हिंदी हॉट सेक्स स्टोरी: भोपाल वाली रात का राज़, भाग 2
हिंदी हॉट सेक्स स्टोरी के इस भाग में दरवाज़े पर करण की आवाज़ गूँजी, "मुझे पता था।" अनन्या का दिल एक पल के लिए रुक गया। देव ने चादर खींचकर खुद को ढका, पर उसकी आँखों में डर से ज़्यादा शर्म थी। करण धीरे से अंदर आया, उसके हाथ में वह पुराना एल्बम था, जिसके पन्नों में अनन्या की कॉलेज की तस्वीरें छिपी थीं।
करण ने एल्बम मेज़ पर रखा और कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी थकान थी। उसने कहा कि वह इस एल्बम को सालों से जानता है, देव ने उसे कॉलेज के दिनों में ही दिखाया था। अनन्या की साँस अटक गई, उसे लगा कि उसका पति बरसों से एक राज़ अपने सीने में दबाए बैठा था।
देव ने हकलाते हुए कहा कि उसने कभी अनन्या को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहा, बस उसकी तस्वीरें उसे उस दौर की याद दिलाती थीं। करण ने हाथ उठाकर उसे रोका और कहा कि आज की रात उसने सब कुछ अपनी आँखों से देख लिया है। वह जानना चाहता था कि अनन्या सच में क्या चाहती है, कोई झूठ नहीं, कोई पर्दा नहीं।
अनन्या ने चादर को अपने सीने से लगाए हुए सच बोला। उसने कहा कि वह करण से प्यार करती है, पर आज की रात में उसे वह एहसास मिला जो बरसों से खो गया था। वह किसी को धोखा नहीं देना चाहती थी, पर देव के साथ वह खुद को फिर से ज़िंदा महसूस कर रही थी। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसकी बातों में ईमानदारी थी।
करण चुपचाप सुनता रहा, फिर उसने एक लंबी साँस ली। उसने बताया कि शादी के बाद उसने अनन्या की आँखों से वह चमक धीरे धीरे फीकी पड़ते देखी थी। वह उसे खुश देखना चाहता था, चाहे वह खुशी किसी भी रूप में आए। उसने देव की तरफ देखा और कहा कि अगर आज की रात अधूरी रही तो यह राज़ उन तीनों को हमेशा खाएगा।
कमरे में सन्नाटा छा गया। देव ने अनन्या का हाथ थामा और उसकी हथेली को चूमा। करण उठा, उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए, फिर रुककर कहा कि वह नीचे ड्राइंग रूम में रहेगा, और सुबह होने से पहले कोई भी फैसला उन तीनों का होगा। दरवाज़ा बंद हुआ तो अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले, पर उसके होंठों पर राहत की मुस्कान भी थी।
देव ने उसके आँसू अपनी उँगलियों से पोंछे और उसके माथे को चूमा। अनन्या ने उसकी कमर में बाँहें डाल दीं और उसे अपने करीब खींच लिया। उसने कहा कि अब कोई डर नहीं है, अब वह पूरी तरह उसकी है, इस रात के लिए। देव ने उसके होंठों को अपने होंठों से लगाया और वह चुम्बन धीरे धीरे गहरा होता गया।
देव ने अनन्या के बालों को सहलाया और उसकी गर्दन पर होंठ रख दिए। अनन्या ने आँखें बंद कर लीं और उसकी साँसें तेज़ हो गईं। देव की उँगलियाँ उसकी पीठ पर चल रही थीं, और हर स्पर्श पर अनन्या का बदन सिहर उठता था। उसने देव की कमीज के बटन खोले और उसके सीने पर अपना चेहरा टिका दिया।
अनन्या ने देव को बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर आ गई। उसने उसकी छाती को चूमा, उसके पेट पर जीभ फिराई, और धीरे धीरे नीचे बढ़ी। देव ने उसके बालों में उँगलियाँ फँसा लीं और उसका नाम फुसफुसाया। अनन्या ने उसके लंड को अपने हाथ में लिया, उसे सहलाया, और फिर अपने होंठों से उसे घेर लिया।
देव की साँसें उखड़ने लगीं। उसने अनन्या को ऊपर खींचा और उसे पलटकर अपने नीचे ले लिया। उसने उसकी चूत को अपनी उँगलियों से सहलाया, उसकी गीलीपन को महसूस किया, और फिर अपनी जीभ से उसे चाटने लगा। अनन्या ने चादर को मुट्ठियों में भींच लिया और उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं।
