पति की तेरहवीं वाली रात जब उसके सबसे करीबी दोस्त ने मुझे थाम लिया
रात के लगभग एक बज रहे थे। घर में अभी भी अगरबत्ती की हल्की खुशबू बाकी थी। तेरहवीं का दिन खत्म हो चुका था। रिश्तेदार चले गए थे। घर पूरी तरह खाली और शांत था।
अन्विता सफेद साड़ी में सोफे पर बैठी थी। आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन आँसू अब नहीं थे। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।
आदित्य खड़ा था। पति का सबसे पुराना और सबसे करीबी दोस्त। पिछले पंद्रह दिनों से वह हर जरूरत में आगे रहा था। आज रात वह अकेला आया था।
“सोई नहीं?” आदित्य ने धीमे स्वर में पूछा।
अन्विता ने सिर हिलाया। आदित्य अंदर आया और दरवाजा बंद कर दिया। दोनों के बीच एक लंबी खामोशी थी। अन्विता ने अचानक कहा, “आज मत जा। रुके रहो।”
आदित्य की साँस थोड़ी तेज हुई। “अन्विता…”
“बस एक रात,” अन्विता ने आँखें उठाकर कहा। “कल से मैं फिर विधवा बन जाऊँगी। आज रात… मुझे इंसान की तरह महसूस करना है।”
आदित्य पास आया। उसने अन्विता का चेहरा दोनों हाथों में लिया। माथे पर चुंबन रखा। फिर होंठों पर। चुंबन में जल्दबाजी नहीं थी। इसमें सहारा था, भूख थी और गहरा गुनाह भी।
अन्विता ने खुद आदित्य के हाथ को अपने गले से होते हुए स्तनों तक ले गई। सफेद साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया। आदित्य ने ब्लाउज के हुक खोले। अन्विता की साँसें तेज हो गईं जब उसके स्तन हवा में खुले। आदित्य ने धीरे-धीरे एक निप्पल को मुँह में लिया। अन्विता की उंगलियाँ उसके बालों में घुस गईं।
“जोर से… आज जोर से,” अन्विता ने फुसफुसाया।
आदित्य ने उसकी बात मानी। उसने निप्पल को दाँतों से हल्का काटा और जोर से चूसा। अन्विता की कमर तन गई। आदित्य ने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया। उस बेडरूम में जहाँ अभी कुछ दिन पहले तक उसका पति सोता था।
बिस्तर पर लेटते ही अन्विता ने खुद अपनी साड़ी और पेटीकोट खोल दिए। आदित्य ने उसकी पैंटी धीरे से उतारी। अन्विता की जाँघें काँप रही थीं—शर्म से नहीं, भूख से। आदित्य ने उसकी जाँघें फैलाईं और अपनी जीभ उसके बीच में रख दी।
अन्विता की पहली सिसकी निकली। आदित्य की जीभ धीमी लेकिन गहरी थी। वह क्लिट को धीरे-धीरे चूस रहा था, कभी अंदर तक जा रहा था। अन्विता के नाखून चादर को पकड़ रहे थे। सालों बाद किसी और के मुँह का एहसास उसे पागल कर रहा था।
जब आदित्य ने दो उंगलियाँ अंदर डालीं, अन्विता की कमर जोर से उछली। “आदित्य… वहाँ… बस वहीं…”
आदित्य ने और गहराई तक उंगलियाँ घुमाईं। अन्विता का शरीर अकड़ गया। पहला चरम आँसुओं के साथ आया। उसने आदित्य के बाल पकड़ रखे थे और काँप रही थी।
आदित्य ऊपर आया। अन्विता ने खुद उसके बेल्ट के साथ खिलवाड़ किया और पैंट नीचे की। जब आदित्य का अंग उसके हाथ में आया तो अन्विता की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। आदित्य ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और बहुत धीरे-धीरे अंदर घुसना शुरू किया।
अन्विता की भौंहें सिकुड़ गईं। आदित्य रुका। “दर्द?”
“नहीं… अंदर तक आ,” अन्विता ने कहा।
आदित्य ने पूरा अंदर ले लिया। दोनों की साँसें एक हो गईं। आदित्य कुछ देर बिना हिले रहा, फिर धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। अन्विता की आँखें बंद थीं। हर धक्के के साथ उसके होंठ से हल्की आवाज निकल रही थी।
गति धीरे-धीरे बढ़ी। आदित्य ने झुककर उसके स्तनों को फिर मुँह में लिया। अन्विता की टाँगें उसकी कमर के चारों ओर लिपट गईं। “और जोर से… आज मुझे धीरे नहीं चाहिए।”
आदित्य ने उसकी बात मान ली। धक्के गहरे और तेज हो गए। बिस्तर चरमरा रहा था। अन्विता की आवाजें अब साफ सुनाई दे रही थीं। आदित्य ने उसका मुँह अपने हाथ से नहीं दबाया। आज वह उसकी आवाज सुनना चाहता था।
अन्विता का दूसरा चरम पहले से कहीं भारी था। उसके आँसू फिर निकल आए। आदित्य ने भी उसी समय उसके अंदर ही छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए काँप रहे थे।
कुछ देर की खामोशी के बाद अन्विता ने धीरे से कहा, “एक बार और। सुबह होने से पहले।”
आदित्य ने उसके चेहरे से बाल हटाए। “तू पक्का?”
अन्विता ने सिर हिलाया। “आज रात मैं विधवा नहीं हूँ। आज रात मैं सिर्फ एक औरत हूँ।”
आदित्य ने उसे फिर से चूमा। इस बार चुंबन में नरमी कम और भूख ज्यादा थी। उसने अन्विता को घुटनों के बल किया और पीछे से अंदर आया। अन्विता ने तकिया दबा लिया। आदित्य की एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसके बालों में। धक्के इस बार और गहरे थे।
अन्विता की आवाज तकिए में दब रही थी। आदित्य ने उसके नितंबों पर हल्के थप्पड़ मारे। अन्विता और जोर से पीछे की ओर धकेलने लगी। तीसरा चरम दोनों का लगभग एक साथ आया। आदित्य ने फिर से उसके अंदर ही छोड़ दिया।
सुबह चार बजे आदित्य कपड़े पहनने लगा। अन्विता चादर ओढ़े उसे देख रही थी। शरीर पर अभी भी उसके स्पर्श की गर्मी थी।
आदित्य ने उसके माथे पर चुंबन रखा। “ये रात… हम दोनों कभी नहीं भूल पाएँगे।”
अन्विता ने आँखें बंद कर लीं। “जा। और जिस दिन तू फिर से आए… दरवाजा खुला मिलेगा।”
आदित्य कुछ देर रुका, फिर निकल गया। अन्विता अकेली बिस्तर पर लेटी रही। सफेद साड़ी एक तरफ पड़ी थी। शरीर में गुनाह का वजन था, लेकिन साथ में एक अजीब सी हल्की सी शांति भी थी।
पति की तेरहवीं वाली रात उसने अपने शरीर को किसी और के हवाले कर दिया था। और अन्विता जानती थी—ये गुनाह अब उसकी साँसों का हिस्सा बन चुका है।
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