हिंदी गंदी कहानी भाग 2: कविता और आरव का खतरनाक खेल
रात के साढ़े ग्यारह बजे कविता का फोन वाइब्रेट हुआ तो उसने झट से तकिया उठाकर उसके नीचे दबा दिया। स्क्रीन पर आरव का नाम चमक रहा था। "इतनी रात को क्यों फोन कर रहे हो," वह फुसफुसाई, "पति कल सुबह आ रहे हैं, तुम्हें पता है ना।" दूसरी तरफ से आरव की हंसी आई, गहरी और बेखौफ। "इसीलिए तो फोन किया है, मैडम। कल सुबह जिम आओगी ना, वरना मैं तुम्हारे फ्लैट के नीचे आकर खड़ा हो जाऊंगा।"
कविता का दिल धड़क उठा। कल सुबह ही उसके पति का फोन आया था कि इंदौर का काम खत्म हो गया है और वह सुबह की ट्रेन से भोपाल पहुंच जाएंगे। और इधर आरव था जो हर सुबह जिम में उसका इंतजार करता था, जैसे कोई हक जताता हो। "तुम पागल हो गए हो," कविता ने धीमी आवाज में कहा, "कल मैं नहीं आ सकती। एक दिन रुक जाओ।" आरव ने जवाब दिया, "एक दिन बहुत लंबा होता है, कविता। तुम्हारी खुशबू अभी भी मेरी शर्ट पर है।" फोन कट गया और कविता अंधेरे कमरे में छत को घूरती रही।
सुबह छह बजे दरवाजे की घंटी बजी। कविता ने दरवाजा खोला तो सामने उसके पति खड़े थे, हाथ में बैग और चेहरे पर थकान। "आ गए," वह मुस्कुराए और उसे गले लगा लिया। कविता ने भी उन्हें बांहों में भर लिया, पर उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। पति का स्पर्श अब उसे उतना नहीं छूता था जितना आरव की एक नजर छू जाती थी। उसने यह बात खुद से भी छिपाने की कोशिश की, पर शरीर झूठ नहीं बोलता।
नाश्ते पर पति ने इंदौर के किस्से सुनाए, काम की थकान और वापसी की खुशी। कविता चाय बनाती रही और बीच बीच में हां हूं करती रही। उसके दिमाग में आरव का चेहरा घूम रहा था, जिम के पिछले कमरे की वह शाम, जहां आरव ने उसे दीवार से लगाकर चूमा था। पति ने अचानक पूछा, "क्या हुआ, आज कुछ खोई खोई लग रही हो।" कविता ने मुस्कुराकर कहा, "कुछ नहीं, बस तुम्हारी वापसी की खुशी में नींद नहीं आई।" झूठ बोलते वक्त उसकी आवाज कांपी नहीं, यह देखकर वह खुद हैरान थी।
दोपहर को पति खाना खाकर सो गए। घर में सन्नाटा छा गया। कविता बालकनी में खड़ी होकर नीचे जिम की तरफ देख रही थी। उसका फोन फिर वाइब्रेट हुआ। आरव का मैसेज था, "सिर्फ पांच मिनट। पीछे वाले गेट पर।" कविता ने मैसेज को घूरा, फिर डिलीट कर दिया। उसने खुद से कहा कि यह गलत है, पति घर में सो रहे हैं और वह यह सब सोच भी कैसे सकती है। पर उसके पैर खुद ब खुद दरवाजे की तरफ बढ़ गए।
उसने धीरे से दरवाजा खोला, चप्पल पहनी और सीढ़ियों से नीचे उतर गई। पीछे वाला गेट आधा खुला था और आरव वहां खड़ा था, काली टीशर्ट में, हाथ में पानी की बोतल। "तुम सच में आ गई," उसने कहा और कविता का हाथ पकड़कर उसे गेट के पीछे खींच लिया। "पति सो रहे हैं," कविता ने कहा, "मुझे वापस जाना है।" आरव ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और कहा, "पांच मिनट भी नहीं हुए और तुम वापस जाने की बात कर रही हो।" फिर उसने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वह चुंबन धीरे धीरे गहरा होता गया। आरव की जीभ कविता के मुंह में घूम रही थी और कविता की उंगलियां उसकी टीशर्ट को मुट्ठी में भींच रही थीं। कविता ने महसूस किया कि उसकी सलवार के अंदर सब कुछ गीला हो रहा है। आरव का हाथ उसकी कमर से नीचे सरकता हुआ उसकी गांड पर आ गया और उसने जोर से दबा दिया। कविता के मुंह से हल्की सी सिसकारी निकली। "धीरे," उसने कहा, "कोई देख लेगा।" आरव ने हंसकर कहा, "देखने दो, मुझे फर्क नहीं पड़ता।"