देव ने उसे घुटनों पर किया और पीछे से उसके करीब आ गया। उसने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे से अंदर धकेला। अनन्या ने एक लंबी आह भरी और अपने कूल्हों को पीछे धकेला। देव ने उसकी कमर पकड़ी और धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी, हर धक्के के साथ बिस्तर हिलने लगा।
अनन्या ने पीछे मुड़कर देव को देखा और कहा कि और तेज़ करे। देव ने उसकी बात मान ली, उसके धक्के गहरे और तेज़ हो गए। अनन्या की चूत से पानी बहने लगा, उसकी जाँघें काँपने लगीं। देव ने उसके बाल खींचकर उसका चेहरा ऊपर किया और उसके कान में कहा कि वह उसकी है।
देव ने उसे पलटकर सीधा लिटाया और उसके पैर अपने कंधों पर रख लिए। उसने एक ज़ोरदार धक्के के साथ फिर से अंदर प्रवेश किया। अनन्या ने उसकी पीठ को नाखूनों से खरोंचा और चिल्लाकर अपना पानी छोड़ दिया। उसकी चूत ने देव के लंड को कसकर जकड़ लिया।
देव ने कुछ और गहरे धक्के लगाए और फिर अपना पानी उसकी चूत के अंदर ही छोड़ दिया। दोनों हाँफते हुए एक दूसरे से लिपट गए। अनन्या ने देव के सीने पर सिर रखा और उसकी धड़कनें सुनीं। कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ थी, और बाहर झील पर चाँदनी फैली हुई थी।
कुछ देर बाद करण की आहट सीढ़ियों पर सुनाई दी। अनन्या ने जल्दी से चादर ओढ़ी और देव ने अपनी कमीज पहनी। करण दरवाज़े पर रुका, उसने अंदर झाँका नहीं, बस कहा कि चाय नीचे बन रही है। उसकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी, सिर्फ एक पति की चिंता थी।
सुबह की पहली किरण के साथ अनन्या नीचे आई। करण किचन में खड़ा था, उसकी आँखें लाल थीं, पर चेहरा शांत था। अनन्या ने पीछे से उसे गले लगा लिया और कहा कि वह उससे माफी नहीं माँगेगी, क्योंकि माफी इस सच को छोटा कर देगी। करण ने उसका हाथ थामा और उसे अपने सामने घुमाया।
करण ने कहा कि वह अनन्या को खोना नहीं चाहता, और अगर सच ही रिश्ते की बुनियाद है तो वह इस सच के साथ जीना सीखेगा। उसने अनन्या के होंठों को चूमा, वह चुम्बन धीमा था, पर उसमें बरसों का प्यार था। अनन्या ने उसकी कमीज को मुट्ठी में भींच लिया और उसे अपने करीब खींच लिया।
करण ने उसे किचन की स्लैब से टिका दिया और उसकी नाइटी के स्ट्रैप नीचे सरका दिए। अनन्या ने उसकी गर्दन को चूमा और उसके कान में फुसफुसाया कि वह उसी की है। करण ने उसके बूब्स को अपने हाथों में लिया, उन्हें सहलाया, और उसके निप्पल को अपने मुँह में ले लिया।
अनन्या की साँसें फिर तेज़ हो गईं। करण ने उसकी नाइटी ऊपर उठाई और उसकी चूत को अपनी उँगलियों से छुआ। वह अब भी गीली थी, और करण की उँगलियाँ आसानी से अंदर फिसल गईं। अनन्या ने उसके कंधे पर सिर टिका दिया और धीरे से कराहने लगी।
करण ने उसे उठाकर स्लैब पर बिठाया और उसके पैर खोल दिए। उसने अपना लंड बाहर निकाला और उसकी चूत के मुँह पर रगड़ा। अनन्या ने अपने हाथों से उसे पकड़कर अंदर की तरफ खींचा। करण ने एक ही धक्के में पूरा अंदर कर दिया और अनन्या ने ज़ोर से आह भरी।
करण के धक्के धीमे पर गहरे थे, हर धक्के के साथ अनन्या का बदन उसके साथ हिलता था। उसने करण की कमर में टाँगें लपेट लीं और उसे और करीब खींच लिया। करण ने उसके होंठों को चूसा, उसकी गर्दन को काटा, और उसकी चूत में अपना पूरा ज़ोर लगा दिया।
अनन्या ने दूसरी बार पानी छोड़ा, इस बार करण के नाम के साथ। करण ने भी अपने धक्के तेज़ किए और अपना पानी उसकी चूत में छोड़ दिया। दोनों एक दूसरे से लिपटकर हाँफते रहे, और किचन की खिड़की से सुबह की धूप उन पर पड़ रही थी।
देव अपना बैग लेकर नीचे आया तो तीनों के बीच एक पल के लिए खामोशी छा गई। करण ने आगे बढ़कर देव से हाथ मिलाया और कहा कि एल्बम अब अलमारी में नहीं, बल्कि खुली किताब की तरह रहेगा। देव ने मुस्कुराकर कहा कि वह इस दोस्ती को कभी दाग नहीं लगने देगा।
