हिंदी आंटी सेक्स कहानी: मौसी की डायरी
बुकशेल्फ़ हिल रहा था। शाम के सात बज रहे थे और मैं स्क्रूड्राइवर हाथ में लिए उसे दीवार से खींच रहा था, तभी पिछली तरफ से कुछ फिसलकर मेरे घुटनों पर गिरा। एक पुरानी डायरी, चमड़े की जिल्द उधड़ चुकी थी, और पहले पन्ने पर सुनीता का नाम लिखा था। उस पल मुझे ऐसा लगा जैसे ये हिंदी आंटी सेक्स कहानी किसी छिपे हुए खज़ाने से शुरू हो रही हो, और मेरी उंगलियां कांपने लगीं।
मौसी छह साल पहले विधवा हुई थीं। मामा की मौत के बाद वो इस बड़े से जयपुर वाले मकान में अकेली रहती थीं, और मैं दो महीने पहले ग्राफ़िक डिज़ाइनर की नौकरी के लिए यहां का पिछला कमरा किराए पर लेकर आया था। डायरी खोलने से पहले मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। घर में सन्नाटा था, रसोई से दाल के तड़के की खुशबू आ रही थी।
पहला पन्ना आठ साल पुराना था। मामा के ज़िंदा रहते की एंट्री, और शब्द ऐसे थे कि मेरा गला सूख गया। उन्होंने लिखा था कि उनके पति थककर सो जाते हैं और वो रात भर करवटें बदलती रहती हैं।
उनका शरीर कुछ मांगता है जो उन्हें कभी मिला ही नहीं। मैंने पन्ना पलटा, फिर एक और।
हर एंट्री एक ही भूख की कहानी थी। कभी उन्होंने लिखा था कि पड़ोस की शादी में दूल्हे को देखकर उनका दिल धड़का था। कभी लिखा था कि बारिश की रात में खिड़की के पास खड़े होकर उन्होंने अपने आप को छुआ था और आंखों में आंसू आ गए थे। एक जगह तो उन्होंने साफ़ शब्दों में लिखा था कि उन्हें एक मर्द चाहिए जो उन्हें पूरी रात प्यार करे, बिना रुके, बिना शर्म के।
मेरा लंड पैंट में तन गया था। ये गलत था, मैं जानता था। ये मेरी मौसी की सबसे निजी डायरी थी।
लेकिन मेरे हाथ पन्ने पलटना बंद नहीं कर रहे थे। आखिरी एंट्री सिर्फ़ तीन महीने पुरानी थी। उसमें लिखा था, आज रोहन को शर्ट के बिना देखा।
वो अब बच्चा नहीं रहा। मैं बाथरूम में जाकर रोई।
मेरे सीने में धकधक होने लगी। उन्होंने मुझे देखा था। उन्होंने मेरे बारे में सोचा था।
डायरी बंद करके मैंने उसे वापस बुकशेल्फ़ के पीछे ठूंसने की कोशिश की, तभी दरवाज़े पर आवाज़ आई। तुम क्या कर रहे हो रोहन। मैं ठिठक गया। डायरी मेरे हाथ में थी।
मौसी दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा सरका हुआ था और आंखों में पहले हैरानी, फिर डर, फिर कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया और धीरे से बोलीं, ये कहां से मिली तुम्हें। मेरी ज़बान तालू से चिपक गई।
बुकशेल्फ़ के पीछे थी मौसी, मैं। मैंने सच बोल दिया। उन्होंने डायरी मेरे हाथ से नहीं छीनी।
बस मुझे देखती रहीं, लंबी सांस लेती हुईं। फिर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया। मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा वो सुन लेंगी।
तुमने पढ़ी, उन्होंने पूछा। आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ थकान थी। मैंने सिर झुका लिया।
उन्होंने मेरे पास आकर डायरी ले ली और उसे सीने से लगा लिया। इतने सालों से ये मेरा एकमात्र दोस्त थी, वो बोलीं। अब तुम जान गए।
तो जान लो, मैं कोई देवी नहीं हूं। मैं एक औरत हूं रोहन।
उस रात खाने पर कोई बात नहीं हुई। लेकिन हर बार जब हमारी नज़रें मिलतीं, वो झुक जातीं। मैंने देखा कि उनके हाथ कांप रहे थे जब वो मुझे रोटी दे रही थीं।
सोने से पहले उन्होंने मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक दी और सिर्फ़ इतना कहा, डायरी के बारे में किसी से कुछ मत कहना। मैंने वादा किया।
अगले दो दिन अजीब तनाव में बीते। सुबह रसोई में जब वो चाय बना रही थीं, मैं पीछे से गुज़रा और मेरा कंधा उनके कंधे से छू गया। वो हिली नहीं।
शाम को बालकनी में कपड़े सुखाते वक्त उनकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ा और मेरे चेहरे से छू गया। उसमें उनके पसीने और इत्र की मिली हुई खुशबू थी।