आरव ने कविता को गेट के पीछे की दीवार से लगा दिया और उसका कुर्ता ऊपर उठा दिया। उसने उसके पेट पर चूमा, फिर नाभि पर जीभ फिराई। कविता की सांसें तेज हो गईं। आरव ने उसकी सलवार का नाड़ा खींचा और अपना हाथ अंदर डाल दिया। उसकी उंगलियां कविता की चूत पर घूमने लगीं और कविता ने अपनी आंखें बंद कर लीं। "आरव," वह फुसफुसाई, "यहां नहीं।" आरव ने कहा, "यहीं, अभी। तुम्हारा पति सो रहा है और तुम मेरी बाहों में हो, इससे ज्यादा मजा कहां।"
कविता ने आरव की पैंट की जिप खोली और उसका लंड बाहर निकाल लिया। वह कड़ा और गर्म था। उसने उसे अपने हाथ में लेकर धीरे धीरे हिलाना शुरू किया। आरव ने उसकी चूत में दो उंगलियां डाल दीं और अंदर बाहर करने लगा। कविता की टांगें कांपने लगीं। उसने आरव के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और उसके कान में कहा, "और तेज।" आरव ने उसकी चूत को अपने लंड से रगड़ना शुरू किया और फिर एक ही झटके में अंदर डाल दिया।
कविता ने अपनी चीख को रोकने के लिए आरव के कंधे पर काट लिया। आरव उसे दीवार से लगाकर धक्के मार रहा था, हर धक्का पहले से गहरा। कविता की चूत से पानी बह रहा था और आरव का लंड अंदर बाहर हो रहा था। "तुम मेरी हो," आरव ने उसके कान में कहा, "तुम्हारा पति चाहे घर में हो, तुम मेरी हो।" कविता ने जवाब में उसकी पीठ को नाखूनों से खरोंच दिया। दोनों की सांसें एक दूसरे में मिल रही थीं।
कुछ ही मिनटों में कविता का शरीर अकड़ गया और वह झड़ गई। उसकी चूत ने आरव के लंड को जोर से जकड़ लिया और आरव भी रुक नहीं पाया। उसने अपना पानी कविता की चूत के अंदर ही छोड़ दिया। दोनों कुछ पल वैसे ही दीवार से लगे खड़े रहे, पसीने से भीगे हुए। कविता ने अपने कपड़े ठीक किए, आरव की तरफ देखा और बिना कुछ कहे सीढ़ियों की तरफ भाग गई। पीछे से आरव की आवाज आई, "शाम को फिर मिलते हैं।"
फ्लैट में पहुंचकर कविता ने दरवाजा धीरे से बंद किया। पति अभी भी सो रहे थे। वह बाथरूम में गई, ठंडे पानी से मुंह धोया और आईने में खुद को देखा। उसके गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे और गर्दन पर एक हल्का सा निशान था। उसने उसे छिपाने के लिए दुपट्टा ठीक किया। उसका दिल अभी भी तेज धड़क रहा था। उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था और साथ ही एक अजीब सी खुशी भी हो रही थी।
कविता बाथरूम से बाहर आई तो पति करवट बदलकर जाग चुके थे। उन्होंने उसकी तरफ देखा और कहा, "तुम्हारे होंठ सूजे हुए लग रहे हैं, क्या हुआ।" कविता ने हंसकर कहा, "धूप में घूमने से हो गया होगा।" पति ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने पास खींच लिया। "इंदौर में तुम्हारी बहुत याद आई," उन्होंने कहा और उसके गाल पर चूमा। कविता ने उनकी बाहों में खुद को ढीला छोड़ दिया, पर उसके मन में आरव का चेहरा था। पति का हाथ उसकी कमर पर था और वह उसे धीरे धीरे सहला रहे थे। कविता ने सोचा कि काश वह इस पल में पूरी तरह मौजूद हो पाती, पर उसका शरीर अब किसी और की आदत का गुलाम बन चुका था।
