिर से झड़ने वाली है, तीसरी बार, और इस बार वो रुकना नहीं चाहती थी।
"मैं आ रहा हूं," अर्जुन ने कहा।
"अंदर," सीमा ने उसके कानों में कहा। "पूरा अंदर डाल दो। मुझे भर दो।"
उसने आखिरी जोरदार धक्का मारा और उसके अंदर झड़ गया। गर्म, गाढ़ा। सीमा ने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया, उसकी टांगें उसकी कमर के चारों ओर लिपटी थीं। वो भी उसी पल झड़ी, उसका बदन उसके बदन से चिपका, कांपता हुआ।
वो ऐसे ही पड़े रहे। उसका लंड अब भी उसके अंदर था, धीरे-धीरे नरम पड़ रहा था। उसकी उंगलियां उसकी पीठ पर बेखयाली में घूम रही थीं।
"ये गलत था," अर्जुन ने धीरे से कहा।
"हम्म," सीमा ने कहा। "फिर से गलत करेंगे?"
वो हंसा। थकी हुई, खुश हंसी। "प्रिया परसों आ रही है।"
"परसों," सीमा ने कहा। "तो हमारे पास अभी दो रातें हैं।"
उसने उसके सीने पर सिर रखा। उसकी धड़कन सुनी। बाहर गली में कुत्ते भौंक रहे थे। कहीं दूर से ट्रेन की सीटी आई। कमरे में पसीने और सेक्स की गंध थी।
अर्जुन ने उसके माथे पर चुम्बन किया। "सो जाओ। सुबह तुम्हारी फिर शिफ्ट है।"
"एक शर्त पर," सीमा ने कहा।
"क्या?"
उसने ऊपर देखा, उसकी आंखों में देखा। "कल सुबह नहाने के लिए तुम्हारा बाथरूम इस्तेमाल करूंगी। और इस बार कुंडी मत लगाना। टूटी हुई है, याद है ना?"
अर्जुन ने उसे घूरा। फिर मुस्कराया। धीरे-धीरे, बड़ी मुस्कान। "याद है।"
उसने लाइट बंद की। अंधेरे में, उसने महसूस किया कि उसका हाथ फिर से उसके बदन पर है। और उसने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की।
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