तीसरी शाम मैं ड्राइंग रूम में लैपटॉप पर काम कर रहा था। वो मेरे पास आकर बैठ गईं, इतने करीब कि उनकी जांघ मेरी जांघ से छू गई। टीवी पर कोई पुराना गाना चल रहा था।
उन्होंने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ गर्म था और कांप रहा था।
रोहन, उन्होंने फुसफुसाकर कहा। मैं छह साल से मरी हुई हूं। सिर्फ़ सांस चल रही है।
डायरी में जो पढ़ा, वो झूठ नहीं है। मुझे एक मर्द चाहिए। और तुम्हें देखकर मुझे शर्म नहीं आती, डर लगता है कि कहीं तुम मुझे गंदा न समझो। मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।
आप गंदी नहीं हैं मौसी, मैंने कहा। आप सबसे सच्ची औरत हैं जो मैंने देखी है। उन्होंने मेरी आंखों में देखा, फिर धीरे से अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब लाईं।
उनके होंठ मेरे होंठों से एक सांस की दूरी पर थे। फिर उन्होंने खुद ही वो दूरी मिटा दी।
उनका पहला चुम्बन भूखा था। उनके होंठ मेरे होंठों को चूस रहे थे और उनकी जीभ मेरे मुंह में घुस आई। मैंने उन्हें अपनी बाहों में खींच लिया।
उनकी छातियां मेरे सीने से दब गईं और मैं उनके ब्लाउज़ के नीचे उनकी ब्रा की डोरी महसूस कर सकता था। मेरे लंड ने पैंट में ज़ोर का झटका मारा।
उन्होंने खुद ही अपने ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू कर दिए। एक, दो, तीन। काली ब्रा में कसे उनके बड़े गोरे बूब्स सामने आए।
मैंने ब्रा का हुक खोला और उनके निप्पल मेरी आंखों के सामने तन गए। गहरे भूरे रंग के बड़े निप्पल, जिनके चारों ओर रोएं खड़े थे। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया और ज़ोर से चूसा।
उनके मुंह से आह निकली। रोहन, धीरे नहीं, ज़ोर से। छह साल से किसी ने इन्हें छुआ नहीं।
मैंने उनके दोनों बूब्स को बारी बारी चूसा, काटा, चाटा। मेरे हाथ उनकी साड़ी के अंदर घुस गए और उनकी नंगी कमर को सहलाने लगे। उनकी त्वचा गर्म और चिकनी थी।
उन्होंने मेरी शर्ट उतार दी और मेरे सीने पर अपने नाखून गड़ा दिए। फिर वो घुटनों के बल बैठ गईं और मेरी पैंट की ज़िप खोली। मेरा लंड उछलकर बाहर आया, पूरा तना हुआ, नसें उभरी हुईं। उन्होंने उसे देखा और उनकी आंखों में वो भूख दिखी जो मैंने डायरी में पढ़ी थी।
उन्होंने मेरे लंड को हाथ में लिया और धीरे से हिलाया। फिर अपने मुंह में ले लिया। गर्म, गीला मुंह।
उनकी जीभ मेरे लंड के टोपे पर घूम रही थी और वो गले तक लेकर चूस रही थीं। मैं सोफे पर पीछे झुक गया और उनके बालों को पकड़ लिया। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं।
बस, मैंने कहा। अब मेरी बारी। मैंने उन्हें उठाया और उनकी साड़ी खींचकर उतार दी।
पेटीकोट भी। अब वो सिर्फ़ पैंटी में मेरे सामने खड़ी थीं। मैंने उनकी पैंटी को घुटनों तक सरकाया। उनकी चूत मेरे सामने थी, गीली और फूली हुई, बाल हल्के से कटे हुए।
मैं घुटनों पर बैठा और उनकी चूत को चाटने लगा। पहले धीरे, फिर ज़ोर से। मेरी जीभ उनकी फांकों के बीच घुस गई और उनके दाने को चूसने लगी।
वो मेरे सिर को अपनी चूत पर दबा रही थीं और चिल्ला रही थीं, हां रोहन, वहीं, और ज़ोर से। उनका पानी मेरे मुंह में छूटा, नमकीन और गर्म।
मैंने उन्हें सोफे पर लिटाया और उनकी टांगें फैला दीं। मेरा लंड उनकी चूत के मुंह पर था। मैंने धीरे से धक्का दिया और आधा लंड अंदर घुस गया।
वो तड़प उठीं। उनकी चूत इतनी टाइट थी जैसे सालों से किसी ने छुई न हो, लेकिन इतनी गीली कि लंड फिसलता हुआ पूरा अंदर चला गया।
मैंने धक्के मारने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज़। हर धक्के के साथ उनके बूब्स उछल रहे थे और वो मेरे कंधों को नोच रही थीं।