पति ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके ऊपर आ गए। उन्होंने उसके कुर्ते के बटन खोलने शुरू किए। कविता ने उन्हें रोका नहीं, पर उसकी आंखें छत पर टिकी थीं। पति ने उसकी गर्दन पर चूमा, फिर उसके सीने पर हाथ रखा। कविता का शरीर जवाब नहीं दे रहा था। उसने पति को धीरे से कहा, "अभी नहीं, मैं थकी हुई हूं।" पति ने समझदारी दिखाते हुए कहा, "ठीक है, रात को सही।" कविता ने राहत की सांस ली, पर साथ ही अपराधबोध भी हुआ। वह अपने पति से झूठ बोल रही थी और आरव के लिए तरस रही थी, यह सच अब उससे छिपाए नहीं छिप रहा था।
शाम को पति जागे तो उन्होंने कहा, "चलो आज बाहर खाना खाते हैं।" कविता ने हां कह दी, पर उसका मन बार बार फोन की तरफ जा रहा था। खाने की मेज पर पति ने पूछा, "तुम जिम कब से नहीं गई।" कविता ने कहा, "कल से फिर शुरू करूंगी।" यह कहते वक्त उसे आरव की शाम वाली बात याद आ गई। उसने फैसला किया कि आज शाम वह घर से बाहर नहीं निकलेगी। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
रात को पति नहाने गए तो कविता बेडरूम में कपड़े बदल रही थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। कविता के हाथ रुक गए। इतनी रात को कौन हो सकता है। उसने धीरे से दरवाजा खोला और सामने खड़ा शख्स देखकर उसकी सांस रुक गई। आरव खड़ा था, हाथ में जिम का बैग, चेहरे पर वही बेखौफ मुस्कान। "तुम्हारा कुछ सामान जिम में रह गया था," उसने कहा, "वही देने आया हूं।" बाथरूम से पानी की आवाज आ रही थी। कविता ने घबराकर कहा, "तुम अभी जाओ, पति घर में हैं।"
आरव ने एक कदम अंदर रखा और फुसफुसाया, "तो क्या हुआ, मैं तो बस सामान देने आया हूं।" उसकी आंखों में शरारत थी और कविता समझ गई कि यह आदमी अब रुकने वाला नहीं है। बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई। कविता का दिल गले में आ गया। उसने आरव की तरफ देखा, आरव ने उसकी तरफ देखा, और तभी पीछे से पति की आवाज आई, "कौन है, कविता।" अगला भाग जल्द आ रहा है।
उस रात जिम बंद होने के बाद आरव ने कविता को मैसेज किया था कि लॉकर रूम में उसकी एक चीज रह गई है। कविता जानती थी कि यह बहाना है, पर वह फिर भी पहुंच गई थी। जिम में सन्नाटा था, सिर्फ एक ट्यूबलाइट जल रही थी। आरव शॉवर रूम के दरवाजे पर खड़ा था, तौलिए में लिपटा हुआ, उसके बाल गीले थे।
कविता ने कहा, मेरी क्या चीज रह गई है, तो आरव ने उसे अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया। शॉवर की हल्की आवाज के बीच आरव ने उसका कुर्ता उतार दिया और उसे दीवार से लगा दिया। ठंडी टाइल्स कविता की पीठ से लगीं तो वह सिहर उठी। आरव ने उसकी चूत पर अपना मुंह रख दिया और जीभ से चाटने लगा। कविता ने उसके बालों को कसकर पकड़ लिया।
फिर आरव ने उसे घुमाकर झुका दिया और पीछे से अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। हर धक्के के साथ शॉवर का पानी छिटक रहा था और कविता की सिसकियां गूंज रही थीं। उसने पीछे मुड़कर आरव को देखा और कहा, और तेज करो। आरव ने उसकी गांड पर एक थप्पड़ मारा और धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी। कविता झड़ गई और उसकी चूत ने आरव के लंड को जकड़ लिया। आरव ने भी अपना पानी उसके अंदर छोड़ दिया और दोनों हांफते हुए वहीं बैठ गए।
हिंदी गंदी कहानी: कविता और आरव का आखिरी राज़, Part 3
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