अनन्या ने देव को दरवाज़े तक छोड़ा। देव ने उसका हाथ थामा, उसकी हथेली को चूमा, और कहा कि भोपाल की यह रात उसकी ज़िंदगी की सबसे सच्ची रात थी। अनन्या ने उसे गले लगाया और कहा कि राज़ अब राज़ नहीं रहा, और यही इस कहानी का सबसे खूबसूरत अंत है।
देव के जाने के बाद अनन्या और करण बालकनी में बैठे। झील पर सुबह की धूप चमक रही थी और दूर से मंदिर की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं। करण ने अनन्या के लिए चाय बनाई और दोनों ने एक ही कप से चाय पी। अनन्या ने कहा कि उसे अब किसी बात का डर नहीं है, क्योंकि सच सामने आ चुका है। करण ने मुस्कुराकर कहा कि सच कभी कभी रिश्ते को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे और मज़बूत बना देता है।
अनन्या ने करण के कंधे पर सिर टिका दिया और उसकी उँगलियों से खेलने लगी। करण ने उसके हाथ को चूमा और कहा कि वह अगले हफ्ते उसे फिर से उसी झील के किनारे घुमाने ले जाएगा, जहाँ उनकी पहली मुलाकात हुई थी। अनन्या की आँखें नम हो गईं, पर इस बार आँसू खुशी के थे। उसने करण को गले लगाया और कहा कि वह हमेशा उसी की रहेगी।
दोपहर को जब देव का मैसेज आया तो अनन्या ने उसे पढ़कर मुस्कुरा दिया। देव ने लिखा था कि वह भोपाल की उस रात को कभी नहीं भूलेगा, और वह चाहता है कि तीनों की दोस्ती हमेशा ऐसी ही साफ़ रहे। अनन्या ने जवाब में लिखा कि अब कोई राज़ नहीं है, और यही सबसे बड़ी आज़ादी है। करण ने मैसेज पढ़कर हँसते हुए कहा कि देव को अगली बार अपने साथ एल्बम लाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
देव की गाड़ी झील के किनारे से गुज़री तो अनन्या ने करण का हाथ थाम लिया। करण ने उसका हाथ दबाया और दोनों घर के अंदर लौट गए। उस रात के बाद उनके बीच कोई झूठ नहीं बचा था, सिर्फ एक सच था, जो तीनों को एक नई शुरुआत दे गया था।
सुबह के पाँच बजे थे जब अनन्या चुपचाप झील के किनारे पहुँची। देव वहाँ पहले से खड़ा था, उसकी गाड़ी किनारे पर खड़ी थी और झील पर हल्की धुंध फैली हुई थी। अनन्या ने उसकी बाँह पकड़ी और उसे पेड़ों की ओट में खींच लिया, जहाँ सुबह की पहली रोशनी भी पूरी तरह नहीं पहुँची थी।
देव ने उसे दीवार से टिका दिया और उसके होंठों को अपने होंठों से लगा लिया। अनन्या ने उसकी कमीज के अंदर हाथ डालकर उसके सीने को सहलाया। देव ने उसकी साड़ी का पल्लू हटाया और उसके ब्लाउज़ के ऊपर से उसके बूब्स को दबाया। अनन्या की साँसें तेज़ हो गईं और उसने देव की कमर में अपनी टाँग लपेट ली।
देव ने उसकी साड़ी ऊपर उठाई और उसकी चूत को अपनी उँगलियों से छुआ। वह पहले से गीली थी। उसने अपना लंड बाहर निकाला और धीरे से उसकी चूत में धकेल दिया। अनन्या ने उसके कंधे पर सिर टिका दिया और धीरे धीरे कराहने लगी, ताकि झील के किनारे टहलने वालों तक आवाज़ न पहुँचे।
देव के धक्के तेज़ हुए तो अनन्या ने उसके होंठों को अपने होंठों से बंद कर दिया, ताकि उसकी सिसकारियाँ बाहर न निकलें। उसकी चूत ने देव के लंड को कसकर पकड़ लिया और कुछ ही पलों में उसने अपना पानी छोड़ दिया। देव ने भी दो गहरे धक्कों के बाद अपना पानी उसके अंदर छोड़ दिया।
दोनों एक दूसरे से लिपटकर खड़े रहे, झील पर धुंध छँट रही थी और दूर से चाय की दुकान खुलने की आवाज़ आ रही थी। अनन्या ने देव के माथे को चूमा और कहा कि यह अलविदा नहीं है, बस एक नई शुरुआत है। देव ने मुस्कुराकर उसका हाथ थामा और दोनों अपनी अपनी राह पर चल दिए। अनन्या जब घर लौटी तो करण बालकनी में खड़ा था, उसके हाथ में चाय का कप था और उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, जैसे वह जानता हो कि उसकी पत्नी ने अभी अभी किसे अलविदा कहा है।
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