और अंदर, और गहरा, वो चिल्ला रही थीं। मैंने उनकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं और पूरे ज़ोर से चोदने लगा। सोफ़ा दीवार से टकरा रहा था।
फिर मैंने उन्हें घोड़ी बनाया। वो सोफे के हत्थे को पकड़कर झुक गईं और उनकी गांड मेरी तरफ़ उठ गई। मैंने पीछे से अपना लंड उनकी चूत में पेला और ज़ोर ज़ोर से धक्के मारे।
मेरे हाथ उनके बूब्स को मसल रहे थे। वो चीख रही थीं, हां, ऐसे ही, फाड़ दे मुझे।
मैं झड़ने वाला था। मैंने लंड बाहर निकाला और उनके मुंह की तरफ़ किया। उन्होंने उसे मुंह में लिया और मैं उनके मुंह में ही झड़ गया।
गर्म वीर्य उनके गले तक गया। उन्होंने सब निगल लिया और मेरे लंड को चाटकर साफ़ किया। फिर वो मेरे सीने से लगकर रोने लगीं, खुशी के आंसू।
उस रात के बाद सब बदल गया। अब वो डायरी में नहीं लिखती थीं। एक शाम उन्होंने मेरे सामने डायरी उठाई और बोलीं, अब ये बंद रहेगी।
मेरी ज़िंदगी खुल गई है। फिर उन्होंने डायरी को उसी बुकशेल्फ़ के पीछे वापस रख दिया, लेकिन इस बार छिपाकर नहीं, बस रखकर।
अब हर रात उनका कमरा मेरा ठिकाना था। कभी वो दरवाज़ा खुद खोलकर मुझे अंदर खींच लेतीं। कभी मैं उनके बिस्तर में पहले से लेटा मिलता।
एक रात उन्होंने लाल साड़ी पहनी, बिना ब्लाउज़ के, सिर्फ़ पल्लू से छाती ढकी हुई। मैं देखते ही पागल हो गया।
उस रात उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे ऊपर आ गईं। उनकी चूत मेरे लंड पर बैठ गई और वो ऊपर नीचे होने लगीं। उनके बूब्स मेरे चेहरे पर झूल रहे थे।
मैं उनके निप्पल चूसता रहा और वो सिसकती रहीं। जब वो झड़ीं, तो उनकी चूत ने मेरे लंड को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि मैं भी उसी पल झड़ गया।
एक सुबह बाथरूम में उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया। शॉवर के नीचे हम दोनों भीगे हुए थे। उन्होंने साबुन लगाकर मेरे लंड को हाथ से हिलाया और मैं दीवार से टिककर झड़ गया।
फिर उन्होंने मेरी उंगली अपनी चूत में डलवाई और खुद हिलाकर पानी छोड़ा। उनकी सिसकारी बाथरूम की दीवारों से टकरा रही थी।
धीरे धीरे पड़ोस को शक होने लगा, लेकिन हमें परवाह नहीं थी। वो अब हंसती थीं, खुलकर। उनकी आंखों की वो मुर्दा सी खामोशी गायब हो गई थी।
एक दिन उन्होंने कहा, तुम्हारे मामा अच्छे आदमी थे, लेकिन उन्होंने मुझे कभी औरत नहीं समझा। तुमने पहले दिन ही समझ लिया।
मैंने उनके गाल को चूमा और कहा, मौसी, आप मेरी सबसे खूबसूरत कहानी हैं। वो शरमा गईं, उनतालीस साल की उम्र में एक जवान लड़की की तरह। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने ब्लाउज़ के अंदर रख दिया।
अभी शर्माने का वक्त नहीं है, उन्होंने आंख मारकर कहा। अंदर चलो।
उस रात हमने तीन बार प्यार किया। पहली बार बिस्तर पर, धीरे धीरे, एक दूसरे की आंखों में देखते हुए। दूसरी बार उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठाया और खुद मेरी गोद में आकर चुदवाया।
तीसरी बार सुबह के चार बजे, खिड़की के पास खड़े होकर, पीछे से। बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
अब जब भी मैं उस बुकशेल्फ़ को देखता हूं, मुझे वो शाम याद आती है। एक हिलती हुई शेल्फ़, एक गिरी हुई डायरी, और एक औरत जिसने अपनी भूख को सालों तक कागज़ पर दफ़न रखा था। उन्होंने डायरी बंद कर दी, लेकिन हर रात वो मेरे कान में फुसफुसाती हैं।
कल रात भी वही हुआ। लाइट बंद थी, सिर्फ़ गलियारे की रोशनी दरवाज़े की दरार से आ रही थी। वो मेरे ऊपर थीं, धीरे धीरे हिल रही थीं, और अचानक रुककर मेरे होंठों पर झुकीं।
रोहन, उन्होंने कहा, अगर उस दिन तुमने शेल्फ़ ठीक न की होती, तो मैं आज भी मरी हुई होती। फिर उन्होंने मेरे होंठ चूम लिए और नीचे तक धंस गईं।
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